Gaurav Gatha 2012 - Private View

Gaurav Gatha 2012 – Private View

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Poem ID: 30

Poem Title: Vibhajan Me
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: July 6, 2012
Poem Submission Date: September 15, 2012 at 8:20 am

Poem:

Wo Aaazadi nhi thi
wo kewal ek samjhuta tha
jab kisi ne balidani itihas par
kalis pota tha.

Poem ID: 31

Poem Title: माँ की पुकार ……!
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: August 9, 2012
Poem Submission Date: August 15, 2012 at 8:08 am

Poem:

माँ की पुकार ——

न हिन्दू , न मुसलमान
न सिख , न ईसाई .
मेरे आँचल के लाल
तुम सब हो भाई भाई
गौर से देखो मुझे
मै तुम सबकी माई .

क्यूँ लड़ते हो आपस में
बैर की भावना
मन में क्यूँ समाई
कर दोगे हज़ार टुकड़े , मेरे
क्या यही कसम है तुमने खाई.

सत्ता के नशे में चूर
चश्मा कुर्सी का चढ़ा है ऐसा ,
कि नज़रे घुमाते ही ,
चारो तरफ बस ,
कुर्सी ही कुर्सी नज़र आई..
आँखों से टपकती हैवानियत में
लुटती हुई माँ कहीं नजर ही न आई .

भारत की सरजमीं को सीचा था,
जिस प्यार व एकता ने ,
आज फिर वही
टूटती – बिखरती नज़र आई
कटते जा रहे है अंग मेरे ,
ममता आज मेरी ,
बहुत बेबस नज़र आई ….!

आतंकवाद , भ्रष्टाचार और हैवानियत से
छलनी कर सीना मेरा ,
ये कैसी विजय है पाई .
माता के तो कण – कण में बसी है,
शहीदो के प्यार व त्याग की गहराई .

मत कटने दो अब अंग मेरा
बहुत मुश्किलों से ,
बेडियो से ,
मुक्ती है पाई
तुम सब तो हो भाई-भाई
गौर से देखो मुझे
मै हूँ तुम सब की माई .

सुनो हे वत्स
अपनी इस धरती
माँ की पुकार
इसी माटी पे जन्मे
वीर लाल , छोड गए है
बंधुत्व की अमित छाप
पर तुम्हारी करतूतों से
माँ हो रही जार -जार .
एक वक़्त था जब
धरा उगलती थी सोना
आज कोख हो रही उजाड़
आँचल भी हुआ है तार तार
यह कैसी ऋतु आई

खाओ कसम न करोगे
अपने भाई का सर कलम
न खेलो खूनी होली
ना काटो मेरे अंग
दो मिसाल एकता
और भाई चारे की
तो सुरक्षित हो जाये वतन
जन्मभूमि तुम्हारी आज
मांग रही तुमसे यह वचन
मेरे आँचल के लाल
तुम सब तो हो भाई भाई
गौर से देखो मुझे मै
तुम सब भी प्यारी माई.

——— शशि पुरवार

Poem ID: 32

Poem Title: ये कैसी स्वतंत्रता ?
Genre: Karuna (pathos)
Poem Creation Date: August 14, 2012
Poem Submission Date: August 14, 2012 at 7:26 pm

Poem:

आजकल भारत मा की परवाह कौन है करता ,
जाने दो कैसे भी हो अपना तो काम है चलता

आम आदमी अपना पेट छोड़ कर और कुछ नही भरता
कहता है, मैंने तो नेता चुना वो क्यू नही लड़ता
नेता कहता है हमें मत”दान” करो, अब जब कर दिया है तो उसका भुगतान करो
नेता कहता है “हाहा” तु इसी तरह रहेगा मरता पर मेरा जेब रहेगा हमेशा भरता

बहुत कहने पर जब नेता को थोड़ी शर्म है आती,
तब सरकार योजना भवन से नयी योजना है लाती
जब दुखिया कहता है भूख,ग़रीबी,बीमारी है कुछ तो कहो,
तब नेता कहता है योजना बना तो दी उसी से खुश रहो.

दुखिया कहता है नेताजी मा बीमार है ज़रा देखें तो ना जाने क्यू परेशान है
नेताजी कहते है तेरी मा है तू जाने तब दुखिया ने कहा नेताजी, भारत मा है ज़रा पहचाने
जिसके तुम जैसे पे ना जाने कितने एहसान है.

ऐसे कपूतो को देख कर मा का दिल ना जाने कितना है दुखता,
ये क्या गम नही की आजकल तिरंगा भी चौराहो पर है बिकता
साल में दो ही दिन तो भारत मा की जय जयकार होती है
बाकी ३६३ दिन ये मेरी मा तो लाचार होती है.

राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान में अंतर जानते नही,तिरंगे का रंग पहचानते नही,
फिर भी सीना ताने कहते है अरे हम तो है हिन्दुस्तानी,आजकल के नये यांगीस्तानी.
आज अगर शहीद भगत सिंग,सुखदेव और राजगुरु होते
अपने इस भारत की दशा देखकर ना जाने कितना रोते
कहते हे मा, माफ़ करना हमें व्यर्थ गया हमारा बलिदान
पर चिंता मत करो कल को फिर कोई शहीद होगा ये सोच कर की यही तो है मेरा हिन्दुस्तान.

आज़ादी क्या होती है ये लड़नेवालो से जानो,
अरे तुम्हे तो मुफ़्त में मिली है ज़रा इसकी कीमत पहचानो.

जय हिंद, जय भारत

Poem ID: 33

Poem Title: भारत माँ तू खास
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: October 10, 2012
Poem Submission Date: October 18, 2012 at 7:03 am

Poem:

दिलो में गूंजती जय जयकार
भारत माँ तू खास

पूरब हो या पश्चिम
उत्तर हो या दक्षिण
दिलो में हो काबा या काशी
हम सब भारत के रहवासी
तिरंगे का सम्मान
मिलकर गाते राष्ट्रगान
यही भारत का आधार

दिलो में गूंजती जय जयकार
भारत माँ तू खास

गांधी का अहिंसा पाठ
गौतम की मीठी बानी
गंगा जमुना औ सरस्वती
का निर्मल निर्मल पानी
वेद मंत्रो की बहती रवानी
पुरखो की गौरवशाली कहानी
यही है भारत का श्रींगार

दिलो में गूंजती जय जयकार
भारत माँ तू खास

शहादत का बाँध सेहरा
जंग पे बढ़ाये कदम
शत्रु के हर यतन
नेस्तनाबूद कर देंगे हम
बाँध सर पे कफ़न
जाँ तुझपे कुर्बान वतन
कभी नहीं मानेगे हार

दिलो में गूंजती जय जयकार
भारत माँ तू खास

शांति अमन का पैगाम
जन गन मन का गुणगान
तिरंगा भी कहे —
भारत गुणों की खान
यहाँ की संस्कृति महान
देश हमारी आन-बान -शान
हमें भारतीय होने का गुमान
भारत की माटी में भी प्यार

दिलो में गूंजती जय जयकार
भारत माँ तू खास .

–शशि पुरवार

Poem ID: 34

Poem Title: स्वाधीनता सभा
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: August 15, 2012
Poem Submission Date: August 15, 2012 at 1:56 pm

Poem:

सजती सभा स्वाधीनता,
सम्राट सा सम्मान है,
सम्पूर्ण सृष्टि सार सरिता,
सज रहा सुरधाम है,
स्वतंत्र स्वयंभू स्वराज्य का,
हो रहा उदघोष है,
लहरा रहा तिरंगा,
हर साँस में अब जोश है ||

इस तिरंगे में छिपे है,
सेकड़ो तप त्याग के,
छोड़ वैभव को गए जो,
हसते इस संसार से,
ढूंढता योवन जिन्हें था,
दे रहे थे आहुति,
शूलिया थी थक गयी,
उनकी कहानी न रुकी ||

ओज के वो पुष्प थे,
थे इस धरा के पुत्र वो,
रच गए इतिहास स्वर्णिम,
मृत्यु से अभिरुद्द हो,
देखती थी स्वप्न जो,
आँखे हमेशा वो रही,
है हकीकत सामने,
उपहार उनकी देन ही ||

नाद मस्तक ताल हृदय,
बढ रहे अविराम है,
प्रेरणा उनसे मिली,
जीवन नहीं विश्राम है,
स्वप्न है बस अब सजाना,
बाकि क्या जिए और क्या मरे,
और क्या वह जिंदगी,
जो न हुई राष्ट्र के लिए ||

Poem ID: 35

Poem Title: भारत माँ, तुझसे करते हैं वादा
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: August 15, 2012
Poem Submission Date: August 15, 2012 at 4:34 pm

Poem:

तुझे सम्पूर्ण और मुकम्मल आजादी दिलाने का है पूरा पूरा इरादा
हे भारत माँ, करना है तुझसे आज एक छोटा सा आशामयी वादा

जकडी और उलझी हुई है आज भी तू ना जाने किन किन बेड़ियों में
इन बेड़ियों के टुकड़े टुकड़े करने का किया है खुद से चाहतभरा वादा

वक्त ने जो तेरी साँसों में दे दी है भ्रष्टाचार की दूषित दुर्गन्ध
उसे महकती खुशबू में बदल डालने का है हमारा ओजस्वी वादा

अमीर होता जा रहा है अमीर और गरीब दरिद्रता में पिस्ता जा रहा
मेहनत और चेष्टा के बल पर इन रेखाओं को जड़ से मिटाने का है वादा

लूटमार और धोखाधड़ी का दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है रोग
इस घृणा भरी बीमारी पर भी नियंत्रण लाने का है पूरा पूरा वादा

क्यूँ रहें बिना पढ़े लिखे आज भी हमारे साथी नौजवान और युवतियां
गाँव गाँव और गली गली साक्षरता और शिक्षा लाने का किया है वादा

कहते हैं तुझे हम माँ और लुटते देखते हैं बेधड़क इज्ज़त स्त्रियों की
आज अपनी कथनी और करनी में समानता लाने का है सक्षम वादा

आज मांग रही है भारत माँ एक मुख़्तलिफ़ और अनोखा सा बलिदान
उस न्यारी सी उसकी चाहत पर मर मिटने का है हम सभी का इरादा

तुझे सम्पूर्ण और मुकम्मल आजादी दिलाने का है पूरा पूरा इरादा
हे भारत माँ, करना है तुझसे आज एक छोटा सा आशामयी वादा

Poem ID: 36

Poem Title: शब्द दर शब्द
Genre: Karuna (pathos)
Poem Creation Date: September 1, 2012
Poem Submission Date: September 1, 2012 at 4:30 pm

Poem:

शब्द दर शब्द
चुक रही हैं इबारतें
गीता के श्लोक
वेदों की सीख
कुरआन की आयतें
शब्द……………
१- ‘बांटों और राज करो’
फिरंगी- रणनीति थी
पर असम, काश्मीर ने
पुनः वह गाथा कही
हाशिये पर हाँफते
लाचारियों के काफिले
बेसबब चलती रहीं –
सियासती कवायदें
शब्द……………
२- भेड़ सम जनचेतना
जो हांकते थे रहनुमा –
कुर्सियों के खेल ने
पहुंचा दिया उनको कहाँ!
लूट, बदहाली पे फिर
ये शोरोगुल तब किसलिए?
मर गयी इंसानियत
ज़िंदा रहीं रवायतें
शब्द …………….
३- देश है जिनकी बपौती
व्यवस्था जिनकी गुलाम
घोटालों का खेल खेलें रोज वे
सुलगे अवाम
तांडव से आतंक के –
फिर बस्तियां उजड़ी तमाम
पंगु जनादेश पर
कायम रही विरासतें
शब्द ………………….

Poem ID: 37

Poem Title: प्रजातंत्र का अंग
Genre: Karuna (pathos)
Poem Creation Date: April 12, 2012
Poem Submission Date: August 16, 2012 at 9:34 am

Poem:

धीरे धीरे कोहरा छंटने लगा
मानव सभ्यता की देहलीज पर
एक नए सूर्य का
उदय हुआ !
रात के सन्नाटे से परेशान
सोया हुआ आदमी
नींद से जगा !
प्रकाश के चकाचौंध से
उसकी आँखें चुंधिया गईं !
आँखें मल – मल कर उसने देखने की कोशिस की !
कुछ दिखा –
कुछ नहीं दिखा !
लाशों के बीच
तिरंगा पकडे एक बूढा –
कृशकाय !

आजादी की कीमत
“लाश”
आजादी का मतलब
“बंटवारा”
हिस्सा -हिस्सा आजादी !
टुकड़े -टुकड़े आजादी !!
उस बूढ़े की कल्पना साकार हुई !
भारत आजाद हुआ !
और आज
वही भारत ,
धर्म और राजनीति का अखाडा है !
बेबस मजबूर मनुष्य ,
इस आजादी का मारा है !!

अब रावण
राम से नहीं डरता !
क्योंकि उसके पास
खद्दर की शक्ति है !
वर्दी का हथियार है !
खद्दर से बलात्कार होता है !
वर्दी से अपहरण !

किन्तु आखिर में

वह भी तो
“प्रजातंत्र का ही एक अंग” है

Poem ID: 38

Poem Title: गणतंत्र को नमस्कार है।
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: February 1, 2011
Poem Submission Date: August 17, 2012 at 10:58 am

Poem:

भुखों और गरीबों की लग रही भरमार है।
फिर भी इस गणतंत्र को नमस्कार है।
हिन्दी यहाँ की फिजा में घुट रही,
अंग्रेजी का बढ़ रहा हमपे अधिकार है।
फिर भी इस गणतंत्र को नमस्कार है।
देशी उत्पादों से कतराते लोग यहाँ,
विदेशी सामानों से सजता रोज बाजार है।
फिर भी इस गणतंत्र को नमस्कार है।
सभ्यता और संस्कृति रोती सरे बाजार है।
फिर भी इस गणतंत्र को नमस्कार है।
छोटों-बड़ों को प्यार और आदर देना,
भुल गया यहाँ हर परिवार है।
फिर भी इस गणतंत्र को नमस्कार है।
अपनी तहज़ीब अपनी जिम्मेदारी के धर्म से,
दूर होकर जीने का यहाँ हो चुका आगाज है।
फिर भी इस गणतंत्र को नमस्कार है।
शहीदों की मजारों पर भी अब,
लगता राजनीति का घिनौना बाजार है।
फिर भी इस गणतंत्र को नमस्कार है।
मजहबों के नाम पर रोज इंसान बँटते हैं,
भाईचारे के पाठ से बचता यहाँ का समाज है।
फिर भी इस गणतंत्र को नमस्कार है।
अमन और शांति से भटक रहा मुल्क है,
उग्रवाद का रोज झेलता दंश है।
फिर भी इस गणतंत्र को नमस्कार है।
बेरोजगारी की मार है जीना दुश्वार है।
फिर भी इस गणतंत्र को नमस्कार है।
विदर्भ में किसान जल रहे,
हर तरफ खेतों मे पसरा हाहाकार है।
फिर भी इस गणतंत्र को नमस्कार है।
पैसे लुटती सरकार चल रही,
कानून भी बेचारी यहाँ बीमार है।
फिर भी इस गणतंत्र को नमस्कार है।
पुलिस जनता पर धौंस जमा रही,
न्यायपालिका यहाँ की लाचार है।
फिर भी इस गणतंत्र को नमस्कार है।
इज्जत के नाम पर बली चढ़ रही,
खापों की चल रही सरकार है।
फिर भी इस गणतंत्र को नमस्कार है।
आरक्षण देने दिलाने की राजनीति हो रही,
शिक्षा व्यवस्था की स्थिती बेकार है।
फिर भी इस गणतंत्र को नमस्कार है।
भ्रष्टाचार खुली हवा में हो रहा,
पूरी व्यवस्था यहाँ शर्मसार है।
फिर भी इस गणतंत्र को नमस्कार है।
अनाज के एक-एक दानों की मारामारी है,
कालाबाजारी करने की हर रोज होती तैयारी है।
फिर भी इस गणतंत्र को नमस्कार है।
भारत तो है गौरव हमारा,
चाहे यह कितना भी लाचार है।
फिर भी इस गणतंत्र को नमस्कार है।

Poem ID: 39

Poem Title: बलिदान चाहिए
Genre: Other
Poem Creation Date: February 8, 2007
Poem Submission Date: August 18, 2012 at 1:28 pm

Poem:

मेरे देश को भगवान नहीं,सच्चा इंसान चाहिए,
गांधी-सुभाष जैसा बलिदान चाहिए।

इंसानियत विलख रही इंसान ही के खातिर,
इंसाफ दे सके जो ऎसा सत्यवान चाहिए…..
मेरे देश को भगवान नहीं सच्चा इंसान चाहिए।

बचपन यहां पे देखो बन्धुआ बना हुआ है,
दिला सके जो इनको मुक्ति ऎसा दयावान चाहिए….
मेरे देश को भगवान नहीं सच्चा इंसान चाहिए।

मुखौटों के पीछे क्या है कोई जानता नहीं है,
दिखा सके जो असली चेहरा ऎसा महान चाहिए….
मेरे देश को भगवान नहीं सच्चा इंसान चाहिए।

रोज़ मर रहे हैं यहां कुर्सी के वास्ते,
जो देश के लिए जिए-मरे,ऎसा इक नाम चाहिए….
मेरे देश को भगवान नहीं सच्चा इंसान चाहिए।

सदियों के बाद भी जो इंसां न बन सकी है,
समझ सके जो इनको इंसान,ऎसा कद्र्दान चाहिए…
मेरे देश को भगवान नहीं सच्चा इंसान चाहिए।

मेहनत से नाता टूटा सब यूंही पाना चाहें,
गीतोपदेश वाला कोई श्याम चाहिए…
मेरे देश को भगवान नहीं सच्चा इंसान चाहिए

Poem ID: 40

Poem Title: आज जो भी है वतन
Genre: Other
Poem Creation Date: August 15, 2012
Poem Submission Date: August 20, 2012 at 11:02 am

Poem:

आज जो भी है वतन आज़ादी की सौग़ात है।
क्‍या दिया हमने इसे यह सोचने की बात है।

कितने शहीदों की शहादत बोलता इतिहास है।
कितने वीरों की वरासत तौलता इतिहास है।
देश की ख़ातिर किये हैं ज़ाँबाज़ों ने फ़ैसले,
सुनके दिल दहलता है वह खौलता इतिहास है।
देश है सर्वोपरि न कोई जात-पाँत है।।

आज़ादी से पाई है, अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता।
सर उठा के जीने की, कुछ करने की प्रतिबद्धता।
सामर्थ्‍य कर गुज़रने का, हौसला मर मिटने का,
काम आऍ देश के, कुछ करने की कटिबद्धता।
सर झुके ना देश का, बस एक ही ज़ज्‍़बात है।।

सोएँगे बे‍फ़ि‍क्र हो, लुटेंगे ये सच्‍चाई है।
एक जुट होना ही होगा, देश पे बन आई है।
आतंक भ्रष्‍टाचार ने, अम्‍नो वफ़ा पे घात कर,
दी चुनौती है हमें, फ़ज़ा भी अब शरमाई है।
पत्‍थर जवाब ईंट का, घात का प्रतिघात है।।

महँगाई, घूस, वोट की राजनीति अत्‍याचार है।
क़ानून का मखौल भी, अब होता बारबार है।
जनतंत्र में जनता ही त्रस्‍त, ख़ौफ़ में जीती रहे,
रक्षक बने भक्षक, तो कैसा, कौनसा उपचार है।
खुशहाल हो हर हाल में, वतन तो कोई बात है।।

करें नमन शहीदों, हुतात्‍माओं और वीरों को
बापू, जवाहर, लोहपुरुष और सैंकड़ों वज़ीरों को।
बनाना है सिरमौर, फहराना है परचम विश्‍वम में,
अक्षुण्‍ण अपनी सभ्‍यता, संस्‍कृति की नज़ीरों को।
गिद्ध दृष्टि डाले, ना किसी की भी औक़ात है।।

आज जो भी है वतन, आज़ादी की सौग़ात है।।

Poem ID: 41

Poem Title: राजनीती की परिभाषा
Genre: Hassya (comic)
Poem Creation Date: August 21, 2012
Poem Submission Date: August 21, 2012 at 5:13 pm

Poem:

इस राजनीती की अपनी ही परिभाषा है..
यहाँ हर एक नेता की अपनी ही एक भाषा है|

हर कोई यहाँ अपनी ही रोटी सेक रहा है ..
भूके के पेट पर मोबाइल की रोटी फेक रहा है ||

अब १०० रूपये तक का बिल सरकार भरेगी..
और देश की भूखी जनता, गूगल से रोटी डाउनलोड करेगी||

मटर पनीर और शाही पनीर का एम.एम.एस होगा.
और धन्यवाद दो अहलुवालिया को क्यों की ..
२० रुपये कमानेवाला अगले साल से अमीर होगा .||

किसी ने सही कहा है, पैसो से पेट नहीं भरता..
पर पैसे वाला इंसान, कभी भूखा नहीं मरता ||

मंत्री हमारे अल्पहारी कहलाते है ..
आम जनता से हमदर्दी है, इसीलिए
खाना कम और पैसा पेट भर खाते है ..||

दलाली मैं हाथ तो पंतप्रधान के भी काले है
किस से जाके कहे..
आम इंसान को दो वक़्त की रोटी के लाले है ..||

देश मैं हर तरफ अकाल ही अकाल है..
मनमोहनजी हमारे कहते है ..
माँ हमारी मैडम जी .. और हम उनके ही लाल है ||

बंद करो ये एम.एम.एस, दंगो के आसार है ..
पर शिन्देजी जरा ध्यान से ..
ये एम.एम.एस तो, मन मोहन सिंह का ही सार है||

क्या होगा इस देश का,
यहाँ की बेबस जनता.. राजनीती से बेजार है|
हाथ का चांटा गाल पर है तो कमल कीचड़ से सरोबार है
घडी, साइकिल की धीमी रफ़्तार है तो लालटेन होते हुए भी अन्धकार है ||

ए मेरे दिल तू बेकार ही रोता है ..यहाँ मौत मतलब इंसान लम्बा सोता है..
क्यों की ये गिद्धों की बस्ती है मेरे दोस्त .. यहाँ मौत ही उत्सव होता है.

Poem ID: 42

Poem Title: गंगे की कसम हमको …………….
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: August 22, 2012
Poem Submission Date: August 22, 2012 at 4:01 pm

Poem:

”तिरंगे की कसम ”
गंगे की कसम हमको ,तिरंगे की कसम हमको |
थके उड़कर भी जो न उस परिंदे की कसम हमको ||
लड़ेंगे आखिरी दम तक , लिए हैं हाथ गंगाजल ;
जिन्होंने देश को लूटा , करेंगे हम भसम उनको ||
—-सुनील ‘नवोदित’ ,मानिकपुर

Poem ID: 43

Poem Title: अपने भावों को ज्वाला बनाकर….
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: August 23, 2012
Poem Submission Date: August 22, 2012 at 7:36 pm

Poem:

अपने भावों को बनाकर, ले आया मैं एक ज्वाला
अश्कों से भिगो कर पन्ने, इन्ख्लाब है लिख डाला
अपने देश की मिट्टी को, घर घर में पहुँचाने को
लगा हुआ हूँ इसी जुगत में, रातों को जला डाला

अपने भावों को बनाकर, ले आया मैं एक ज्वाला
मात्रभूमि के चरणों को, जज्बातों से सजा डाला

न मुझको जरुरत है, प्रियतम के सहारे की
न मुझको अभीलाशा है, लोगों के इशारे की
मैं तो कर रहा हूँ करता रहूँगा, भारत का गुणगान
जब भी होगी बात वही फिर, हिंद के जयकारे की

अपने भावों को बनाकर, ले आया मैं एक ज्वाला
अल्फासों के फूलों की, चढ़ा रहा हूँ मैं माला

मेरी रातों में जब भी, रत जागों के दीप जलते हैं
भगत आज़ाद के शब्दों , के जैसे तीर चलते हैं
मेरी खामोशियाँ भी, मुझको अक्सर छेड़ जाती हैं
वो जब नेता जी के किस्से, मुझसे बोल पढ़ते हैं
मैं लिखने से पहले, हर दम रो पढता हूँ
जब बिस्मिल की कविताओं के, शब्द गूँज पढ़ते हैं

अपने भावों को बनाकर, ले आया मैं एक ज्वाला
कुछ और पीने की जरुरत ही क्या, जब देश प्रेम ही पीडाला
है विकट समस्या मेरे देश की, यहाँ जन जन में वो धार नहीं
संबेदनाओं से भरे हें बहुत पर, कुछ करने को तैयार नहीं
क्या इस मिट्टी के उन सब पर, कोई उपकार नहीं
बस नौकरी पैसा ही काफी है, किसी बेबस का प्यार नहीं
यहाँ पग पग पर मासूमों पर, क्या होते अत्या चार नहीं
जो घूम रहे हें सडको पर एक वक़्त के भोजन की खातिर
क्या वो इसी देश के आधार नहीं
क्या भुखमरी और गरीबी के आगे, हम लाचार नहीं
चन्द लोगों के हाथ में, देश की पतबार नहीं
पीड़ी दर पीड़ी चलाते, जो हम पर अधिकार नहीं
जो मिली थी आजादी, क्या वो कुछ एक का प्रभार नहीं
बेरोज गारी में मिट रही हे जवानी, क्या ये हमारी हार नहीं
किसानो की जिन्दगी है भंवर में, ये हमे कतई स्वीकार नहीं
ऐसे कई सवाल हैं, जो उठते हैं जहन में
क्या उनका जबाब देने के लिए, हम जबाबदार नहीं

अपने भावों को बनाकर, ले आया मैं एक ज्वाला
मिलेगा तब सुकून, जब बनेगा कोई स्वदेशी हाला

माना हमने, बहुत विकाश कर लिया है
सिनेमा से लेकर खेलों तक, इतिहाश रच दिया है
अब हम कुछ हटकर भी, आजमाने लगे हैं
विक्की डोनर और पान सिंह तोमर, बनाने लगे हैं
अब तो ओलंपिक में भी, पदक आने लगे हैं
हम चांद पर पहले भी पहुंचे हैं
अब दुनिया के उपर भी, कुछ कुछ छाने लगे हैं
पर क्या काफी है जो पाया है?
सोचो हमने थोड़े के लिए, कितना कुछ गबाया है?

अपने भावों को बनाकर, ले आया मैं एक ज्वाला
कुछ पायेंगे तब, जब भरेगा देशभक्ति का प्याला

परन्तु आज भी कहाँ सुधरा है, इस देश का इंसान
गुजरात को बीते ज़माने हो गए, तो आज निशाने पर आसाम
क्या हिन्दू क्या सिख, और क्या है मुसलमान?
जलती है छाती भारत की, जब लोग करते हैं त्राहिमाम
नहीं चाहिए अच्छाई को, आज के युग मैं कोई भगवान
बस चाहिए तो हर डगर पर, सच्चे और अच्छे इंसान
जहां रहें झोपड़े और महल बराबर, बस चैन से जिए आबाम
दो वक़्त का खाना खाकर,हर रोज सोये हर एक जान
पढने लिखने के लिए, हर सुबह जाए मासूम तमाम
मिल जुल कर रहने लगे, हिन्दू हो या मुस्लमान
चाहे न पढ़े गीता, चाहे न पढ़े कुरान
हर एक करे बस, हिन्दुस्तान का गुणगान
मंदिरों में चाहे न हो पूजा, और मस्जिदों में चाहे न हो अजान
हर एक जुबान पर हो बस, एक मेरा तुम्हारा हिन्दुस्तान
एक ही भाषा हो हमारी, एक ही हो मजहब हमारा
एक ही पेशा हो और बस, एक ही हो हमारी पहचान
बस एक इंसान बस एक इंसान बस एक इंसान

अपने भावों को बनाकर, ले आया मैं एक ज्वाला
जब होगा सच जो देखा है, तब होगा महा गाला
है यही मेरा सपना, मेरा देश हो निराला
तभी देपाऊंगा शहीदों को, उनके हक़ की जय माला
जय भारत जय हिन्दुस्तान का, होगा हर तरफ बोल बाला
जय भारत जय हिन्दुस्तान का, होगा हर तरफ बोल बाला.

Poem ID: 44

Poem Title: chingaaree
Genre: Shant (peaceful)
Poem Creation Date: August 24, 2012
Poem Submission Date: August 24, 2012 at 12:28 pm

Poem:

अटवी के प्रस्तर ,
खंड -खंड घर्षण,
चकमक चकाचौध ,
जठरानल को शान्ति दे ,
अखंड जीवन की,
लौ चिंगारी ।
बन मशाल,
प्रेरणा की मिसाल ,
मंगल की,
चमकी चिंगारी ।
चहुँ ओर ,
तम का का डेरा।
जन सैलाब चिंगारी से,
अभिभूत वडवानल घेरा ।
व्याकुल आने को नया सवेरा,
रानी के खडगों की चिंगारी ।
अमर कर गई ,
जन-जन में जोश भर गई ,
सत्य अहिंसा प्रेम दीवानी,
बापू की स्वराज चिंगारी ।।
नूतन अलख जगा गई ,
देशभक्त बलिदानी,
चिंगारी दावानल फैला गई ।
युग – युग के ज़ुल्मों को सुलझा गई ।
नई रात ,
नई प्रात: करा गयी ।
चिंगारी मशाल,
मिसाल बन ,
स्वाभिमान बन,
राष्ट्र गीत सुना गयी ।।

Poem ID: 45

Poem Title: विशाल लोकतंत्र के गगन पे नवविहान है. सपूत मातृभूमि के भरो नयी उड़ान है.
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: August 14, 2012
Poem Submission Date: August 24, 2012 at 12:34 pm

Poem:

विशाल लोकतंत्र के गगन पे नवविहान है.
सपूत मातृभूमि के भरो नयी उड़ान है.

ह्रदय में गर्व की तरंग स्वर्णमय अतीत पर.
कदम बढ़ें सुमार्ग सत्य शान्ति औ सुनीति पर.
यकीन ध्रुव रहे सदा मनुष्यता की जीत पर.
युगल अधर मुखर रहें ये मातृभू की प्रीत पर.
वक्ष पर सहन किये असंख्य घात काल के.
स्वबन्धुओं की फूट के विदेशियों की चाल के.
अनेक हैं परन्तु एक व्यंजनों से थाल के.
अनेक रूप रंग के विहंग एक डाल के.
तेरे बलिष्ठ बाहुओं पे देश को गुमान है.
सपूत मातृभूमि के भरो नयी उड़ान है.

विशाल लोकतंत्र के गगन पे नवविहान है.
सपूत मातृभूमि के भरो नयी उड़ान है.

आज पुण्य पर्व पर सुनो कथा पुनीत है.
सिखा दिया ‘महात्मा’ ने भय के पार जीत है.
बिगुल बजा स्वतंत्रता गली गली समर ठनी.
शहीद वीर सैनिकों के रक्त से मही सनी.
हरेक जाती धर्म के अबाल वृद्ध बालिका.
बढे पुनीत पंथ पर ले प्राण पुष्प मालिका.
अदम्य शौर्य का सुफल मिला हुए नयन सजल.
वसुंधरा पे वन्दिनी के मुक्ति के खिले कमल.
फहर फहर फहर उठा तिरंगा स्वाभिमान है.
सपूत मातृभूमि के भरो नयी उड़ान है.

विशाल लोकतंत्र के गगन पे नवविहान है.
सपूत मातृभूमि के भरो नयी उड़ान है.

तू शिल्पकार देश की समृद्धि के मकान का.
है जागरूक संतरी हमारी आन बान का.
लहलहाते खेत राजमार्ग पुष्प क्यारियाँ.
हुनर तेरे ही हाथ का ढ़ो रहा सवारियाँ.
तू रुग्ण मानवों के हेतु जग रहा अहर्निशा.
विपत्ति आपदा में भूल भूख क्लान्ति औ तृषा.
लहू की बूँद जब तलक है तन में ऐसी आन कर.
जियेगा देश के लिए यही जिया में ठान कर.
अमर रहे अनादि काल तक सुकीर्ति गान है.
सपूत मातृभूमि के भरो नयी उड़ान है.

विशाल लोकतंत्र के गगन पे नवविहान है.
सपूत मातृभूमि के भरो नयी उड़ान है.

Poem ID: 46

Poem Title: झंडा न झुकने पाये.
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: August 15, 2012
Poem Submission Date: August 24, 2012 at 8:30 pm

Poem:

प्राण भले ही जाये मित्रो,
पर झंडा न झुकने पाये.

झंडा हमारी शान है मित्रो,
मर मिटने की आन है मित्रो.

इसके तीन रंगों का फलसफा
महत्वपूर्ण और महतारा है

केसरिया बाना वीरों का
श्वेत शांति का नारा है

हरा रंग खुशहाली जग में
यही सन्देश हमारा है.

बीच चमकता चक्र सितारा,
धर्म कर्त्तव्य की धारा है.

शान है अरु आन हमारी,
सर झुकाती इसे हिंद सारी.

जितनी भी बाधाएं आयें,
पर झंडा न झुकने पाये.

आजादीपन की यही निशानी,
इसके पीछे कई कहानी.

ओ’ डायर का इतिहास काला,
भूलो न तुम जलियान वाला.

गोलियों की जम कर झड़ी थी,
नींव आज़ादी की पड़ी थी.

याद करो वो खूं बहाना,
झंडा कभी न नीचे झुकाना.

सब कहो कि सर कटेगा,
झंडा नीचे नहीं झुकेगा.

जय हिंद!
बोलो जय हिंद!!

Poem ID: 47

Poem Title: नवचेतना
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date:
Poem Submission Date: August 26, 2012 at 6:32 am

Poem:

—————————————–
जगतगुरु, सोने की चिड़िया कहकर देती दुनिया जिसको सम्मान,
भला ऐसे हिन्दोस्ताँ पर क्यों ना हो हमको अभिमान |
भारत माँ की लाज को रखकर हुए कई बेटे बलिदान,
सबसे पहले इस कवि का उन बेटों को अर्पित एक सलाम ||१||

आज हमारा देश है जकड़ा मजबूरी की जंजीरों में,
खुरच-खुरच कर नोच लिया इस बरगद को रकीबों ने |
सोना-चाँदी-हीरे देती थी जो धरती कभी यहाँ,
आज वहीं के बच्चे हीरे देखते हैं तस्वीरों में ||२||

धन-दौलत ले गये फिरंगी जन-जन को तडपा-तडपा,
देवभूमि को हिला दिया इन दैत्यों ने उत्पात मचा |
धर्म-ग्रन्थ, संस्कृति भी लूटी, हिन्दोस्ताँ को दिया सता,
बस जो कुछ वो छोड़ गये वो थी उनकी पाछिमी अदा ||३||

आज हमारे देश में पसरी मुसीबतें हैं कुछ घनघोर,
बढ़ रही हैं कुरीतियाँ और बढ़ते जा रहे हैं कुछ चोर |
नेतागण और अधिकारी बन गये हैं रिमझिम सावन के मोर,
अब आप बताओ ऐसे में ये देश भला जाये किस ओर ||४||

जेब गरम करने की फिराक में बैठे हैं आला अधिकारी,
घर पर बैठे मौज मनाते कहते हैं खुद को सरकारी |
दहेज़, नशा जैसी कुप्रथायें हिला रही हैं नीव हमारी,
नष्ट करें इनको खुद ही हम, ताकि खुश रहे पीढ़ी सारी ||५||

अपने पेट तक ही सीमित हो रहे हैं अब हम,
दूसरों की कुछ भी फिकर नही है |
‘लाखों बच्चे आज भी भूखे ही सोते हैं सड़कों पर’,
गिरती लाशों की कोई कदर नहीं है ||६||

कहीं कर्ज का बोझ दबा देता है गरीब किसानों को,
कहीं “कॉलेज की रैगिंग” निगल लेती है मासूम जवानों को |
रोगों से लड़ते-लड़ते जाती है जान गरीबों की,
मौला ना करे ऐसी हालत भी हो कभी रकीबों की ||७|||

आज जरुरत है चमन को जवानों की जवाँ जवानी की,
आज जरुरत है वतन को हिन्दोस्ताँ की नयी कहानी की |
आज अमल कर सके अगर हम, तो कल दुनिया हमसे हारी,
अगर आज भी आँखें मूंदी, गुलाम बनेगी पीढ़ी सारी ||८||

रुष, चीन, अमरीका, जापान, हैं दुनिया के देश महान,
इन सबसे भी आगे होगा इक दिन अपना हिन्दोस्तान |
तब जाकर अमर शहीदों की सफल हो सकेगी कुर्बानी,
वरना चिताओं पे मेलों तक ही, सीमित रहेगी उनकी कहानी |
वरना चिताओं पे मेलों तक ही, सीमित रहेगी उनकी कहानी ||९||
——————————————
— “जय हिन्द”/ ——- “आशीष नैथानी / हैदराबाद”
——————————————-

Poem ID: 48

Poem Title: Sandesha Pak ke naam
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: August 14, 2012
Poem Submission Date: August 26, 2012 at 6:48 am

Poem:

संदेशा पाक के नाम
काश्मीर पे हक़ जताने वाले,अपने गिरेबां में झांक ज़रा!
भारत को आंख दिखाने से पहले अपनी ताकत को आँक ज़रा!!
घात लगाये बैठा है जो तू घुसपैठ की ताक में!
अंदेशा भी नहीं तुझको की मिल जायेगा खाक में!!

संसार के भूगोल से ,तू इतिहास बन कर रह जायेगा !
कफ़न ओढ़े दफनाये कब्र की लाश बन कर रह जायेगा !!
सीमा पार करने वालों की अब टांग तोड़ दी जाएगी !
भारत की तरफ उठने वाली हर आँख फोड़ दी जाएगी !!

दान में मिली जमीन पर तू इतना अकड़ दिखाता है!
लाहौर करांची पर पकड़ नहीं, काश्मीर पे पकड़ दिखाता है!!
नापाक इरादे तेरे स्वप्न बन कर रह जायेंगे !
दुनिया के सामने अस्तित्व भी तेरे प्रश्न बन कर रह जायेंगे !!

अमेरिका ,जो तुझे अपने टुकड़ों पर है पाल रहा !
उदीयमान हिंद का आगे बढ़ना उसे भी अब शाल रहा !!
अभी वक़्त है,सबक ले तू पिछले युद्धों के अंजाम से !
कर ले सर परस्ती अब भी अपने देश के आवाम से !!

कब तक भूखा रहकर पैसे गोले -बारूद में लगाएगा !
जियो और जीने दो का मंत्र अपना ,तेरा भी भला हो जाएगा !!

Poem ID: 50

Poem Title: माँ भारती
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: August 15, 2012
Poem Submission Date: August 27, 2012 at 6:57 am

Poem:

तुम तो माँ हो, सब कुछ सहती हो
संतानों का फिर भी सम पालन करती हो

हो सहस्त्र श्वान कपूत एक सिंह उस पर भारी
नरसिहों ने दी आहूति तुझे है बारी बारी

है वहनियों में सिंह रक्त सभी को दिखला दो
गर्जन से अपने इस व्योम को भी दहला दो

उठो और माता के चरणों को धो दो
रहे पल्लवित धरा ऐसे बीजों को बो दो

माँ भारती का कर स्मर्ण अपने मन में
कर्तव्य पथ पर बढ़ चलो इस जीवन में

जब तक तुम हो माँ का ऊचा शीश रहे
रहे फैलता दशदिक् उनका आशीष रहे

आए हैं नरसिंह और अभी अनंत आयेंगे
तेरे चरणों में जो अपनी आहूति दे जायेंगे

© रतीश

Poem ID: 51

Poem Title: जागो भोर भई
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: August 28, 2012
Poem Submission Date: August 29, 2012 at 7:03 am

Poem:

जागो भोर भई
घर मै बैठा कोसता हूँ, देश के हालात को
ये बुरा है, सब गलत है, रिश्वती अंदाज़ को
आज सो कर जब उठा, तो मन ने पुछा बावले
क्या दिया तुने अभी तक देश के अंजाम को
कोसते ही कोसते, उम्र बीती मगर
लूटेरे, लूटते रहे देश के हर गॉव को
देख निकले है दीवाने हाथ में मसाल है
आज मौका है, मिला ले, हाथो से अपने हाथ को
लूट का रावन हिमालय से बड़ा अब हो गया
अब लगेंगे हाथ लाखो, राम के हर बाण को
जंग मेरी ही नहीं, ये जंग तेरी भी तो है
जब लगेंगे हाथ सब, हिला देंगे इस बुनियाद को
रोने, कोसने, से जालिम कभी हिलता नहीं
पलट पन्ने इतिहास के, हक भीक में मिलता नहीं
या तू भी कूद जा, जंग के मचान पे
या कोसना तू बंद कर, जालिमो के नाम पे

— जीवन

Poem ID: 52

Poem Title: भारत : सोने की चिड़िया
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: July 2, 2009
Poem Submission Date: September 4, 2012 at 1:50 pm

Poem:

था कभी सोने कि चिड़िया, देश मेरा किसी काल में ।
पर लग गयी इसको नज़र, डाला फिर डेरा काल नें ।
आए बहेलिये परदेस से, इसको फंसाने जाल में ।
आकाश में फिर उड़ सके, छोड़ा नहीं इस हाल में ।

छाया अँधेरा देश पर, सब लोग घबराने लगे ।
भेष धर मेहमान का, और बहेलिये आने लगे ।
करके भरोसा उनपर दिया था, धोखा वतन की आन को ।
छीना उसीने घर हमारा, पूजा था जिस मेहमान को ।

रख सकता नहीं लेकिन, पिंजरे में कोई तूफ़ान को ।
चल पड़े वीर फिर जोड़ने, बिखरे हुए सम्मान को ।
लाए वो आज़ादी छीनकर, देकर स्वयं की जान को ।
दे दिया उन्होंने देश यह, अपनी हर इक संतान को ।

फिर हुआ सवेरा एक दिन, पर जागा न को कोई नींद से ।
हो गयी थी चकनाचूर, यह देश, छीना था जिस उम्मीद से ।
देश अपना पर हर इक, वासी पराया हो गया ।
एक गहरी नींद में, हर एक भारतवासी सो गया ।

है नहीं गुलाम कोई भी अब, पर आज़ादी नज़र आती नहीं ।
अपनी यह पावन सभ्यता, अब किसी को भाती नहीं ।
नींद में है प्रत्येक मानव, पर दिन रात है वो जाग रहा ।
उगते हुए सूरज को छोड़, उलटी दिशा में भाग रहा ।

क्यों किसी के ज्ञान को, अंग्रेज़ी में अब हम नापते हैं ।
मातृभाषा बोलने में, अल्फाज़ क्यों अब कांपते हैं ।
यह देश क्यों है इंडिया, अब मन को ये भाता नहीं ।
आज़ाद है गर देश तो, भारत ही क्यों कहलाता नहीं ।

यूँ तो कहने को सभी में, प्यार हम बस बांटते हैं ।
लेकिन धरम के नाम पर, इंसान को हम काटते हैं ।
हर गली-कूचे में बस, दंगे और फंसाद हैं ।
फिर भी हमें यह मान है, की देश अब आज़ाद है ।

हर शख्स दोषी है, नहीं माफ़ी के काबिल कोई भी ।
भारत माँ यह सब देखकर, चिल्लाई भी और रोई भी ।
कर अनसुनी माँ की पुकार, बस प्रगति हम करते रहे ।
फिर भी हैं लाखों लोग जो, भूख से मरते रहे ।

चिर नींद में सोने से पहले, इक बार तो जागो भी अब ।
ऋण है तुम पर भी तो माँ का, पर उसे उतरोगे कब ।
समय यही है श्रेष्ठ, तुम अब तो निद्रा त्याग दो ।
इस देश को भारत बनाने में, सभी अब भाग दो ।

अपनी यह पावन सभ्यता, हर एक जन अपनाएगा ।
ऋण चुकाने के लिए, वापस हर बेटा आएगा ।
चमकेगा सूरज एक दिन, फिर जग में भारतवर्ष का ।
होगा वही सबसे अधिक, मेरे लिए दिन हर्ष का ।
होगा वही सबसे अधिक, मेरे लिए दिन हर्ष का ।

Poem ID: 53

Poem Title: मेरा भारत देश
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: August 20, 2012
Poem Submission Date: August 29, 2012 at 2:24 pm

Poem:

मेरा भारत देश
१ . भारत मेरा देश है .सुन्दर और न कोय
शीश हिमालय श्रेष्ठ है ,सागर -जल पग धोय .

२. अनुपम भारत देश है ,विविध जाति औ रूप
भाषा रीति -रिवाज़ भी ,धर्म-पर्व बहुरूप .

३ .सोने की चिड़िया जिसे ,कहते आये लोग
शत्रु बहुत आये यहाँ ,करने इसका भोग .

४ . कई और पहुँचे यहाँ ,करने को व्यापार
फिर फैलाया राज हित ,अतिक्रामक कर भार.

५ .सदियों की परतंत्रता ,पीड़ा अत्याचार
शीश बहुत से कट गए ,कोड़े मार प्रहार.

६. अपनी ही धरती लुटी ,खुद बेबस लाचार
तब क्रांति की लौ उठी ,जागा माँ हित प्यार .

७ .मंगल पांडे ने किया ,क्रांति बिगुल का नाद
रानी झाँसी की लड़ी ,हो दुश्मन बर्बाद ,

८. समय चक्र चलता रहा ,मिलते आये वीर
खुदीराम बिस्मिल भगत ,आजाद बहुत वीर

९. फाँसी के फंदे मिले .कालापानी दंड
हँसते ही वे सह गए ,सारी पीर प्रचंड

१०. ख्वाब अनोखा एक जो ,देख गए वे वीर
आज़ादी मिलकर रहे ,टूटेगी ज़ंजीर .

११ .बाँध कफ़न सर पर चले ,माटी को धर माथ
प्राणदान मंज़ूर था ,छूट न जाये साथ .

१२. अमर हुए कुछ जन यहाँ ,हुए बहुत ग़ुमनाम
आज़ादी इक ध्येय था ,और तिरंगा शान .

१३. बिना ढाल तलवार के ,सत्य अहिंसा साथ
मिलकर चल इक राह पे , ली आज़ादी हाथ .

१४. भूल न जाएँ हम कभी, वीरों के बलिदान
स्वतंत्रता जो दे गए ,बढ़ा देश का मान .

१५. गए विदेशी छोड़ के ,प्यारा भारत वर्ष
आज़ादी अब मिल गयी ,सभी मनाते हर्ष .

१६.आज़ादी अनमोल है, इसका हो सम्मान
लहराए ऊँचा सदा , अमर तिरंगा शान

१७.भारत देश स्वतंत्र है ,काम रह गए शेष
जनता के हिस्से नहीं,आया फर्क विशेष

१८.सूरज सा भारत हुआ भ्रष्टतंत्र का ग्रास
आज़ादी है नाम की ,सबके मन भय त्रास.

१९. सर्व -धर्म सम भाव हों ,राष्ट्र धर्म हो एक
अनेकता में एकता ,कर्म सभी के नेक.

२०.सुरक्षा हेतु स्वदेश की , सीमा प्रहरी वीर
देते जान सहर्ष जो ,सम्मानित हों वीर .

२१.बच्चों का बचपन खिले , युवकों को हो काम.
वृद्ध उपेक्षित हों नहीं ,नारी का सम्मान .

२२.कृषक और मजदूर भी, पायें अपना भाग
कोई भी अवसाद में, करें न जीवन त्याग .

२३.बेटी भी परिवार में ,पाए सम सम्मान
पढ़ लिख के उन्नति करे ,ऊँची भरे उड़ान .

२४.शष्य श्यामला हो धरा ,फल फूलों से पूर
नदियाँ कल कल कर बहें,सभी कलुष से दूर

२५.शीतल मंद पवन बहे ,धूल प्रदूषण हीन
खुली हवा में रह सकें ,जन आतंक विहीन .

२६.हर दिन खुशियों से भरा ,ईद ,तीज त्योहार
होली दीवाली मनें,गलबहियों के हार .

२७.हिन्दू ,सिख व ईसाई , पारसी मुसलमान
जैन बौद्ध से मिल बने ,भारत मेरा महान.

२८.जब तक सूरज चाँद हैं ,वसुंधरा आकाश
गंगा यमुना नित बहें ,सुख समृद्धि का वास .

२९.स्वतंत्रता की शान पे ,तन मन से बलिहार
प्राणों को अर्पण करें , रक्षा हेतु नर -नार .

३० भारतीय हों सब प्रथम ,भेदभाव हो दूर
भाई भाई मिल रहें ,खुशियाँ हों भरपूर .

३१. विश्व -देश , अन्तरिक्ष में ,चमके तेरा नाम
जय हिंद की गूँज से माँ, तुमको करें सलाम .

जय हिंद !!!

Poem ID: 54

Poem Title: हिमालय की गुहार
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: August 30, 2012
Poem Submission Date: September 3, 2012 at 4:41 pm

Poem:

सर्व दिशाओं मे फैलाकर,
अपने वर्चस्व की ज्योति |
खड़ा हिमालय देख रहा,
अपनी गंगा मैली होती ||

है जो शक्ति का महा कुण्ड,
वो आज दिखे लाचार खड़ा
अपने होने पर गर्व नहीं,
पी रहा घूंट है शर्म भरा
अपने सपूत ने नाम डुबाकर,
अपनी माँ की छीनी धोती
खड़ा हिमालय देख रहा,
अपनी गंगा मैली होती ||

वो क्या अब खुद मे अहम भरे,
और क्या शत्रु पर बाध्य बने
वो था सीने पर ढाल लिए,
पर पीछे के वार हैं घाव बने
भ्रष्ट आत्मा वैध जताकर,
है दवा पिलाई फिर खोटी
खड़ा हिमालय देख रहा,
अपनी गंगा मैली होती ||

फिर आज बज उठे एक नाद
ललकार भरी हुंकार भरी
फिर आज जग उठें हम मानस
क्यूँ अब तक की कर दी देरी
वो पत्थर दोनों हाथ उठाकर
जला रहा यलगार ज्योति
खड़ा हिमालय देख रहा,
अपनी गंगा मैली होती ||

Poem ID: 55

Poem Title: हे भारत भूमि!
Genre: Shant (peaceful)
Poem Creation Date: November 3, 2009
Poem Submission Date: September 3, 2012 at 3:17 pm

Poem:

शामे अवध हो या सुबहे बनारस
पूनम का चन्दा हो चाहे अमावस

अली की गली, महाबली का पुरम हो
निराकार हो या सगुण का मरम हो

हो मज़हब रिलीजन, मत या धरम हो
मैं फल की न सोचूँ तो सच्चा करम हो

कोई नाम दे दो कोई रूप कर दो
उठा दो गगन में धरा पे या धर दो

तमिलनाडु, आंध्रा, शोनार बांगला
डिमापुर, कवरत्ति, पुणे माझा चांगला

सूरत नी दिकरी, मथुरा का छोरा
मोटा या पतला, काला या गोरा

सिन्धु ए हिन्द से आती हैं लहरें
हिमालय सी ऊंची, पहुँची हैं गहरे

ग़ज़ब की खुमारी, मदमस्त मस्ती
है भारत ह्रदय में, यही मेरी हस्ती

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