1. || इंसानकी हैसीयत ||

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    बस भूलने की कगार पर था तू, यह इंसानियत होती है क्या? एक अस्तित्वहीन जीवने दिखाया, हे इंसान तेरी हैसियत है क्या? बम और गोली के बलबूतेपर तू, छाती ठोक ठोक कर उछलता था। गिरगिटकोभी शर्मा आ जाए इस भांति, पल-पल रंग बदलता था। चल पड़ा था हैवानको सिखाने, देख...