Gaurav Gatha 2012 - Private View

Gaurav Gatha 2012 – Private View

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Poem ID: 138

Poem Title: “सबसे प्यारा-न्यारा हिंद है”
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: July 20, 2012
Poem Submission Date: October 2, 2012 at 3:47 pm

Poem:

“सबसे प्यारा-न्यारा हिंद है”

इस अंजुमन में गुलजार जिस्म का हर चिराग हिंद है ,
रूह पे ओढे हुए वतनपरस्ती का हर लिबास हिंद है !
बहती है वतनफरोशी इबादत की तरह यंहा हर लहू में ,
दिलों पर लिखी पावन इबारतों का कलाम हिंद है !

है हमारे खून का कतरा-कतरा रंग तिरंगा,
और जिस्म का अंश -अंश हिंद है !
बारोह माह देशप्रेम का मौसम यंहा एक सा,
धरती पर खुदा का बेमिसाल कमाल हिंद है !

है तिरंगा अहद हमारी आन के स्वर्णिम गौरवगाथा की,
पारवानावार देशभक्त यंहा हर आग का नाम हिंद है !
मकिने दिल शाने-भारत ,क्रांतिवीरो की मिट्टी ,
इस गुलिस्तान की आबोहवा का श्रंगार हिंद है !

पढ़ती है शहीदों की चिताएं भी हिंद्प्रेम के गीत यंहा,
हिन्दू-मुस्लिम-सिख-इसाई कौम का हर सिंह हिंद है !
पैदा होता है हर हिन्दुस्तानी सरफरोशी की तमन्ना लिए,
वतन पर मर मिटने वाले सीनों का फौलाद हिंद है !

मिलती है इस चमन की खुशबुएँ भी गले अमलन,
इस मुल्क की मिट्टी-तरु-फूल-प्रस्तर तक हिंद है !
इसकी हिफाजत में शौक से कट जाते है लाखो सर यंहा,
आजादी के रंगरेज मतवालों का पैगाम हिंद हैं !

डोला मुगलों-अंग्रेजों का सिहासन जब हमने हुंकार भरी ,
झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की मर्दानी सिह्नाद हिंद है !
लिखा टीपू की बेखौफ तलवार ने स्वर्णिम अध्याय ,
छत्रपति शिवाजी और महराणा प्रताप का अमुल्य बलिदान हिंद है

पाशमुक्त भारत मस्ताने मंगल पांडे के बलिदानों की अमर कहानी है ,
वीर भगतसिंह के अमूल्य त्याग की अमरज्योति का प्रकाश हिंद है !
लाल-बाल-पाल ने दिया हमे स्वराज्य का मौलिक अधिकार ,
लौहपुरुष बल्लभभाई की लौह दृढ़ता का अंजाम हिंद है !

कर गए परिपाक गांधी-नेहरु-अम्बेडकर संविधान की जड़े,
अनगिनत हाथों की लकीरों में लिखी भाग्यलिपि हिंद है !
हिंदफौज के पुरोधा युगांतरवीर बोस बाबू फक्र है इसका ,
अथक अमरवीर चंद्रशेखर की अमर आजाद उड़ान हिंद है !

महाकवि गुरुदेव ने राष्ट्रगान से उलगुलानों में फूंका प्राण,
बंकिम जी के कालजयी राष्ट्रगीत का अतुल्य योगदान हिंद है !
किया बिस्मिल ने अखंड सरफरोशी से घात हिंद के दुश्मनों पर ,
जन-गण-मन, वन्देमातरम की अभ्यर्थना का इन्कलाब हिंद है !

विद्यापीठ तक्षशिला-नालंदा से ज्ञानगुरु हिंद ने दिया विश्व को ज्ञान,
आर्यभट्ट का विश्व को जीरो का अमूल्य दान हिंद है !
भाषाई सम्राट संस्कृत से लिया एटम ने अणु का नाम,
अलजेब्रा त्रिकोणमिति,केलकुलस का जन्मस्थान हिंद है !

आयुर्वेद के जनक भारत ने किया विश्व कल्याण ,
पृथ्वी की रवि परिक्रमा का खगोलीय अनुमान हिंद है !
पाई के मूल्यांकन का गणितशास्त्र का इतिहास है विश्व प्रसिद्ध ,
मार्यादा ,परम्परा ,संस्कृति की भव्यता का धाम हिंद है !

है गिरिराज हिमालय प्रहरी और माँ गंगा इसकी प्राण है,
कश्मीर से कन्याकुमारी का स्वर्गीय विस्तार हिंद है !
ऋषि-मुनिओं की तपोभूमि ,देव-देविओं की जन्भूमि भारत ,
देवल-दरगाह-चर्च-गुरुद्वारों के मुव्वहिद का उदगार हिंद है !

हल जोतता हलधर इस मातृभूमि की शान है ,
सरहद पर तैनात वीर जवानों का स्वाभिमान हिंद है !
खेल के मैदानों पर उठाते है इसे अपने शानो पर खिलाड़ी ,
होली-ईद-दीवाली-रमजान त्योहारों का सौहाद्र हिंद है !

लोकतंत्र है राष्ट्रधर्म यँहा हर हिन्दुस्तानी का ,
बहु धर्मी-भाषा-जाती-अनेकता में एकता की मिशाल हिंद है
है सत्यमेव जयते मूल मन्त्र हमारी न्याय व्यवस्था का,
जम्बूद्वीप,अजानभदेश,सोने की चिड़िया सब नाम हिंद है

नेस्तानाबूद कर दे अरि मंसूबों को, तरेरे जो तुझ पर नजरे भारत,
हवादिस आतंक से लड़े मिल के निसिबासर, हम बेखौफ हिंद है !
गर है दहशतगर्दो के पास असलाह-गोला-धोखा-बारूद,
तो हमारी जिरहंबख्तर के अंगार का उबाल हिंद है !

खौफजदा लाडो की आँखे ,बेनूर हो रहा नन्हा बचपन
कैसे हम इस मुर्दापन सी निष्ठुरता में जीवित हिंद है
वह कौन निशाचर जला रहा जो दंगों की भट्टी पर भारत
उसे रौंदने को फड़क रही भुजाएं और हिय में भूचाल हिंद है

घोंप रहे संसद की पीठ में छुरा चंद पापाचारी हुक्काम
कानून पड़ गया पीला,चंहुओर बेबसी सा मातम हिंद है
भोला संविधान कराह रहा ,मासूम लोकतंत्र के हाथ कटे
साम्राज्यवादी तानाशाहों को अब तीता सबक सिखाना हिंद है

जल रही मातृभूमि निर्दोष मुफलिसों के आंसुओं से ,
दुबली आजादी भी राजनैतिक कैद में बेहद बीमार हिंद है !
चिल्ला रहे पर्वत-पेड़-नदियाँ , बचाओ ! बचाओ !
सत्य ,अहिंसा के हथियारों से क्या तू फिर से तैयार हिंद है !

भ्रष्टासुर लील रहा धीरे-धीरे नोच-नोच माँ भारती को
क्यों शमशानी चुप्पी से तू जडवत खामोश हिंद है
न बना वफादारी को किसी धर्म-रंग-जात-वर्ग-पार्टी का टट्टू
तेरे देशप्रेम और कुर्बानी का आज इम्तिहान हिंद है

अब वक्त नहीं रहा बन्दे चुप्पी बन सहने का
तेरे सत्याग्रह की आहुति के महाव्रत को बेताब हिंद है !
कितने काले सूरज और उगेंगे, कितने मटमैले डूबेंगे चाँद
तुझसे एक नई उजियारी सुबह के आमद को पूछ रहा हिंद है !

अकीदत रहे हर भारतवासी को अर्जमंद आर्यवत इतिहास की,
मातृभूमि की रक्षा को उठने वाली हर प्रतिकार हिंद है !
आओ खत्म करे सरहदे बैर-भाव,मजहबों की दीवार की ,
बजसिन्हा नव भारत के स्वपन को,मेरा मुश्ताक हिंद है

अब घायल इंडिया बेटी-भ्रूण ह्त्या -बलात्कार-कुपोषण-घोटालों के घावों से,
जगा जमीर के तेरे मेहनतकश हाथों में अब इंतजाम हिंद है !
सिमट न रह जाए भारतप्रेम पंद्रह अगस्त-छब्बीस जनवरी की तारीखों तक,
सौगंध तुम्हे नव भारत निर्माण की, कह्कशों में लिखो लहू से “सबसे प्यारा-न्यारा हिंद है” !

Poem ID: 139

Poem Title: ‘उस दीवार के पीछे’
Genre: Shant (peaceful)
Poem Creation Date: October 1, 1997
Poem Submission Date: October 2, 2012 at 4:23 pm

Poem:

कुछ लोग रहते है उस दीवार के पीछे
होते है मेरी ही तरह बने हुए,
करता है शिरकत लाल ही खून उनकी रगों में,
बसते है ख्वाब भी उनकी आँखों में,
होते है उनके भी कुछ दुःख दर्द, आंसूँ और गम,
हाँ! कुछ लोग रहते है उस दीवार के पीछे
होते है मेरी ही तरह बने हुए.

है वो भी किसी राखी का रेशम,
किसी घर का सुनहरा दीपक
किसी के दिल का आराम होते है वो भी
पर मालूम न चल सका क्यों दी बंदूके उन्हें?
चाहते तो थे वे भी इक मिला जुला संसार
फिर क्यों?
आखिर क्यूँ बदल दिया उनका रास्ता चल पड़ने के पहले ही?
हाँ! कुछ लोग रहते है उस दीवार के पीछे
होते है मेरी ही तरह बने हुए.

‘उन’ पीछे वालों को थमा तो दी विनाश-सामग्री
पर न सोचा क्या उन्होंने न गाया कोई सुखी गान?
क्या नहीं स्वर दिया विश्व एकता के भावों को?
नहीं हुई तमन्ना फूलों और भवरों की उन्हें?
फिर क्यों?
आखिर क्यूँ बदल दिया उनका रास्ता चल पढने के पहले ही?
हाँ! कुछ लोग रहते है उस दीवार के पीछे
होते है मेरी ही तरह बने हुए.

Poem ID: 140

Poem Title: ** अतुलनीय भारत **
Genre: Shant (peaceful)
Poem Creation Date: August 14, 2012
Poem Submission Date: October 2, 2012 at 4:46 pm

Poem:

** अतुलनीय भारत **
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” हिम आच्छादित श्वेत श्रंखला ,स्वाभिमान दर्शाती है.
निर्झर नदियां जल से पूरित ,सुख समृद्धि दिखाती हैं
आदर्शों की राह चुने हर भारतवासी ,
आस्था के प्रतीक बन गये मथुरा काशी,
पर्वों की भरमार– ईद , होली, दीवाली ,
लंगर छकते कभी, कभी सरगी की थाली
संस्कृति इतनी उच्च , विश्व चोटी में नाम लिखाती है ..
.हिम आच्छादित श्वेत श्रंखला ,स्वाभिमान दर्शाती है..
अन्तरिक्ष ,तकनीक कृषि जगत प्रकृति सम्पदा ,
समृद्धि चारों ओर , भरे खलियान सर्वदा
लघु कुटीर उद्योग बनाते आत्म- विश्वासी ,
मानवता से ओत -प्रोत हर भारतवासी .
गगन विचरती पर्वत चढ़ती ,नारी विश्वास जगाती हैं
हिम आच्छादित श्वेत श्रंखला ,स्वाभिमान दर्शाती है..
वीरों ने इतिहास लिखा -स्वर्णिम अक्षर में ,
देशप्रेम का भाव भरा हर नारी-नर में ,
गीता के उपदेश गूंजते हैं – घर-घर में ,
परमात्मा के दर्शन करते -स्थिर, चर में,
संत जनों की अमृत वाणी कर्म योग सिखलाती है.
हिम आच्छादित श्वेत श्रंखला ,स्वाभिमान दर्शाती है..”
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Poem ID: 141

Poem Title: hosla
Genre: Other
Poem Creation Date: September 2, 2012
Poem Submission Date: October 4, 2012 at 3:59 pm

Poem:

देख तिरंगे, का सम्मान,
हमको है, तुम पर अभिमान|
भारत की बेटी ने आख़िर,
भारत को, भेजा पैगाम|

दूर छितिज पर फहराया,
जन-गन-मन तुमने गाया|
हर भारतवासी के मन मे,
लहर तिरंगा लहराया|

भिन्न-भिन्न भाषा और वेश,
सतरंगी सा, अपना देश|
सोंधी-सोंधी, खुश्बू इसकी
कण -कण, देता है संदेश|

रहे किसी, कोने मे कोय,
देश-प्रेम का, भाव संजोय|
सेवा-भाव, समर्पण, त्याग,
जनम से उपजे, कोई न बोय|

गर्व हमे, हम भारतवासी,

अपनी तो, पहचान यही है,
सच पूछो तो, शान यही है,
जिस्म यही और जान यही है|

Poem ID: 142

Poem Title: आकुल करते मेरे गीत…
Genre: Shringaar (romantic)
Poem Creation Date: October 3, 2012
Poem Submission Date: October 3, 2012 at 9:21 am

Poem:

स्वतंत्र विहग के पंखों जैसे
फैल रहा है स्वर संगीत,

मेरे अंतर्मन से निकले,
आकुल करते मेरे गीत,
नीलनभ से विश्वसागर की,
लहरों पर ये तैरें गीत,

इतना साहस नहीं है मुझमें,
तुम तक कैसे पहुंचें गीत,
गीतों के पंखों से छू कर,
तव चरण रज लूँगा, मीत!

तुम जब गाने को कहते हो,
तुम्हें सुनाता हूँ हे मीत!
मेरा मन गर्वित हो जाता,
तुम्हें जब भाता मेरा गीत,

तुमको सन्मुख पाकर मेरे
नैन अश्रु जल छलकें शीत,
परम आनंद मुझे मिलता है,
दुःखदर्द पिघलें मृदु गीत.

खुश हो नशे में झूम रहा हूँ,
स्वयं को भूला, भूले गीत,
ईश सम तुम मित्र हो प्यारे,
तुम्हें पुकारूँ प्यारे मीत.

Poem ID: 143

Poem Title: आझादी
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: February 15, 2011
Poem Submission Date: October 3, 2012 at 1:08 pm

Poem:

लम्हे की चिँगारी को आग मे बदलना सिखो,
जिँदगी मे खुद की वजह धुंडना सिखो ।
ये वक्त तुम्हारा ही है, जो किसीने छिन लिया है,
अपनी आझादी की लढाई अब तुम भी लढना सिखो ।

पनाह दो सपनो को अपने दिलो मे,
तुम खुद मे ही अपनी एक शान हो ।
एक और, एक और मौका दो खुदको,
ताकि सर आँखो पे सारा जहान हो ।
धडकनो की धुन बनाकर जीत के गीत गुनगुनाओ,
बंधे पंखो को खोलकर खुले आसमान मे उडना सिखो,
अपनी आझादी की लढाई अब तुम भी लढना सिखो ।

Poem ID: 144

Poem Title: देश के ओ वीर प्रहरी ….
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: August 8, 2012
Poem Submission Date: October 4, 2012 at 2:14 am

Poem:

देश के ओ वीर प्रहरी
आभा सक्सेना देहरादून

देश के ओ वीर प्रहरी तू धरा को डगमगादे,
सो गया है आज पौरूष, तू उसे फिर से जगादे।।
गांधी की यह पुण्य भूमि रह गयी अभिशाप बन कर,
नेहरू जी का रोम- रोम भी रो रहा अवसाद बन कर।
ओ धरा के युग प्रवर्तक तू नया इतिहास गढ़ दे।।
देश के ओ वीर प्रहरी तू धरा को डगमगादे,
सो गया है आज पौरूष, तू उसे फिर से जगादे।।
देश के नेता ही देखो देश के गददार निकले
अब वतन के वास्ते उनकी आंख से आंसू न निकले
ओ मसीहा देश के एक, काव्य तू धरती पर लिखदे
देश के ओ वीर प्रहरी तू धरा को डगमगादे
सो गया है आज पौरूष, तू उसे फिर से जगादे
विदेश की बैंकों में जो, चोरी से अपना धन गया है
देश का हो कर भी वह अब देश का न रह गया है
ओ रक्षक देश के निज धन ला करके दिखादे
देश के ओ वीर प्रहरी तू धरा को डगमगादे
सो गया है आज पौरूष, तू उसे फिर से जगादे
राष्ट्र की यह प्रिय पताका अब कभी न झुक सकेगी
आकाश की उँचाइयों से यह सदा बातें करेगी
ओ सिपाही देश के तू जोश हर सीने में भर दे
देश के ओ वीर प्रहरी तू धरा को डगमगादे
सो गया है आज पौरूष, तू उसे फिर से जगादे

Poem ID: 145

Poem Title: मुझे भी खुद पर गुमान करने दो
Genre: Karuna (pathos)
Poem Creation Date: October 4, 2012
Poem Submission Date: October 4, 2012 at 6:28 am

Poem:

मैं अनसुनी एक आवाज़ हूँ,मुझे ज़रा सुनकर देखो,

कहीं दूर खड़े हो सच्चाई से,पास आकर देखो,

डूब जाओगे इस हकीक़त की गहराई में तुम भी ज़रूर,

सिर्फ खुदको नहीं मुझे भी इंसान मानकर देखो……

ज़िल्लत मिली है सौग़ात में इस बेदर्द ज़माने से,

सोचूं की क्या मिटेगी ये एक ऊँचा नाम कमाने से,

खुदा ने तो हाड़-मांस-रख्त से बनाया सबको ,

फिर मुझे क्यूँ नापते हैं उंच-नीच के पैमाने से……

हैं ख्वाब मेरे भी,सांस लेता हूँ मैं भी यहीं ,

खड़े हो जिस धरती पर तुम,खड़ा हूँ मैं भी वहीँ ,

पूर्वजों की मान्यताओं की दुहाई देते हो आज तक भी ,

पहचान सिर्फ तुम्हारी है,और मेरा कोई वजूद भी नहीं??????

एक दिल है तुम्हारे जैसा जो रोता है कभी तुम्हारे हरकतों से,

जिंदा मुझे भी रहना है,क्यूँ मुंह मोड़ते हो मेरी हसरतों से ,

रगों में तुम्हारे जो लहू है लाल का,मुझमे वह रंग पानी का तो नहीं,

अब तो जीने दो,जज़्बातों को उभरने दो जो दबे हैं कई मुद्दतों से……

वह दमकता सूरज,वह फ़लक का चाँद,बिखेरता है रौशनी सबको एक सामान,

तो कैसे हूँ मैं तुमसे अलग,कारण बताओ या लौटाओ मुझे मेरा सम्मान,

तिरस्कार की नज़रें हटाकर देखो एक बार इंसान की नज़र से मुझे,

जातिवाद का भेद मिटाओ,अब करने दो मुझे भी खुद पर गुमान…….

सबसे बढ़कर भी एक ख़ास है तुम में और मुझमे ए नादानों!

हिंदुस्तान मेरा है ,चाहे तुम मुझे अपना मानो न मानो,

इसी मिट्टी में तुम भी समाओगे और समाऊंगा मैं भी एक दिन,

बस अब भारत को एक ही रहने दो,एक गुज़ारिश ये मेरी सुनो……

Poem ID: 146

Poem Title: माँ भारती तेरे चरणों में, हम अर्पित है
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: October 14, 2012
Poem Submission Date: October 4, 2012 at 10:11 am

Poem:

माँ भारती तेरे चरणों में, हम अर्पित है

माँ भारती तेरे चरणों में, हम अर्पित है
हम सबने मन में ठाना है,
नफरत को दूर भगाना है,
जग में परचम फहराना है
माँ भारती तेरे चरणों में, हम अर्पित है!

अंतिम घर में भी उजाला हो,
हर मुहं के पास निवाला हो,
प्रेम तराने हम गायें,
मंदिर-मस्जिद मिल मुस्काएं,
सन्देश यही फैलाना है
हम सबको हिलमिल जाना है
भारत को आगे आना है
दुनिया में नाम कमाना है
माँ भारती तेरे चरणों में, हम अर्पित है!

हम सब माली इस बगिया के,
मिलकर के कदम उठाएं,
ये नागफनी खरपतवारें
अब नज़र नहीं यहाँ आयें
भ्रष्टाचार मिटाना है
दुश्मन को दूर भगाना है
दहशत को भी धमकाना है

माँ भारती तेरे चरणों में, हम अर्पित है!

सरहद पर चोकस वीर रहे,
हरदम अपना कश्मीर रहे
गंगा जमुना में नीर रहे
अबला का चोकस चीर रही
चमन हमें तो सजाना है
तितली को भी मुस्काना है
भवरों को नगमें गाना है
नव इंद्र धनुष रच जाना हैं
माँ भारती तेरे चरणों में, हम अर्पित है!

केसरिया रंग ने ये बोला,
तुम स्वाभीमान अपनाओ,
श्वेत शांत और हरे रंग संग
चक्र चलाते जाओ
कवियों को कलम चलाना है
पुरखों का मान बढ़ाना है
वन्देमातरम गाना है
माँ भारती तेरे चरणों में, हम अर्पित है!
माँ भारती तेरे चरणों में, हम अर्पित है!

किशोर पारीक “ किशोर”
9414888892
जयपुर

(2)

मेरे भारत को तुम देना , खुशि‍यॉं अपरम्‍पार

देना मॉं अनुपम उपहार, देना मॉं अनुपम उपहार,
मेरे भारत को तुम देना , खुशि‍यॉं अपरम्‍पार ।

मि‍टटी, अंबर,आग, हवा, जल, में मॉं नहीं जहर हो,
सूखा, वर्षा, बाढ, सुनामी का मां नहीं कहर हो,
रि‍तुऐं, नवग्रह, सात स्‍वरों की हम पर खूब महर हो,
धरती ओढे चुनरधानी, ढाणी, गांव, शहर हो,
दशो दि‍शाओं का कर देना, अदभुद सा श्रंगार ।
देना मॉं अनुपम उपहार, देना मॉं अनुपम उपहार,
मेरे भारत को तुम देना , खुशि‍यॉं अपरम्‍पार । ।

शब्‍दों के साधक को देना, भाव भरा इक बस्‍ता
मुफलि‍स से मॉं दूर करो तुम, कष्‍टों भरी वि‍वशता
ति‍तली गुल भवरों को देखें, हरदम हंसता हंसता
दहशतगर्दों के हाथों में भी दे मॉं गुलदस्‍ता
कल कल करती मां गंगा फि‍र, मुस्‍काये हर बार
देना मॉं अनुपम उपहार, देना मॉं अनुपम उपहार,
मेरे भारत को तुम देना , खुशि‍यॉं अपरम्‍पार ।

मंदि‍र के टंकारे से, नि‍कले स्‍वर यहॉं अजान के
मस्‍जि‍द की मि‍नारें गायें नगमें गीता ज्ञान के
मि‍लकर हम त्‍योंहर मनाऐं, होली के रमजान के
दुनि‍यां को हम चि‍त्र दि‍खाऐं ऐसे हि‍न्‍दुस्‍तान के
अमन चैन भाई चारे की, होती रहे फुहार
देना मॉं अनुपम उपहार, देना मॉं अनुपम उपहार,
मेरे भारत को तुम देना , खुशि‍यॉं अपरम्‍पार ।
किशोर पारीक “ किशोर”
9414888892
जयपुर

(3)
मांगे फूल मिलें है खार,

मांगे फूल मिलें है खार,
इनसे कैसे हो सृंगार!
रक्त सना है गोपी चन्दन, थमी धड़कने चुप स्पंदन
कैसी संध्या, कैसा वंदन, आह, कराह, रुदन है क्रंदन
लुप्त हुए है स्वर वंशी के, गूंजा भीषण हाहाकार
मांगे फूल मिलें है खार,
इनसे कैसे हो सृंगार!
दहके नगर बाग, वन-उपवन,आशंकित आकुल है जन-जन
गोकुल व्याकुल शंकित मधुबन,कहाँ छुपे तुम कंस निकंदन
माताएं बहिने विस्मित हैं, छुटी शिशुओं की पयधार
मांगे फूल मिलें है खार,
इनसे कैसे हो सृंगार!
लड़ती टोपी पगड़ी चोटी, बची इन्ही में धर्म कसोटी
मुश्किल चूल्हे की दो रोटी, अबलाओं पर नज़रे खोटी
सपनो के होते है सोदे, अरमानो के है व्यापार
मांगे फूल मिलें है खार,
इनसे कैसे हो सृंगार!
बदला नहीं कोई मंज़र, केवल बदले हमने कई कलेंडर
संसंद में गाँधी के बन्दर, बेशर्मी से हुए दिगंबर
थमा सूर तुलसी का सिरजन, अब बारूदी कारोबार
मांगे फूल मिलें है खार,
इनसे कैसे हो सृंगार!
किशोर पारीक “ किशोर”
9414888892
जयपुर

(4)

नई सुबह के पन्नो पर, में अपने मन के मीत लिखूंगा

वंदन मिले ना, चाहे मुझको, चन्दन मिले ना चाहे मुझको
नई सुबह के पन्नो पर, में अपने मन के मीत लिखूंगा
में धड़कन के गीत लिखूंगा
बादल चाहे कितना गरजे, सूरज से भी अग्नि बरसे
अपने माँ के अनुपम गुंजन, से में नवनीत लिखूंगा
में धड़कन के गीत लिखूंगा
थक कर चाहे सो जाऊंगा, जग कर फिर लिखने आऊँगा
करदे सराबोर सब जग को, ममतामय में शीत लिखूंगा
में धड़कन के गीत लिखूंगा
मोसम तो आये जायेंगे, मुझको कहाँ हिला पाएंगे
अग्नि का जो ताप भुजादे , कागज़ पर में शीत लिखूंगा
में धड़कन के गीत लिखूंगा
इस बगिया की आंगन क्यारी, मुझको प्यारी हर फुलवारी
हर रिश्ते में जान फुकदे, ऐसी सुन्दर रीत लिखूंगा
में धड़कन के गीत लिखूंगा
ओ चिराग गुल करने वालों, चाहे जितना जोर लगालो
जगतीतल को रोशन करदे, ऐसे उज्वल दीप लिखूंगा
में धड़कन के गीत लिखूंगा
सागर जितना में गहरा हूँ, अम्बर जैसा में ठहरा हूँ
वर्तमान को सुरभित करदे, अनुपम वही अतीत लिखूंगा
में धड़कन के गीत लिखूंगा
चाहे शब्द कहीं खो जाये, स्वर मेरे चाहे खो जाये
फिघलती पावक पर बैठा, में फिर से नवनीत लिखूंगा
में धड़कन के गीत लिखूंगा
वंदन मिले ना, चाहे मुझको, चन्दन मिले ना चाहे मुझको

नई सुबह के पन्नो पर, में अपने मन के मीत लिखूंगा
में धड़कन के गीत लिखूंगा
किशोर पारीक “ किशोर”
9414888892
जयपुर

Poem ID: 147

Poem Title: आज़ादी की सालगिरह पर – एक आज़ाद नज़्म
Genre: Karuna (pathos)
Poem Creation Date: January 8, 1992
Poem Submission Date: October 4, 2012 at 11:11 am

Poem:

आज़ादी की सालगिरह पर, तुम सबका अभिनन्दन है
जीवन पथ पर बढ़ो हमेशा, यही हमारा वंदन है

मत भूलो गांधी, नेहरू को, याद सदा उनको रखना
लड़ें लड़ाई आज़ादी की, भगतसिंह का था सपना

भेद भाव बाकी न रहा जब, आज़ादी के मतवालों में
रानी झांसी ज्वाला बनकर कूद पड़ी मैदानों में

तनिक वेदना याद करो आज़ाद, लाजपत, सुखदेवों की
लाठी, गोली, फांसी खाकर की है सेवा जन मानस की

अस्त्र-शस्त्र से लड़ें सभी पर हिम्मत गांधी जी की देखो
सत्य अहिंसा के बूते पर दिला गए आज़ादी हमको

बुरे नहीं अंगरेज़ कभी थे, बसी बुराई मन उनके
इक आँगन बांटा वर्गों में हम भी कितने नादाँ थे

तमिलनाडु से काश्मीर तक भारतवर्ष हमारा है
मातृभूमि का कण-कण हमको जान से बढ़कर प्यारा है

Poem ID: 148

Poem Title: बलिदानो का पुण्य महूरत !!!
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: May 9, 2014
Poem Submission Date: October 4, 2012 at 5:04 pm

Poem:

बलिदानो का पुण्य महूरत,आता नहीं दुबारा
उठो देश के वीर सपूतो,भारत माँ ने पुकारा……………….।

जिनसे तुमको अन्न दिया,अपने जल से सींचा
उस माँ का मस्तक देखो होने न पाये नीचा
सिर काटना मंजूर हमे,सिर झुकना नहीं गवारा…………..।
उठो देश के वीर सपूतो,भारत माँ ने पुकारा……………….।

उठो कि…शस्त्र उठाओ,दुश्मन के आँख उठाने के पहले….।
मर्यादा पे भारत माँ की दाग लगाने से पहले…………।
चीर दो सीना उसका,जिस दुश्मन ने ललकारा…………….।
उठो देश के वीर सपूतो,भारत माँ ने पुकारा……………….।

हम उनको समझौते के कई बार दे चुके मौके
और नहीं मनमानी उनकी…नहीं और अब धोखे ……..।
उनको अपना शौर्य दिखा दो,जो समझे हमे बेचारा………….।
उठो देश के वीर सपूतो,भारत माँ ने पुकारा……………….।

तुमने की जो शुरू कहानी ,हम खत्म करेगे वो किस्सा…..
एक टुकड़ा भी न देगे उसमे,जो मेरे घर का हिस्सा…..।
हमको को अपना मुल्क बैरियो है प्राणो से प्यारा…………।
उठो देश के वीर सपूतो,भारत माँ ने पुकारा……………….।

सौगंध तुम्हें भारत माँ की…कि वार ये खाली जाए न…..।
गोली जड़ना छाती पर….पर तू पीठ कभी दिखलाए न……।
मुल्क रखेगा याद हमेशा ये बलिदान तुम्हारा………..।
उठो देश के वीर सपूतो,भारत माँ ने पुकारा……………….।

जनने वाली माँ को भूले….ब्याही पत्नी को भूल गए
कुछ वो भी वीर सपूत तो थे…जो हंस कर फांसी झूल गए….।
आजादी के लिए जिनहोने प्राणो को बलिहारा………..।
उठो देश के वीर सपूतो,भारत माँ ने पुकारा……………….।

सूनी जिनके गांवो की गलिया…जिनके घर का आँगन खाली है..।
सूने होली के रंग जिसके…जिसकी बे रौनक दीवाली है…..।
उस कठिन तपस्या से दुश्मन… होगा दमन तुम्हारा………..।
उठो देश के वीर सपूतो,भारत माँ ने पुकारा……………….।

सर्द स्याह रातो मे भी जो पलक नहीं झपकता….।
तपता गरम मरुस्थल जिसका साहस नहीं डिगाता…..।
हर मान कर कदम खीच ले…..वरना अबकी जाएगा मारा……।
उठो देश के वीर सपूतो,भारत माँ ने पुकारा……………….।

माना हम ने कि सबको जीवन देता है ईश्वर ……।
रक्षा करता तू जीवन कि……तू ईश्वर से भी बड्कर…….।
ये ‘गौरव गाथा ‘ करती ‘शत-शत’ नमन तुम्हारा………।
उठो देश के वीर सपूतो,भारत माँ ने पुकारा……………….।

बलिदानो का पुण्य महूरत,आता नहीं दुबारा
उठो देश के वीर सपूतो,भारत माँ ने पुकारा……………….।

Poem ID: 149

Poem Title: ख्वाबों का हिन्दुस्तान …
Genre: Karuna (pathos)
Poem Creation Date: October 4, 2012
Poem Submission Date: October 4, 2012 at 6:19 pm

Poem:

तेरी अज़्मत१ का कायल तो, आज भी ज़हान है,
तेरी खुद्दारियों का गवाह, आज भी आसमान है,
मेरे बापू – सुभाष ! फ़िर लौटकर देखो यहाँ..
तेरे ख्वाबों का, क्या यही हिन्दुस्तान है…?
—–
इख्लाको–मज़हब२ जो तूने दिया इस ज़माने को,
बेरहम वक्त तक डरता है, आज़ भी उन्हें आज़माने को,
मज़हबी सियासतों३ में अब बंट चुका इंसान है,
मेरे बापू – सुभाष ! फ़िर लौटकर देखो यहाँ..
तेरे ख्वाबों का, क्या यही हिन्दुस्तान है…?
—–
गुलामी की फ़सीलें४ तोड़कर जीना सिखाया आपने,
ख़ातिर इस ज़माने के, मरना भी सिखाया आपने,
काबिले-ताज़ीर-झूठ५ खुश है और हकीकत६ परेशान है,
मेरे बापू – सुभाष ! फ़िर लौटकर देखो यहाँ..
तेरे ख्वाबों का, क्या यही हिन्दुस्तान है…?
——
मायूस होगा तू भी तस्वीर-ए-वतन७ के दाग देखकर,
रोएगी रूह तेरी, गद्दारों के सर हीरों का ताज देखकर,
अब शहीदों की चिताओं पर बन रहा झूठ का मकान है,
मेरे बापू – सुभाष ! फ़िर लौटकर देखो यहाँ..
तेरे ख्वाबों का, क्या यही हिन्दुस्तान है…?

१महानता २ सदाचार और धर्म ३ धर्म की राजनीति ४ दीवार
५ दंड देने योग्य झूठ ६ सच्चाई ७ देश की सच्चाई

Poem ID: 151

Poem Title: तितली रानी
Genre: Other
Poem Creation Date: September 13, 2007
Poem Submission Date: October 5, 2012 at 7:10 am

Poem:

तितली रानी उड़कर मेरे पास तो आओ
सुन्दर पुष्प कहाँ खिलते हैं पता बताओ

उन पुष्पों को चुनकर माला तैयार करूँगा
एक परम पूज्य प्रतिमा का श्रृंगार करूँगा

तुम बूझ सको तो बूझो किसकी प्रतिमा है
जिसकी पूजा करने को मन आतुर इतना है

आँचल में जिसके मैं इतनी क्रीड़ा करता हूँ
चुपचाप वो सहती है जितनी पीड़ा करता हूँ

वो अन्न मुझे देती है जल भी देती है
कितनी सारी खुशियाँ मुझको हर पल देती है

लगता मेरा उससे कुछ गहरा नाता है
दादी मेरी कहती है वो भारत माता है

Poem ID: 152

Poem Title: हिंदुस्तान
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: August 15, 2012
Poem Submission Date: October 5, 2012 at 7:04 am

Poem:

हिंदुस्तान

हमने कब तुमसे तख़्त ताज,
और सम्मान माँगा था |
हम सबके सपनो में बसने वाला ,
एक प्यारा सा हिंदुस्तान माँगा था|
नाही तो हिन्दू और नाही,
मुस्लमान माँगा था |
हमारी सरहदों पर मिटने वाला,
बस एक सच्चा जवान माँगा था |
इंसानियत को रुसवा कर दे,
कब ऐसा इंसान माँगा था |
हमने तो केवल भगत सिंह जैसा,
एक सच्चा सपूत महान माँगा था |
तुम्हारे सियासी दंगों से बनने वाला,
कब वो मनहूस कब्रिस्तान माँगा था |
हम सबके सपनो में बसने वाला ,
एक प्यारा सा हिंदुस्तान माँगा था|
सबको भोजन, मुफ्त शिच्छा,तन पर कपड़े,
और चेहरों पर मुस्कान माँगा था |
हमने बस तुमसे भ्रस्टाचार मुक्त,

एक प्यारा सा हिंदुस्तान माँगा था |
पले सत्य बढे विश्वास,
नित – नित जीवन हो आसान |
सबको लेकर चलने वाला,
वह तरुण नौजवान माँगा था|
सबके हाँथो से गढ़ने वाला,

एक प्यारा सा हिंदुस्तान माँगा था|
शायद तुम कभी समझ भी न सको,
की हमने तुमसे कैसा इमान माँगा था |
क्या यही है वह देश जैसा तुमसे,
हमने अपने सपनो का हिंदुस्तान माँगा था|

Poem ID: 154

Poem Title: देश की अखंडता
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: August 18, 2012
Poem Submission Date: October 5, 2012 at 7:21 am

Poem:

देश की अखंडता को, रोकने के लिये आज।
बहना ईद साथ ले, आया है पतेती जी।।
थोडी दूर पर खडे, ढांढस बंधाते देख।
बडा गुरू पर्व संग, मोहिनी दिवाली जी।।
बारी बारी आते पर्व, इसी नेक भाव संग।
देश गतिमान रहे, एकता के साथ जी।।
देश के अखंडता की, बुझने न पाए आग।
एकता की जगी रहे, सदा ये मसाल जी।।

भीषण हिंसा की आग, जल रहा कोक्राझार।
समती न आज आग, देखिए असम की।।
त्राहि माम त्राहि माम, मचा पूरे देश शोर।
देखो दबी राख कैसे, चिनगारी भडकी।।
देश की अखंडता न,जिनको सुहाती आज।
बने हैं पलीता सब, वही इस आग की।।
देश की अखंडता को, यूँ न कर तार तार ।
सुधि कर प्यारे जरा , माँ के उपकार की।।

Poem ID: 156

Poem Title: स्वराज का आना बाकी है |
Genre: Other
Poem Creation Date: August 8, 2012
Poem Submission Date: October 5, 2012 at 11:29 am

Poem:

( १ )
स्वराज का आना बाकी है|

मानव ; मानवता से दूर,
उत्कर्ष अभी भी बाकी है|
आज़ादी का सही अर्थ मे,
भाव जगाना बाकी है |
किया बहुत उत्थान ,
पतन की राह मिटाना बाकी है|
प्रजातांत्रिक “भारत” में ,
स्वराज का आना बाकी है ||

भरत शर्मा “भारत”
18, शिवपुरी, बॅंक ऑफ इंडिया के पीछे
कालवाड़ रोड , झोटवाड़ा , जयपुर
राजस्थान 302012
सचल दूरभाष 09829711011

( २ )

आज़ादी का सपना

आज़ादी सपना बन आई, स्वपन हक़ीकत हीन रहा |
गली मोह्हले बाज़ारों में , बचपन कचरा बीन रहा ||
गली मोह्हले………………
अपने अपने हक़ की रोटी, जनता का अधिकार बना|
रैन बसेरे मिलने चाहिए , इसका भी आधार बना |
दशकों बीते इसी आस में , अंतर नहीं नवीन रहा |
राजे; महाराजे बन बैठे , जन पहले सा दीन रहा ||
गली मोह्हले……………….
भावी भारत आज देश में , निगाह पसारे बैठा है |
रोज़गार के कम अवसर से , कुंठित होकर ऐंठा है |
बंदर बाट मचाई ऐसी , गण से तन्त्र कुलीन रहा |
कैसी आज़ादी उसका तो , वाज़िब हक़ ही छीन रहा||
गली मोह्हले……………..
सामाजिक सद्‍भाव बट गये, अब काबा और काशी में|
उग्रवाद की लपटें उठती , काश्मीर कैलाशी में |
लूट डकैती व्यभिचार से , अमन चमन गमगीन रहा |
“भारत” सारा रोम जल उठा, नीरो फिर तल्लीन रहा||
गली मोह्हले………………

भरत शर्मा “भारत”
18 , शिवपुरी बॅंक ऑफ इंडिया के पीछे
कालवाड़ रोड , झोटवाड़ा , जयपुर
राजस्थान 302012
सचल दूरभाष : 09829711011

Poem ID: 157

Poem Title: मातृभूमि वंदना
Genre: Shringaar (romantic)
Poem Creation Date: February 28, 2005
Poem Submission Date: October 5, 2012 at 2:23 pm

Poem:

शस्य श्यामला धरा स्नेह सिक्त निर्झरा
षड़ऋतु श्रृंगार युता अन्नपूरणा वरा
जननी हे जन्मभूमि तू महान है
जननी हे जन्मभूमि तू महान है जननी हे जन्मभूमि तू महान है ।।
शस्य श्यामला धरा स्नेह सिक्त निर्झरा…

वन उपवन झूमे हिमगिरि नभ चूमे
देव धरे नर देहा पुलकित मन घूमे
हिमगिरि देखो रजत वरण मरूरज कण जैसे स्वरण
सत्यम् शिवम् सुन्दरम् का गान है
जननी हे जन्मभूमि तू महान है
शस्य श्यामला धरा स्नेह सिक्त निर्झरा…।।

नदियाँ अटखेलि करे कलकल बहे
मधुर सुरों में गाये गीत अनकहे
छम छम छम बाजे पैंजनीखन खन खन बोले कंगना
मुदितमना नवयौवना मिलन चली पिया अंगना
हुलसित हिय सागर में भी उफान है
हुलसित हिय सागर में भी उफान है, जननी हे जन्मभूमि तू महान है
शस्य श्यामला धरा स्नेह सिक्त निर्झरा…।।

मलयज शीतल समीर गंगा का अमिय नीर
कस्तूरीयुत कुरंग केशर युत काशमीर
अवतारी पुरूष धीर शंकर बुद्ध महावीर
मीरा रसखान सूर नानक तुलसी कबीर
विश्वगुरू तू ही गुणिजन की खान है
दिग दिगन्त गूंजे तव यशोगान है
दिग दिगन्त गूंजे तव यशोगान है जननी हे जन्मभूमि तू महान है
शस्य श्यामला धरा स्नेह सिक्त निर्झरा…।।

Poem ID: 158

Poem Title: उठो जवानों जाग उठो अब ….
Genre: Other
Poem Creation Date: January 1, 2012
Poem Submission Date: October 5, 2012 at 3:54 pm

Poem:

उठो जवानों जाग उठो अब , अग्नि परीक्षा आई है |
समृद्ध संपन्न राष्ट्र बनाने , की पुकार अब आई है ||

भारत माता मलिन हो रहीं, प्रतिद्वन्दी भर रहे हैं तान |
शंखनाद अब कर विकास का, दिखा विश्व को अपनी शान ||

आतंकवाद के साए में , भय की दुर्गन्ध आई है |
महगाई की मार ने भी , जन जन को तरपाई है ||

अपनी सभ्यता भूल रहे हम , पश्चिम की परछाई में |
बेरोजगारी और गरीबी , सर्वत्र कहर बरपायी है ||

ज्ञान की गंगा में बहकर तुम , सागर तट तक साथ चलो |
सम्पूर्ण राष्ट्र को सींचकर , जन – जन का कल्याण करो ||

जय हिंद | जय भारत ||

Poem ID: 159

Poem Title: नज़र आता है
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: August 15, 2012
Poem Submission Date: October 5, 2012 at 9:27 pm

Poem:

नज़र आता है

असली नही है ये चेहरे,
हर चेहरे पे मुझे इश्तिहार नज़र आता है.
हालत-ए-मुल्क गौर करो,
जैसे सबको तबाही का इंतज़ार नज़र आता है.
वतन क्यों गिर रहा है नीचे,
वतनपरस्त तो मुझे सरे बाज़ार नज़र आता है.
वोह अलग दौर था कोई यारो,
अब कहाँ मुल्क में परवरदिगार नज़र आता है.
अब क्यों न हवा दे थोड़ी सी हम,
जबकि हर सीने में आज अंगार नज़र आता है.
ज़माने की कोई विसात नही कोई,
क्या करे जब राह रोके अपना ही दीवार नज़र आता है.
कड़ी कर लो अब छाती तुम अपनी,
मुझे अब हिमालय में भी एक दरार नज़र आता है.
अब क्यों शहादत नही होता जबकि,
हर खून में आज हौसला तो बेशुमार नज़र आता है.
ये दिए न जलाओ मेरी चौकट पर,
जब तक कि मुझे हर जलसा उधार नज़र आता है.
होने दो अब रौशनी बर्क से ही राघव,
इससे इस साँझ के धुधलके के पार नज़र आता है .

Poem ID: 160

Poem Title: जिन्दगी, ऐ माँ तेरे लिए
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: December 18, 1999
Poem Submission Date: October 5, 2012 at 9:33 pm

Poem:

जिन्दगी, ऐ माँ तेरे लिए

अपनी जवानी मैंने पहाड़ों के नाम लिख दी,
जवानी की बहारें जंगलों के नाम लिख दी,
जवानी की गर्मी से बर्फ मैं पिघलाता रहा,
जवां जिस्म की नर्मी, राजस्थान के रेत में उडाता रहा,

जिन हाथों से सहलाता मैं सजनी का चेहरा,
उन हाथों में बन्दूक मैं थमाता रहा ।

जब भी आता खत सजनी का,

पहरा है मेरा सरहद पर, मैं ये बताता रहा ।

जवानी की रंगिनियाँ, मैं सफेद बर्फ में मिलाता रहा,
जो पिघली बर्फ तो स्याह पत्थरों से मन बहलाता रहा
एक पहाड़, से दूसरे पहाड़, बनकर रखवाला मैं जाता रहा।

ख़ुशी हो या गम, बेखबर ! मैं झूमता रहा।

इस कदर खोया मैं, सरहद के पहरे में,
दिल की बातें कभी न झलकी मेरे चेहरे में।
बिते सत्तरह साल –
‘‘राम राम साहब’’, ‘‘जय हिन्द’’, मॉं, चला घर तेरा लाल ।
टूटा भ्रम, सपनों के महल से निकला जो बाहर,

बैठकर सोचा तो हिसाब किताब नहीं है बराबर ।

सरहद पर जवानी की कुर्बानी, ये है महज दीवानगी ।
सरहद का पहरेदार ! कहते हैं लोग ‘‘ परे हट, चौकीदार ! ’’

उत्तर में, सबसे ऊँची चोटी पर पहरा मेरा –
सोचता था मैं, मेरी ऑंखों के नीचे अमन से है हिन्दूस्तान ।
करता था मैं अपने भाग्य पर अभिमान

है ये बिते दिनों का फसाना, मुझसे है रूबरू अब जमाना ।
दुनिया सौदे की बात करती है
दुनिया हर हिसाब को किताब में लिखती है ।

बस और जिरह मैं नहीं करूँगा लोगों से,

वो मेरी जिन्दगी थी, ऐ माँ तेरे लिए ।
मेरी वो बन्दगी थी,
बन्दूक से मैने निभाई वो बन्दगी थी,
‘ ऐ माँ ’ तेरे लिए

Poem ID: 161

Poem Title: भ्रूण की आजादी
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: October 5, 2012
Poem Submission Date: October 5, 2012 at 9:44 pm

Poem:

माँ के साए में।
पल रहा था एक भ्रूण
रहता था पेट की चहारदीवारी में।
गुलाटी खाता, लातें मारता,
नाल के झूले में
माँ के फेफड़ों से ऊँची पेंगे भरता।
माँ के दिल में कूद जाता।
और कभी-कभी
बाहर आने को भी मचलता।

एक दिन उसने सुना
माँ के कानों से होते हुए,
बात उसके कानों तक पहुँची।
अब उसका लिंग परीक्षण होगा।
पहले ही उसकी सात बहनें थीं।
बाहर की दुनिया में
उसका इंतजार कर रही थीं।
अगर वह भी कन्या निकला, तो ?
तो उसकी जरूरत किसी को नहीं थी।
फिर ? फिर क्या !
फिर उसे मार डाला जाएगा।

अब माँ का नन्हा उदर
बन गया था कारागार।
हर पल लगता था डर।

नाल से बँधा, उल्टा लटका,
साँसें उखड़ने का करता इंतजार।
भूल गया था खेलना-कूदना ।
रहने लगा था सहमा-सहमा ।
मुरझाने लगी थी अधबनी काया ।
साथ नहीं था कोई जुड़वाँ।
कंधे पर ही उसके वरना,
रख लेता वह अपना सिर।
बाहर की बढ़ती हलचल
बढ़ाती थी उसकी धक-धक
हिला जाती थी उसे अंदर तक।
नहीं थी बचने की कोई उम्मीद।

पकड़ लिया था डॉक्टरी जाँच ने।
उसका अनचीन्हा कन्या-स्वरूप
अविकसित ही कोख से उसे अब
हो रही थी तैयारी बाहर लाने की।
गिन रही थी वह भी उल्टी गिनती।
माँ-बाप ही हों जहाँ पराए,
कन्या-भ्रूण को कौन दुलारे।
आरक्षित थी माँ की कोख
मन में बाल गोपाल की आस।
क्या करे वह ऐसी जगह
जहाँ न मिले नेह की छाँव।

बाहर निकाला गया सुबह-सुबह उसे।
निकला था माँस का लोथड़ा बस।
थामा था नर्स ने ले कर डॉक्टर से
लेकिन पंद्रह अगस्त तो उसकी
हो गई थी आधी रात को ही।
अपना भाग्य दूजे हाथों
रचाने के बदले जब उसने,
फाँसी लगा ली थी अपने हाथों
खुद ही अपने नाल से।
आजाद थी, वह आजाद रही।
छू न सके उसे मारने वाले।
नए-नए परीक्षण भी हार गए
उसकी आजादी को मान गए।

लोग हुए खुश, चलो, मरी पैदा हुई।
एक बार रो कर बात खत्म हुई।
लेकिन है यह कदम आत्मघाती
समझ न सके हलकी सोच के धनी।
स्त्री-पुरुष का अनुपात गड़बड़ाया
देश को अंदर से कमजोर बनाया।
विदेशी ताकतों का खतरा बढ़ाया।
एक के बिना है दूसरा अधूरा।

कैसे दिखें दुनिया के सामने पूरा।
विकलांग देश को गुलाम बनाना
बिलकुल भी मुश्किल काम नहीं।
गवाह हैं इतिहास के पन्ने
जो नहीं सीखे सबक इससे
इतिहास रचेगा यही फिर से

बीज जब वटवृक्ष बनता
छाया देता, बसेरा मिलता
कन्या-भ्रूण जब बने नारी
सारी दुनिया उसने सँवारी।
दे दो उसे उसकी आजादी।
उसका हक, उसकी जिंदगी।
समाज बनाओ स्वस्थ इतना
समाए उसमें नारी का सपना।

Poem ID: 162

Poem Title: आह्वान
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: August 15, 2012
Poem Submission Date: October 10, 2012 at 5:49 pm

Poem:

आह्वान

अरे सोये हुए माँ भारती के नौजवानों |
आह्वान है तुमसे कि अपने शस्त्र तानो ||
नहीं अब सोचने का ये समय है |
करो कुछ कर गुजरने का समय है ||
प्रभु श्री राम से लो प्रेरणा तुम |
मिटाओ आज जन कि वेदना तुम ||
अकेले राम ने मारा कई को |
उठो क्या सोचना तुम तो कई हो ||
उठो वीरों न अब कुछ खौफ खाओ |
कहाँ बिखरे हो ख़ुद में एका लाओ ||
जो खतरा था परायों से टला है |
मगर अपनों से ही खतरा बड़ा है ||
इन्ही अपनों को अब रास्ता दिखाओ |
बचाओ माँ की इज्ज़त को बचाओ ||
तुम्हीं पर धरती माँ का क़र्ज़ है ये |
करो पूरा इसे अब फ़र्ज़ है ये ||
तुम्हीं हो इसके नव निर्माणकर्ता |
तुम्हीं से आस इसको दिख रही है ||
न सह पाती है अपनों का छलावा |
बड़ी बेबस सी होकर बिक रही है ||
बचा लो आज अपनी धर्मभूमि |
बचा लो आज अपनी कर्मभूमि ||
ये ‘तन्हा’ सी खड़ी ख़ुद पर है रोये |
बचा लो आज अपनी जन्मभूमि ||

Poem ID: 163

Poem Title: चिंगारी
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date:
Poem Submission Date: October 5, 2012 at 10:08 pm

Poem:

चिंगारी

अटवी के प्रस्तर ,
खंड -खंड घर्षण,
चकमक चकाचौध ,
जठरानल को शान्ति दे ,
अखंड जीवन की,
लौ चिंगारी ।
बन मशाल,
प्रेरणा की मिसाल ,
मंगल की,
चमकी चिंगारी ।

चहुँ ओर ,
तम का डेरा।
जन सैलाब चिंगारी से,
अभिभूत वडवानल घेरा ।
व्याकुल आने को नया सवेरा,
रानी के खडगों की चिंगारी ।
अमर कर गई ,
जन-जन में जोश भर गई ,
सत्य अहिंसा प्रेम दीवानी,
बापू की स्वराज चिंगारी ।।
नूतन अलख जगा गई ,
देशभक्त बलिदानी,
चिंगारी दावानल फैला गई ।
युग – युग के ज़ुल्मों को सुलझा गई ।
नई रात ,
नई प्रात: करा गयी ।
चिंगारी मशाल,
मिसाल बन ,
स्वाभिमान बन,
राष्ट्र गीत सुना गयी ।।

Poem ID: 165

Poem Title: बोलें जिनके कर्म ही ….
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: September 26, 2012
Poem Submission Date: October 6, 2012 at 4:45 am

Poem:

बोलें जिनके कर्म ही ….

बोलें जिनके कर्म ही ,ओज भरी आवाज़,
ऐसे दीपित से रतन ,जनना जननी आज ।
जनना जननी आज, सुता झाँसी की रानी ,
वीर शिवा सम पुत्र ,भगत से कुछ बलिदानी ।
कुछ बिस्मिल आज़ाद ,नाम अमृत रस घोलें,
गाँधी और सुभाष ,भारती माँ जय बोलें । |

बहुरंगी दुनिया भले , भा गए रंग तीन ,
बस केसरिया ,सित ,हरित , रहें वन्दना लीन ।
रहें वन्दना लीन ,सीख लें उनसे सारी ,
ओज,वीरता ,त्याग ,शान्ति हो सबसे प्यारी।
धरा करे श्रृंगार , वीर ही रस हो अंगी ,
नस नस में संचार ,भले दुनिया बहुरंगी।।

एक लडा़ई कल लडी़ ,एक लडा़ई आज ,
विजयी गाथाएँ लिखें ,जियें मातृ भू काज ।
जियें मातृभू काज ,मिटाऎँ सब अँधियारा,
खोलें नयन कपाट , दिखाऎँ ,कर उजियारा ।
भारत रहे महान ,सकल जग करे बडा़ई ,
ठान तमस से रार ,लडे़गें एक लडा़ई ।।

लेंगे अपने हाथ में ,सच की एक मशाल ,
भले अधर पर मौन हो ,कलम कहे सब हाल |
कलम कहे सब हाल ,व्यथा अब सही न जाए ,
जन गन मन की पीर ,भला क्यूँ कही न जाए |
रखनी पैनी धार ,सोच कब बिकने देंगे ,
सच की सदा मशाल ,हाथ में अपने लेंगे

Poem ID: 166

Poem Title: जय हो हिंदुस्तान !!!
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: February 15, 2002
Poem Submission Date: October 10, 2012 at 5:53 pm

Poem:

जय हो हिंदुस्तान !!!

मान शान और स्वाभिमान की शब्दतीर हिय लागी|
सह कर अत्याचार खूब है आज आत्मा जागी ।।

बहुत हुआ तुम बहुत रह चुके, बहुत कर चुके अत्याचार।
जाग गए हैं अब हम पल में चुन उखाड़ हर खरपतवार ।।

उठी लहर ऐ कहर ठहर तेरा विनाश हम कर देंगे।
सर को मरोड़ कर गोड़ तोड़ जड़ से उखाड़ तुझको देंगे ।।

जो था फैलाया नीति जाल वह चूर चूर हो गिरा गगन में।
फिर चिराग जल उठा लगन का सब जन चलेंगे एक लगन में ।।

मत भाग दाग सरदार तुझे ये काल मिटाने आया।
तेरा विनाश तुझको टटोलकर आज बुलाने आया ।।

इति को तेरी बहुत नहीं बस, जन समूह और साहस ये दो।
गर बदल सके तो बदल आपको जियो और जीने दो ।।

पग पग में तुम ताव सहित जब दाव लगा दलते थे।
कर में चाबुक बँदूक लिए, तन के ऊपर चलते थे ।।

देख जमीं ऐ देख आसमां, जाग उठा संसार।
गूँज रही है चहू ओर अब एक मधुर झंकार ।।

हर महिला हर प्यारे बच्चे, बूढ़े और जवान।
एक साथ सब मिलकर बोलें जय हो हिंदुस्तान ।।

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