Gaurav Gatha 2012 - Private View

Gaurav Gatha 2012 – Private View

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Poem ID: 56

Poem Title: ‘भारत’ कहलाने आए हैं
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: September 3, 2012
Poem Submission Date: September 4, 2012 at 10:02 am

Poem:

कर तिलक तेरी माटी का माँ
ये शपथ उठाने आए हैं
रोशन करने को तेरा जहाँ
हम खुद को जलाने आए हैं

कुछ लोग घरों से निकले हैं
कुछ आवाज़ें तो गूँजी हैं
ये शोर नही हंगामा कोई
बस सबको जगाने आए हैं
रोशन करने को……

क्रांतिकारियों के बलिदान को
यूँ ही न जाने देंगे
उनके सपनों का ‘भारत’
सच्चाई में लाने आए हैं
रोशन करने को……

हम हैं संतान तेरी इस पर
है अपरिमित गर्व हमें ए माँ
हम भी अपने कृत्यों से तेरा
सर ऊँचा उठाने आए हैं
रोशन करने को……

अंधेरों से कोई कह दे ये
दिन उनके ढालने वाले हैं
जो अस्त न हो, तेरे क्षितिज पे माँ
सूरज वो उगाने आए हैं
रोशन करने को……

चाह नही तेरे दिव्य भवन की
दीवारों में सजे जीवन
बनके नींव के पत्थर हम तो
खुद को छिपाने आए हैं
रोशन करने को…….

है स्वप्न यही इन आँखों में
तुझे विश्व-गुरु बनता देखें
दुनिया के शिखर पे ‘तीन-रंग’
तेरे हम फहराने आए हैं
रोशन करने को……

तेरी संस्कृति तेरी सभ्यता
से जग ने जीना सीखा
तेरी ‘गौरव-गाथा’ को
हम फिर से गाने आए हैं
रोशन करने को……

भारत धर्म है भारत कर्म है
पहचान हमारी भारत है
धर्म जाति के भेद मिटाके
‘भारत’ कहलाने आए हैं
रोशन करने को……

Poem ID: 57

Poem Title: अब फिर सुभाष चाहिए……
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: July 5, 2012
Poem Submission Date: September 4, 2012 at 6:20 pm

Poem:

भगत सिंह सुखदेव राजगुरु, और आज़ाद चाहिए।
वतन की है पुकार ये, अब फिर सुभाष चाहिए॥

जल रहे हैं लोग बस, दिल मे ही नफ़रत लिए।
भाई है प्यासा ख़ून का, भाई से अदावत लिए॥
मज़हब के नाम पे, ये खूनी खेल रोकना होगा।
मजहब का सियासत से, ये मेल रोकना होगा॥
नफ़रत की नहीं दिल में, बग़ावत की आग चाहिए।
वतन की है पुकार ये, अब फिर सुभाष चाहिए॥

एक ओर सीमा पर, सैनिकों ने ख़ून बहाया है।
तो दूजी ओर गद्दारो ने, वतन बेचकर खाया है॥
गद्दारो को अब यहाँ, सबक सही सिखलाना होगा।
चौराहो पर सरेआम ही, फांसी पर लटकाना होगा॥
समझौता क्या इनसे, बस सम्पूर्ण विनाश चाहिए।
वतन की है पुकार ये, अब फिर सुभाष चाहिए॥

अपने ही वोट से हमे यूं, कब तक चोट मिलती रहेगी।
ये आग भ्रष्टाचार की, कब तक यूं निगलती रहेगी॥
पानी नहीं इसे बुझाने, अपना ख़ून बहाना होगा।
दिलो मे अंगार लिए, अब सड़कों पर आना होगा॥
एकल नहीं इसके लिए, संगठित प्रयास चाहिए।
वतन की है पुकार ये, अब फिर सुभाष चाहिए॥

है हर इंसा के दिल में, सुभाष कहीं सोया हुआ।
स्वार्थ और लालच में कहीं, दबा हुआ खोया हुआ॥
सोये हुये सुभाष को, इस दिल मे जगाना होगा।
भारतपुत्रों देश बचाने, सबको आगे आना होगा॥
जोश भरे भारतवासी, नहीं ज़िंदा लाश चाहिए।
वतन की है पुकार ये, अब फिर सुभाष चाहिए॥

समझें जीवन मूल्य, खुद से क्रांति की शुरुवात हो।
स्वयं को बदले पहले, फिर औरों से कोई आस हो॥
है देशप्रेम तो देश वास्ते, ये क़ुरबानी करनी होगी।
औरो से पहले खुद अपनी, नीयत ही बदलनी होगी॥
गैरो से पहले खुद अपनी, रूह से जवाब चाहिए।
वतन की है पुकार ये, अब फिर सुभाष चाहिए॥
वतन की है पुकार ये, अब फिर सुभाष चाहिए॥

Poem ID: 58

Poem Title: ए कलम तू कर मदद
Genre: Karuna (pathos)
Poem Creation Date:
Poem Submission Date: September 8, 2012 at 5:44 am

Poem:

एक अनकही कहानी लबज़ों की जुस्तजू मे भटक रही है कहीं,
ए कलम,तू करे मदद तो मिले पहचान उसे खुद मे ही…
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कुछ आदम्या एहससों ने बना लिया है दिल मे ही अपना आशियाना,
ए कलम,तू करे मदद तो सारे जज़्बात बाहर आएँगे तो सही…
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वो पुकारें तो पुकारे किसे,सारा जहाँ है सदा ही स्वार्थी,
ए कलम,तू करे मदद तो मिल जाए अब मंज़िल यहीं…
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ये महेंगाई है गगनचुंभी,इसका हल मिले तो कैसे मिले,
ए कलम,तू करे मदद तो कोई आगे आज आएगा तो सही…
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अमीरो को है बिरियानी खानी,राजनीति ने दुनिया लूटी,
ए कलम,तू कर मदद वरना ग़रीबों क लिए रोटी भी नही

Poem ID: 59

Poem Title: देश प्रेम
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: August 30, 2012
Poem Submission Date: September 10, 2012 at 10:14 am

Poem:

नहीं जागेगा देश प्रेम
नहीं खौलेगा हमारा लहू
हमारे चेहरे पर शिकन भी न आयेगी
जब तक हमारे अस्तित्व पर प्रहार नहीं होगा।

जलती हैं किसी की बेटियां तो हमें क्या
हमारा घर तो महफूज है।
हो जाने दो तार – तार घर की इज्जत को
हमारे घर पर तो चार चांद लगे हैं।

मानसिकता हो गई है विकृत हमारी
नहीं तो क्या सुन नहीं पाते पड़ोस में उठती चीखें।
मूक बधिर दृष्टिहीन बने देखते हैं सब कुछ
ये तो न था संस्कार और संस्कृति हमारी।

हमारे स्वार्थ ने देश को कहां पहुंचा दिया
सोने की चिड़ि‍या को कर्जे में डुबा दिया।
मंदिरों में छिपा है बहुमूल्य खजाना
कूड़े में ढूंढते हैं बच्चे दाना – दाना।

खेतों में अनाज सड़ रहे हैं
लोग भूख से मर रहे हैं।
गणेश जी तत्पर हैं दूध पीने के लिए
किसान विवश हैं स्वहत्या करने के लिए।

देश में बेरोजगारी भत्ता मिलता है, रोजगार नहीं मिलता
कितने ही परिवारों को दो जून का खाना नहीं मिलता।
राशन कार्ड, बी.पी.एल. कार्ड बनवाने में टूट जाती है कमर
गरीबी तो मिटती नहीं, नेताओं पर होता है न कोई असर।

आज हम व्यस्त हैं फेसबुक पर फ्रैंड सर्किल बढ़ाने में
इन्टरनेट, चैटिंग, इयर फोन लगाने में।
हम तो खुश हैं रोशन हैं हमारे घर के दिये
भले ही जलता हो किसी गरीब का लहू इसके लिए।

हमारे लिए कुछ लोग अनशन कर रहे हैं
हम ड्राइंग रूम में बैठे लाइव टेली कास्ट देख रहे हैं।
देश सेवा के लिए हैं हमारे सैनिक सीमा पर उन्हें ही लड़ने दीजिए
हमें तो बस घर बैठ चुपचाप तमाशा देखने दीजिए।

गांधी जी की तस्वीर को हमने घर आफिस में सजाया है
उन्हीं के सामने बैठकर अवैध व्यापार चलाया है।
कोई ऐसा क्षेत्र नहीं बचा जहां से हमने पैसा नहीं कमाया है
और की तो बात ही क्या हमने तो पशुओं का चारा खाया है।

देश की अस्मिता से हम खिलवाड़ कर रहे हैं
स्वयं भी डूब रहे हैं देश भी डुबा रहे हैं।
घुसपैठिये को शरण देकर हम अपनी ही जान गवां रहे हैं
कसाब जैसे आतंकी को हम छप्पन भोग खिला रहे हैं।

हम क्यों अपना लहू बहायें
मरणोपरान्त पुरस्कार पायें।
हो – हल्ला करने से कुछ नहीं होगा
जितना मिलना है वह हमारा ही होगा।

हमसे नहीं होगा गांधी सुभाष जैसा काम
हमें कौन सा करना है मरने के बाद अपना नाम।
देश स्वतंत्र है हम आजाद हैं
सबसे जरूरी हमारी जायदाद है।

इस आजादी के लिए दी थी बहुतों ने कुर्बानियां
आज भी देश में मौजूद हैं उनकी निशानियां।
हम नहीं कहते कि वे महान नहीं थे
हमारे कोई भी ”गुण” उनमें विद्यमान नहीं थे।

राम के आदर्श और सुभाष की वीरता
गांधी की विनम्रता और बुद्ध की धीरता।
कैसे सजायेंगे स्वयं को इन विशेषताओं से
हम तो भरे हुए हैं अहंकार दुर्भावनाओं से।

इन महान हस्तियों को हम श्रद्धांजलि देते हैं
हर पुण्यतिथि पर पुष्पांजलि देते हैं।
क्या हुआ जो रोज उनकी वंदना नहीं होती
होली, दिवाली भी तो रोज कहां मनती।

हम जीवित होते तो संभवतः कुछ गुंजाइश होती
मृत देह विद्रोह कहां से करती।
आत्मा होती तो आवाज देती
चुपचाप अत्याचार सहन नहीं कर लेती।

कब तक हसेंगे हम दूसरों पर
अब हमारी भी बारी आयेगी।
रहेगा न कोई संगी न साथी
जब काल की सवारी आयेगी।

कहां है यह देश और कहां है देश भक्ति
कैसे जागेगा देश प्रेम और कैसे मिलेगी मुक्ति।
है कोई जो कुछ रास्ता सुझाता
कुछ हमारी सुनता कुछ अपनी सुनाता।

भ्रष्टाचार, अनाचार के खिलाफ कौन लड़ेगा
हमें ही गांधी सुभाष बनना पड़ेगा।
आज एक नहीं सैकड़ो गांधी चाहिए
देश पर मिटने वाले भारतवासी चाहिए।

आओ, अपने मृत देह को जीवित करें
लुप्त हुई आत्मा का आह्वान करें।
प्राण, शक्ति, मन, क्रम, वचन से,
देश की सेवा में जुट जायें तन, मन, धन से।

हर किसी की जुबान पर हो बस एक नाम
देश की रक्षा ही हो बस अपना काम।
सौगंध लें नहीं करेंगें कभी भ्रष्टाचार
सहेंगे नहीं जुल्म और अत्याचार।

फिर से लायेंगे देश में खुशहाली और शांति
हम एक हैं एक रहेंगे अब रहे न कोई भ्रांति।
चुपचाप बैठकर तमाशा हम न देखेंगे
दूसरों के दुःख से अपनी आंखें हम न सेकेंगे।

त्याग कर जातिवाद, क्षेत्रवाद और न जाने कितने विवाद
हम अपनायेंगे प्रेमवाद और अहिंसावाद।
भूल कर सारे झगड़े फसाद, मिल कर करेंगें अपना काम
तभी देश फूलेगा फलेगा और विश्व में होगा इसका नाम।

तब नहीं जलेंगी किसी की बेटियां
अत्याचारियों के पैरों में होंगी बेड़ि‍यां।
रहेगा न कोई अमीर न गरीब
शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास होगा सबके करीब।

समानता का अधिकार स्वतः ही सबको मिलेगा
प्रगति का प्रति दिन इक द्वार खुलेगा।
हर मासूम के चेहरे पर चमक होगी
देश पर होने को कुर्बान हर जान तत्पर होगी।

जब जागेगा देश प्रेम
जब खौलेगा हमारा लहू
हमारे चेहरे पर शिकन जब आयेगी
तब हमारे अस्तित्व पर प्रहार कभी नहीं होगा।

Poem ID: 60

Poem Title: विश्व भारती
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: September 11, 2012
Poem Submission Date: September 11, 2012 at 11:36 am

Poem:

विश्व भारती

रवि-रथ उतरता जिस धरा पर सर्व प्रथम

भूतल पर सतरंगी आँचल फैलाती किरण

रौशन हो दम्काती कंचन सा हर एक कण

पर्वतों के भाल पर सिंदूरी तिलक कर रमण

जहाँ गूंजते मंदिर में घण्टे,घर घर आरती

ऋचा ऋचा पुकारती, वही है विश्व भारती

धर्मभूमि सिन्धु अम्बरा सुदेव निर्मितम धरा

स्वप्न सी सुकुमार ,स्वर्ण छवि सी मोहती

राम कृष्ण की जन्मभूमि, यहीं यहीं ऋतंभरा

नव प्रभात पर नव प्रशस्ति मार्ग खोलती

अप्सराएं जिसकी छटा,फलक से निहारती

ऋचा ऋचा पुकारती,वही है विश्व भारती

धरा थी समृद्ध,प्रचुर खनन सम्पदा से हरदम

अब ये स्वर्णिम शिखर है अतीत की घटना मात्र

विदेशी लुटेरो सम लूट रहे देशी नेता,हर कदम

सत्ता पर छा गए लालची, दबंग स्वार्थी पात्र

महंगाई बेरोजगार की दोहरी मार झेलती

ऋचा ऋचा पुकारती,वही है विश्व भारती,

आतंकी संघों का पनाहगार बना देश ,है डावांडोल

मंत्री ,नाते, रिश्तेदार आकंठ डूबे हुए, डाल रहे फूट

खुदरा बाजार में विदेशी निवेश मंदीद्वार रहा खोल

भ्रष्टाचार की बहती धार, महंगाई ,बेरोजगारी,लूट,

समस्याओं की सूची लम्बी जीभ लपलपाती

ऋचा ऋचा पुकारती ,वही है विश्व भारती

है प्रण न रहने देंगे भ्रष्टाचार की काली परछाई

महंगाई होगी दूर फिर होगा स्थापित रामराज्य

जिनकी कुर्बानियों पर खड़ा भारत दे रहा दुहाई

नींव के उन पत्थरों को नमन ,हो बुराई त्याज्य

जहाँ मिले ऐसा जज्बा,हो नौजवाँ हिम्मती

ऋचा ऋचा पुकारती ,वही है विश्व भारती

लाल बाल पाल,घोष,खुदीराम बोस ,गांधी, नेहरू

आजाद ,पटेल ,मौलाना जैसे आजादी के परवाने

फांसी की कोठरी में हंसी के ठहाके गूंजते चहकते

तलवारों के प्रहार झेल मुस्कुराने में नहीं हिचकते

कातिल को माफ़ कर हंसी खिलखिलाती

ऋचा ऋचा पुकारती,वही है विश्व भारती,

प्रश्न हो जब देश की रक्षा,सुरक्षा,अस्मिता का,

झांसी की रानी,रणचंडिका बन आगे आती नारियाँ

निज कल्पना साकार कर,भू ,अम्बर खंगारती

छछिया भर छाछ पर कान्हा को नचातीं गोपियाँ

अनुसूया त्रिदेवों को शिशु बना पुचकारती

ऋचा ऋचा पुकारती,वही है विश्व भारती,

मेहमानो को जहाँ पूजते आज भी देवतुल्य

एक छत के नीचे रहे साथ चार-चार पीढियां

जहाँ होता सबसे पहले भोजन देवों को अर्पित

दादा पोते का हाथ पकड़ करता पार सीढियां

जहाँ पर मनुष्यता निज स्वरुप संवारती

ऋचा ऋचा पुकारती,वही है विश्व भारती

संतोष भाऊवाला

Poem ID: 61

Poem Title: प्रश्न
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date:
Poem Submission Date: September 22, 2012 at 5:35 pm

Poem:

इक लौ की दीपित शिखा, वर्षों से नयनों में जल रही है ,
कभी मंद कभी आरोहित, यह पीढ़ियों दर पीढियां उतर रही है
कुछ बात है दीवानी इसमें कि बुझती नहीं कभी ये,
सदियों से घने मतवाले तिमिरों को हर रही है
राष्ट्र प्रेम में की इस शमां में आहुत होने को परवाने
माँ धरती कल भी सिरजती थी, और आज भी जन रही है

हिमालय के ललित स्वर्णाभ शिखरों से, आज से युगांतर पहले,
दिखता था एक स्वर्ण पक्षी, सुदूर पूर्व से पश्चिम तक पंख पसारे
इस असीम विभव पर विजय लालसा लिए,
जाने कितने चंगेज़ मंगोल चोटियों से उतरे
फिर उन्हीं रास्तों से लौट गए मुँह की खा के
या रह गये फिर सदा के लिए यहीं के हो के
वैमनस्य कहाँ टिक पता है, सदय उदार कुटुंब की छत के तले

पर कभी जो ये ज्योति मंद पड़ने लगी
गिर्द आत्मश्लाघा की कालिख जो जमने लगी
जब कर्मण्यता राजसी ठाटों में बिखरने लगी
तकनीक के प्रति उदासीनता अपनी कीमत भरने लगी
हाय! परतंत्रता तब सादगी का शील हरने लगी !

वीरांगना जब शोषित होती है, छुप के सबसे भले वह रोती है
पर व्यथा न कभी अधरों तक लाती है,
बस संतान को शौर्यगाथाएँ सुनाती जाती है
उसमें ओज बल बुद्धि भर कर, वह अपना टूटा हृदय जुड़ाती है
और संग्राम दिवस के आने पर, रण तिलक स्वयं सजाती है

मातृभूमि भी सहते सहते सिसक उठी जब
खून से अपने, वो आँसू धोने निकल पड़े उसके सुनंद
कितने शरीर निष्प्राण हुए, दूसरों को देने को उन्हीं का ज़मीं-फ़लक
बहुत कुछ खोकर फिर पा लिया हमने,जो होता वजूद का सबब

वो अनमोल चीज़, जो छीनी गयी थी होते हुए भी हमारी
आयी लौट के ले के दिवाली, और दे के कीमत बड़ी भारी
उमर ग़ुलामी में काट उन्होंने हमारे लिए ला दी आज़ादी
और जब मांगी कीमत जालिमों ने, तो दी अपनी जिंदगानी

खो के, पा के पर छोड़ यहीं सब वो चले गए बिन देखे,
कि खुली फिज़ा में साँस लेना क्या होता है,
इसलिए कि हम आयें जब जहाँ में तो यह न देखें,
कि ग़ैर इशारों पर जीना या मरना क्या होता है !
पर जब जोशो-जुनून और हसरते-ज़िन्दगी की बात तौलें,
तो उनका ख्वाब हमारी हक़ीकत पे भारी होता है !

जो आ गया कर पार सारी मुश्किलों को
क्यों आज उसे बस सँवारना मुश्किल हो रहा है
क्योंकि कुछ लोग सीना ठोंक बदल गए तकदीरों को
पर उन्हीं के वंशजों को बस स्वार्थ निहित दिख रहा है

अधिकार जानते हैं हम सभी अपने, साक्षरता दर भी बढ़ी है
पर क्या तब से अब फिर से नहीं वो ज्योति मंद पड़ी है?
स्वअपेक्षा उन्मुख स्वकर्म तो नहीं, पर आशाएं बहुत बड़ी हैं
मैंने अपनी गलतियाँ नेतृत्व पर और नेतृत्व ने मुझ पर मढ़ी हैं
बन्दर ही सब ले जाता, जब दो बिल्लियाँ आपस में लड़ी हैं
छोटा या बड़ा हिस्सा, क्यों उसमें मेरा नहीं, दूसरे चेहरों पर चमकती जो ख़ुशी है
पर हिस्सा तो हम उसके हल में भी नहीं लेते, समस्या दूसरों की जो सीना ताने खड़ी है

अब ख्वाब बस पलने लगे हैं खुद के आराम और इमारत के
जयंतियों को ही बस याद आते हैं लफ्ज़ शहीदों की इबारत के
अपने सुख के आगे कहाँ दिखते हैं किस्से दूसरों की हरारत के
सब यही मानते हैं क्या बने-बिगड़ेगा मेरी एक हिकारत से

किंचित कड़ियों के परिवर्तन भर से, अभिलेख नूतन गढ़ जाते हैं
तारे भरसक आलोकित करते, जब राकेश अमावास में ढल जाते हैं
अगर इमान दिखे हर भारत पुत्र के काम में, तो उनकी क्या बिसातें हैं,
पद, लाभ, प्रलोभन, या जाति, धर्म, वर्ण, वेश में जो उलझाते हैं

आशियाने बनाते हम खुद वहीँ, और फिर कहते फिजाएँ ही मैली हैं
रखवाले से लेकर रहबर तक, पक्ष और विपक्ष सभी बहुत दोषी हैं,
पर जब आये अपनी बारी, तो हमें भी दिखती क्यों बस थैली है

क्या सत्पथ, सनातन गीता-ध्यायी भारत के लिए सच में कठिन है?
भटके पार्थ को लक्ष्य-बोध कराती, जो पार्थेष- पठित है?

Poem ID: 62

Poem Title: देशभक्ति
Genre: Other
Poem Creation Date: June 17, 2011
Poem Submission Date: September 12, 2012 at 3:53 pm

Poem:

देशभक्ति

याद आती देश की ,
अब केवल दो रोज,
देश पर मर मिटना,
हुई एक घटिया सोच.

कैसे कहूँ? अब मैं ,
देश मेरा महान है,
भ्रस्टाचार, आतंकवाद ,महंगाई से,
जूझता हर इन्सान है.

आज देशभक्ति के नाम पर,
गाने बजा दिए जाते है,
बस जय हिंद बोलकर ,
कम चला लिए जाते है.

लोकतंत्र से विश्वास अब,
उठता ही जाता है,
आम आदमी हमेशा खुदको ,
ठगा ही पता है.

यार किसे हम वोट दे,
सभी की एक है करनी,
देश से पहले हमेशा,
खुद की जेब है भरनी.

अपने दिल की भड़ास ,
आज मैं निकलता हूँ ,
दिल के दर्द को,
कविता द्वारा सुनाता हूँ.

कसाब जैसे आतंकवादियों को,
जेल में रखकर पला जाता है,
आम आदमी को सड़क पर,
खुलेआम मारा जाता है.

कंधार , संसद ,ताज,
भुलाये नहीं भूलता है,
आज भी वो दिन दिल में,
शूल जैसे चुभता है.

आज जेहन में ये आता है,
शायद घर वापस जा ना पाऊ,
रेल में , बस में या सड़क पर,
कहीं बेमौत ना मारा जाऊ.

आज मैं खुद को ,
बहुत बेबस पता हूँ,
चाह कर भी देश के लिए,
कुछ नहीं कर पता हूँ.

बहुत विचार करके मेरे,
दिमाग में ये आता है,
ईमानदारी से अपना कम करना ही,
देश सेवा कहलाता है.

बहुत नहीं तो थोडा करे
करे जो भी मन से करे,
खुद से ईमानदारी सदैव,
अपने मन में धरे.

Poem ID: 63

Poem Title: हिंदुस्तान वाया कश्मीर
Genre: Other
Poem Creation Date:
Poem Submission Date: September 14, 2012 at 8:04 am

Poem:

मैंने कहा कि धरती की है स्वर्ग ये जगह
उसने कहा की अब तुम्हारी बात बेवजह
सुनता जरुर हूँ कि थी ये खुशियों कि जमीं
धन-धन्य से थी पूर्ण, नहीं कुछ कि थी कमी
हिम चोटियाँ ही रचती जिसका खुद सिंगार हैं
बसता है गर कहीं – यहीं परवरदिगार है
झीलों की श्रृंखलाएं यहाँ मन है मोहती
हरियाली यहीं पर है जलवा बिखेरती
केसर की क्यारियां थी, पंक्तिया गुलाब की
कुछ बात ही जुदा थी इसके शबाब की
लेकिन जो मैंने देखा है मजबूर हो गया
गम , दर्द, आह , अश्क से हूँ चूर हो गया
तुम ये समझ रहे हो मुझे कुछ गुमाँ नहीं
तुमने न देखा खून ,आग और धुआं – नहीं
तुमने फकत सजाई है तस्वीर ही इसकी
तुमने पढ़ी किताबों में तहरीर है इसकी
सुनो आज कह रहे हैं मेरे अश्क दास्ताँ
इंसानियत , ईमान का है तुमको वास्ता
मैं दूध पी सका न कभी माँ के प्यार का
नहीं याद मुझको वक़्त हैं बचपन बहार का
माँ ने कभी लगाया नहीं मुझको डिठौना
गीला हुआ तो बदला नहीं मेरा बिछौना
होती है चीज ममता क्या ये जान न सका
मैं माँ की गोद भी तो पहचान न सका
मैं न हुमक सका कभी माता की गोद में
ना उसको देख पाया कभी स्नेह क्रोध में
कभी बाप की ऊँगली पकड़ के चल न पाया मैं
और मुट्ठियों में उसकी मूंछ भर न पाया मैं
उससे न कर सका मैं जिद मिठाई के लिए
आँगन में लोट पाया न ढिठाई के लिए
राखी के लिए सूनी रही है कलाइयाँ
हैं गूंजती जेहन में बहन की रुलाईयां
दिन और महीना याद है न साल ही मुझे
जिस दिन की मेरी ज़िन्दगी के सब दिए बुझे
कहते हैं लोग आग की लपट था मेरा घर
और गोलियां शैतान की ढाने लगीं कहर
कापी , कलम , किताब , मदरसे नहीं देखे
कहते किसे ख़ुशी हैं वो जलसे नहीं देखे
लाशो को ढोकर , कंधो पे हैं गिनतियाँ सीखी
विद्या के नाम शमशान , सजाना चिता सीखी
अब तुम ही कहो इसके बाद क्या हैं ज़िन्दगी
सर हम कहाँ झुकाए , करें किसकी वन्दगी
एक आस की किरण हैं तो जवान फ़ौज के
है जिनकी बदौलत हिंदुस्तान मौज से
उनके भी हाथ बाँधती है रोज हुकूमत
गर है कोई गिला तो अफ़सोस हुकूमत
हर रोज यहाँ बेगुनाह मारे जा रहे
पर जाने कैसे सोचती है सोच हुकूमत
जाकर कहो उनसे की सियासत न अब करे
आखिर कैसे कोई , कितना सब्र अब धरे
कश्मीर में बहती है रोज खून की नदी
है जिससे दागदार एक पूरी ही सदी
है जल चुका चरार – ए- शरीफ यहाँ पर
हैं हजरत बल में खून के धब्बे भी खुदा पर
दहशत का है गवाह , मंदिर रघुनाथ का
और अब तो पृष्ठ जुड़ गया है अक्षर धाम का
विष्फोट मुंबई का हो या गोहाटी का लहू
काशी में बेटे मर गए और पुणे में बहू
कश्मीर की विधान सभा , दिल्ली की संसद
आतंक जिनका धर्म है आतंक ही मकसद
आखिर कब तलक हम यहाँ सब्र ढोयेंगे
हम जाके किसकी किसकी कब्र रोयेंगे
दिल्ली से कहो जंग का ऐलान अब करे
दहशत को मिटा देने का ऐलान अब करे
आतंक समझाता नहीं है हर्फ़-ऐ-मोहब्ब्बत
इंसानियत को दाग देता , देता है तोहमत
बन्दुक की गोली को नहीं फूल चाहिए
मक्कारों के न सामने उसूल चाहिए
है मुल्क अपना , इसको चलो हम ही बचाएं
हर कोने से “जय हिंद ” की आवाज़ लगाये
हम जाति, धर्म , वर्ण औ मजहब को भुला दे
आओ शहर और भाषा की हर दूरी मिटा दे
मक्कारों , कायरों का तख्तो – ताज पलट दे
माँ भारती के चरणों में हर शीश झुका दे
लहरों पे समंदर के लहराए तिरंगा
और “बेजुबाँ” हिमालय पे फहराएँ तिरंगा

Poem ID: 64

Poem Title: मातृभूमि को नमन करूँ
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: September 13, 2012
Poem Submission Date: September 14, 2012 at 7:42 pm

Poem:

मातृभूमि को नमन करूँ मैं
मातृभूमि को नमन करूँ,
इसके गौरवशाली चरणों में
मैं अपने शीश धरूँ II 1 II
मातृभूमि को नमन करूँ मैं
मातृभूमि को नमन करूँ I
पाँव पखारे सागर जिसका
और हिमालय मुकुट बने ,
अद्वितीय सभ्यता समेटे
अतुलनीय भू-खंड है ये II 2 II
साक्षी इसकी हिम की चोटी
जो खड़ी हजारों सालों से ,
फहराता ध्वज जहाँ आज तलक
इस देश के जनमे लालों से II 3 II
यहाँ वीर उपजते मिट्टी से
इसका इतिहास पुराना है ,
उनके ही रक्तों से सिंचित
इस देश का ताना-बाना है II 4 II
यहाँ भरत खेलते शावक से
शैशव में रंग दिखाते हैं ,
करते हैं दो-दो हाथ निडर
दुश्मन उन्हें देख लजाते हैं II 5 II

जब-जब आक्रांत हुई ये माँ
जब भी कोई दुश्मन आया है ,
प्राणों को न्योछावर करके
पुत्रों ने मोल चुकाया है II 6 II

हो चन्द्रगुप्त या राजा पुरु
पर हार किसी ने ना मानी ,
कर दिया चूर अरि का घमंड
पड़ गयी उन्हें मुँह की खानी II 7 II

गोरी जब दुस्साहस करके
इस भूमि पर चढ़ आया था ,
अपने ही घर में वधित हुआ
घटना का मोल चुकाया था II 8 II
सन सत्तावन में जब फैली
आज़ादी की चिंगारी थी ,
अबला कहते थे सब जिनको
वह सिंह-सदृश ललकारी थी II 9 II

चढ़ गया अठारह में फाँसी
पर मुँह से उफ़ तक किया नहीं ,
जी गया जो जीवन खुदीराम
वो और किसी ने जिया नहीं II 10 II

वो भगत सिंह जो बचपन से
बंदूके भी उपजाता था ,
घर-बार छोड़कर जोड़ लिया
इस मातृभूमि से नाता था II 11 II

आज़ाद बन गया पंद्रह में
बचपन में कोड़े खाए थे ,
आज़ाद रहा जो जीवन भर
आज़ाद ही प्राण गंवाए थे II 12 II

अनगिनत शहीदों ने दी है
जीवन की अपने कुर्बानी,
सच्चे सपूत थे मातृभूमि के
देश-प्रेम के अभिमानी II 13 II
बापू-नेहरु की थाती ये
टैगोर-तिलक का सपना है ,
लाला-सुभाष की जिद थी ये
स्वाधीन-साँस ही लेना है II 14 II

गंगा-यमुना कल-कल बहती
यहाँ राम-रहीम की भाषा में ,
गुरबानी संग अज़ान उठे
पावन जग की अभिलाषा में II 15 II

सतरंगी धूप छिटकती जब
बन जाता दृश्य मनोहर है ,
सब जाति धर्म और सम्प्रदाय
यह देश जहाँ से सुन्दर है II 16 II

जब जग के प्राणी वनचर थे
सर्वत्र व्याप्त जब जंगल था ,
आदर्श सभ्यता बसी यहाँ थी
सिन्धु घाटी में मंगल था II 17 II

महावीर और बुद्ध ने जग को
ज्ञान का मार्ग दिखाया था ,
सत्य अहिंसा की शिक्षा दी
प्रेम का पाठ पढ़ाया था II 18 II
तक्षशिला से ज्ञान उपजता
जो दुनिया में पहला था ,
चतुराई चाणक्य नीति से
विश्व-विजेता दहला था II 19 II

किसी और के देश-भूमि की
कभी हमें लालसा नहीं ,
हम पर जिसने आँख उठाई
कभी आज तक बचा नहीं II 20 II

संख्या-पद्धति दिया विश्व को
शून्य दशमलव सिखलाया ,
ज्ञान भूमि ये रही सदा से
जो आया उसने पाया II 21 II

आयुर्वेद है देन चरक की
शल्य-चिकित्सा सुश्रुत की ,
दुनिया को विज्ञान दिया था
बात अतीत पुरातन की II 22 II

योरप की सारी भाषाएँ
उनकी जननी संस्कृत है ,
नवगति यहीं से शुरू हुआ था
ये प्रमाण भी उद्धृत है II 23 II
अंतरिक्ष के इस रहस्य को
आर्यभट्ट ने सुलझाया ,
धरा लगाती रवि का चक्कर
सबसे पहले बतलाया II 24 II

गार्गी मैत्रेयी की धरती
जहाँ कालिदास महान हुए ,
विद्वत्ता नर और नारी की
ऊँची उठकर आकाश छुए II 25 II

आज उसी धरती पर कैसा
समय का पहिया घूम गया ,
इतराता था मानव जिस पर
आज उसे वो भूल गया II 26II

मक्कारी सीनाज़ोरी से
अब लूट-खसोट मचाते हैं ,
गाँधी-गौतम की धरती पर
बच्चे भूखों मर जाते हैं II 27 II

अन्याय हो रहे प्रतिपल क्यूँ
रक्षक क्यूँ भक्षक बनते हैं ,
अवमूल्यन मूल्यों का होता
हम चुप बेबस क्यूँ सहते हैं II 28 II
जो नारी देवी थी कल तक
अब कैसे ये होता है ,
दिन में चौराहे पर उसका
चीरहरण क्यूँ होता है II 29 II

उपजे कुछ ऐसे नरपिशाच
जो देश-गर्व से खेल रहे ,
इतने कायर हम कैसे हुए
क्यूँ देश-दुर्दशा झेल रहे II 30 II

कुछ मुट्ठी भर राक्षस जिनसे
ये जनता क्रंदन करती है ,
पददलित देश की आत्मा है
गणतंत्र की आह निकलती है II 31 II

बस अपने मतलब की खातिर
ये सब कुछ ही बाँटते हैं ,
आज़ादी जो मिली हमें
उसकी कीमत आंकते हैं II 32 II

यह आज़ादी जो मिली हमें
इसकी कीमत मत आंकों तुम ,
गर लहू उबाल नहीं ले तो
अपने अतीत में झाँकों तुम II 33 II
राणा-प्रताप की धरती यह
अन्याय को जिसने सहा नहीं ,
सोचो उस वीर शिवाजी को
जो दुश्मन से कभी डरा नहीं II 34II

सौगंध हमें उन वीरों की
अन्याय न अब होने देंगे ,
भ्रष्टाचारी हो सावधान
तुम्हे चैन न अब लेने देंगे II 35 II

अत्याचारी अन्यायी सब
जो बैठ मदों में फूले हैं ,
उनको अहसास दिलाना है
ये हाथ न लड़ना भूले हैं II 36 II

सौगंध शहीदों की हमको
अब राक्षस ना बच पाएंगे ,
गाँधी-इंदिरा की आहुति
हम यूँ ना व्यर्थ गवाएंगे II 37 II

उठो हो जाओ होशियार
अँधियारा ना घिरने पाए ,
दीमक लग आये जड़ में हैं
यह महावृक्ष ना गिर जाए II 38 II

आओ हम इसे बचाते हैं
और शपथ आज ये खाते हैं ,
जो भूल हुई अब ना होगी
फिर स्वर्ण-काल ले आते हैं II 39 II

यह देश हमारा हम इसके
हमें फिर से इसे संजोना है ,
सोने की चिड़िया कहते थे
उस गरिमा को पा लेना है II 40 II

ऋषियों-मुनियों की कर्मभूमि
का गौरव फिर से लाओ तुम ,
निर्वहन करो कर्तव्यों का
सच्चे सपूत कहलाओ तुम II 41 II

इसकी मिट्टी से बने हैं हम
इस मिट्टी में मिल जायेंगे ,
ग़र काम देश के आ न सके
तो कैसे पुत्र कहायेंगे II 42 II

संस्कृति ऐसी अपनी है
सारा जग शीश नवाता है ,
धन्य मनुज वो जिनका
इस पावन भूमि से नाता है II 43 II
ये जीवन इसे समर्पित है
सौ और जनम यदि पाऊँ मैं ,
बस यही लालसा एक मेरी
इस माँ का पुत्र कहाऊँ मैं II 44 II

धन्य हूँ इस धरती पर आकर
बारम्बार प्रणाम करूँ ,
मातृभूमि को नमन करूँ मैं
मातृभूमि को नमन करूँ II 45 II

Poem ID: 65

Poem Title: नज़म-ए-भारत-माता
Genre: Other
Poem Creation Date: September 13, 2012
Poem Submission Date: September 15, 2012 at 4:22 am

Poem:

नज़म-ए-भारत-माता

वीर बनो‚ गुणवान बनो‚
रीत है भारत माता की।
प्रीत समाये हर बंधन में‚
नज़म-ए-भारत-माता की॥

प्रेम के कच्चे धागे‚
सीरत स्वाभिमान की।
खोना न इसे‚
जान है भारत माता की॥

चाहो तो मान लो,
चाहो तो भूल जाओ।
चाहना तुम्हारे बस में है,
नहीं है तकदीर भारत माता की॥

पीपल की छाँव का झूला,
हंसी की लहरों का फूला।
बरगद तले दांव-पेंच,
रंगीन यादें भारत माता की॥

हर पल पूजनीय रंगीन,
हर कदम लहराता नवीन।
हर सांस फर्राती यही,
सलाम भारत माता की॥

डा मोनिका सपोलिया

Poem ID: 66

Poem Title: मेरा सपना
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: August 14, 2011
Poem Submission Date: September 17, 2012 at 12:27 pm

Poem:

मेरा सपना
मेरा भी एक सपना है, मैं स्वस्थ भारत बनाऊँगा ।
भले यहाँ मैं मिट जाऊँ, सुख, शांति, समृद्धि फैलाऊँगा ।।
सर पे कफन जो बांधकर कर्तव्य पथ पर चलते हैं,
अंजाम की चिन्ता किये बिना, वो कर्म ही अपना करते हैं,
लड़ने को जो मुसीबतों से, तैयार हर-दम रहते हैं,
बाधा, रुकावट जब भी आये, कभी न उससे डरते हैं ।
बिल्कुकल ऐसे हीं लोगों को अपने साथ मैं लाऊँगा ।
अपने देश में फैली जकड़न को, मैं जड़ से ही मिटाऊँगा ।।
मेरा भी एक सपना है, मैं स्वस्थ भारत बनाऊँगा ।
भले यहाँ मैं मिट जाऊँ, सुख, शांति, समृद्धि फैलाऊँगा ।।

भारत वासी सुधर जायेंगे, काम करेंगे सबसे बेहतर,
मदद के लिए दूसरों की ही, हरदम रहेंगे वो तत्पर,
हम भारत के उत्थान के लिए, कभी न चूकेंगे अवसर,
विश्वर पटल पर भारत का, स्थान होगा सबसे ऊपर ।
भ्रष्टाचार को दूर भगा, सोने की चिड़ियाँ बनाऊँगा ।
आतंकवाद का नाम मिटा, शांति से जीना सिखाऊँगा ।।
मेरा भी एक सपना है, मैं स्वस्थ भारत बनाऊँगा ।
भले यहाँ मैं मिट जाऊँ, सुख, शांति, समृद्धि फैलाऊँगा ।।

Poem ID: 67

Poem Title: वंदेमातरम गाया
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: September 17, 2012
Poem Submission Date: September 17, 2012 at 5:43 pm

Poem:

वंदेमातरम गाया

देश के शहीदों को नमन बारम्बार हमारा
सीमाओं पर जाकर शत्रुओं को ललकारा
आज़ादी का बिगुल बजाकर प्राणों को वारा
थमती हुई साँसों ने वंदेमातरम गाया .

आज़ादी के संकल्पों से माँ को था चूमा
ज्वालाओं की देह बन बैरियों को था भूना
बलिदान अपना करके वायदा था निभाया
बिछुड़ती हुई साँसों ने वंदेमातरम गाया .

बन के सरहदों के मेरुदंड बन गए मोर्चा
करके संहार रिपुओं का इतिहास नया रचा
दगाबाजों को मिटाकर स्वयं को था मिटाया
ठहरती हुई नब्जों ने वंदेमातरम गाया .

जिसकी माटी में खेलकर बचपन था झूला
जिस माता का अन्न -फल खाकर यौवन था झूमा
दे कर अपने प्राण माता का ऋण था चुकाया
माता की दुआओं ने वंदेमातरम गाया .

बसा था जिनके फौलादी सीनों में तिरंगा
बनके विजयी तिरंगा था मौत को रंगा
इसकी शान के खातिर जौहर था दिखलाया
मौन हुई साँसों ने वंदेमातरम गाया .

माता की लाज बचाने किया सीनों को लाल
कफन मातृभूमि का बाँधकर बने महाकाल
कर्तव्य अपना अदा कर मौत को गले लगाया
निकलते हुए प्राणों ने वंदेमातरम गाया .

बेड़ियों को भस्म किया बन के प्राणों का लावा
अजर – अमर होकर देश का गौरव था बढ़ाया
बिछुड़े जो थे आज़ादी ने बच्चो को बताया
बच्चो की नम पलकों ने वंदेमातरम गाया .

रण स्तंभ बनके नाम उनका अंकित हो गया
अमर जवान ज्योति बनकर के देश भक्ति रहे जगा
सपना आज़ाद भारत का साकार कराया
मिलकर पंचतत्वों ने वंदेमातरम गाया .

केसरिया बाना पहन के रक्त फाग का खेला
आज़ादी का सूरज बन नया सवेरा फैला
धर्म , देश , न्याय के लिए शीश नहीं था झुकाया
वीरों की कुर्बानी ने वंदेमातरम गाया .

शहादत अपनी दे चमन देश का रहे महका
स्वयं को सुलाकर स्वाधीनता को गए जगा
उजड़े न किसी की कोख मोल कोख का चुकाया
फलित पवित्र कोखों ने वंदेमातरम गाया .

आज़ादी की विरासत दे ऋणी हुई पीढ़ियां
श्रद्धा सुमन चढ़ा के देश – जग दे रहा श्रद्धांजलि
राष्ट्रीय धर्म निभाकर स्वतंत्रता को गूंजाया
आखिरी महासफ़र ने वंदेमातरम गाया .

बन के भारत के आज़ादी गीत जन गा रहा
बन के राष्ट्रीय पर्व देश है तुम्हें पूज रहा
भारत माँ आज़ाद रहे नारा बुलंद कराया
स्वाधीनता महान ने वंदेमातरम गाया .

शहादत की जीवनी बन जीवनी रहे सूना
क्रांतिकारियों की अमर कहानियाँ रहे बता
सौंपकर आज़ादी आज़ाद रहना सिखाया
अलबिदा कह साँसों ने वंदेमातरम गाया .

Poem ID: 68

Poem Title: हम प्रोग्रेस कर रहे है..
Genre: Adbhut (wondrous)
Poem Creation Date: April 8, 2011
Poem Submission Date: September 18, 2012 at 7:58 am

Poem:

“हम प्रोग्रेस कर रहे है”
कोर्ट के वकील बाबू से,
पसीना पोछते उस इंसान तक ।
दफ्तरी महिलाओं से लेकर,
वयोवृद्ध किसान तक ।
सभी को कहते सुना है
हम प्रोग्रेस कर रहे है ।।

गंगा की निर्मल धरा से,
बाजार के मिनरल वाटर तक ।
स्वर्ण रजत की थालो से,
थर्मोकोल की प्लेटो तक ।
हम प्रोग्रेस कर रहे है ।।

रिश्तो की गर्माहट से,
फेसबुक की चाहत तक ।
शास्त्रों के प्रज्ञान से,
गूगल के विज्ञान तक ।
हम प्रोग्रेस कर रहे है ।।

सर्वेभवन्तु सुखिनः से ,
नक्सल आतंकवाद तक ।
अखंड भारतवर्ष से टूटते,
‘खंडित’ कश्मीर ‘आज़ाद’ तक ।
हम प्रोग्रेस कर रहे है ।।

माता-पिता के चरणों से,
‘मॉम-डैड’ के कंधो तक ।
नारी शक्ति की पूजा से,
वेश्यावृत्ति के धंधो तक ।
हम प्रोग्रेस कर रहे है ।।

विक्रम के न्याय से,
‘राखी के इन्साफ’ तक ।
गौ सेवा – ईश्वर सेवा से,
गौ चर्म के व्यापार तक ।
हम प्रोग्रेस कर रहे है ।।

‘नालंदा-तक्षशिला’ को छोड़,
ऑक्सफोर्ड की चौखट तक ।
‘विश्वगुरु’ भारत से पीछे,
‘प्रगतिशील’ इस भारत तक ।
हम प्रोग्रेस कर रहे है ।।

पर इस प्रोग्रेस की दौड़ में,
हम भूल रहे संस्कार को ।
भूल रहे संस्कृति व भारतीय आकर को ।।
बचा सको तो बचा लो,
इस देश को इस बाजार से ।
वरना बिक जायेगी ये सभ्यता
‘उनकी’ एक ललकार से ।।

और जब बचा लो तभी कहना …
“हम प्रोग्रेस कर रहे है”

Poem ID: 69

Poem Title: Bharatvarsh
Genre: Karuna (pathos)
Poem Creation Date: September 17, 2012
Poem Submission Date: September 18, 2012 at 9:44 am

Poem:

ऐ खुदा तेरी इस बसती में ,अब हराम चलता है
जिसम बेचे तो ग़ाली,ज़मीर बेचे तो सलाम चलता है

जब से आई है आज़ादी बदला बदला सा है दसतूर
अब हर ग़ुलाम के संग यहां इक ग़ुलाम चलता है

हर नुकड़ बाज़ार सजा है चमड़ी के ख़रीददारो का
मुन्नी हो या शीला यहां सब का इक दाम चलता है

कौन लिखेगा झूठ को झूठा कौन लिखेगा सच्च को सच्चा
कलम बिकती है हर तरफ़ बिका कलाम चलता है

मत घबरा भारतवरश अच्छा है हम सब राज़ी हैं
बसक इनसां गुम है ,बाकी धंधा तमाम चलता है – rajpaul sandhu

Poem ID: 70

Poem Title: भारत माँ का कर्ज़
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: September 9, 2012
Poem Submission Date: September 18, 2012 at 6:00 pm

Poem:

देशभक्ति का यह जज़्बा
हर दिल में जनम नहीं लेता,
निज सुख को तज स्वदेश हित में
हर कोई जतन नहीं करता |
है खास नस्ल उन वीरों की
जो सरहद पर डट जाते हैं,
सीमा की रक्षा करने को
अपना सर्वस्व लूटते हैं |
अपनी आज़ादी की खुशबू को
तनमन से वश में रखना,
जीवन की मोहक धारा में
मत अपने को बहने देना |
अपने को खरा बनाना तुम
यूँ तपन झेल कर सोने सा,
गाँधी सुभाष भी फक्र करें
ऐसा तुम देश बना देना |
ये स्वतंत्रता जो मिली हमें
अपने सत्कोटि शहीदों से,
वो अल्फ़्रेड पार्क, जलियाँवाला,
अट्ठारह सौ सत्तावन की प्रथम क्रांति |
अब अलग नही हो सकते हम
अपनी बहुमूल्य विरासत से,
हो कोई देश हो कोई जाति
मन में रक्खे न कोई भ्रांति |
भारत माता की ओर बढ़े
हर हाथ को चकनाचूर करें,
वो मुँह की खाएगा हमसे
जो अखण्ड हिंद के खण्ड करे |
यह सत्प्रण है उन वीरों का
जो सीमा पर मर मिटे लड़े,
गाँधी, सुभाष, नेहरू, बिस्मिल,
रानी, आज़ाद, सुखदेव, भगत,
विक्रम बत्रा, मनोज पांडे, नायर
जिन संग गुमनाम शहीद बड़े |
अब वक़्त हमारा आया है
हमको कुछ साबित करना है,
इन वीरों ने जो देखा था
वो सपना पूरा करना है |
है क़र्ज़ हमारे ऊपर भी
इस माटी का इस धरती का,
देकर अपना भी योगदान
हमको यह क़र्ज़ चुकाना है |
कुछ दुश्मन तो भाग चुके
कुछ दुश्मन अब भी बाकी हैं,
कर शंखनाद हुंकार भर
हमें उनको मार भगाना है,
भ्रष्टाचार, ग़रीबी, बेरोज़गारी
को जड़ से हमें मिटाना है |
हमको कुछ और नही करना
नहि कोई मुहिम चलानी है,
तन मन कर पाक़ शुद्ध सबको
अपना कर्त्तव्य निभाना है |
हर माँ का फ़र्ज़ वह बच्चे में
ऐसे पावन संस्कार भरे,
जो लहू बने दौड़े रग में
किंचित सन्मार्ग से हो ना परे |
हर शिक्षक अपने शिष्यों में
ऐसी शिक्षा संचरित करे,
वह राष्‍ट्र विकास राष्‍ट्र हित में
अपना प्रयास भर पूर करे |
नैतिकता से परिपूर्ण नस्ल
जिस दिन तैयार कर सकेंगे,
हम भ्रष्टाचार, ग़रीबी जैसे
दुश्मन को परास्त कर सकेंगे |
जो सपना देखा अमन चैन का
देश के वीर शहीदों ने,
उस सपने को साकार बना इस
माटी के ऋण से उऋण हो सकेंगे |

Poem ID: 71

Poem Title: हे! भारत के राम
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: September 16, 2012
Poem Submission Date: September 18, 2012 at 6:06 pm

Poem:

हे भारत के राम

शयन हुआ संपूर्ण तुम्हारा, आगे मात्र समरांगण है,
घर-घर दंगा, हर घर लंका, हर घर में एक रावण है,
भेद चुके जो नाभि उसकी, मैं उसे बुलाने आया हूँ,
हे भारत के राम! तुझे मैं आज जगाने आया हूँ।
धवल ध्वजाएँ धर्मच्युत हों, मलिन हुई फहराती हैं,
तालिबान की आदिम शक्ति, जिहादी भिजवाती हैं
स्वर्णमृग मारीच बने हैं, मैं तुम्हें चेताने आया हूँ
हे भारत के राम! तुझे मैं आज जगाने आया हूँ।
आज प्रकंपित सबल राष्ट्र यह, अपने घर के शत्रु-दल से,
हमें तोड़ना है कुचक्र को, अपने ही अंतर्बल से,
इस संबल की वानर – सेना, मैं आज माँगने आया हूँ,
हे भारत के राम! तुझे मैं आज जगाने आया हूँ।
विस्फारित उनके हैं नेत्र, जो अंग हमारे होते थे,
वो करते युद्ध की भाषा बुद्ध जिनके यहीं पर बसते थे,
इस प्रेम-दया से पूरित जन को ब्रह्मास्त्र थमाने आया हूँ,
हे भारत के राम! तुझे मैं आज जगाने आया हूँ।
अतिथि को हम मान देवता , अपने अंग लगाते हैं,
करगिल के हत्यारे को भी हम पलकों पर सजाते हैं,
गर वह समझे युद्ध की भाषा तो बिगुल बजाने आया हूँ,
हे भारत के राम! तुझे मैं आज जगाने आया हूँ।
पतित हो गए आज विभीषण, चल पड़े रावण के द्वार,
कुंभकर्ण की नींद सो रहे आज नागरिक व सरकार,
इस पाप नगर में घूम – घूम मैं आग लगाने आया हूँ,
हे भारत के राम! तुझे मैं आज जगाने आया हूँ।
आश्रम सूने, गुरु मौन, निर्जन संसकार की शाला है,
सर पर गाँधी टोपी और एक हाथ में हाला है,
रामभक्तों की यह मर्यादा मैं तुम्हें दिखाने आया हूँ,
हे भारत के राम! तुझे मैं आज जगाने आया हूँ।
रामनाम की लूट मचाई, देश के इन कर्णधारों ने,
जाने क्या – क्या खा डाला, देश के इन गद्दारों ने,
भ्रष्टाचार का यह सागर मैं आज सुखाने आया हूँ,
हे भारत के राम! तुझे मैं आज जगाने आया हूँ।
आरुढ़ भरत सिंहासन पर, यह गठजोड़ों का मेला है,
लक्ष्मण तज गए मचा तहलका वन में राम अकेला है,
वनवास छोड़ के लौट चलो, मैं तुझे बुलाने आया हूँ,
हे भारत के राम! तुझे मैं आज जगाने आया हूँ।
मायावी सत्ता की शूपर्णखां अंकशायिनी होती है,
सीता जैसी संस्कृति आज अग्निपरीक्षा देती है,
मंथरा कैकयी के तंत्रजाल को आज काटने आया हूँ,
हे भारत के राम! तुझे मैं आज जगाने आया हूँ।
ऊर्जासिंधु युवावर्ग की आज कतारों में खड़ी है,
शस्त्रों का आडंबर पहने, अँधियारे में आज पड़ी है,
बाँध सके जो शक्ति सागर, वो पत्थर तिराने आया हूँ,
हे भारत के राम! तुझे मैं आज जगाने आया हूँ।
मातृशक्ति की पावन प्रतिमा क्यूँ खंडित हो जाती है,
कभी जलाई जाती है, कभी नग्न घुमाई जाती है,
इस अहिल्या की मूरत में प्राण फूँकने आया हूँ,
हे भारत के राम! तुझे मैं आज जगाने आया हूँ।
सुख-समृद्धि इस धरा पर, हम तो फिर से लाएंगे,
मर्यादा – मंडित अयोध्या, हे ! राम यहीं बनाएंगे,
जन-जन में हे ! राम, तुझे मैं आज बसाने आया हूँ,
हे भारत के राम! तुझे मैं आज जगाने आया हूँ।

Poem ID: 72

Poem Title: गौरवगाथा
Genre: Karuna (pathos)
Poem Creation Date: September 15, 2012
Poem Submission Date: September 22, 2012 at 9:48 am

Poem:

जन्मभूमि जहाँ मातृत्व का हो पर्याय,
पर्वत-नदियाँ जहाँ माता-पिता सम आदर पाएं!
प्रस्तर में भी बसते हो भगवान जहाँ,
रह गया वही है देश के लिए सम्मान कहाँ?
जिसकी गौरव-गाथा संपूर्ण विश्व गाता था!
जग को दे परम ज्ञान जो जगतगुरु कहलाता था!
वचन की रक्षा में जहाँ प्राण गंवाया जाता था!
परोपकार जहाँ पूण्य की संज्ञा पाता था!
स्वार्थ वही देखो कैसी लीला रचाता है,
अपर का न्यास छीन मानव-हृदय हर्षाता है!
राम-राज्य की स्थापना जहाँ हुई थी कभी!
संतुष्ट प्रसन्न जहाँ रहा करते थे सभी!
जहाँ रही है प्रेम-शांति-करूणा-क्षमा-दया,
जिससे हमे है प्राप्त उत्कर्ष सदा हुआ!
वही ‘सर्वकार’ देखो ‘सरकार’ बन गया,
जिसको स्वयं से बस ‘सरोकार’ रह गया!
समृद्ध ऐश्वर्ययुक्त स्वतंत्र देश
में आया परतंत्रता का परिवेश,
जब विदेशी राष्ट्र ने आधिपत्य जमाया
तब क्रांति ने अपना रूप दिखाया!
धरा को निज रक्त से सिंचित कर,
प्रसन्नता से प्राणों की आहुति देकर,
अपनी धरती विदेशियों से मुक्त कर ली गयी!
सब मोल चुका स्वतंत्रता मोल ले ली गयी!
पर स्वतंत्र होकर भी आज प्रसन्नता नहीं होती है!
गणतंत्र होकर भी शोषित जनता लाचार रोती है!
जो है आध्यात्मिकता के तेज से प्रकाशित,
सदा से है जो संस्कृति एवं संस्कारों से पोषित!
विश्वबन्धुत्व-वसुधैवकुटुम्बकम हुए जहाँ से प्रसारित,
वह पुण्य भूमि भारत भूमि कर दी गयी विभाजित!
पहले देश विभाजित हो गया अपना,
फिर प्रारम्भ हो गया राज्यों का बँटना!
अब तो देखो घर भी बंटने लगे हैं!
हम सब स्वयं में ही सिमटने लगे हैं!
घर का आँगन कहीं लुप्त हो गया,
विभाजन की दीवारों में जाने कहाँ खो गया?
जहाँ पावनी पापनाशिनी पवित्र गंगा बहती है,
जहाँ कहते हैं सद्भावना कण-कण में बसती है,
हरिश्चंद्र दधिची सम हुए जहाँ दानी,
वीरों ने दी जहाँ प्राणों की कुर्बानी,
जहाँ परहित हेतु सर्वस्व होता था निस्सार,
वही आज चहुँ ओर होता है स्वार्थ का व्यापार!
धरती का जगतगुरु भारत!
भरतों की पुण्य भूमि भारत!
आज अपने ही ज्ञान से वंचित क्यूँ है?
परोपकार की भूमि स्वार्थ से सिंचित क्यूँ है?
हे भारतवासी! पहचानो अपनी वास्तविकता!
हो पुनः सर्वत्र प्रेम और पारस्परिकता!
फिर इस महिमा मंडित भूमि की महिमा वापस आएगी,
गौरवशाली देश की ‘गौरवगाथा’ सर्वत्र गायी जाएगी!!!

Poem ID: 73

Poem Title: सशक्त नौजवान : अदम्य क्रांति
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: September 17, 2012
Poem Submission Date: September 22, 2012 at 4:45 pm

Poem:

जेहन में आई देशभक्ति की तरंग
हृदय में स्वारित हुआ मधुर मृदंग
आज़ादी-गाथा आज गुनगुनाता भृंग
झलकता वीरों में उत्साह रंग-बिरंग
गणतंत्र रहा है आजादी का शाश्वत भरतार
अभिव्यक्ति का आज यह नव-अवतार
शत्रु करते रहे इंसानियत तार-तार
अचानक धराधर ने बरसाया जल-मूसलाधार
और गिरि से उड़े क्रांतिकारी पखेरू हज़ार
असीम गगनचुम्बी परवान छुए बार-बार
निष्कपट पीकर गरल, चूम लिया शिखर
कौड़े-लाठी-भाठा का करते हुए तिरस्कार
आज मतवारा-मंत्रमुग्ध हुआ हर राष्ट्रभक्त
नई आभा, नई प्रभा – आज़ादी का वक्त
अमूल्य-अतुल्य इन शूरवीरों का रक्त
जितनी बार करो याद, कम हैं अरब-करोड़-लाख-हज़ार
यह गौरव-गाथा रखेंगे याद हमारे तात
बनाया है नव-इतिहास, अंग्रेजों को देकर मात
शहीदों की ये पवित्र काया, पवित्र गात
आज शहादत को करो सलाम, भूल कर जात-पांत
वाहित हो रही उमंग की मलय-वात
वंदन-गायन-पूजन योग्य हमारी भारत मात
कायम कर मिसाल, जगा डाली क्रांति-जोत
आह्वान भाव लिए उड़ते गये नित-कपोत
इन अमर-वीरों की होती रहे सदैव अर्चना
जिन्होंने की कायरता-अज्ञानता-दासता से घ्रणा
इनमें ही पली राष्ट्रप्रेम की अदम्य तृष्णा
राष्ट्र को पहुँचाया फर्श से अर्श तक
लड़ते रहे वो महावीर अंतिम दम तक
चेतना से भरकर जोशीले राग किये उदधृत
मूल रहा सेवा-निष्काम, जब तक गये मृत
इक्कीसवीं सदी के नए युग का है आगमन
उन्नति का लेकर प्रण, मिलकर करें अभिनन्दन
तरुण-जवानों से जमकर करें आह्वान-निवेदन
कि करके तुम देशभक्त-राष्ट्रवीरों का अभिवादन
नवयुवकों को मैं प्रेरित करता होकर अंतर्ध्यान
उठ खड़े होकर कर दो बुराइयों को छिन्न-भिन्न
उन्नति का असीम परवान हासिल करने का करो प्रयत्न
लाओ भारत में खूब कांस्य,रजत,स्वर्ण,हीरा,मोती,रत्न
लहराओ हर क्षेत्र में भारतीय परचम, बनकर तुम शत्रुघ्न
नवयुवकों को मैं प्रेरित करता होकर अंतर्ध्यान
भरपूर करके देश-सेवा, जीवन का देश हेतु कर बलिदान
कहलाकर तुम अमर-वीर, बन जाओ भारत की शान
गाते रहो सदेव इन्कलाब-जिंदाबाद का मधुर गान
दीनों के बनकर तुम बन्धु, बनाओ उन्हें विपन्नता-हीन
नवयुवकों को मैं प्रेरित करता होकर अंतर्ध्यान
भ्रष्टाचार,नक्सलवाद,भेदभाव को कर डालो क्षीण
अधीनता का करके उल्लंघन, लाओ नई उषा किरण
दांव पर लगते हुए स्वयं की आन-बान-शान
कलयुगी-राक्षसों को पहुंचा डालो शमशान
नवयुवकों को मैं प्रेरित करता होकर अंतर्ध्यान
स्पेक्ट्रम का बंटवारा या हो कोयले की खान
विधायक-मंत्री-सांसद हो चुके रिश्वत की दुकान
आज हर व्यभिचारी की आफत में है जान
न तो रहा इनका अब रुतबा, न ही शान
नवयुवकों को मैं प्रेरित करता होकर अंतर्ध्यान
2014 में जनता रखेगी हर प्रत्याशी का ध्यान
स्वच्छ-छवि वालों का ही होगा संसद को प्रस्थान

मुगदर हिला रही आक्रोश की ज्वाला
वीरों ने क्रांति में सारा जीवन झोंक डाला
आज गूँज रही राष्ट्र में क्रांति-मशाल
हिन्दोस्तां के पास है फ़ौज विशाल
मुगदर हिला रही आक्रोश की ज्वाला
राष्ट्र-उत्थान के गुणधर्म जो की पुण्य,पावन व सजीला
आज हर राष्ट्रभक्त महायज्ञ में आहुति देने को मतवाला
धधकती क्रांति से होगा भ्रष्टाचारियों का देशनिकाला
स्वर्णाक्षरों से सजेगी, सद्कर्मों की खुशबूदार शिला
रक्तप्लावित स्वर एक उफान पैदा करता
मैं नम्रता में भी क्रांति-सुर जगाता फिरता
दुनिया के समक्ष गाड़ डालो भारतीय झंडा
राष्ट्र-उन्नति को मानते हुए एजेंडा
विन्ध्याचल से हिमालय, फतह कर एवेरस्ट
तरुणाई ही लाएगी प्रगति का सुपरजेट
आतंकवाद-आरक्षण की सुलग रही आग
बुरे नेताओं ने ही अलापा यह राग
पूर्व चलने के बटोही अब तो तू जाग!
जनता को समझना होगा यह मर्म
कुपोषण को कहती है सरकार “राष्ट्रीय शर्म”
ऐसी कर्तव्यहीनता नही है इनका जुर्म ?
दग्ध-क्रांति की ज्वाला भड़क पड़ी है आज
क्षुब्ध-जन की जोशीली है आवाज
जनलोकपाल को सभी दलों ने है नकारा
सशक्त-भारत का ख्वाब इन्होने कहाँ विचारा?
करना ही होगा अपराधी-सांसदों का अंत
समस्याएं अनेक बढ़ रही हैं ज्वलंत
भारत माँ का करते हुए अदभुत गुणगान
राष्ट्रहित में न्योछावर कर दो प्राण
हर राजनेता के जेहन में केन्द्रित है बेईमानी
दुर्गुणों की अव्वलता में नहीं इनका कोई सानी
राजस्थान के जल-मंत्री की रही शोचनीय कहानी
संपूर्ण राज्य को कर डाला उसने पानी-पानी
मेरी कृति में समाहित है जनता की जागृति
जनतंत्र में जनता की सुनते क्यों नहीं मंत्री?
मंत्रियों के लिए सार्थक-प्रजातंत्र का नहीं रह गया कोई मोल
भ्रष्टाचार-व्यभिचार ही बन गया इनका अब “गोल”
राष्ट्र की अवनति में निभा रहे ये महत्पूर्ण रोल
जनता को चुनना ही होगा “राईट टू रिकाल”
गंभीर समस्याओं को न समझें युवक अवध्य
स्वच्छ-राजनीति हेतु करना ही होगा सद्बुद्धि यज्ञ
देशभक्ति पुनः करानी होगी इन्हें हृदयंगम
सुशासन की बात जानी चाहिए पूर्णतः रम
अटूट-अद्वितीय-अनुशीलनता का करते हुए संगम
दृढ-निश्चित होकर उत्थान कार्य करो विहंगम
वात्सल्य-स्नेह का पाकर दामन
पराक्रमी बन कर डालो बुराइयों का दमन
नव-सृजित कर दो यह चमन
पुनः खिलखिला उठें अनन्य सुमन
सभी दलों ने राष्ट्र लूटकर लड्डू तो खाया, नारियल भी फोड़ा
देश की अर्थव्यवस्था की कमर को भी तोड़ा
चुनाव के समय गला फाड़कर चिल्लाते ये इन्कलाब-जिंदाबाद
पूछो ज़रा इनसे, इसका मतलब है इन्हें याद?
आतंक में अलकायदा और देश में बाकायदा हो रहे प्रचंड
एकजुट होकर करना ही होगा इन्हें खंड-खंड
हे नौजवानों! ग्रहण करो नव-श्रद्धा और आशीष
थामते हुए अडिग-अविचल शिरीष
अरविन्द करता रहता एक आह्वान नित
लोकतंत्र की बुराइयाँ कर डालो चारों खाने चित
करते रहो कार्य एक से बढ़कर एक
राष्ट्र को बना डालो अत्यंत नेक
आर्थिक-महाशक्ति की दावेदारी का पेश करते हुए अदभुत नमूना
बहा डालो फिर से, उन्नति की गंगा-विकास की यमुना
जगत-गुरु की भाँति बनाओ इसे अमर-अटल सिरमौर
हे क्रन्तिकारी! नव-क्रांति की ज्वाला निज मन में फूँक डाल
दुआ कर, आना नए जोश से “15 अगस्त” हर साल

Poem ID: 74

Poem Title: तब मुझको प्रेम हुआ भारत से
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: September 22, 2012
Poem Submission Date: September 23, 2012 at 7:57 am

Poem:

जब सम्पूर्ण धरा शिशुओं सी, भटक रही बिन पहचान लिए
जब ढूँढ रहा था विश्व अखिल, देव प्रकाश का दान लिए
तब हरकर अज्ञानता की रजनी और जलाकर सूर्य प्रखर
सभ्यता सृजन करने भारत तब प्रकट हुआ था ज्ञान लिए
बस एक यही है जगद-गुरु एक यही पथ-प्रदर्शक
जब सम्पूर्ण विश्व परिचित हो गया सत्य इस शाश्वत से
तब मुझको प्रेम हुआ भारत से

उठा कृपाण इस दुनिया ने, जीता जब भूभगों को
प्रेम सुधा उर में भरकर,हम चले बुझाने आगों को
यवन हूणों के तलवारों से,गूँज उठा जब विश्व सकल
बुद्ध महावीर और अशोक ने, छेड़ा प्रेम के रागों को
आज विश्व वह दोहराता,जो हमने सदियों सिखलाया
क्रूर और कुत्सित हिंसा दानव जब झुका अहिंसा के हठ से
तब मुझको प्रेम हुआ भारत से

“ये तेरा है ये मेरा है” जग में तो ये चलता आया
शोणित लीक खींच धरा पर,जग ने अब तक क्या पाया
“है कुटुम्ब संपूर्ण धरा ही” कहकर भारत ने किंतु
मुगलों,यहूदी,पारसियों को, सच्चे मान से अपनाया
पीकर कटु गरल भारत ने,जब विश्व को पय का दान किया
जयकारों की ध्वनि उठी,कृतज्ञ मुखों फिर शत शत से
तब मुझको प्रेम हुआ भारत से

Poem ID: 75

Poem Title: राष्ट्र के लिए
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: August 15, 2012
Poem Submission Date: October 9, 2012 at 10:36 pm

Poem:

जब! प्रेमिका, प्रेमी पर मरती
प्रेमी के लिये जिये।
जब! प्रेमी, प्रेमिका पर मरता
जिये प्रेमिका के लिए।
जब! स्वार्थी धन पर मरता
जिये धन के लिए।
जब! परमार्थी परमार्थ पर मरता
जिये परमार्थ के लिये।
तब! मरना तुम्हें है किसी पर
तो जिओ राष्ट्र के लिये।
अगर! किसी के लिये जीना तुम्हें
तो मरो राष्ट्र के लिये।।

Poem ID: 76

Poem Title: शहीदों की याद
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: July 22, 2012
Poem Submission Date: September 23, 2012 at 3:25 pm

Poem:

आओ याद करें उनको
जिन्हें भुला चुके हैं लोग यहाँ.

सूरज अस्त नहीं होता था
अंग्रेजों के राज में ,
चुभते थे वे अत्याचारी
भारत में के ताज में .
निकल पड़े कुछ लोग घरों से
करने माँ की दूर चुभन ,
मन में था साहस अदम्य
और बंधा हुआ था शीश कफ़न.
तन घायल था मन घायल था,
अधरों पे नए तराने थे.
उनके पास भी घर में
रुक जाने के कई बहाने थे.

Poem ID: 77

Poem Title: हाथ में वीणा नहीं तलवार दे दो …
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: August 11, 2012
Poem Submission Date: September 24, 2012 at 6:34 am

Poem:

हाथ में वीणा नहीं तलवार दे दो
माँ मुझे रण बांकुरा श्रृंगार दे दो

सांस जब तक है ध्वजा ऊंची हो तेरी
स्कंध पर मेरे तनिक ये भार दे दो

हो गए हैं मस्त मद में पुत्र तेरे
माँ मुझे फिर नाग सी फुंकार दे दो

खड्ग खप्पर धारणी काली बना दे
साथ में नरमुंड का ये हार दे दो

दक्ष हैं सब वीर अपने कर्म पथ पर
पग में चीते की गति हुंकार दे दो

रक्त का आवेग अब थमने न पाए
शीश पर आशीष की बौछार दे दो

Poem ID: 78

Poem Title: इंकलाब चाहिए………
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: September 24, 2012
Poem Submission Date: September 24, 2012 at 2:55 pm

Poem:

आज फिर वो वक़्त है जहा इंकलाब चाहिए
मेरे वतन की हर एक आत्मा आज़ाद चाहिए,

क्यों लाल झंडे के नीचे
कफ़न में लिपटे लोग हे ?
क्यों खून बहते है यहाँ
अपनों का अपने ही लोग हे ?
क्यों रोष हे उनमे इतना
और क्यों वो अनसुने से लोग हे ?
क्यों बैठते नहीं वो मंच पर
क्यों हल नहीं निकलते ये लोग हे ?

आज फिर हमें एक सरदार पटेल चाहिए,
आज फिर वो वक़्त है जहा इंकलाब चाहिए,
मेरे वतन की हर एक आत्मा आज़ाद चाहिए,

आज सडको पर चलता हुआ
डरता हे आम आदमी,
जीता हे घुट घुट कर
हर डरता हुआ आदमी,
क्यों ये धमाको की आवाजे
और चीखे ख़त्म नहीं होती,
क्यों आज कश्मीर में
एक आम सुबह नहीं होती,

आज फिर हमें एक सुभाष बोस चाहिए,
आज फिर वो वक़्त है जहा इंकलाब चाहिए,
मेरे वतन की हर एक आत्मा आज़ाद चाहिए,

यहाँ क़त्ल-ए-आम हे
जात के नाम पर,
मिट रही इंसानियत
क्यों धर्म के नाम पर ?
क्यों स्त्रियों के दामन पर
खून ही खून हे ?
क्यों लुटती हे आबरू
धर्म जात के नाम पर ?

आज फिर हमें एक मोहनदास गाँधी चाहिए,
आज फिर वो वक़्त है जहा इंकलाब चाहिए,
मेरे वतन की हर एक आत्मा आज़ाद चाहिए,

Poem ID: 80

Poem Title: जय भारत माँ, जय भारत माँ!
Genre: Adbhut (wondrous)
Poem Creation Date: August 14, 2012
Poem Submission Date: September 24, 2012 at 9:13 pm

Poem:

जय भारत माँ, जय भारत माँ!

यह भूमि अहा! मम भारत की।
सुजला, सुफला, महकी-महकी।
इस भू पर जन्म अनंत लिए।
सुख सूर्य, अनेक बसंत जिये।
यह स्वर्ग धरा पर और कहाँ?
जय भारत माँ! जय भारत माँ!

सिर, ताज हिमालय शोभित है।
चरणों पर सागर मोहित है।
हर रात यहाँ पर पूनम की।
हर प्रात सुवर्णिम सूरज की।
बहतीं यमुना अरु गंग यहाँ।
जय भारत माँ! जय भारत माँ!

यह भूमि पुरातन वैभव की।
यह भूमि सनातन गौरव की।
यह संस्कृति की बहती सरिता।
अति पावन है यह वेद ऋचा।
इतिहास यही कहती सदियाँ।
जय भरत माँ! जय भारत माँ!

हर हाथ जुड़े नित वंदन को।
हर शीश झुके अभिनंदन को।
यह पोषक है, अभिभावक है।
सुखकारक है, वरदायक है।
नित गुंजित हो इसकी महिमा।
जय भारत माँ! जय भारत माँ!

हम याद रखें, यह माँ सबकी।
जिस छोर बसें, सुध लें इसकी।
बन सेवक हों, इसके प्रहरी।
पनपे मन में ममता गहरी।
कम हो न कभी इसकी गरिमा।
जय भारत माँ! जय भारत माँ!

Poem ID: 81

Poem Title: ये देश मेरी आस्था, यही मेरा गुरूर है
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: May 25, 2012
Poem Submission Date: September 25, 2012 at 4:32 am

Poem:

ये देश मेरी आस्था, यही मेरा गुरूर है

क्यों नहीं रगों में आज तुम्हारे बिजली कौंधती ?
क्यों स्वकेन्द्रीय सत्ताएं आज इंसानियत को रौन्ध्ती ?
क्यों लेन-देन की दुनिया में और बचा नहीं कुछ शेष है ?
इतिहास बदल देने वाले नाम बस रह गए अवशेष हैं…

एक नए बदलाव की क्रांति लाना हमे ज़रूर है….
ये देश मेरी आस्था , यही मेरा गुरूर है….

पढ़ी-लिखी पीढ़ी आज बस ऊपर से चमकदार है,
अन्दर डरती हीन भावना, वोह भी जार-जार है,
अगर देश का भविष्य ही कर्मों से मुंह चुराएगा,
तो खुद का देश बचने क्या अंतरिक्ष से कोई आयेगा?

आओ चलें साथ, भले ही मंजिल अभी दूर है…
ये देश मेरी आस्था, यही मेरा गुरूर है…

इस धरती ने ही जने सुभाष, भगत और गाँधी,
मिल जाओ सब एक जुट, और लाओ ऐसी आंधी.
अकेले यूँ मत घबरा, एक छोटा-सा कदम बढ़ा,
पीछे मुड़के जब देखेगा तो पायेगा पूरा देश खड़ा.

लोग कहेंगे की ये बस मेरे खाली दिमाग की फितूर है…
पर ये देश मेरी आस्था, यही मेरा गुरूर है….

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