Gaurav Gatha 2012 - Private View

Gaurav Gatha 2012 – Private View

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Poem ID: 110

Poem Title: वंदे मातरम् ! मंत्र है , पावन ॠचा है , राष्ट्र का मन-प्राण है !
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: January 21, 2000
Poem Submission Date: October 3, 2012 at 2:14 am

Poem:

वंदे मातरम् !
उत्तप्त ध्वनि उ द् घो ष वंदे मातरम जय मातरम् !
उत्फुल्ल ध्वनि स द् घो ष वंदे मातरम जय मातरम् !
श् वा स वंदे मातरम् ! उच्छ्वास वंदे मातरम् !!

मंत्र है , पावन ॠचा है , राष्ट्र का मन-प्राण है !
विहित वंदे मातरम् में संस्कृति का त्राण है !
निहित वंदे मातरम् में सृष्टि का कल्याण है !
जयति जय जय राष्ट्र ! वंदे मातरम् !! जय मातरम् !!!

है हमारा कर्म यह , हर कर्म का प्रतिफल यही !
स्नेह में सौहार्द है यह , समर में संबल यही !
ओज है यह , तेज है यह , शौर्य शुचिता गर्व है !
बल भुजाओं का यही ,अधरों की स्मित-मुस्कान है !
राष्ट्र-हित सन्नद्ध जन का लक्ष्य है , संधान है !!

सभ्यता-संस्कृति न अंगद-पांव-सी टस मस हुई !
शिवत्व के संस्पर्श से ज्योतित स्वयं कल्मष हुई !
पुण्य शाश्वत् यश चिरंतन पथ सनातन श्रेष्ठतम ;
नित्य अपराजेय अक्षुण्ण आत्मभू अभिमान है !
अनवरत् उत्कर्ष अरुणिम अभ्युदय उत्थान है !!

शूरवीर प्रताप ना बिसराएं वंदे मातरम् !
लक्ष्मी दुर्गा शिवाजी गाएं वंदे मातरम् !
भगतसिंह सुखदेव बिस्मिल राजगुरु आज़ाद की ,
और… हेडगेवार सावरकर सभी की जान है !
मातृ-सुत बंकिम की वंदे मातरम् पहचान है !!

जयति भारतवर्ष ! वंदे मातरम् !! जय मातरम् !!!

Poem ID: 111

Poem Title: नौजवान आबरू वतन की नौजवान ! तुमसे है …
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: January 10, 1999
Poem Submission Date: October 3, 2012 at 2:10 am

Poem:

नौजवान

आबरू वतन की नौजवान ! तुमसे है …
ख़ुशबू-ए-चमन ऐ बाग़बान ! तुमसे है …
देश के लिए निकल के तू घरों से आ !
मस्जिदो-गुरुद्वारों, चर्चो-मंदिरों से आ !
गर्दे-मज़हब रुहो-जिस्म से ; आ झाड़ कर !
दुश्मने-वतन पे टूट पड़ दहाड़ कर !!

मोड़-मोड़ पर खड़े हैं लाख इम्तिहां !
देश को बहुत है आस तुमसे नौजवां !
ज़र्रा-ज़र्रा हिंद का निहारता तुम्हें …
मां का रोम-रोम ; सुन ! पुकारता तुम्हें …
नौजवान आ !
नूरे-जहान आ !
हिंद के मुस्तक़बिल ! रौशन-निशान आ !!

तू ही जिस्म और तू ही जान हिंद की !
नौजवां ! बलंद रखले शान हिंद की !
अज़्मतो-पाकीज़गी, बलंद हौसला ;
ख़ास है जहां में ये पहचान हिंद की !
नौजवां सम्हाले रखना शान हिंद की !!

नौजवां ! अज़ीम तेरी आन बान शान !
तेरे हाथ में सुकून, अम्न-ओ-अमान !
जीतले ज़मीन, जीतले तू आसमान !
जीतले दिलों को, जीतले तू दो जहान !
सुन ! वतनपरस्ती ऊंची मज़हबों से है !
इज़्ज़ते-वतन तुम्हारे वल्वलों से है !!

बर्फ़ के मानिंद शोले हो नहीं सकते !
शेरमर्द तो खिलौने हो नहीं सकते !
तीरगी टिकेगी कब मशाल के आगे ?
तेरे हौसले तेरे जलाल के आगे !!

मादरे-वतन के ज़ख़्म भरदे नौजवां !
दुश्मनों के सर क़लम तू करदे नौजवां !
क़तरा-क़तरा ख़ून का तेरा वतन का है !
है वतन भी तेरा !
…और तू वतन का है !
लहरादे तिरंगा ऊंचे आसमान पे !
फहरादे तिरंगा ऊंचे आसमान पे !
जानो-ईमां नज़्र कर हिंदोस्तान पे !

नौजवान आ !
नौजवान आ !!
नौजवान आ !!!

Poem ID: 112

Poem Title: क्या जंग लगी तलवारों में
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: August 2, 2012
Poem Submission Date: September 29, 2012 at 3:00 pm

Poem:

क्या जंग लगी तलवारों में, जो इतने दुर्दिन सहते हो I
राणा प्रताप के वंशज हो,क्यों कुल को कलंकित करते हो II
आराध्य तुम्हारे राम-कृष्ण,जो कर्म की राह दिखाते थे I
जो दुश्मन हो आततायी, वो चक्र सुदर्शन उठाते थे I
श्री राम ने रावण को मारा, तुम गद्दारों से डरते हो II
जब शस्त्रों से परहेज तुम्हे,तो राम राम क्यों जपते हो I
क्या जंग लगी तलवारों में,जो इतने दुर्दिन सहते हो II

अंग्रेजों ने दौलत लूटी,मुगलों ने थी इज्जत लूटी I
दौलत लूटी, इज्जत लूटी, क्या खुद्दारी भी लूट लिया,
गिद्धों ने माँ को नोंच लिया,तुम शांति शांति को जपते हो I
इस भगत सुभाष की धरती पर,क्यों नामर्दों से रहते हो?
क्या जंग लगी तलवारों में जो इतने दुर्दिन सहते हो II

हिन्दू हो,कुछ प्रतिकार करो,तुम भारत माँ के क्रंदन का I
यह समय नहीं है, शांति पाठ और गाँधी के अभिनन्दन का II
यह समय है शस्त्र उठाने का,गद्दारों को समझाने का,
शत्रु पक्ष की धरती पर,फिर शिव तांडव दिखलाने का II
इन जेहादी जयचंदों की घर में ही कब्र बनाने का,
यह समय है हर एक हिन्दू के,राणा प्रताप बन जाने का I
इस हिन्दुस्थान की धरती पर ,फिर भगवा ध्वज फहराने का II

ये नहीं शोभता है तुमको,जो कायर सी फरियाद करोI
छोड़ो अब ये प्रेमालिंगन,कुछ पौरुष की भी बात करोII
इस हिन्दुस्थान की धरती के,उस भगत सिंह को याद करो,
वो बन्दूको को बोते थे,तुम तलवारों से डरते होI
क्या जंग लगी तलवारों में जो इतने दुर्दिन सहते हो II

Poem ID: 113

Poem Title: वीरों को नमन
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: December 16, 2010
Poem Submission Date: September 30, 2012 at 12:59 am

Poem:

कठनाइयों की चले आँधी अड़चनें बन जाए तूफान|
फिर भी ना ढले जो पथ से कहलाते वो ही वीर महान||

चाहे आकाश से बरसे आग या तीरों की हो बौछार|
मातृभूमि के लिए झेलते सिने पे शत शत प्रहार||

हर पत्ता बने भाला हर डाली बने तलवार|
जब देश पर मर मिटने को हर इंसान हो तय्यार||

स्वतंत्रता के लिए जिन्होने कष्ट सहे अपरंपार|
उन वीरों को सर झुकाके नमन करूँ मैं सैंकड़ो बार|

Poem ID: 114

Poem Title: यह आज़ादी, जो मनाने का त्यौहार नही…..
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: September 3, 2012
Poem Submission Date: September 30, 2012 at 5:14 am

Poem:

पुष्प की अभिलाषा कभी ये कहती थी,
उस राह पर फेके जाने को मचलती थी
कहती धन्य भाग्य सर आ जाए उनके चरणो तले
दिल में जिनके वतन का प्यार पले
आज वह अभिलाषा प्रवंचना बन गई है
बस एक मनोरंजक कविता भर रह गई है
कहाँ गाँधी, कहाँ नेहरू, कहाँ उनके सपने
रह गये ख्वाब वे हो भी न सके अपने
वतन की मिट्टी बिकती है जहाँ कौडियों के मोल
रह गया रत्ती भर न अब सत्य का भी तोल
गाँधी जेबों तले अब सिसकियाँ भरते हैं
उन्ही के नाम पर लोग बिका करते हैं
रंग गई उनकी सूरत भी अब सरेआम
रंगों से बदल गई है उनकी पहचान
कहते आज़ादी पर आज़ादी क्या जब कितने लोग
आज़ादी का मतलब भी नहीं जानते
भूखी नंगी तस्वीर और फूटी तकदीर से
आज़ादी जैसी नेमत कैसे पहचानते
यह तो चंद धनपतिओं को पड़ी हुई गिरवी है
जहाँ ग़रीबों के ठठरियो की मशाल जल रही है
आज़ादी पर्व मना कर उत्सव मनता है कहीं
दिल में मेरे उठती है पुकार यहीं
कोई जाकर जरा उनसे ये तो कह दे
ये आज़ादी जो मनाने का त्यौहार नहीं……….

Poem ID: 115

Poem Title: ईमान
Genre: Other
Poem Creation Date:
Poem Submission Date: September 30, 2012 at 5:46 am

Poem:

बालकों में कमी है ज्ञान की
बडों के सम्मान की।
युवाओं का भी बडा बुरा हाल है,
एक्शन फिल्मों से ज्यादा
विधान सभा में बवाल हैं।

गांधी की तस्वीर के नीचे
रिश्वतखोरी होती है,
सरकार छोडो, अब तो
परिवार में भी राजनीति होती है।

बाबू नेता की सुनता है
नेता सुनता है गुंडों की,
सरदार दीदी की सुनता है
और दीदी अपने मन की।

जब बैठा एक साधु अनथन पर
इल्ज़ाम लगा कि वह राजनीति में आना चाहता है!
बैठा जब बूढ़ा
इल्ज़ाम लगा कि दल में उसके भ्रष्टाचार है!
पर कोई वक्ता से
क्या वह राजनीति में नहीं?
क्या दल उसका भ्रष्ट नहीं?

सत्य की चिंगारी तो है पर आग को ईंधन नही।
जोशीले युवा तीर तो हैं पर कोई कमान नहीं।
सब कुछ है मेरे देश में बस एक ईमान नहीं।

Poem ID: 116

Poem Title: प्रतिकार करूँ, करवाऊंगा
Genre: Vibhatsa (odious)
Poem Creation Date: July 2, 2011
Poem Submission Date: September 30, 2012 at 6:11 am

Poem:

सच कहता हूँ, सच जीता हूँ, नहीं झूठ कह पाउँगा
जीवन शेष रहा जब तक, प्रतिकार करूँ, करवाऊंगा

राजनीति है अर्थ खो चुकी, नीति समर्पित राज यहाँ
समजावाद बन गया सपन अब, लंगड़ाता सद्भाव यहाँ
जन रोता है तंत्र जाल में, जनतंत्र कहाँ कह पाउँगा
जीवन शेष रहा जब तक, प्रतिकार करूँ, करवाऊंगा

आँखे सपनो को तरस गई, उर सज़ल फर्जी मुठभेड़ यहाँ
आधे से अधिक आबादी जब, सोती हो आधे पेट जहाँ
तब दिवा स्वप्न को तोड़ सके, ऐसी आवाज़ उठाऊंगा
जीवन शेष रहा जब तक, प्रतिकार करूँ, करवाऊंगा

सापेक्ष सत्ता है मानक अब, गृह युद्ध छिड़ा हो आज जहाँ
उद्योग क्रांति के साये में, बढ़ाते कुछ पूँजी व्यक्ति यहाँ
तब मरघट की थाती चीरे जो, गीत वही मै गाऊँगा
जीवन शेष रहा जब तक, प्रतिकार करूँ, करवाऊंगा

महगाई डायन खाय रही, उस पर खेलों में लूट यहाँ
सर्वोच्च सत्ता जब करती हो, अपने वेतन की बात जहाँ
तब दंभ चरित चेहरे के धब्बे, दर्पण बन दिखालाऊंगा
जीवन शेष रहा जब तक, प्रतिकार करूँ, करवाऊंगा

सच कहता हूँ, सच जीता हूँ, नहीं झूठ कह पाउँगा
जीवन शेष रहा जब तक, प्रतिकार करूँ, करवाऊंगा

Poem ID: 117

Poem Title: तेरे वीर बहादूरशेर
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: September 29, 2012
Poem Submission Date: September 30, 2012 at 9:41 am

Poem:

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Poem ID: 118

Poem Title: नित शीश झुकता रहे हमारा उनके नमन के लिये
Genre: Other
Poem Creation Date: March 22, 2012
Poem Submission Date: September 30, 2012 at 11:10 am

Poem:

लड़कपन गुजारा जिन्होंने इस वतन के लिये
जवानी हवन की उन्होंने इस वतन के लिये
बुढ़ापे की नौमत न आयी इस वतन के लिये
नित शीश झुकता रहे हमारा उनके नमन के लिये//

सूरज की किरणें भी कम हैं उनकी अर्चना के लिये
चाँद की रोशनी भी मध्यम है उनकी अर्चना के लिये
गंगा की जलधारा भी कम है उनकी अर्चना के लिये
धरती की आँखें भी नम हैं उनकी अर्चना के लिये//

मंदिर भी उनकी मूरत से हर्षाते रहें
देवता भी खुद पर नित इठलाते रहें
घंटे भी उनकी यशगाथा में बजते रहें
उनके बलिदानों को गाकर हम नर्तन करते रहें//

वे वतन की हवाओं पे सिसकते होंगे अब भी
फिर कुछ कर गुजरने को बाजू फड़कते होंगे अब भी
तड़पन उदासी में उनके दिल धधकते होंगे अब भी
खुशबू से उनकी देवलोक महकते होंगे अब भी //

लड़कपन गुजरे यहाँ अब वतन के लिये
जिंदगी हवन हो यहाँ अब वतन के लिये
पूजा हो शहीदों की यहाँ अब वतन के लिये
नित शीश झुकता रहे हमारा उनके नमन के लिये//

Poem ID: 119

Poem Title: माँगा जिस मिटटी ने कभी …….
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: September 18, 2012
Poem Submission Date: September 30, 2012 at 2:43 pm

Poem:

माँगा जिस मिटटी ने कभी, बलिदान अपने सपूत से ,
आज वही मिटटी हमसे, ज़बाव माँगती है ।
वही पुनीत भावना , वही स्वर्ण कल्पना ,
संस्कृति और दर्शन का , वही इतिहास माँगती है ।
माँगा जिस मिटटी ने कभी …….

लाखों अबाल बृद्ध नर नारी , जिनके सपने छले गए ,
त्याग और बलिदान की गाथा , लिखाकर के जो चले गए ।
उस भगत सिंह आजाद को , चौराहों पर गड़ाने वाले ,
उस शिल्पकार कारीगर से , उन जैसा व्यक्तित्व माँगती है ।
माँगा जिस मिटटी ने कभी …..

इक अदम्य शक्ति का , जन जन में संचय हो ,
जहाँ प्रीत श्रद्धा भक्ति का , फिर कभी न क्षय हो ।
जहाँ जीने की न शर्त हो , हर कोई समर्थ हो ।
ऐसे कल्प देश की , वही पुकार माँगती है ।
माँगा जिस मिटटी ने कभी ……..

जब मानवता और लोकहित , इक छलावा मात्र है ।
जब हर तरफ कर्तव्य पथ पर , अंधकार व्याप्त है ।
जब आदर्शों और मूल्यों को , असली अर्थों में खो दिया ।
तब शील , शिष्ट और सदभावाना का वही चरित्र माँगती है ।
माँगा जिस मिटटी ने कभी ………….

जब एतिहासिक पर्व था , उसको हम पर गर्व था ।
हर मानते पर चन्दन था , मिटटी का एसा वंदन था ।
आज सभ्यता के विक्ष युग में , उपेक्षित सी उदाशीन सी ,
अपने लिए वो मिटटी हमसे , वही सम्मान माँगती है ।

माँगा जिस मिटटी ने कभी बलिदान अपने सपूत से ,
आज वही मिट्टी हमसे ज़बाव माँगती है ।

Poem ID: 120

Poem Title: पहले हिन्दुस्तानी हैं
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: September 15, 2012
Poem Submission Date: September 30, 2012 at 3:17 pm

Poem:

‘पहले हिन्दुस्तानी हैं’

फिर गुजराती, फिर मलयाली, बंगाली, आसामी हैं |
आज शपथ लेकर कहते हैं- ‘पहले हिन्दुस्तानी हैं’ ||

हम गाँधी की अटल अहिंसा, हम सुभाष का नारा हैं |
भगत सिंह की फांसी हैं हम, अंडमान का कारा हैं ||

पृथ्वीराज का तरकश हैं हम, सत्तावन के बागी हैं |
हम राणा की घास की रोटी, हम ही बंदा बैरागी हैं ||

हम कित्तूर की बेटी हैं, हम झांसी की रानी हैं |
अस्सी बरस के कुंवर सिंह की, हम बेख़ौफ़ जवानी हैं ||

फिर गुजराती, फिर मलयाली, बंगाली, आसामी हैं |
आज शपथ लेकर कहते हैं- ‘पहले हिन्दुस्तानी हैं’ ||

हम शिरडी की दीवाली, हम ख्वाजा की होली हैं |
गुरुग्रंथ की वाणी हैं हम, हम अज़ान की बोली हैं ||

उस मसीह की करुणा हैं हम, हम नवरोज़ की ज्वाला हैं |
हम विनाश के महाकाल, मीरा के बांसुरीवाला हैं ||

सारनाथ के बरगद हैं हम, कुंडग्राम का पानी हैं |
धरम के हेतु समर हुआ जो, उसकी अमर कहानी हैं ||

फिर गुजराती, फिर मलयाली, बंगाली, आसामी हैं |
आज शपथ लेकर कहते हैं- ‘पहले हिन्दुस्तानी हैं’ ||

हम हैं गर्व हिमाला का, हम फूलों वाली घाटी हैं |
हम प्रयाग के संगम हैं, हम रेवा तट का माटी हैं ||

हम ही दक्कन का पठार, हम केसर की क्यारी हैं |
लक्षद्वीप का मूंगा हैं हम, पावन कन्याकुमारी हैं ||

अलग रूप है, अलग है बोली, अलग धरम और पानी है |
अलग भले विश्वास हमारे, अपनी एक कहानी है ||

फिर गुजराती, फिर मलयाली, बंगाली, आसामी हैं |
आज शपथ लेकर कहते हैं- ‘पहले हिन्दुस्तानी हैं’ ||

Poem ID: 121

Poem Title: भारत माँ के नाम
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: June 15, 2012
Poem Submission Date: September 30, 2012 at 3:33 pm

Poem:

भारत माँ के नाम

हे माँ बताऊँ कैसे, कितना प्यार तुमसे है
जीवन की सभी खुशियाँ , बहार तुमसे है !

माँ जन्मदायिनि तुम आँचल में दी जगह
अंततः समाना तुममें, ये संसार तुमसे है !

नदियाँ, गिर श्रंखलायें, झील, ताल कंदरायें
कला बोध, गीत, प्रीत लय मल्हार तुमसे है !

हमें दिये माँ तुमने अनमोल रतन कितने
ऋषि संत मुनियों सा मिला उपहार तुमसे है !

गार्गी, मीरा, सीता या हों कल्पना, सुनीता
सुन्दर सुगन्धित चमन ये गुलजार तुमसे है !

श्री राम ,राणा, शिवाजी ,पटेल, टैगोर गाँधी
वेद पंचम धर्म दर्शन का आधार तुमसे है!

दुष्टों के प्रहार भी माँ सहती रही सदा से
निश्छल प्रेम, क्षमा भाव का आचार तुमसे है !

मन में है चाह इतनी हों प्राण तुम पे कुर्बां
सब गीत गजल कविता अश‍आर तुमसे हैं !

Poem ID: 122

Poem Title: हमको उस भारत से प्यार …….
Genre: Other
Poem Creation Date: September 30, 2012
Poem Submission Date: September 30, 2012 at 4:47 pm

Poem:

कई काल के खण्डों में भी , जो रहा अनुपम अखण्ड
जिसके अंतस में प्रकाशित, संस्कृति की लौ प्रचण्ड
जिसके उर से जन्म पाकर , कलाओं ने वर्चस्व पाया
भुजाओं में सर को छुपा , संसार ने सर्वस्व पाया
और मानवता के प्रति है , जिसके मन में स्नेह अपार
हमको उस भारत पे गौरव , हमको उस भारत से प्यार

जिसकी पावनता की द्योतक, है धरा पर स्वयं गंगा
मान और गौरव झलकता, जब लहरता है तिरंगा
गुण अगर हैं मापने, इतिहास बारम्बार देखो
धरा का देखो रसातल, गगन का विस्तार देखो
पर उठाओगे कलम तो, खुद को पाओगे वहां
करने परिभाषित इसे तुम, थे खड़े पहले जहाँ
साहस-प्रतीक अशोक के, स्तम्भ के हैं सिंह चार
हमको उस भारत पे गौरव , हमको उस भारत से प्यार

पग-पग पे जिसने जगत को, जीवन का नव दर्शन दिया है
हर धर्म की समृद्धि हेतु, अपना घर आँगन दिया है
जिसकी मिट्टी की महक में, प्रेम और भक्ति बसी है
कण-कण में ईश्वर व्याप्त है, रज-रज सुधा रस से लसी है
सभ्यता कहती जहाँ की, चरित्र का निर्माण करना
वह किसी भी जाति का हो, दुखी जन का त्रास हरना
जिसको सब कुछ सहन पर, असह्न्य है मूल्यों पे वार
हमको उस भारत पे गौरव , हमको उस भारत से प्यार

सोने की चिड़िया जिसे, कह कर पुकारा विश्व ने
सब को आकर्षित किया, जिस देश के अपनत्व ने
आओ की हम एक हो, इस देश को आगे बढायें
कुरीतियों का तम हरें, जो हम वही दीपक जलाएं
प्रण करें कि देश की, निस्वार्थ सेवा हम करेंगे
प्रण करें जब तक जियेंगे, देश हित मन में रखेंगे
तब सब मिलायेंगे मेरी, आवाज़ में अपनी पुकार
हमको भी भारत पे गौरव , हमको भी भारत से प्यार

Poem ID: 124

Poem Title: डंका हम बजाते सदा-सर्वदा से आए हैं !
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: September 21, 2009
Poem Submission Date: October 3, 2012 at 2:13 am

Poem:


डंका हम बजाते सदा-सर्वदा से आए हैं !

हिंद के सपूत कमजोर या कायर नहीं
डंका हम बजाते सदा-सर्वदा से आए हैं !
पीठ पीछे घात की , उसे भी नहीं छोड़ा ; लड़े
सामने उन्हें तो तारे दिन में दिखाए हैं !
राम कृष्ण दुर्गा के भक्तों ने न्याय के निमित्त
जब-तब अस्त्र-शस्त्र हाथों में उठाए हैं !
धूल है चटादी , यमलोक भेजा पापियों को
छक्के आतताइयों-दुश्मनों के छुड़ाए हैं !

Poem ID: 125

Poem Title: घाती-कायरों से हम कभी नहीं डरते !
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: September 21, 2009
Poem Submission Date: October 3, 2012 at 2:12 am

Poem:


घाती-कायरों से हम कभी नहीं डरते !

खेल-खेल में दबा के मुंह में सूरज लाल
बाल हनुमान नभ में कुलांचे भरते !
दूह लेते शेरनी को खेल-खेल में शिवाजी
भरत सिंहों के दांत खेलते ही गिनते !
भरते दहाड़ पृथ्वीराज वीर छत्रसाल
दूर-दूर दुश्मनों के कलेजे दहलते !
रग़ों में हमारी लहू उन्हीं शूरवीरों का है
घाती-कायरों से हम कभी नहीं डरते !

Poem ID: 126

Poem Title: अमर रहे ये हिंदुस्तान
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: September 29, 2012
Poem Submission Date: September 30, 2012 at 5:54 pm

Poem:

लाल हो गई लहू से देखो भारत माँ की माटी है,
छलनी-छलनी रोज हो रही देश की हर एक घाटी है।
मैदानों में हर दिन खूनी होली खेली जाती है,
जाने कितने सीनों से ये गोली झेली जाती है।
दंश कई अपराधों का है भारत मेरा झेल रहा,
इक खूनी कई-कई जानों से बेदर्दी से खेल रहा।
जिनकी आँखों में पानी न दिल में कोई जज़्बात रहा,
भारत माँ ने उन पापी बेटों का भी आघात सहा।
वंदे मातरम की अस्मत का जिनको भान नहीं होता,
जन गण मन का भी मन में जिनके सम्मान नहीं होता।
पल-पल अट्टाहस करते हैं करते वो गद्दारी हैं,
देश बेचने की पूरी कर ली उनने तैयारी हैं।
संविधान में संशोधन की आवश्यकता जब आती है,
सत्ता आँखें बंद करके हौले-हौले मुसकाती है।
कुर्सी को है शरम कहाँ की वो नोटों की भूखी है,
उन माँ के आँसू कहाँ दिखेंगे जिनकी छाती सूखी हैं।
हर इक नेता अपनी जेबें भरने में मशगूल रहा,
इक-इक किसान हर एक सुबह फाँसी पर देखो झूल रहा।
मेरे दिल में चुभती है ये खूब दलाली दिल्ली की,
देश को भूखा नंगा कर गयी नमकहलाली दिल्ली की।
कहने को तो ये भारत आबाद दिखाई देता है,
पर सच तो हर दुर्घटना के बाद दिखाई देता है।
सरकारी पैसे की जारी चौतरफ़ा बरबादी है,
फिर भी भूखी प्यासी भारत की आधी आबादी है।
सरेआम अब कट्टे-गोली बंदूकें लहराती हैं,
राजनीति की चालें शेखर को आतंकी कह जाती हैं।
स्वामी अन्ना जैसे बेटे जब-जब आगे आते हैं,
पीछे से भारी-भारी षड्यंत्र कराये जाते हैं।
झूठ बोल आरोप लगाना सरकारों की चालें हैं,
कुर्सी पर बैठे ये नेता सारे मन के काले हैं।
दिल्ली कब से जूझ रही सचमुच आज़ादी पाने को,
दागी पैसे लूट रहे हैं बर्बादी पर लाने को।
नहीं लेखनी मैं वो जो डर जाती हो गद्दारों से,
सत्ता की गलियों में फैले भयभीतक अंधियारों से।
देशभक्त मैं वीरपुत्र मैं भगत सिंह सी ज्वाला हूँ,
हर शहीद के प्राण-त्याग का चित्र दिखाने वाला हूँ।
उसने हमसे जनम लिया वो फिर हममें मिल जाएगा,
जो खून तुम्हारा खौल गया तो पाकिस्ताँ हिल जाएगा।
दुनिया को ताकत दिखला दो गर दुःख से आँखें नम हैं तो,
काश्मीर को वापस ला गर दिल्ली तुझमें दम है तो।
भयभीत व्यथित है माँ का मन और करुण रुदन उद्वेलन है,
जो घाव सहे इस माँ ने उन सब घावों का सम्मेलन है।
दिल्ली से है प्रश्न मेरा क्या चीख सुनाई देती है,
भारत माँ हमलों से रोती रोज़ दुहाई देती है।
आतंकी घटनाओं से जब मंज़र सभी बदलते हैं,
दिल्ली तब क्या रोती है जब माँ पर खंज़र चलते हैं।
सब मजहब की चिंगारी को आग बना भड़काते हैं,
मेरी भारत माँ को पीड़ा दे-दे के तड़पाते हैं।
गुंडों को अवलंब मिला दिल्ली के पहरेदारों का,
खून खौल जाता है ये सब देख के कुछ खुददारों का।
शेष रही ना अब लज्जा ना शेष रही मर्यादा है,
माँ की पीड़ा से बढ़कर जज़्बात कौन सा ज्यादा है।
हत्या चोरी लूट यहाँ हर रोज़ नया घोटाला है,
फिर भी देखो मेरा भारत कितनी हिम्मतवाला है।
जो भारत माँ पर लिख न सके वो शायर कैसा शायर है,
माँ को रोते देख सके वो बेटा बिलकुल कायर है।
लो मैं आह्वान करता हूँ हर एक का जो सोता है,
जागो भारत की जनता ये देश तुम्हारा रोता है।
भारत को फिर से विश्वगुरु के पद पर तुम्हें बिठाना है,
गौरव वापस लाना है और महाशक्ति बन जाना है।
हे ईश्वर सन्मार्ग रूप में हमको दो तुम ये वरदान,
रहे अमर ये हिन्दी मेरी रहे अमर ये हिंदुस्तान॥

Poem ID: 127

Poem Title: तेरी शान रहे तिरंगे
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: September 30, 2012
Poem Submission Date: September 30, 2012 at 6:26 pm

Poem:

!! तेरी शान रहे तिरंगे !!
शूल चुभें या बरसें फूल ,
सत्य सदा से तेरा मूल
तेरी साँसों से संचारित..
मुझमें प्राण रहें …!
तेरी शान रहे तिरंगे,
तेरी शान रहे ..!!
-१-
भाल सदा ऊंचा हो तेरा
शिखर मिलें तुमको /
विश्व-पटल पर सबसे आगे ,
सूरज सम चमको //
रक्त भरी रग-रग संचालित,
है तेरे कारण /
पल पल ध्यान रहे तिरंगे ,
तेरा ध्यान रहे //
तेरी शान रहे ..!!
-२-
दशों दिशाओं में लहराए,
आनंदित झूमे /
रंग न फीके हों दामन के ,
अम्बर पग चूमे //
छू न सके वैरी बन कोई
तेरा तन पावन /
तेरी आन रहे तिरंगे …
तेरी आन रहे //
तेरी शान रहे ..!!
-३-
युग-युग गौरव गाथा तेरी,
हर्षित सब गायें /
तेरे यश आदर्शों के हित,
बलि-बलि हम जाएँ //
प्रेम सुधा से सुरभित क्षण-क्षण,
हो तेरा आँगन /
ये अरमान रहे तिरंगे ,
यह अरमान रहे //
तेरी शान रहे ..!!
– भावना तिवारी –

Poem ID: 128

Poem Title: क्या यही सिला दोगे ?…
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: September 30, 2012
Poem Submission Date: September 30, 2012 at 6:30 pm

Poem:

क्या यही सिला दोगे ?…
क्या यही सिला दोगे ,तुम उनकी सहादत का ?
उनके त्याग का बलिदान का और उनकी बगावत का,
क्या यही सिला दोगे तुम उनकी सहादत का ?

प्राण आहुति देकर जिसने, तुम सब को आज़ाद किया,
शांति,स्वतंत्रता, सुख, समृद्धि का फिर से यहाँ आगाज़ किया,
देशसेवा अज़ान था जिसका ,उनके किये इबादत का ,
क्या यही सिला दोगे ,तुम उनकी सहादत का ?

शौर्य ही श्रृंगार था जिसका,धरती जिसकी माता थी,
फांसी के फंदे से गूंजी जिसकी गौरव गाथा थी,
वीरों के इस वीरभूमि में, वीरता के विरासत का,
क्या यही सिला दोगे, तुम उनकी सहादत का ?

अपने खून को जिसने खून न समझा, बहा दिया पानी कि तरह,
कोई है जो जाँ दे सकता है अब,आज़ाद कि कुर्बानी कि तरह
राजगुरु,सुखदेव, भगत की,माँ की लुटी अमानत का,
क्या यही सिला दोगे ,तुम उनकी सहादत का ?

माँ चाहती है, कुर्बानी फिर,उठो देश का उद्धार करो,
भ्रष्ट, भ्रष्टाचार,व्यभिचार, सबका तुम संहार करो,
या फिर तुम तमाशा देखो,राजा, तेलगी, कसाब के जमानत का,
क्या यही सिला दोगे ,तुम उनकी सहादत का ?
– दीपक कुमार दुबे”दीप”

Poem ID: 129

Poem Title: अरे हिंद के वीर जवां !
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: September 7, 2004
Poem Submission Date: October 3, 2012 at 2:11 am

Poem:


अरे हिंद के वीर जवां !

अपने ख़ून की गरमी दिखलादे तू आज जहान को !
अमन की बातें भूलजा प्यारे ! दिल में रख तूफ़ान को !
अरे हिंद के वीर जवां ! पहचानले अपनी आन को !
अपने पुरखों के गौरव को , गरिमा को , अभिमान को !

आंख दिखाने वाले दुश्मन की आंखें तू फोड़दे !
अकड़ दिखाने वाले ढीठ की गरदन आज मरोड़दे !
देख तू उसकी शैतानी , मत देख कुटिल मुस्कान को !
अरे हिंद के वीर जवां ! पहचानले अपनी आन को !

बार-बार मुंह की खा’कर भी जिसको शर्म नहीं है
अबके उसका अहम तोड़दे , तेरा धर्म यही है !
अमर तुम्हारी रहे जवानी ; मिटादे हर हैवान को !
अरे हिंद के वीर जवां ! पहचानले अपनी आन को !

नहीं अकेला तू सीमा पर ,बच्चा-बच्चा तेरे साथ !
टकराए दो अरब बाज़ुओं से , किसकी इतनी औक़ात ?
फिर भी मरने आए दुश्मन ; सौंप उसे शमशान को !
अरे हिंद के वीर जवां ! पहचानले अपनी आन को !

ओ प्रताप के पूत ! न अपना शीश कभी झुकने देना !
वीर शिवा के वंशज ! घर और सीमा पर चौकस रहना !
ओ लक्ष्मी के लाल ! संभालले अपने हिंदुस्तान को !
अरे हिंद के वीर जवां ! पहचानले अपनी आन को !

ओ वीर बांकुरे ! जवां बहादुर ! राष्ट्र के प्रहरी ! ओ सैनिक !
ओ जल थल नभ के रक्षक ! देश के बेटे ! देश के ओ मालिक !
तेरे होते’ कहां कोई भय भारत भूमि महान को ?!
अरे हिंद के वीर जवां ! पहचानले अपनी आन को !

Poem ID: 130

Poem Title: वर दो माँ भारत माता !!
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: October 1, 2012
Poem Submission Date: September 30, 2012 at 7:49 pm

Poem:

वर दो माँ भारत माता
देश तुम्हारी मिट्टी ने ,हमको संघर्ष सिखाया है,
दौड़ रहा जो रक्त रगों में,देह ने तुमसे पाया है //
है आभार उन्हें शत-शत,जिनके बल पर आज़ाद हुए ,
उनको वंदन कोटि-कोटि,जिनके श्रम से आबाद हुए //
है धिक्कार उन्हें जो धरिणी,नोच डालने को आतुर ,
है लानत जो स्वाभिमान को, बेच डालने को आतुर //
युद्ध शेष है विजय गान की ,गाथाएँ फिर गानी हैं ,
पावनतम आँचल में दूध की,नदियाँ लहरानी हैं //
चन्द्र-सूर्य-सम चलें निरंतर,कहीं विराम न लेना है
उन्नति का नभ छुए बिना,क्षण भर विश्राम न लेना है //
प्रवहमान जनशक्ति देश में ,परिवर्तन लाएगी ,
विश्व गुरु होने की संज्ञा ,वापस फिर आएगी //
देश न उन्नत होगा जब तक ,जनगण सुदृढ नहीं होंगे ,
मातृभूमि के ऋण से हम,मर कर भी उऋण नहीं होंगे //
उच्च स्वरों में गाएँ हम,निशिदिन शुभ गौरव गाथा /
मातृभूमि के चरणों में हम ,नित्य नवाएँ माथा //
आओ हों समवेत पुनः बन जाएँ भाग्य विधाता ,
सुप्त चेतना जाग्रत हो ,वर दो माँ भारत माता //
– भावना तिवारी-

Poem ID: 131

Poem Title: धरती वीरों की
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: August 13, 2012
Poem Submission Date: October 1, 2012 at 3:06 pm

Poem:

“ये आज़ाद भारत,धरती है वीरों की,
धर्म है,कर्म है,जीवन है शूरवीरों की,
लहू देकर अपना,जिसे सींचा है वीरों ने,
चारों ओर लकीर जिसके,खींचा है धीरों ने,
यही वो उन्मुक्त-चमन है फूलों की|
यही वो आज़ाद धरती है वीरों की|

आओ इस आज़ादी के सही मायने,
समझें आज़ाद-भगत-बिसमिल से,
जो आज़ादी की लौ जलाकर,
चले गये दुनिया की महफ़िल से।
यही वो पतीत-पावन शुभ वेला है,
जब हमे यह विचार करना है,
इस पावन धरती की प्रतिष्ठा के लिए ,
जीना है या इसके लिए मरना है।
इसी पवित्र भावना से,
दुनिया भारत की चलती है,
ज़रा जागो इस निद्रा से,
ये आज़ाद भारत की धरती है|

ऐसा वर हमे दो, हे! भारतमाता!
कि तुम्हारे चरणों मे
बलिदान हम दे सकें।
धन-सम्पत्ती यश-वैभव,
कुछ भी न हो हमारे पास,
फ़िर भी सर्वस्व अपना,
तुमपर निछावर हम कर सकें।
जब भी प्राण निकले इस तन से,
तब तन मेरा तुम्हारी गोद मे हो।
जब भी विकार आये इस मन मे,
तब मन मेरा स्वच्छ गंगाजल से हो।”

Poem ID: 134

Poem Title: भारती उठ जाग रे !
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: August 15, 2012
Poem Submission Date: October 2, 2012 at 8:21 am

Poem:

है कहां निद्रित अलस से
स्वप्न लोचन जाग रे !
प्रगति प्राची से पुकारे
भारती उठ जाग रे !

मलय चन्दन सुरभि नासा
नित नया उत्साह लाती
अरूणिमा हिम चोटियों से
पुष्प जीवन के खिलाती

कोटिश: पग मग बढ़े हैं
रंग विविध ले हाथ रे !
भारती उठ जाग रे !

ज्ञान की पावन पुनीता
पुण्य सलिला बह रही
आदि से अध्यात्म गंगा
सुन तुझे क्या कह रही
विश्व है कौटुम्ब जिसका
चरण रज ले माथ रे!
भारती उठ जाग रे !

नदी निर्झर वन सुमन सब
वाट तेरी जोहते
ध्वनित कलकल नीर चँचल
मृगेन्द्रित मन मोहते !
कोटिश: कर साथ तेरे
अनृत झुलसा आग रे !
भारती उठ जाग रे !
युग भारती फिर जाग रे !
जाग रे ! .. फिर जाग रे !

Poem ID: 135

Poem Title: इस आजादी,कुछ आजादी कम की जाये
Genre: Shant (peaceful)
Poem Creation Date: August 14, 2012
Poem Submission Date: October 3, 2012 at 2:01 am

Poem:

इस आजादी, कुछ आजादी कम की जाये
नहीं सुरक्षित भ्रूण कन्या,कुछ बेड़ियाँ तय की जाएँ ।
बढ़ती हुई कोपलों को, एक सी सीख दी जाये
अधिकार कानून ने दिए,थोड़ा तो सम्मान दिया जाये ।
विचार गोष्ठियाँ,रैलियाँ, आयोजनों का मेला लगा
खुद के स्तर को समझ, ‘सच’ में कुछ तो किया जाये ।
नहीं दिखाना किसी को नीचा,कोई बड़ी बात नहीं
दोनों हाथोँ की ताकत से किसी को तो उठाया जाये ।
दिल जलता है लबों पे हँसी, देख दूसरों की ख़ुशी
ह्रदय बड़ा कर लबों की हवा से जलते दिल को बुझाया जाये ।
सब्जी,रिक्शा,ज़मीनी सामान सब लगता मंहगा बड़ा
चलो इक रोज ज़रा, ‘शेष’ पे ध्यान लगाया जाये ।
गुलामी बुरी थी या कि भली है आजादी
छोड़ बहस ये,खुद पे गौर फ़रमाया जाये
इस आजादी,कुछ आजादी कम की जाये ।

Poem ID: 136

Poem Title:
Genre: Other
Poem Creation Date: August 18, 2012
Poem Submission Date: October 2, 2012 at 10:44 am

Poem:

देश की अखंडता को, रोकने के लिये आज।
बहना ईद साथ ले, आया है पतेती जी।।
थोडी दूर पर खडे, ढांढस बंधाते देख।
बडा गुरू पर्व संग, मोहिनी दिवाली जी।।
बारी बारी आते पर्व, इसी नेक भाव संग।
देश गतिमान रहे, एकता के साथ जी।।
देश के अखंडता की, बुझने न पाए आग।
एकता की जगी रहे, सदा ये मसाल जी।।

भीषण हिंसा की आग, जल रहा कोक्राझार।
समती न आज आग, देखिए असम की।।
त्राहि माम त्राहि माम, मचा पूरे देश शोर।
देखो दबी राख कैसे, चिनगारी भडकी।।
देश की अखंडता न,जिनको सुहाती आज।
बने हैं पलीता सब, वही इस आग की।।
देश की अखंडता को, यूँ न कर तार तार ।
सुधि कर प्यारे जरा , माँ के उपकार की।।

Poem ID: 137

Poem Title: परिवर्तन मुझे खुद में ही लाना होगा
Genre: Shant (peaceful)
Poem Creation Date: August 15, 2011
Poem Submission Date: October 2, 2012 at 1:13 pm

Poem:

परिवर्तन मुझे खुद में ही लाना होगा

भाव के अतिरेक में,
बह रहा अशांत मन मेरा,
देख उसे आहत होता तन मेरा,
चोटे कितनी सहेगा वो जर्जर

देख रहा,
चौसठ वर्ष का वृद्ध लंगड़ाता चल रहा
अत्याचार,भ्रष्टाचार से ग्रसित
चार-चार होते उसके वस्त्र अव्यवस्थित,

दर्द अतीत का दबाये
है वो सोच रहा
कंहा गयी वो परम्पराएँ,
अतीत की मर्यादित कथाएं

पुरषोत्तम राम की मर्यादा
कृष्ण का कर्मयोग मनन
नानक का चिंतन
बुद्ध के वचन

महावीर की अहिंसा
गीता का ज्ञान
शहीदों का बलिदान
शिवा की शान
मीरा की तान
पुरखो का अभिमान

सुरदास के भाव
बिहारी के दोहों की शक्ति
कबीर की पंक्ति,
तुलसी की भक्ति

मेरे शैशव में तो देश प्रेम महान था
युवा हुआ तो कर रहा निर्माण था
इस अवस्था में क्यूँ घात है
क्यों न उनको पश्चाताप है,

मेरे बच्चे मुझसे क्यूँ बिछड़ रहे
भ्रस्टाचार और अनाचार में क्यूँ बिगड़है

चिकित्सक कौन ऐसा आयेगा
दूर बिमारिया कर जायेगा
क्या अपाहिज शारीर को फिर से स्वस्थ कर पायेगा

लड़ना मुझको ही है अपनी बिमारियों से
गर संतान मेरी दूषित हो रही
सुधारना मुझे ही है उन्हें प्यार से

परिवर्तन मुझे खुद में ही लाना होगा
मै भारत हूँ,
भारत कहलाना होगा

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