Gaurav Gatha 2012 - Private View

Gaurav Gatha 2012 – Private View

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Poem ID: 82

Poem Title: भारत माँ
Genre: Adbhut (wondrous)
Poem Creation Date: March 16, 2012
Poem Submission Date: September 25, 2012 at 4:40 am

Poem:

भारत माँ

स्नेह की प्रतिमा सुहानी है हमारी भारत माँ
दुनियाँ मे दिखता न कोई दूसरा ऐसा यहाँ

भाल है काश्मीर जिस पर हिम किरीट ताज है
है हिमाचल चन्द्रमुख जिसका सुखद भूभाग है

दिल है दिल्ली, यू पी राजस्थान हैं वक्षस्थली
कुरूक्षेत्र जहाँ पै” जन्मी गीता वह पुण्य स्थली

गंगा यमुना सरस्वती जिसके गले का हार है
करधनी सी नर्मदा औ” ताप्ती की धार है

बिहार छत्तीसगढ महाराष्ट्र कहते रामायण कथा
आंध्र कर्नाटक तमिलनाडु बताते मन की व्यथा

हरा केरल भरा गुजरात असम और पूर्वाचंल
अंग बंग औ” उडीसा लहराते सुदंर वनांचल

कृष्णा कावेरी हैं नुपुर ,चरण धोता है जलधि
सुनहरी पूरब क्षितीज है पश्चिम में नीला उदधि

हिमालय सा उच्च पर्वत गंगा सी पावन नदी
राम कृष्ण की मातृ भू यह सदा सुख साधन भरी

आज भी आध्यात्म में ऊंचा इसी का नाम है
प्राकृतिक सौंदर्य सुख भंडार सब अभिराम है

जन्म पाने को तरसते देवता सब भी जहाँ
वह अनोखी इस जगत में है एक ही भारत माँ।

Poem ID: 83

Poem Title: रुग्ण राग छोड़ दो
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: August 11, 2011
Poem Submission Date: September 25, 2012 at 7:00 am

Poem:

रुग्ण राग छोड़ दो

भरत शर्मा ” भारत “

हो गया व्यतीत उस अतीत को अब छोड़ दो |
उस पुरानी दास्ताँ का रुग्ण राग छोड़ दो ||…..
हो गया………………….
देश के समक्ष आज है चुनौतियाँ कई |
जाति भाषा धर्म में राष्ट्रीयता बटी हुई |
उन्नति की राह की सब विघ्न बाधा तोड़ दो ||
हो गया,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
तंत्र सारा भ्रष्‍ट हुआ आज सारे देश का |
कौन ज़िम्मेदार है इस पूरे परिवेशका |
ऐसे उत्तरदाइयों की गर्दनै मरोड़ दो ||
हो गया………………….
जन गण के मौन से जो जेब अपनी भर रहे|
जोंक बनकर राष्ट्र रूपी रक्त को जो पी रहे |
दुष्ट दुराग्रहियों के चूषकांग तोड़ दो ||
हो गया…………………..
वक़्त की पुकार आज भेदभाव तोड़ दो |
राष्ट्र के उत्थान में निज स्वार्थों को छोड़ दो|
“भारत” माँ के गौरव को आम जन से जोड़ दो||
हो गया……………………

Poem ID: 84

Poem Title: हो चली शुरुआत
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: May 20, 2010
Poem Submission Date: September 25, 2012 at 8:48 am

Poem:

मिल गए गर सपने जो धूल में
तो क्या छुट गयी आस
अभी न जाने पल हैं कितने
मायने जो रखते ख़ास

उठो रे मानुष अब तुम जागो
निराशा के बंधन को फेंको
सारी कठिनायियो को दे दो मात
अब हो चली शुरुआत

अब हो चली शुरुआत
मुश्किलों को गले लगाने की
अब हो चली शुरुआत
कंटका – कीर्ण रस्तों पे चलने की

अब इनसे डरना है क्या
अब इनसे छिपना है क्या
पानी है जो मंजिल अपनी
तो फिर इनसे बचना है क्या

सफलता है नहीं नपती
उन्चायियो से जो तुमने पाई
सफलता उससे है नपती
ठोकरे जो उन तक तुमने खायी

याद करोगे एक ये भी दिन
जब सारी दुनिया थी अन्धकार में लीन
याद आयेगी तब वो बात
जब हुई थी एक शुरुआत

Poem ID: 85

Poem Title: लोकतंत्र का पर्व …
Genre: Other
Poem Creation Date: September 24, 2012
Poem Submission Date: September 25, 2012 at 11:29 am

Poem:

लोकतंत्र का पर्व अबकी ऐसे मनाया जाये
शत्रुओ को देश के जड़ से मिटाया जाये
हिन्दू ,मुस्लमान ना सिक्ख ना इसाई
कौम से पहले राष्ट्र को लाया जाये
सबके लिए हो रोटी ,सबके लिए हो शिक्षा
सबके लिए बराबर कानून बनाया जाये
अलग अलग लड़ने से कुछ नहीं हासिल
साथ मिलके पहले भ्रस्टाचार मिटाया जाये
छुपे हुए है भेडिये जो, खादी की आड़ लेकर
चेहरे से उनके अबकी ,नकाब हटाया जाये
एक बार “इन्कलाब ” का नारा बुलंद करके
चोरों को संसद से मार भगाया जाये
भूल चुके है अपने अधिकार को जो लोग
ऊँगली पकड़ के उनको “बूथ ” पे लाया जाये
जाती ,धरम और द्वेष का भेद भुलाकर
योग्य उम्मीदवार पर ही “बटन ” दबाया जाये
लाख रास्ता है कठिन ,दूर मंजिल है सही
चलो अबकी खुद को आजमाया जाये
आँखों में आस भरके “सागर” निहारता है
चलो अबकी देश बचाया जाये , देश बचाया जाये …..
संजीव सिंह “सागर”

Poem ID: 87

Poem Title: रे भ्रष्ट तू सिंघासन संभाल
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: August 10, 2012
Poem Submission Date: September 25, 2012 at 2:53 pm

Poem:

हिलती है धरा, डोले है गगन
राजा है डरा, सहमा है सदन
उमड़ी है प्रजा, हुआ आन्दोलन
अब झूम उठा, वीरो का मन
लो सजी ध्वजा, बज उठा नाद
यह पुण्य कर्म का, है प्रसाद
क्या सुन्दरता, क्या भोलापन
सब त्याग चला, देखो बचपन
अब मात्रि हेतु, उठ खड़ा हुआ
अधिकार हेतु बस, अड़ा हुआ
ललकार जो सुन ले अब कोई
जग उठे प्रीत मन में सोयी
जिस क्षण की थी अभिलाष सखे
चल शीश उठा अब मान रखें
बस बहुत हुआ शासन उनका
बस बहुत हुआ भाषण उनका
अब तो जनता की बारी है
वहि शासन की अधिकारी है
सदियों से अत्याचार सहे
क्यों शासक ही लाचार रहे
यदि स्वर्ण गला हमने ढाला
सिंघासन को हमने पाला
अब हम ही उसे गलायेंगे
सिंघासन नया बनायेंगे
प्रासाद गिराए जायेंगे
जन भवन उठाये जायेंगे
चलते है जन, मन में उमंग
इतना तो आज करेंगे हम
धरती का ऋण अब बहुत हुआ
सब क़र्ज़ चुकायेंगे अब हम
चल बन्धु चले अब बढ़ निकलें
अपना भविष्य हम गढ़ निकलें
उन हुक्कामो को पता चले
आवाज़ यहाँ भर दम निकले
अब गया दौर उठ रहा आज
बरसो से जो सोया समाज
अब समेट अपना ये जाल
रे भ्रष्ट तू सिंघासन संभाल
की अब तक जिनको कुचल रहा
अब उनका ही ब्रह्माण्ड हिला
अब वापस करने की बारी
जो तुझको दी ज़िम्मेदारी
अब ख़तम हुआ भय राज तेरा
अब होगा यहाँ स्वराज मेरा
चमकेगी बस अब राष्ट्र ध्वजा
कि राज करेगी यहाँ प्रजा

Poem ID: 88

Poem Title: हे मातृभूमि तुझको अर्पण
Genre: Shant (peaceful)
Poem Creation Date: August 15, 2012
Poem Submission Date: September 25, 2012 at 4:04 pm

Poem:

हे मातृभूमि तुझको अर्पण, मेरा तृण-तृण मेरा कण-कण
वर्षो तूने दी है ये शक्ति, कभी खंडित न हो राष्ट्रभक्ति
जीवन यह तुक्ष तुझे अर्पण, यह स्वास देह धन और ये मन
किस तरह करू तेरा मान जननी, तुझपे सब वार बनूँ मै धनि
किस तरह और क्या दू तुझको, तुझसे ही मिला सब कुछ मुझको
कामना यही मै कर सकती, मेरा ह्रदय बने तेरा दर्पण
हे मातृभूमि तुझको अर्पण……

करना चाहू तेरि पूजा मै, तेरा अभिनन्दन और मान करू
रज-भूमि तेरि मै ललाट मलूँ, सर्वत्र तेरा गुणगान करूँ
तेरे जल में अधिक मिठास लगे, संपूर्ण मुझे हर स्वास लगे
तेरे खेतो की हरियाली से, तेरे बागो की हर डाली से
तेरी पगडण्डी तेरे मौसम से, मुझे प्रीत हवा मतवाली से
तू है अनुपम नैसर्गिक है, किस तरह करू तेरा वर्णन
हे मातृभूमि तुझको अर्पण…..

तेरे खेतो ने खलिहानों ने, तेरि धरा के पूज्य किसानो ने
सीमा पर डटे जवानों ने, आज़ादी के दीवानों ने
तुझको चाहा तुझको ही जपा, तेरा सुमिरन कर खुद को तपा
शत कोटि कंठ जय गान करे, शत कोटि शीश अभिमान करे
है ममता की अभिलाष हमे, बस एक तुम्हारी आस हमे
तुझको यह दिवस समर्पित कर, शत पुत्र करे तेरा ही मनन
हे जननी करू तुझे अर्पण, मेरा तृण-तृण मेरा कण-कण

Poem ID: 89

Poem Title: मेरे देश तुझको मेरा नमन
Genre: Other
Poem Creation Date: February 5, 2012
Poem Submission Date: September 25, 2012 at 7:58 pm

Poem:

मेरे देश तुझको मेरा नमन

मेरे देश तुझको मेरा नमन
कितनी सुहानी धरती तेरी
पावन तेरा गगन।

मंत्रों सी पावन धरती है,
सबका अभिनन्दन करती है,
जीवन की साँसे हैं सबमें,
जड़ हो या चेतन

पवन तेरी है चंचल–चंचल,
गीत सुनाये मंगल-मंगल,
हर मौसम खुशियों का मौसम,
पतझड़ या सावन

खिलती हुई कली ना तोडें,
अपनों को अपनों से जोड़ें,
महकाना है उपवन अपना,
अपना ये आँगन

ना हो भाषा राग-द्वेष की,
बोली मीठी प्रेम-देश की,
लोभ, निराशा, स्वार्थ, तिकड़में,
आज करें तर्पण

अपना देश है अपना साथी,
जैसे एक दीया और बाती,
चलो किरण बन जाएँ हम तुम,
दुनिया हो रोशन

-रोहित रुसिया

Poem ID: 90

Poem Title: एक बार फिर स्वतंत्र, भारत वर्ष महान हो…
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: February 8, 2013
Poem Submission Date: September 26, 2012 at 12:22 pm

Poem:

विस्मृत गौरव गाथाओं का, हमें पुनः ज्ञान हो,
एक धर्म हो मानवता, भारतीयता पहचान हो,
यों स्वतंत्र हों विचार, नव स्वतंत्र गान हो,
एक बार फिर स्वतंत्र , भारत वर्ष महान हो…!!!
आंख मूँद क्यों चलें, क्यों अनुसरण करें,
स्वयं विचारते नहीं, क्या करें क्या न करें,
स्व-संस्कृति प्यारी हो, निजता पर अभिमान हो,
एक बार फिर स्वतंत्र , भारत वर्ष महान हो…!!!
सच का साथ दे सकें और गलत बदल सकें,
जिसपे चलने मन करे, राह वो चल सकें,
हो शिखर जिसका हश्र, वो शुरू अभियान हो,
एक बार फिर स्वतंत्र , भारत वर्ष महान हो…!!!
प्रेम गुनगुना सकें, विश्वास को अपना सकें,
ईमान बाकी है अभी, खुद को ये समझा सकें,
मृत्यु आये चाहे जब, पर जीवन आसान हो,
एक बार फिर स्वतंत्र , भारत वर्ष महान हो…!!!
खोखला करती दीमकों से, घर बनाती चीटियों से,
अन्यायपूर्ण नीतिओं से, व्यर्थ की कुरीतियों से,
एक बार फिर स्वतंत्र , भारत वर्ष महान हो…!!!
एक बार फिर स्वतंत्र , भारत वर्ष महान हो…!!!

Poem ID: 91

Poem Title: अटवी के प्रस्तर , खंड -खंड घर्षण,
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date:
Poem Submission Date: September 26, 2012 at 12:23 pm

Poem:

कविता- चिंगारी

अटवी के प्रस्तर ,
खंड -खंड घर्षण,
चकमक चकाचौध ,
जठरानल को शान्ति दे ,
अखंड जीवन की,
लौ चिंगारी ।
बन मशाल,
प्रेरणा की मिसाल ,
मंगल की,
चमकी चिंगारी ।
चहुँ ओर ,
तम का डेरा।
जन सैलाब चिंगारी से,
अभिभूत वडवानल घेरा ।
व्याकुल आने को नया सवेरा,
रानी के खडगों की चिंगारी ।
अमर कर गई ,
जन-जन में जोश भर गई ,
सत्य अहिंसा प्रेम दीवानी,
बापू की स्वराज चिंगारी ।।
नूतन अलख जगा गई ,
देशभक्त बलिदानी,
चिंगारी दावानल फैला गई ।
युग – युग के ज़ुल्मों को सुलझा गई ।
नई रात ,
नई प्रात: करा गयी |
चिंगारी मशाल,
मिसाल बन ,
स्वाभिमान बन,
राष्ट्र गीत सुना गयी ।।

Poem ID: 92

Poem Title: रंग लहू का एक है
Genre: Adbhut (wondrous)
Poem Creation Date: January 9, 2014
Poem Submission Date: September 26, 2012 at 12:28 pm

Poem:

फुलवारी में फूल अनेक
चमन महकता एक है
रंग लहू का एक है|

संविधान की सौं थी मगर
समुदाय बंटा औ छिन्न हुआ,
शराफ़त की दुहाई थी मगर
चलन पशु से क्या भिन्न हुआ?
हम हिन्दू, हम ही मुसलमान
हम ही राष्ट्र की हैं पहचान
यहाँ मनुष्य समान हर एक है,
रंग लहू का एक है|

झुण्ड की कुछ काली भेंड़ों का
चलो, पर्दाफाश सरे-आम करें,
आस्तीन के साँपों का भी
जल्दी से काम तमाम करें|
भ्रष्ट व द्रोही के चंगुल से
मुक्त देश को करने में,
करें वही जो नेक है,
रंग लहू का एक है|

शांति-लौ जलते रहने को
दिया-तेल-बाती लगते हैं,
प्रेम-भ्रातृत्व-सहिष्णुता संग
देशभक्त-परवाने जलते हैं|
उनकी गाथाओं से लिख दें
अमन-चैन की अमर कहानी
जहाँ हो माहौल खुशी का
वहाँ आनंद अतिरेक है,
रंग लहू का एक है|

अपने ही हाथों गढ़नी है
पुनरोदय की अमिट निशानी,
कबिरा-गांधी की पवित्र थली में
मेल-जोल की पौध लगानी|
क्यों हो दंगा, क्यों फसाद
कैसा झगड़ा, कैसा विवाद
जब प्रेम-रंगों का इंद्रधनुष
क्षितिज पर अभिषेक है,
रंग लहू का एक है|
-अजय तिवारी
25 सितम्बर, 2012

Poem ID: 93

Poem Title: मत पूछो क्यों तन -मन हँसता
Genre: Other
Poem Creation Date: November 30, 2011
Poem Submission Date: September 26, 2012 at 1:36 pm

Poem:

मत पूछो क्यों तन -मन हँसता

मत पूछो क्यों तन मन हंसता
पगध्वनि में क्यों साज सा बजता
अंग-अंग में थिरकन रहती
अधरों पे मृदु गीत सा सजता
देस अपने थी गई सखि मैं
देस मेरा अँखियों में बसता ।

धरती की केसरिया चुनरी
मनवा पल पल याद करे
पीपल की वो ठंडी छैयाँ
याद करूँ तो आंख भरे
क्यारी- क्यारी, उपवन-उपवन
चित्रकार रंग भरता

देवदारों की शीत पवन
प्राणों में भर देती सिहरन
जलतरंग की स्वर लहरी सा
शाख- शाख में होता गुंजन
नदियों की कल-कल लहरों में
स्नेह वेग न थमता ।

त्योहारों की मेंहदी का रंग
झलके नभ के आंगन में
वांसती फूलों का उत्सव
सजता सब के प्रांगन में
श्र्द्धा और विश्वास का दीपक
मन मन्दिर में जलता

श्वेत पताका लिये खड़े वे
सीमाओं के प्रहरी पर्वत
मौन तपस्या लीन युगों से
संतों से वे साधक पर्वत
ऋषि मुनियों के ज्ञान का झरना
हिम शिखरों से झरता

हर प्राणी की अँखियां जैसे
स्नेह सुधा की गागर
अब जानूँ क्यों कहती दुनिया
गागर में है सागर
कैसे कह दूँ बिन माँ के हूँ
देस मेरा माँ जैसा लगता
तभी तो वो अँखियों में बसता ।

शशि पाधा

Poem ID: 94

Poem Title: ‘our proud’
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: February 9, 2014
Poem Submission Date: September 26, 2012 at 3:55 pm

Poem:

Today my dear fellowmen,
You will learn about some men,
Who are for their country,
More than just someone who brought them victory,
For when their nation was in danger,
their blood boiled in anger,
Without caring for their personal life,
They left their parents,children,and wife,
And off they went like real heroes,
To make the enemy feel like zeroes,
These men had muscles like Iron,
And had the hearts of a Lion,
When the enemy faced these men,
The enemy didn’t know where to go then,
For one of these men,
Was enough for the enemies then,
The enemy then ran away like rats,
Like rats run after seeing the cats,
Thus these men saved the country,
Giving it a proud victory,
The heroes of this story,
Work for the country,
These are the great and ever victorious,
Our Proud India!

Poem ID: 95

Poem Title: वीर सुभाष बाकी तो हैं………
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: March 2, 2013
Poem Submission Date: October 11, 2012 at 10:17 pm

Poem:

मानचित्र में जड़ा हुआ, या बीच सड़क पर खड़ा हुआ
रामलीला में अड़ा हुआ, या फिर संसद में पड़ा हुआ
जन-गण का भाग्य-विधाता वह,हम कहें किसे भारत है?
वहीं भारत जिसकी महिमा सारे संसार ने गाया,
नई दिशा दे सकल विश्व को जगतगुरु कहलाया|
आज वहीं जननी अपने कुछ कपुतों पर रोती,
जिसके कारण भारतमाता अस्मिता अपनी खोती|
जो संसद को बना दुकान, ईमान को रखकर गिरवी
करते सौदा संस्कार का, जिनसे शरमाती दिल्ली|
पूछ रहा है आज हर बच्चा राजा, कलमाडी से,
क्या गरिमा बढ़ जाती इनकी मंत्री जैसे गाली से|
सत्तर साल के कंधे पर बूढ़ा भारत रोया है,
और हमारा यूवा आज़ाद जाने कहाँ सोया है?
नोट उछाले, इज़्ज़्त बेची, कुर्सी-जूते चला दिया,
संवैधानिक मंदिर को तुमने मयखाना बना दिया|
कभी जला सिंगूर, कभी जलते मंदिर-मस्जिद भी,
मजहबों की ले आड़ फिर इंसानियत भी जला दिया|
पाँच साल पर जयहिन्द कहता वह कथित देशभक्त है,
संवैधानिक पुतलों के हाथों में तिरंगा त्रस्त है|
है एक कटु सवाल मेरा नक्सलपोषक ठेकेदारो से,
जो बनते समाजवाद के नायक, दम भरते बस बातों से|
क्या कभी धमाके उनके दिल्ली का दिल दहलाते हैं?
बस उनके निशाने पर मासूम सिपाही आते हैं|
दोनों ने रोटी की खातिर बंदूक संभाला है पर,
फ़र्क होता बस वर्दी का, क्या इसलिये मारे जाते हैं?
हर बार जली है रेल सामूहिक नरसंहार के जलवे में,
क्या कभी सुना है हुई मौत, मंत्री की नक्सल हमले में|
यह सवाल नही तमाचा है, समाजवाद के चेहरे पर,
क्या कभी भ्रष्ट नेता के बेटे होते लाशों की मलवों में|
क्यों लोकतंत्र है मौन, खौलता लहू नहीं इन बातों से?
क्यों उदासीन हो गये हार, हौसला हम हालातों से?
डायनिंग से निकल चौक तक आक्रोश आज आया पर,
सड़क से संसद तक उसका जाना अभी बाकी तो है|
मत भूल सत्ता के गलियारे, है बूढ़ा शेर बस थका अभी,
याद रखना उसके कई वीर सुभाष बाकी तो हैं…….||

Poem ID: 96

Poem Title: हुईं यहाँ मर्दानियाँ
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: June 1, 2012
Poem Submission Date: September 26, 2012 at 4:46 pm

Poem:

हुईं यहाँ मर्दानियाँ

भारत कि इस धरती ने
वीरता की रची कहानियाँ
मर्दानों की बात तो क्या
हुई यहाँ मर्दानियाँ

कभी बनी चाँद बीबी वो
कहलाई कभी रजिया सुल्तान
नूरजहाँ का नूर कभी तो
कभी रानीझाँसी हुई महान
चलती रहीं गाथाएं आगे
चलती रहीं कहानियाँ
मर्दानों की ………………
वीरता की इस गाथा में
जुड़ा एक नाम बलिदानी
आँधियों भरे दिन हों चाहे
चाहे रातें हो तूफानी
भारत की इस बेटी ने
छोड़ी कितनी निशानियाँ
मर्दानों की बात……………..
अटल हिमालय सा निर्णय ले
बंग देश आजाद किया
डटी रहीं और डिगी नहीं
रची कहानी साहस की
लहू के कतरे कतरे से
लिखीं अमिट कहानियाँ
मर्दानों की बात ………….
संकट में होगा जब भारत
वे फिर तलवार उठाएंगी
रानीझाँसी सा जज्बा ले कर
दुश्मन को मार भागएंगी
व्यर्थ नहीं जाने देगीं वे
उनकी वो कुर्बानियाँ
मर्दानों की बात ………………..
भारत तो हमारी आन है
भारत हमारी शा न है
इसकी एक मुस्कान पर तो
कुर्बान हमारी जान है
यही कहेंगी नहीं डरेंगी
भारत की दीवानियाँ
मर्दानों की बात तो क्या
कुई यहाँ मर्दानियाँ हुईं यहाँ मर्दानियाँ

भारत कि इस धरती ने
वीरता की रची कहानियाँ
मर्दानों की बात तो क्या
हुई यहाँ मर्दानियाँ

कभी बनी चाँद बीबी वो
कहलाई कभी रजिया सुल्तान
नूरजहाँ का नूर कभी तो
कभी रानीझाँसी हुई महान
चलती रहीं गाथाएं आगे
चलती रहीं कहानियाँ
मर्दानों की ………………
वीरता की इस गाथा में
जुड़ा एक नाम बलिदानी
आँधियों भरे दिन हों चाहे
चाहे रातें हो तूफानी
भारत की इस बेटी ने
छोड़ी कितनी निशानियाँ
मर्दानों की बात……………..
अटल हिमालय सा निर्णय ले
बंग देश आजाद किया
डटी रहीं और डिगी नहीं
रची कहानी साहस की
लहू के कतरे कतरे से
लिखीं अमिट कहानियाँ
मर्दानों की बात ………….
संकट में होगा जब भारत
वे फिर तलवार उठाएंगी
रानीझाँसी सा जज्बा ले कर
दुश्मन को मार भागएंगी
व्यर्थ नहीं जाने देगीं वे
उनकी वो कुर्बानियाँ
मर्दानों की बात ………………..
भारत तो हमारी आन है
भारत हमारी शा न है
इसकी एक मुस्कान पर तो
कुर्बान हमारी जान है
यही कहेंगी नहीं डरेंगी
भारत की दीवानियाँ
मर्दानों की बात तो क्या
कुई यहाँ मर्दानियाँ

Poem ID: 98

Poem Title: देश
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: August 9, 2012
Poem Submission Date: September 26, 2012 at 5:01 pm

Poem:

देश

देश लिखा नहीं जाता
देश पढ़ा नहीं जाता
देश जिया जाता है
देश प्रेम जब पीया जाता है
लाख चट्टानों के गिरने से
देश दिया नहीं जाता
दो टुकडों की लड़ाई में
बंजर खेतों की जुताई में
इंसानों को धागों सा सिया नहीं जाता
तोड़ने की कोशिश में लगकर
जोड़ने का परिचय दिया नहीं जाता
देश लिखा नहीं जाता
देश पढ़ा नहीं जाता

पैसों की चमक से
न शहर न गावं से
देश नहीं डरता किसी अलगाव से
जुड़कर ,बना मिलकर रहा
न कभी झुकेगा न कभी झुका
गिरकर सर उठाया नहीं जाता
सपनो को कभी दबाया नहीं जाता
हर शहीद ने इतिहास लिखा
गर्व से भरी यहाँ हर इक माँ
ममता की छाँव ये देश मेरा
तेरे लिए मेरे लिए
हर सैनिक सरहद पर खड़ा
वीरो को डर से डराया नहीं जाता
गद्द्दारो को घर में बसाया नहीं जाता

Poem ID: 99

Poem Title: यह देश मेरा जल रहा
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: September 1, 1992
Poem Submission Date: September 26, 2012 at 11:48 pm

Poem:

यह देश मेरा जल रहा .. [कविता] – श्रीकान्त ,मिश्र ’कान्त’

आतंक के अंगार बरसे
आज अम्बर जल रहा
त्रस्त घर उसका नहीं
यह देश मेरा जल रहा

भ्रमित अरि के हाथ में
कुछ सुत हमारे खेलते हैं
घात कर के मातृभू संग
जो अधम धन तौलते हैं
आज उन सबके लिये
न्याय का प्रतिकार दो
विहंसता है कुटिल जो
अब युद्द में ललकार दो

नीर आंखों का हुआ है व्यर्थ सब
और अब तो क्षीर शोणित बन रहा
त्रस्त घर उसका नहीं
यह देश मेरा जल रहा

आग यह किसने लगायी
क्यों लगायी किस तरह
राष्ट्र के सम्मुख खड़े हैं
कुछ यक्ष प्रश्न इस तरह
किस युधिष्ठिर की चाह में
राष्ट्र के पाण्डव पड़े हैं
प्रतीक्षा में कृष्ण की हम
मूक जैसे क्यों खड़े हैं

आतंक की हर राह में
सैनिक हमारा छल रहा
त्रस्त घर उसका नहीं
यह देश मेरा जल रहा

कुटिल अरि ललकारता है
मातृभू हुंकारती है
महाकौशल के लिये
फिर जन्मभू पुकारती है
उठो जागो ….
सत्यसिंधु सजीव मानस
कर गहो गाण्डीव
फिर से बनो तापस

रक्त अब राणा शिवा का
युव धमनि में जल रहा
शीष लेकर हाथ में हर
‘कान्त’ युगपथ चल रहा
त्रस्त घर उसका नहीं
यह देश मेरा जल रहा

Poem ID: 100

Poem Title: भगत सिंह , राजगुरु और सुखदेव को समर्पित
Genre: Karuna (pathos)
Poem Creation Date: August 14, 2012
Poem Submission Date: September 27, 2012 at 4:01 am

Poem:

भगत सिंह , राजगुरु और सुखदेव को समर्पित

थे बड़े सजीले वह दूल्हे
वैसी ही थी बारात चली
हर दिल भीतर से रोता था
पर चेहरे थी मुस्कान सजी

मुख मंडल पर वह आभा थी
शत शत सूरज भी शर्मायें
हौसलों में वह बुलंदी थी
हिम शिखर के मस्तक झुक जायें

अधरों पर जयजयकार लिए
अंत:स में माँ का प्यार लिए
वे चले आज जिसको वरने
वह दुल्हन थी बेताब खड़ी

कितना प्यारा आलिंगन था
सारे देवों के शीश झुके
मनसा वाचा और कर्मों से
वे जोड़े मिलकर एक हुए …

Poem ID: 101

Poem Title: देश के साथ यात्रा
Genre: Adbhut (wondrous)
Poem Creation Date: August 5, 2012
Poem Submission Date: September 27, 2012 at 4:36 am

Poem:

देश के साथ यात्रा

आओ मेरे देश
एक दीप की तरह
ज्योतित होकर
साथ चलो मेरे क्योंकि
कोई इंतज़ार नहीं करता
तारीखों के ठहर जाने का
हम साथ होंगे तो
देश के लिए
इतिहास बनायेंगे
जहर का प्याला पीकर
देश के लिए
अमृत जुटाएँगे
फिर मूक हो जाएँगे
ताकि देश गा सके
विश्वास के गीत
आस्था और
सदभाव के गीत
हम चलते चले जायेंगे
दूर की यात्राओं में
साफ़ सुथरी
सुबह की तरह
गुजर जायेंगे
अंधी सुरंग से
रोशनी की हवा लेकर
जरुरत हुई तो
अंधे हो जायेंगे ताकि
देश को नेत्र मिलें
प्रतीक्षा करेंगे
मौत की
देश को जिलाने में
आओ मेरे देश
साथ चलें
एक दीप की तरह
ज्योतित होकर !

Poem ID: 103

Poem Title: क्या क़ीमत है आज़ादी की
Genre: Rudra (wrathful)
Poem Creation Date: September 27, 2012
Poem Submission Date: September 27, 2012 at 4:47 pm

Poem:

क्या क़ीमत है आज़ादी की
हमने कब यह जाना है
अधिकारों की ही चिन्ता है
फर्ज़ कहाँ पहचाना है

आज़ादी का अर्थ हो गया
अब केवल घोटाला है
हमने आज़ादी का मतलब
भ्रष्टाचार निकाला है

आज़ादी में खा जाते हम
पशुओं तक के चारे अब
‘हर्षद’ और ‘हवाला’ हमको
आज़ादी से प्यारे अब

आज़ादी के खेल को खेलो
फ़िक्सिंग वाले बल्लों से
हार के बदले धन पाओगे
‘सटटेबाज़ों’ दल्लों से

आज़ादी में वैमनस्य के
पहलु ख़ूब उभारो तुम
आज़ादी इसको कहते हैं?
अपनों को ही मारो तुम
आज़ादी का मतलब अब तो
द्वेष, घृणा फैलाना है ॥

आज़ादी में काश्मीर की
घाटी पूरी घायल है
लेकिन भारत का हर नेता
शान्ति-सुलह का कायल है
आज़ादी में लाल चौक पर
झण्डे फाड़े जाते हैं
आज़ादी में माँ के तन पर
चाक़ू गाड़े जाते है

आज़ादी में आज हमारा
राष्ट्र गान शर्मिन्दा है
आज़ादी में माँ को गाली
देने वाला ज़ीन्दा है

आज़ादी मे धवल हिमालय
हमने काला कर डाला
आज़ादी मे माँ का आँचल
हमने दुख से भर डाला

आज़ादी में कठमुल्लों को
शीश झुकाया जाता है
आज़ादी मे देश-द्रोह का
पर्व मनाया जाता है

आज़ादी में निज गौरव को
कितना और भुलाना है ?

देखो! आज़ादी का मतलब
हिन्दुस्तान हमारा ह

Poem ID: 104

Poem Title: MERA BHARAT MAHAN
Genre: Other
Poem Creation Date: September 3, 2012
Poem Submission Date: September 28, 2012 at 8:06 am

Poem:

देश हमारा कितना प्यारा कहलाता है हिंदुस्तान
भारत भी इसको कहते हैं मेरा भारत महान
आज़ादी के आन्दोलन को वर्षों तक कितने देशभक्तों ने खींचा
चंद्रशेखर ,भगत सिंह , सुभाष ने अपने खून से सींचा
गाँधी जी ने दे दी जान संवार के इस देश का ये बागीचा
इसीलिये तो इसमें यारो बसते हैं अपने प्राण
देश हमारा कितना प्यारा कहलाता है हिंदुस्तान
भारत भी इसको कहते हैं मेरा भारत महान
समय समय पे आज़ादी पर खतरे कितने आये
सबने एकजुट होके दुश्मन को सबक सिखलाये
कभी न सर उठा सके ऐसे नाकों चने चबवाये
हम एक थे एक ही रहेंगे ऐसी अपनी शान
देश हमारा कितना प्यारा कहलाता है हिंदुस्तान
भारत भी इसको कहते हैं मेरा भारत महान
आज देश को चंद लोग किस दिशा में मोड़ रहे हैं
भाईचारे के संबंधों को क्यों कर तोड़ रहे हैं
नीम बबूल को किसकी खातिर किसके लिए जोड़ रहे हैं
भूल शत्रुता आओ मिल गाए मित्रता के गान
देश हमारा कितना प्यारा कहलाता है हिंदुस्तान
भारत भी इसको कहते हैं मेरा भारत महान

Poem ID: 105

Poem Title: क़र्ज़ कैसे चुकाओगे
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: October 9, 2012
Poem Submission Date: October 5, 2012 at 6:23 am

Poem:

क़र्ज़ कैसे चुकाओगे

जिन माओं ने करी अपनी कोख कुर्बान
जिन माओं से जबरन छीनी गयी उनकी संतान
जिन ने देखे होते बेटें लहू लुहान
आज भेजा जाता नही सरहद पर अपना एक प्यारा लाल
उन माओं का क़र्ज़
तुम कैसे चुकाओगे

खाई थी लाठियां नंगे बदन जिन्होंने
नही लगाया महीनों अन्न का दाना मुंह से
फिर भी डट के लड़े उस तानाशाह हुकूमत से
आज बिना ऐ.सी. के रहा नहीं जाता
उन शहीदों का क़र्ज़
तुम कैसे चुकाओगे

जवानी की सारी इच्छा त्याग जिन्होंने
फंदों को चूम कर गले लगाया
देश को थी और हमेशा रहेगी
जरुरत जवां लोगों की जवानी की
यह हमको बतलाया
आज सिगरेट, शराब, शबाब बिन
तुमसे रहा नही जाता
उन लड़कों की जवानी का क़र्ज़
तुम कैसे चुकाओगे

जिन्होंने खून मांग कर आज़ादी दी
उनके खून में भी क्या रवानी थी
जिस खून से सींची इस देश की जमीं
उस खून की भी क्या कहानी थी
आज तुम १५०० में बेईज्ज़त कर आते हो
उन खून की बूंदों का क़र्ज़
तुम कैसे चुकाओगे

काकोरी में लुटा अंग्रेजी खज़ाना था
ताकि आने वाली नस्ल स्वतन्त्र हो
वो सोने की चिड़िया
जो रोज़ लुट रही थी
उस पर भी अत्याचार खत्म हो
यहाँ लाखों को झोपडी नसीब नही होती
तुम अपने ही देश को लूट कर
बंगले बनाते चले जाते हो
उन क्रांतिकारियों का क़र्ज़
तुम कैसे चुकाओगे

“इंक़लाब जिंदाबाद”
से गुंजाया था जिन्होंने आसमां
ऊँचा सुनने वालो को पहुँचाया
बम से फरमान
आज अपने हक के लिए बोला नही जाता
उन सूरमों का क़र्ज़
तुम कैसे चुकाओगे

जलियावाला बाग़ भी हुआ था लहू लुहान
डायर ने ली थी हजारों की जान
तुम सरकारी आकड़ों में उलझे रहते हो
जब बात छेड़ो तो सच दबा कर
३७९ की रट लगाते हो
घुमा था वो २१ साल प्रण लिए दिल में
आज देश के प्रति दो फ़र्ज़ निभाने से कतराते हो
उन कर्म समर्पित लोगों का क़र्ज़
तुम कैसे चुकाओगे

हम को तो गुलामी की आदत हो गयी थी
आज़ादी का मतलब समझाने के लिए
आज़ाद नाम जिन्होंने रखा
हस हस कर मौत का जश्न मनाया
बेड़ियों में दम नही तोडा
आज किसी साहूकार किसी सरकार से
दबते चले जाते हो
उन आज़ाद शेरों का क़र्ज़
तुम कैसे चुकाओगे

कुछ मामूली सी ख्वाहिशें
“हमारी मज़ारो पर लगेंगे हर बरस मेले”
“मेरा रंग दे बसंती चोला”
आज उनकी बात को सच करके
हर १५ २६ पर मजाक उड़ाते हो
उन निस्वार्थ एहसानों का क़र्ज़
तुम कैसे चुकाओगे

कश्मीर की बरफ हो या राजस्थान का रेगिस्तान
दिन-रात
सुबह-शाम
तुम्हारे लिए मरता एक जवान
तुम शहीद को शहीद कहलाने की इज्ज़त नहीं बख्शते
उन सरहद के पहरेदारों का क़र्ज़
तुम कैसे चुकाओगे

हमारा आज आने वाली पीढ़ी से लिया उधार है
इस बात को तुम कहा समझ पाओगे
२जी और कोयले से तुम इस आज को बर्बाद कर
कहाँ मुंह दिखाओगे
कहाँ स्वर्ग पाओगे
उस आने वाली पीढ़ी का क़र्ज़
तुम कैसे चुकाओगे

एक बार इस देश पर मर जाये
फिर आराम से जी लेंगे
कुछ ऐसे थे बेटें इस देश के
जिन्होंने इसे भारत माता कहा
आज की तो में अब क्या बात करूँ
यह बताओ उन बेटों का क़र्ज़
तुम कैसे चुकाओगे

सर से पांव तक क़र्ज़ में डूबे हो तुम
मुझे तो यह समझ नहीं आता
इतने सारे क़र्ज़
तुम कैसे चुकाओगे ?

Poem ID: 106

Poem Title: इंतज़ार है मुझे
Genre: Other
Poem Creation Date: September 27, 2012
Poem Submission Date: September 28, 2012 at 8:43 pm

Poem:

मायने आजादी आज फिर मुख्तलिफ है,
कल देश को थी आज हमको ही अपनी जरूरत है,
इक आजादी हमने कई शहादतों से पाई है,
इक गुलामी के चलते अब तो जान पे बन आई है।

तब बंटी थी सीमाएं और दिल थे छलनी हुए,
उस समय के घाव जो थे वो न अब तक भरे,
मजहब के सीने में चुभा था जो खंज़र उस समय,
आज भी दूर तक उसके खून के कतरे मिले।

दम भर जो बैठे अपने सारे गीले, सूखे ज़ख्म लिए,
चीन के हमले से फिर कुछ नए नश्तर चुभे,
दर्द और धोखे की फरेहिस्त और लम्बी हो गई,
हिन्दोस्तां के माथे पे हार के भी कंकर लगे।

रफ्ता रफ्ता फिर भी हम जिन्दगी की रौ में बह गए,
चोट जो दिल पे लगी थी उसको हँस के सह गए,
माझी की दुश्वारियां तब बस किस्से बन के रह गए,
सुनहरे मुस्तकबिल के सपने आँखों में बस के रह गए।

और पहले तो फटे चाक हमने सब रफू किये,
दुश्मनों के दिए जख्मों से भी कई सबक लिए,
दोस्ती के रूप को भी हमने नए मायने दिए,
अपनी रक्षा को भी कुछ बेहतर आयाम दिए।

दूध की किल्लत का नामोनिशां ही हमने मिटा दिया,
खेतो में चलते थे जो हल उनको ही ताकत अपनी बना लिया,
ला के कुछ तबदीलियाँ इसका नक्शा ही बदल दिया,
दुनिया के परदे पे इसको एक नया मुकाम दिया।

आज सोचो तो मन इस बात से इतराता भी है,
पर खुली आँखों से इक और सच दिखलाता भी है,
आज के सरपरस्त बस व्यापारी बन के ही रह गए,
देश की जगह खुद के फायदे में ही उलझ के रह गए।

आज भी सड़कों पे भूखा बचपन है देखो रो रहा,
और देश का नौजवां नाउम्मीदी के फर्श पे है सो रहा,
स्वदेशी का नारा दूर कहीं पे तार तार है हो रहा,
और बाहर के मुल्कों का बोलबाला है हो रहा।

आज भी बेटे के जन्म पे मिठाईयां बांटी जाती है,
और बेटियों के पैदा होने पे चुप्पी सी छा जाती है,
आज भी निठारी जैसे किस्सों से गर्दन हमारी झुक जाती है,
और माँ बहनों की आबरू सरे आम ही लुटी जाती है।

क्या करे, कैसे करे, इन सवालों को फिर से दोहराना होगा,
अब तो अपने अन्दर जज्बातों का इक जलजला लाना होगा,
जंग लगी इन बेड़ियों को अब कही बहा कर आना होगा,
बरसों से जमे जवां खून में उबाल तो लाना होगा।

वो हसरतें जो हमने इस पाक सरजमीं के लिए सजाई थी,
वो आजादी जो हमने कई शहादतो के बाद पाई थी,
उस आजादी को आज पूरी तरह से पाना होगा,
मुद्दों की इस दलदल से इस देश को बाहर लाना होगा।

सोच की इन लहरों में जब यह तूफां आएगा,
तब ही सोये हुए इस वतन में इन्कलाब आएगा,
और धुंधला चुका सूरज चमक के सामने आ जायेगा,
शायद मायने आजादी भी तब ही समझ में आएगा।

Poem ID: 107

Poem Title: सियाचिन का शहीद
Genre: Karuna (pathos)
Poem Creation Date: September 29, 2012
Poem Submission Date: September 29, 2012 at 9:25 am

Poem:

वह प्रहरी था
उस हिमनद का
जो करता रहा छुप छुप कर वार
सर्द हवा की तलवार से
शिखर स्तब्ध खड़े
नाम लिखते रहे
वतन पर मिटने वालों का
मैदान खड़े रहे
बस वसंत के लिए
लेकर फूलों के हार.

रात घिर आयी
और वह नहीं लौटा
आँखों में बसता था जो तारा
दिन भर पत्तों पर टिकी बर्फ
रात की सर्दी में
बूँद बन पिघलती रही
नम होता रहा धरा का आँचल
यादों की ऊष्मा से.

फिर वह लौटा
तीन रंग लपेटकर
धरती का सीना
रंगों से फूला
वसंत सारी खुशबू और रंग लिए
जल उठा टेसू सा
अब वह कभी वापस नहीं जायेगा.

Poem ID: 108

Poem Title: वंदेमातरम् ! वंदे !! कण-कण से हर गली-गांव से , घर-घर से , सब नीड़ों से ,
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: January 1, 2005
Poem Submission Date: October 3, 2012 at 2:15 am

Poem:

वंदेमातरम् ! वंदे !!

कण-कण से हर गली-गांव से , घर-घर से , सब नीड़ों से ,
होता है जयघोष… किलों-गढ़-दुर्गों की प्राचीरों से ,
वंदेमातरम् ! वंदेमातरम् ! वंदेमातरम् ! वंदे !!
जीत नहीं पाएगा दुश्मन हिंदुस्थानी वीरों से !!

केशर दसों दिशाओं फैला , कमल मृदुल मुसकाए !
भगवा विजय-पताका नीले अंबर तक लहराए !
रौद्र रूप की झलक देख’ हर महिषासुर थर्राए !
रणचंडी जब चली भाल पर शोणित तिलक लगाए !
रानी लक्ष्मी कोटि कांतिमय कोहेनूर के हीरों से !
जीत नहीं पाएगा दुश्मन हिंदुस्थानी वीरों से !
वंदेमातरम् ! वंदेमातरम् ! वंदेमातरम् ! वंदे !!

हमसे घात न करना , हर ज़ालिम को नेक सलाह है !
निज पद से ना कंटक कुचले ; कहो , कौन सी राह है ?
हृदय पराक्रम अ द् भु त पौरुष-परावार अथाह है !
निज घावों को सहलाने की… सुनो किसे परवाह है ?
ख़ौफ़ नहीं सांगा को खल-दल की तोपों-शमशीरों से !
जीत नहीं पाएगा दुश्मन हिंदुस्थानी वीरों से !
वंदेमातरम् ! वंदेमातरम् ! वंदेमातरम् ! वंदे !!

कई ग़ज़नवी , कितने ग़ौरी… सबको धूल चटाई !
जिसने आंख उठाई ; गर्दन उसकी वहीं उड़ाई !
पुण्य-भूमि पर धर्म-पताका लाख बार फहराई !
पृथ्वीराज , प्रताप , शिवा ने विजय-रागिनी गाई !
छिछलों की तुलना मत करना हमसे गहन-गंभीरों से !
जीत नहीं पाएगा दुश्मन हिंदुस्थानी वीरों से !
वंदेमातरम् ! वंदेमातरम् ! वंदेमातरम् ! वंदे !!

लहू उबलता हुआ हमारी रग-रग में बहता है !
राष्ट्रभक्ति का हृदय-हृदय… इक सैलाब उफनता है !
घर में हमारे कोई दुश्मन अब कैसे रहता है ?
निपटेंगे गद्दारों से हम , हर बेटा कहता है !
भगत , पटेल , सुभाष ना डरें बम-बंदूकों-तीरों से !
जीत नहीं पाएगा दुश्मन हिंदुस्थानी वीरों से !
वंदेमातरम् ! वंदेमातरम् ! वंदेमातरम् ! वंदे !!

Poem ID: 109

Poem Title: लहू रहे न सर्द अब उबाल को तलाश लो
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: March 3, 2000
Poem Submission Date: October 3, 2012 at 2:15 am

Poem:

लहू रहे न सर्द अब उबाल को तलाश लो
दबी जो राख में हृदय की ज्वाल को तलाश लो

भविष्य तो पता नहीं , गुज़र गया वो छोड़ दो
इसी घड़ी को वर्तमान काल को तलाश लो

सृजन करें , विनाश भूल’ नव विकास हम करें
तो गेंती-फावड़े व हल-कुदाल को तलाश लो

धरा को स्वर्ग में बदलना साथियों ! कठिन नहीं
दबे-ढके-छुपे हुनर-कमाल को तलाश लो

भटकना मत जवानों ! मां का कर्ज़ भी उतारना
निकल के वहशतों से अब जलाल को तलाश लो

किया दग़ा जिन्होंने हिंद से उन्हें न छोड़ना
नमकहराम भेड़ियों की खाल को तलाश लो

हमें ही हल निकालना है अपनी मुश्किलात का
जवाब के लिए किसी सवाल को तलाश लो

यहीं पॅ चंद्र हैं , भगत सुभाष हैं , पटेल हैं
यहीं शिवा प्रताप छत्रशाल को तलाश लो

राजेन्द्र देशभक्त हर गली शहर में गांव में
किसी भी घर में जा’के मां के लाल को तलाश लो

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