Gaurav Gatha 2013 - Poet's View

Gaurav Gatha 2013 – Poet’s View

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Poem ID: 187

Poet’s Name: shashi purwar
Poem Title: नयी अलख जगाना है …………।
Location: indore (m.p.)
Occupation: House wife
Poem Length: ४४ lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: August 15, 2013
Poem Submission Date: November 15, 2013 at 5:43 pm

Poem:

“नयी अलख जगाना है “
उठो ऐ देश वासियों
नया चमन बसाना है
दिलों में मातृभूमि की
नयी अलख जलाना है

सीमा पर चल रही है
नफरत की ,ऐसी आधियाँ
कतरा कतरा खून से
लिख रही कहानियाँ,
साँस साँस सख्त है
ये आया कैसा वक़्त है
अब जर्रा जर्रा द्वेष की
बँट रही है ,निशानियाँ

आओ साथ मिलकर
अब द्वेष को मिटाना है
दिलों में मातृभूमि की
नयी अलख जलाना है।

उठो ऐ देशवासियों ………… !
आज , ईमान बिक रहा है
स्वार्थ का व्यापार है
चले, जिन भी राहों पर
पतित , अभ्याचार है
कदम कदम पर धोखा है
आतंक को किसने रोका है
चप्पा चप्पा मातृभूमि के
पुनः – पुनः प्रहार है

आओ स्वार्थ के घरों में
नयी सुरंग बनाना है
दिलों में मातृभूमि की
नयी अलख जगाना है।
उठो ऐ देशवासियों ………………।
अब मुल्क की आन का
बड़ा अहम सवाल है
फिजूल की बतियों पे
यहाँ ,मचता बबाल है .
बदला बदला वक़्त है
ये तरुण अनासक्त है
देशभक्ति की तरंगो से
अब करना इकबाल है

नए राष्ट्र के गगन पर
नयी पतंग उड़ाना है
दिलों में मातृभूमी की
नयी अलख जगाना है
उठो ऐ देशवासियों ………!
— शशि पुरवार

Poem ID: 188

Poet’s Name: DR KARUNA SHANKAR DUBEY
Poem Title: जिनगी
Location: LUCKNOW-UTTAR PRADESH
Occupation: Government
Poem Length: 22 lines
Genre: Karuna (pathos)
Poem Creation Date: August 2, 2013
Poem Submission Date: August 28, 2013 at 9:17 am

Poem:

जिनगी

तरई के गाँव में ,चन्दा नहाय रहा ।
मछरी के पोखर में ,दिनकर ठंडाय रहा ।

जिनगी के ककहरा में देस अऊ गांव समाय रहा ।
अइसन मोह अऊ बिछोह जियरा छटपटाय रहा ।
तरई के गाँव में ,चन्दा नहाय रहा ।
मछरी के पोखर में ,दिनकर ठंडाय रहा ।
मनवा क गतिया दिनवा -रतिया , अटपटाय रहा ।
किस्सा अऊ बतिया हियरा में लहराय रहा ।
तरई के गाँव में , चन्दा नहाय रहा ।
मछरी के पोखर में ,दिनकर ठंडाय रहा ।
उतान सेवारे क मचान पनिया में बनाय रहा ।
पात बीच बेरा के फूल जइसन गमगमाय रहा ।
तरई के गाँव में , चन्दा नहाय रहा ।
मछरी के पोखर में ,दिनकर ठंडाय रहा ।
मन मगन सेवा सहचरी में तन कुनमुनाय रहा ।
सुख शान्ति अशीष सब जन पे गुन गुनाय रहा ।
तरई के गाँव में , चन्दा नहाय रहा ।
मछरी के पोखर में ,दिनकर ठंडाय रहा ।
निर्मोही मनवा बैरी पपीहवा टेर में अटकाय रहा ।
संगी सब लुटाय खाली हाथ गेहिया को जाय रहा ।
तरई के गाँव में , चन्दा नहाय रहा ।
मछरी के पोखर में ,दिनकर ठंडाय रहा ।

0———-0

Poem ID: 189

Poet’s Name: vijay kumar singh
Poem Title: अर्पित करूँ मैं क्या तुझे ओ देश मेरे
Location: sydney
Occupation: Other
Poem Length: 28 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: August 15, 2012
Poem Submission Date: August 29, 2013 at 10:18 pm

Poem:

अर्पित करूँ मैं क्या तुझे ओ देश मेरे

अर्पित करूँ मैं क्या तुझे ओ देश मेरे तू बता ,
ओ देश तेरी शान से बढ़कर मुझे कुछ भी नहीं |
मैं माँ कहूँ माटी कहूँ या कह रहूँ तुझको ख़ुदा ,
ओ देश तेरे नाम से बढ़कर मुझे कुछ भी नहीं |
सुर में सभी मौसम सजे सुर में सजीं सब वादियाँ ,
सुर में सभी झरने सजे सुर में सजीं सब घाटियाँ |
सरिताएँ भी सुर में सजीं सागर भी सुर में हैं तेरे ,
सुर में सभी पर्वत सजे सुर में सजीं सब चोटियाँ |
स्तुति करूँ वंदन करूँ या कह रहूँ तेरी कथा ,
ओ देश तेरे गान से बढ़कर मुझे कुछ भी नहीं |
अर्पित करूँ मैं क्या तुझे ओ देश मेरे तू बता ,
ओ देश तेरी शान से बढ़कर मुझे कुछ भी नहीं |
दिल में तेरे मन्दिर लिए दिल में तेरे गुरुद्वार मैं ,
दिल में तेरी मसजिद लिए दिल में तेरी दरगाह मैं |
गिरजा भी तेरे दिल लिए स्तूप भी दिल में तेरे ,
दिल में तेरे खंडहर लिए दिल में तेरी मीनार मैं |
पूजा करूँ अर्चन करूँ मन मैं तेरी स्मृति सजा ,
ओ देश तेरे मान से बढ़कर मुझे कुछ भी नहीं |
अर्पित करूँ मैं क्या तुझे ओ देश मेरे तू बता ,
ओ देश तेरी शान से बढ़कर मुझे कुछ भी नहीं |
यदि तू कहे बिज़ली बनूँ यदि तू कहे अंगार सा ,
यदि तू कहे प्रस्तर बनूँ यदि तू कहे फ़ौलाद सा |
तलवार बन जाऊँ मैं तेरी ढाल बन जाऊँ तेरी ,
यदि तू कहे अंधड़ बनूँ यदि तू कहे सैलाब सा |
मैं हँसते हँसते प्राण दूँ और हो रहूँ तुझमे फ़ना ,
ओ देश तेरी आन से बढ़कर मुझे कुछ भी नहीं |
अर्पित करूँ मैं क्या तुझे ओ देश मेरे तू बता ,
ओ देश तेरी शान से बढ़कर मुझे कुछ भी नहीं |

Poem ID: 190

Poet’s Name: Suprem Trivedi
Poem Title: साँकल तोड़ कर सारे, मैं उड़ कर पार जाता हूँ
Location: Swindon
Occupation: Professional Service
Poem Length: 12 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: February 21, 1983
Poem Submission Date: August 29, 2013 at 4:49 pm

Poem:

साँकल तोड़ कर सारे, मैं उड़ कर पार जाता हूँ
कहीं वादे कहीं फितरत कहीं आँसू कहीं गुरबत,
मैं हांथों मे पकड़ चलता हूँ, चल कर पार जाता हूँ।
वो आंखें घूरती मुझको, निगाहें चीरती जातीं,
मैं लड़ता रात भर, दिन भर न थक कर हार जाता हूँ।

रंगों मे चमक बाकी, सितारों मे दमक बाकी,
अँधेरा जीत क्यों ले फ़िर, सफर की जागती बाजी,
फलक का चीर दे सीना, ये मुक्ता हाथ के छाले,
लड़ना ही है गर नियती, मैं अबकी बार जाता हूँ

रोने से नहीं रुकना, या गाने से नहीं रुकना,
टूटन में है जय मेरी, झुकाने से नहीं झुकना,
है टहनी से बंधा रहना, या पत्ता टूट कर उड़ना,
साँकल तोड़ कर सारे, मैं उड़ कर पार जाता हूँ।

दवा है गर दवा देना, दुआ है गर दुआ देना,
घावों पर लगा सकना, तो मरहम तर लगा देना,
मगर न वास्ता देना न आँसू का न खूनों का,
ये रक्खो फूल-गुल-दामन, मैं ले तलवार जाता हूँ।

सुप्रेम त्रिवेदी ‘विद्रोही भिक्षुक’

Poem ID: 191

Poet’s Name: डा.राजेंद्र तेला”निरंतर”
Poem Title: हिंद की ज़मीन किसी इन्द्रधनुष से कम नहीं
Location: ajmer,rajasthan
Occupation: Professional Service
Poem Length: 20 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: August 3, 2011
Poem Submission Date: August 31, 2013 at 4:49 am

Poem:

हिंद की ज़मीन किसी इन्द्रधनुष से कम नहीं
हिंद की ज़मीन
किसी इन्द्रधनुष से कम नहीं
सतरंगी सिकाफत
किस मुल्क से ज्यादा नहीं ?
हवा में खुशबू
सारे जहां से ज्यादा यहाँ
हर मुल्क से ज्यादा त्योंहार यहाँ
मजहबों का संगम यहाँ
नफासत से भरी बोली यहाँ
खुदगर्जों के जहन में
कीड़े कुलबुलाने लगे
नफरत के बीज मुल्क में उगाने लगे
उखाड़ फैंकों नफरत के हैवानों को
ख़त्म करो उनके अरमानों को
हिंद की ज़मीं को
पुराने मुकाम पर लाओ
भाई-चारे से रहो
रहना सिखाओ
हवा में रवानी
मौसम में बहारें लाओ
डा.राजेंद्र तेला”निरंतर”,अजमेर
सिकाफत =Culture

Poem ID: 192

Poet’s Name: Nishant Choubey
Poem Title: योगेन्द्र सिंह यादव
Location: kochi,kerala
Occupation: Professional Service
Poem Length: 50 para lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: September 23, 2012
Poem Submission Date: August 31, 2013 at 7:04 am

Poem:

योगेन्द्र सिंह यादव

शिवाजी , लक्ष्मीबाई , भगत सिंह
कि बात अब पुरानी है ,
मैं आज सुनाता हूँ तुम्हे
नई अब जो कहानी है |

अब भी हमारे रगों में
जोश का उफान है ,
अब भी हमारे सीने में
देशभक्ति का तूफान है |

नसों में है बिजलिया
आँखों में अंगार है ,
अब भी देश कि खातिर लोग
मर मिटने को तैयार है |

अच्छाई कभी न दिखाती मीडिया
बस बुरे दिखाना काम है ,
तभी तो लोगों का अब
जीना यहाँ हराम है |

इस देश का कुछ नहीं हो सकता
यह तिनको में बिखर जायेगा ,
अरे खुद को सुधारो तुम
यह अपने आप सुधर जायेगा |

खैर अब मैं अपनी
कहानी पर आता हूँ ,
एक सच्ची घटना को
आपको मैं सुनाता हूँ |

वीरता और देशभक्ति जहाँ
कण – कण में समाई है ,
देश के लिए जहाँ वीरो ने
खून क़ी नदियाँ बहाई है |

बुजदिलो के बीच में
मर्द आज भी पलते है ,
भेद बकरियों के बीच में
शेरो क़ी तरह चलते है |

योगेन्द्र सिंह यादव है
नाम ऐसे शेर का ,
यह कहानी है उसी
फौलाद के ढेर का |

यु.पी. में जन्मा है
पर भारत क़ी शान है ,
उन जैसे लोगो से ही
इस देश क़ी आन है |

6 मई को शादी हुई
और 20 मई को बुलावा आया ,
बड़ी खुशी से दुल्हे ने
सेहरा उतार बन्दूक उठाया |

18 ग्रेनेडिएर बटालियन का
रत्ना था , कोहिनूर था ,
शक्ति और शौर्य का
जीता -जगता प्रतिरूप था |

पाकिस्तानी भेडिये बैठे थे
तोलोलिंग पहाड़ी क़ी छोटी पर ,
भारतीय शेरो ने परखा उन्हें
वीरता क़ी कसौटी पर |

22 दिनों के भीतर ही
खदेढ़ उन्हें वहां से भगाया ,
फिर टाइगर हिल पर कब्ज़े का
बीड़ा हाथों में उठाया |

दुर्गम रस्ते अजेय पहाड़ी
पर सीने में जोश था ,
भारत माँ के आगे क्या
किसी और चीज़ का होश था |

7 जाबांजो क़ी घातक टुकड़ी
चली असंभव काम करने ,
सिर्फ रस्सियों के सहारे
सीधी पहाड़ी को चढ़ने |

16500 फुट ऊँची पहाड़ी
गिरे तो हड्डिया भी न बचेंगी ,
पर उन चट्टानों में वो दम कहाँ
जो भारतीय कदमो को रोक सकेंगी |

3 दिन और 2 सर्द रातो बाद
असंभव को संभव कर दिखाया ,
पर रत के अँधेरे में था
दुश्मन बैठा अपने को छिपाया |

सुबह होते ही उनपर
हमला हुआ जोरो का ,
बचने के लिए सहारा लिया
पर्वतो क़ी गोदो का |

अल्लाह हो अकबर के नारे
और बरसते पत्थर और गोली ,
शेरो क़ी गिनती करने
आ रही गीदडो क़ी टोली |

8 को मार गिराया
2 को किया घायल ,
दुश्मन भी हुआ उनकी
वीरता का कायल |

घायल सिपाहियों ने अफसर को
भारतीयों क़ी गिनती बताई ,
आधे घंटे बाद उन्होंने
दुबारा उनपे क़ी चढाई |

5 जुलाई का दिन था
करीब 12 बज रहे थे ,
7 भारतीय जवानों से
70 पाकिस्तानी लड़ रहे थे |

35 को कफ़न पहनकर
6 वीरगति को प्राप्त हुए ,
पार्थिव शारीर को छोड़कर
हमारे दिल में व्याप्त हुए |

उन मृतकों के बीच एक
ज़ख्मी शेर बचा था ,
सही मौके क़ी तलाश में उसने
मरने का ढोंग रच था .

खून से लथपथ शारीर
पर दर्द मौजूद नहीं ,
भारत माँ और तिरंगे के आगे
किसी और का वजूद नहीं .

उन बेरहम पाकिस्तानियों ने
पहले शवो को बूटो से मारा ,
फिर दम तक गलियां दी
और अपने बन्दूको को उतरा |

मरे हुए लोगो पर
गोलियों क़ी बौछार कर दी ,
उन जालिमो ने अब तो
सभी हदों को पर कर दी |

12 गोलिया खाने के बाद भी
उसके शारीर में स्वास बाकी थी ,
सर और दिल में गोली न लगने से
जीने क़ी आस बाकी थी |

तभी एक पाकिस्तानी ने मुड़कर
उसके सीने में गोली दाग दी ,
पर उस वीर क़ी किस्मत
उस समय उसके साथ थी |

जेब में बटुआ था और
उसमे पांच के सिक्के पड़े थे ,
गोली और दिल के बीच में
चट्टान क़ी भांति वे खड़े थे |

उसने सोचा अभी तक नहीं मरा
तो अब नहीं मरूँगा ,
अपने दिए मिशन को
हर हालत में पूरा करूँगा |

बायाँ हाथ बेकार हो गया
दाये से उसने ग्रेनेड उठाई ,
एक बड़ा धमाका हुआ जिसने
पाकिस्तानियों क़ी होश उड़ाई |

तीन तरफ से हमला कर
10 को मौत से भेट कराई ,
बुजदिल पाकिस्तानियों को लगा क़ी
भारतीय फौज दुबारा लौट आई |

दुम दबाकर भाग खड़े हुए
पीछे मुड़कर भी न देखा ,
एक अकेले ने वहां खीच दी
मौत क़ी गाढ़ी रेखा |

दुबारा लौट यादव अपने
भाइयो के पास आया ,
भुज हीन , मुंड हीन सबको
खून से सना पाया |

फूट -फूट कर रोया हो
फिर संभाला उसने होश ,
चल पड़ा वहां से
वो वीरता का कोष |

नीचे MMG पोस्ट पर
हमले क़ी खबर पहुँचानी थी ,
दुश्मन के ठिकाने क़ी
सारी बाते उन्हें बतानी थी |

लटकते बाये हाथ को उसने
पीछे बेल्ट से बांध दिया ,
नीचे पोस्ट तक पहुचने का
संकल्प मन में साथ लिया |

लुढ़क गया नाले से
शारीर का परवाह न किया ,
उसके साहस और शौर्य को
जिंदगी ने रुसवा न किया |

खून से नहाया योगेन्द्र
किसी तरह नीचे आ गया ,
उसका साथ देने के लिए तो
खुद खुदा भी पीछे आ गया |

लडखडाती जुबान से उसने
जनरल को पूरी बात बताई ,
उन्होंने दुबारा प्लान बनाया
फिर चोटी पर क़ी चढ़ाई |

उसी रत टाइगर हिल पर
भारतीय तिरंगा फहराया गया ,
उन बेवखूफ़ पाकिस्तानियों को
उनकी असली औकात बताया गया |

27 महीने तक हुई फिर
जिंदगी और मौत क़ी जंग ,
मौत भी दंग रह गयी
देख उसके वीरता का रंग |

उस वीर के लिए दुआ में
आरती का थाल सजाया गया ,
उस परमवीर भारतीय को
परमवीर चक्र पहनाया गया |

पूछने पर बताया उसने ,
बस खून दिया है
बलिदान अभी बाकी है ,
इस मिटटी के गौरव का
अभिमान अभी बाकी है |

हुस्न के जलवो का मज़ा
हम भी उठा सकते थे ,
अपनी इस जवानी को
उन पर लुटा सकते थे |

मगर , वो फूल ही क्या
जो अपनी खुशबु ना महकाये ,
और वो जवानी ही क्या
जो वतन के काम ना आये |

मात्र 21 साल में उसने
यह अद्भूत कारनामा किया ,
वीरता क़ी कोई उम्र ना होती
पूरी दुनिया को बता दिया |

हमेशा बोलते हो कि
इस देश ने मुझे क्या दिया है ,
कभी ये भी तो सोचो कि
तुमने इसके लिए क्या किया है |

………………………………………………………………

Poem ID: 193

Poet’s Name: pavan rajput
Poem Title: वो देखो उससे रूठकर उसका बचपन जा रहा हे
Location: ghaziabad, utter pradesh
Occupation: Student
Poem Length: 32 lines
Genre: Karuna (pathos)
Poem Creation Date: August 12, 2011
Poem Submission Date: August 31, 2013 at 12:08 pm

Poem:

कल सुबह एक बच्चा मेरी चाय लेकर आया था
शlयद उस चाय ने ही उसका बचपन जलाया था
कुछ उसकी आठ या नो साल उम्र रही होगी
ये सब देख उसकी माँ पर क्या गुजर रही होगी
वो भी उसे सबकी तरह पड़ना चाहती हे
उसे इस उम्र में कम करता देख पछताती हे
उसे भी बस यही गम सता रहा हे
वो देखो उससे रूठकर उसका बचपन जा रहा हे

कोई महेंगे महेंगे खिलोनो से खेलता हे
कोई बस दिन रात अपने मालिक की मार झेलता हे
कोई मखमल के बिस्तर पर सोता हे
कोई पूरी रात ठण्ड में बैठकर रोता हे
कोई अपनी हर जिद पूरी करवाता हे
कोई खुद ही अपना घर चलता हे
इस बचपन में भी वो सबकी झूठन खा रहा हे
वो देखो उससे रूठकर उसका बचपन जा रहा हे

किसी का बाप हे नहीं कोई दारू में धुत रहता हे
कोई अपने बच्चे को छोड़ दुसरो की खुसी में रहता हे
क्या हे उसकी खता जो इस उम्र भी दुःख झेलता हे
भगवान तू भी हे खुश क्यों उनके जज्बातों से खेलता हे
उन्होंने तो अभी ठीक से बोलना भी नहीं सिखा था
अभी तो उनका देखा हर रंग फीका था
और तू उन्हें ठोकर पे ठोकर दिए जा रहा हे
वो देखो उससे रूठकर उसका बचपन जा रहा हे

कपडे नहीं उसपर भीख मागने से शर्माता हे
उसकी खुद्दारी तो देखो इस उम्र में भी कमाता हे
उन ठेकदारो से पूछो जो इनसे भीख मंगवा खुद खाते हे
सर्म होती नहीं उनमे या बेच कर खा जाते हे
इस बचपन को कोई सवारना नही चाहता हे
खुद की अच्छी इस्थ्ती होने पर दोस्रो को ज्ञान सुनाता हे
किसी कम्बक्त को बुडापे में भी बचपना आ रहा हे
वो देखो उससे रूठकर उसका बचपन जा रहा हे

Poem ID: 194

Poet’s Name: Parmeshwar Funkwal
Poem Title: सपने धूप के
Location: Ahmedabad, Gujarat
Occupation: Government
Poem Length: 29 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: August 15, 2013
Poem Submission Date: September 2, 2013 at 12:44 pm

Poem:

सपने धूप के

दुश्वर सपने
फिर से देखें
नयी नवेली धूप के

सोने की चिड़िया
की क्यों कर
मंद हुई परवाजें
राह देखते रहे अनेकों
खुले हुए दरवाजे

जमी वसा को
अब पिघलाएं
चर्चे हों फिर रूप के

काले अक्षर
भैंस बराबर
चिड़िया चुगती जाती खेत
भ्रम बिल्ली से
राहें काटें
शुतुरमुर्ग सिर डाले रेत

आसमान से
बात करें हम
क्यों हों मेंढक कूप के

युगों से बहती
इस धारा को
कई कछारों ने बांटा
लेकिन रह रह
हर रेले को
सिन्धु ने अक्सर पाटा

एक है अपनी
पुण्यभूमि
दाने हम एक सूप के.

-परमेश्वर फुंकवाल

Poem ID: 195

Poet’s Name: Ashutosh Kumar ‘Kunwar’
Poem Title: वतन की मुहब्बत
Location: New Delhi, Delhi
Occupation: Other
Poem Length: 18 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: January 26, 2009
Poem Submission Date: September 9, 2013 at 5:19 am

Poem:

वतन मेरे बता मुझको मुहब्बत तुझसे इतनी क्यों
तेरी मिटटी की खुशबू से मुझे इतनी मुहब्बत क्यों
आखिर क्यों तेरी खातिर मेरा ये दिल तड़पता है
तेरी ही आन की खातिर ‘कुँवर’ मरता है मिटता है
कहें क्या आरज़ू है तेरी खातिर और क्या अरमां
की मुझको बस बता दे मेरी खातिर क्या तेरा फ़रमाँ
मुझे अब पुर-सुकूं ये ज़िन्दगी बस रास ना आये
तमन्ना है की मेरी ज़िन्दगी तेरे काम तो आये
मेरा दिल आरज़ू बस इतनी सी हर दिन संजोता है
मै लाऊंगा ख़ुशी हर दिल में जो की आज रोता है
मेरा भी ज़िक्र होगा एक दिन उस कत्लखाने में
जहाँ आशिक है सारे तेरे भेजे इस ज़माने ने
हाँ है शौक हमको तेरी जानिब जां निसार ये हो
तेरे जो क़र्ज़ हैं मुझपर की उसका हक अदा तो हो
मुझे है फक्र की तूने मुझे आँचल में पाला है
मेरी हर चाल को तूने ही तो हर पल संभाला है
की ग़र अल्लाह मेरी नेकियों का कुछ सिला जो दे
है मेरी इल्तजा वो तुझसे ही मुझको मिला फिर दे

Poem ID: 196

Poet’s Name: Ratish Gaurav
Poem Title: bharat bhoomi
Location: Gandhinagar, Gujarat
Occupation: Software
Poem Length: 14 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: September 1, 2012
Poem Submission Date: September 12, 2013 at 8:37 am

Poem:

अरे ओ भारत भूमि विशाल
मस्तक पे तेरे हिमाला है
हैं चरण धोती तेरी
हिन्द महासागर विकराल

दक्कन बढाती है तेरा मान
दक्षिण तेरा दैदीप्यमान
बंग भूमि तेरा अभिमान
उर स्थित विन्ध्य शोभायमान

देव भूमि है तेरा श्रृंगार
उत्तर प्रदेश ,कलिंगा और बिहार
रण कच्छ सौराष्ट्र मराठवाड़
राजस्थान की हो जय जय कार

मेरा कोटि कोटि नमन
करूँ मस्तक से स्पर्श चरण ।।

Poem ID: 197

Poet’s Name: Nishant Choubey
Poem Title: रण
Location: kochi,kerala
Occupation: Professional Service
Poem Length: 10 para lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: September 5, 2013
Poem Submission Date: September 14, 2013 at 4:44 am

Poem:

रण

बरसो से सोया था
वो सिंह दहाड़ उठा है,
छेड़ा है तुमने जिसे
वो नाग फुंकार उठा है ।

बरसो से दबी जनता
आज हुँकार उठी है,
भारत की सोई जवानी
अब पुन: जाग उठी है ।

ब्राह्मणों में लुप्त था वो
दिव्य ज्ञान जाग उठा है,
क्षत्रियों के शास्त्रों से
वही पुराना आग उठा है ।

धरती के गर्भ में पलता
लावा धधक रहा है,
कालिया नाग के दमन हेतु
अब कृष्ण मचल रहा है ।

जगा सकते हो पौरुष तो
कायरता पर तुम चोट करो
अनीति पर तुम टूट पड़ो
अधर्म पर विस्फोट करो ।

वरना, मूक दर्शक सा तुम
कोने में खड़े हो जाओ,
निरीह कीट सा जीवन जी
काल के ग्रास हो जाओ ।

महाभारत का रण है ये
अर्जुन तुम गाण्डीव चलाओ,
बहुत हो चुकी संधि वार्ता
अब अमोघ अस्त्र चलाओ ।

दुश्शासन और दुर्योधन का
भीम तुम संहार करो,
उनके रक्तों से अब तुम
द्रौपदी का श्रृंगार भरो ।

महाराणा , शिवाजी जैसे
देशभक्ति की ललकार बनो ,
अंग्रेजो के छक्के छुड़ाए
वो टीपू की तलवार बनो ।

परिणाम की परवाह ना कर
वीर अब तुम युद्ध करो ,
अपनी वसुधा के कलंको को
रक्तों से अब शुद्ध करो ।

Poem ID: 198

Poet’s Name: Marut Tiwari
Poem Title: धरती ये रोशन हो
Location: Bangalore, Karnataka
Occupation: Software
Poem Length: 30 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: November 9, 2012
Poem Submission Date: September 27, 2013 at 11:29 am

Poem:

कितना सहा है इसने, बरसों से रात का डर |
कोई तो सुबह हो अब कि धरती ये रोशन हो ||

ये तंत्र हो चुका है, जर्जर, गुलाम तम का |
कुछ दीप तो जलें यूँ, अंधेरा ये दफ़न हो ||
कोई तो सुबह हो…

नेत्रत्व करे जग का, विज्ञान ज्ञान अपना |
मेधावियों का जग के, हम पहला आकर्षण हों ||
कोई तो सुबह हो…

आज़ाद हो अभिव्यक्ति और हो कला शिखर पर |
अपनी कला से प्रेरित, दुनिया के आंदोलन हों ||
कोई तो सुबह हो…

उद्योग और उद्यम, मानक बनें जगत के |
निर्यात से अपने विश्व-व्यापार में जीवन हो ||
कोई तो सुबह हो…

हर धर्म, आस्था का, सम्मान हो बराबर |
सदभावना की मिसाल बनें, कायम ऐसा अमन हो ||
कोई तो सुबह हो…

कृषि और दुग्ध में हों, ना सिर्फ़ आत्मनिर्भर |
निर्यात करें जग को, क्रांतिकारी उत्पादन हो ||
कोई तो सुबह हो…

जब अलविदा कहें हम, कोई कसक रहे ना |
संतुष्टि सी हो मन में, ऐसा वो अंतिम क्षण हो ||
कोई तो सुबह हो…

Poem ID: 199

Poet’s Name: Ravi Meena
Poem Title: “जनता की ललकार”
Location: Kanpur, Uttar Pradesh
Occupation: Student
Poem Length: 34 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: September 6, 2013
Poem Submission Date: September 28, 2013 at 6:31 pm

Poem:

“जनता की ललकार”
माँ अम्बा और बजरंगबली के सेवक हम,
तांडव से प्रचंड परसुराम के वंशज हम,
गर हुए सवार आक्रोश के ऐरावत पर , तो
अपनी असली औकात बता देंगे हम, औ,
कान खोलकर सुनलो सत्ता के मद में मदहोशों,
गर लौट-आये जोश में इक-बार तो फिर,
इस भ्रष्टतंत्र की शक्ति का सच्चा अनुपात बता देंगे हम,
माना कि गाँधी के कदम-निशानों पर चलने वाले हम,
माना कि सीधे-सादे चुपचाप समंदर से हम,
पर मत भूलो सत्ता के मद में अंधों, बुद्धि के मारो,
यह भारत-भूमि वीर शिवाजी की भी माता है,
और मजबूरी के मारों को उनको अच्छे से अपनाना भी आता है।
बाबा के संविधानी कानूनों के विश्वासी हम,
राणा प्रताप से आजादी आतुर वनवासी हम,
धूर्त लुटेरों !
तुमने हमको अब-तक कानूनों से अनभिज्ञ रखा है,
बल पर इसके ही तुमने अब-तक सत्ता का स्वाद चखा है,
लेकिन अब कान खोल-कर सुनलो संसद में काबिज अनपढ़-अनजानों,
गर अधिकारों का हुआ और हनन तो,
तुमको लाठी-बंदूकों के बल पर असली संविधान पढ़ा देंगे हम,
औ,जनता के कारागारों में सबकी सेज सजा देंगे हम,
चाहे चाल कुटिल कितनी भी चल लो तुम,
चाहे 10-10 मंदिर मस्जिद की बातें कर लो तुम,
लेकिन,
धर्म अलग होकर भी एक बनेंगे हम,
देश बचने हेतु सारे गठजोड़ बुनेंगे हम,
सत्ता के भूखे उन्मादी संदेशों के हरकारों,
हमें बांटने वालों जनता के गद्दारों,
जल्दी स्वयं संभालो खुद को, नही तो
तुम्हे तुम्ही में बाँट बाँट कर ,
बोटी बोटी नोच-नोच कर ,पापों की तुम्हे सजा चखाकर,
असली भगवान दिखायेंगे हम,
सभी बराबर धर्म बराबर,धन बराबर,
ऐसा कर समभारत तुमको दिखलायेंगे हम,
:- रवि मीणा

Poem ID: 200

Poet’s Name: Himanshu Mishra
Poem Title: क्रांति की आशा…
Location: Kanpur, Uttar Pradesh
Occupation: Student
Poem Length: 52 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date:
Poem Submission Date: October 13, 2013 at 5:02 am

Poem:

कोयल की मधुर वाणी न मैं श्रृंगार लिखता हूँ
कलम को खून से भरकर ग़ज़ल अंगार लिखता हूँ

वीरों का यहाँ रुसवा रोज़ बलिदान होता है
वतन की आन पर आघात यहाँ नादान होता है
कोई सौ क़त्ल करके भी चैन की नींद सोता है
कोई मासूमियत का कर फ़ना हो कर के देता है
यहाँ पर देश का बचपन सड़कों पर भटकता है
यहाँ ममता का आंचल अब पुत्र को भार लगता है
यहाँ नेतृत्व करता है जिसे न सूझ मंजिल की
यहाँ तो बस चुनावों पर है झूठी आस ही मिलती
जिन्हें यह देश सौंपा था आस्तीन के सांप निकले सब
जो थे राष्ट्र के भरतार वही गद्दार निकले सब
है यह बलिदान की धरती यहाँ मत स्वार्थ पलने दो
मिटा दो हर बुराई को यहाँ मत पाप बढ़ने दो
न कोई काल्पनिक घटना मैं बस यथार्थ लिखता हूँ
कलम को खून से भरकर ग़ज़ल अंगार लिखता हूँ

यहाँ सीता की रक्षा को स्वयं जब राम आते हैं
तो जल में रास्ता बनता है पत्थर तैर जाते हैं
यहाँ पर द्रौपदी की लाज पर कोई जो आंच आती है
लहू से केश धुलने को महाभारत हो जाती है
यहाँ जननी की सेवा का जो राणा प्राण उठाता है
तो उसकी असि-धार के आगे मुग़ल शासन झुक जाता है
कोई माँ राष्ट्रहित हेतु जो निज शिशु को कटाती है
महाबलिदान की देवी वो पन्नाधाय कहती है
यहाँ झाँसी की रानी ने लिखे इतिहास खूनों से
थी अर्चित भू सुभाष आज़ाद भगत जैसे प्रसूनों से
धरे ब्राह्मण भी जो कृपाण तो पापी वंश हिल जाये
और क्षत्रिय भी जो बाँटे ज्ञान तो जग को बुद्ध मिल जाये
भुला बैठा जिसे भारत मैं वो समाज लिखता हू
कलम को खून से भरकर ग़ज़ल अंगार लिखता हूँ

न जाने किस समाधी में है स्वाभिमान हम सबका
न कोई चार तमंचे ले हमें ललकार नहीं सकता
जो सरहद पार है बैठा यहाँ विस्फोट करता है
कोई सैनिक के धड़ से शीश ले अपने घर में रखता है
अहिंसक हैं तो क्या आघात होकर मौन खायेंगे
यही हद है ये सरहद है उन्हें अब हम बताएँगे
उठो ऐ सिंह के पूतों तुम्हें अब जागना होगा
हर इक जननी के घावों का हिसाब अब मांगना होगा
छिपा बैठा कहीं दिनकर है गहरी इन घटाओं में
दबी तूफ़ान की आहट है ठहरी इन हवाओं में
जो बोया था भगत ने बीज उसका फल भी आयेगा
निकल घनघोर तम से इक सुनहरा कल भी आयेगा
शुरू अब जंग होने को है मैं आगाज़ लिखता हूँ
कलम को खून से भरकर ग़ज़ल अंगार लिखता हूँ

छिपा सबके दिलों में जो वतन का प्यार लिखता हूँ
कलम को खून से भरकर ग़ज़ल अंगार लिखता हूँ

Poem ID: 201

Poet’s Name: purnima
Poem Title: मेरे देश
Location: new delhi
Occupation: Student
Poem Length: 23 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: October 16, 2013
Poem Submission Date: October 19, 2013 at 5:52 pm

Poem:

तेरी मिट्टी ने मुझको बनाया
तेरे आँचल ने मुझको छिपाया
तू ही जीवन , तू ही परछाई
मेरे देश इतनी ममता
मैंने तुझसे पाई

मेरी साँसों में तेरी धडकन
मेरे सीने में समाया
एक तेरा ही दिल
आसमान से जमीं तक
तू ही मेरा हमराही
बोली से दिशा तक
तिरंगे की यहाँ परछाई
मेरे देश इतनी ममता
मैंने तुझसे पाई

मैंने हर शब्द में तुझको
बसाया
अपने हर गीत में
तुझको ही पाया
जमीं से फलक तक
साज से सुरों तक
कण -कण में फसल
तेरी लहराई
मेरे देश इतनी ममता
मैंने तुझसे पाई

Poem ID: 202

Poet’s Name: Yatindra Jeet Mudgal
Poem Title: “कैसा होगा भाग्य देश का”
Location: MATHURA,UTTAR PRADESH
Occupation: Student
Poem Length: 36 LINES lines
Genre: Other
Poem Creation Date: July 2, 2012
Poem Submission Date: October 22, 2013 at 4:47 pm

Poem:

“कैसा होगा भाग्य देश का”

कैसा होगा भाग्य देश का,
शोणित कण जहाँ बरसते हों I
निर्दोषों को दण्ड मिल रहा ,
कातिल स्वच्छन्द विचरते हों II
काग़ा जहाँ हंस बन बैठा,
कोयल की कूक तरसती हो I
स्वाँति पपीहा तकता रहता ,
घटा गरल बरसाती हो II
पीठ से हाय! लहू बरसता,
सीने के घाव कसकते हो I
कैसा होगा भाग्य देश का,
शोणित कण जहाँ बरसते हों II1II
सेवक सेवा से मुक्त जहाँ ,
औ सेवारत चटुकारी हों I
नाच नाचते चाकर फिरते ,
नटराज बने अधिकारी हों II
कितनी सेवा चाकर कर ले ,
पर बढ़ निर्देश बिखरते हों I
कैसा होगा भाग्य देश का,
शोणित कण जहाँ बरसते हों II2II

फुटपाथों पर सोता मानव ,
बिस्तर स्वानों को मिलते हों I
मजदूरों के लहू से जहाँ,
कोठी के दीपक बलते हों II
गाँधी, शेखर और इंदिरा के,
दिल के अरमान सिसकते हों II
कैसा होगा भाग्य देश का,
शोणित कण जहाँ बरसते हों II3II
“ जीत ” बना अब खड्ग कलम को,
रण बिगुल बजा तू वाणी का I
“ मसि ” का तिलक लगा मस्तक पर,
चिंतन कर माँ कल्याणी का II
रचना कर तू उन गीतों की ,
जिनसे फिर भाग्य बदलते हों I
रे! स्वर्ग बनेगा फिर भारत ,
अमृत कण जहाँ बरसते हों II4II

Poem ID: 203

Poet’s Name: Rishi Jaiswal
Poem Title: ऐ मेरी लेखनी
Location: Mirzapur
Occupation: Student
Poem Length: 30 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date:
Poem Submission Date: October 24, 2013 at 11:29 am

Poem:

ऐ मेरी लेखनी
आज फिर तू गान कर
उनका तू सम्मान कर
अपनी खुशियाँ छोड़ कर
सारे मोह तोड़कर
चल पड़े थे जो कभी
वंदना में माँ के जो
आज उनका गान कर

जिनकी रक्त धार भी
बन गयी तलवार सी
काट डाली बेड़ियाँ
पड़ी जो माँ के के हाथ थी
आज उनका गान कर

स्वयं का कोई भान ना
अपना कोई सम्मान ना
दिल में केवल एक ही
बस राष्ट्र का ही भान था
उनका तू सम्मान कर
आज फिर तू गान कर

निद्रा ये टूटेगी कब
सो गए है आज सब
गिद्ध नयन शत्रु के
दिखने लगे है आज फिर
ऐ मेरी लेखनी
उनका तू आह्वान कर
आज फिर तू गान कर
उनका तू सम्मान कर

Poem ID: 204

Poet’s Name: Parmeshwar Funkwal
Poem Title: सपने धूप के
Location: Ahmedabad, Gujarat
Occupation: Government
Poem Length: 29 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: August 15, 2012
Poem Submission Date: October 24, 2013 at 1:34 pm

Poem:

सपने धूप के

दुश्वर सपने
फिर से देखें
नयी नवेली धूप के

सोने की चिड़िया
की क्यों कर
मंद हुई परवाजें
राह देखते रहे अनेकों
खुले हुए दरवाजे

जमी वसा को
अब पिघलाएं
चर्चे हों फिर रूप के

काले अक्षर
भैंस बराबर
चिड़िया चुगती जाती खेत
भ्रम बिल्ली से
राहें काटें
शुतुरमुर्ग सिर डाले रेत

आसमान से
बात करें हम
क्यों हों मेंढक कूप के

युगों से बहती
इस धारा को
कई कछारों ने बांटा
लेकिन रह रह
हर रेले को
सिन्धु ने अक्सर पाटा

एक है अपनी
पुण्यभूमि
दाने हम एक सूप के.

-परमेश्वर फुंकवाल

Poem ID: 205

Poet’s Name: nonigopal
Poem Title: “उनकी कुर्बानी”
Location: WEST BENGAL,NADIA
Occupation: Business
Poem Length: 32 lines
Genre: Karuna (pathos)
Poem Creation Date: October 17, 2012
Poem Submission Date: October 27, 2013 at 4:52 am

Poem:

(2 ) ” उनकी कुर्बानी”

ये मेरे आजाद देश के लोगों–
ज़रा आखों में लाओं नमी,
आज आजाद हुए हम
हजारों जवान दिए थे उसदिन कुर्बानी !

यह मत भूलों–ये मेरे वतन के लोगों–
कुर्बान हुए थे उसदिन जवान हजारों ;
उनकी माँ-बहन और पिता-पुत्र के लिए
थोड़ी सी आज लाओं आखों में नमी–
मत भूलों मेरे आजाद देशवासी –उनकी कुर्बानी !

घोर अंधेरी तूफानी रातों में
माथे पर बंधें भारत माँ का आँचल की डोरी–
लिए कंधें पर बन्दुक और गोला-वारूद सारी
जुज रहे थे दुश्मनों के गोली के बोछारों के आगे,
उन्हें मत भूलों ये मेरे वतन के लोगों–
ज़रा आज एकबार आखों में लाओं थोरी सी नमी !

लड़ते लड़ते वे गिर पड़े–
गिर पड़े गोली खाकर छाती पे,
जान अभी बाकी था–
पुकार सुनकर वतन के
दुसरे ही पल वे उठ खड़े हुए
बन्दुक उठा लिए भारत माँ के आवाज पर–
भुन कर रख दिए दुश्मनों को–फिर
सलाम देकर वतन को–मिट गए
इस भारत माँ के ही मिट्टी पर !

यह वतन था हम्हारा–रह गया हम्हारा —
पर वतन के जवानें –सरहद के जवानें
माँ के लिए मर-मिट गए–लौटकर नहीं आ पाए,
हो गया आजाद हिन्दुस्ता हम्हारा !
ज़रा आखों में लाओं नमी–
मत भूलों वतन के लोगों
हजारों हिन्दुस्तानी की कुर्बानी !
ये मेरे आजाद देश के लोगों…..लाओं नमी !!

Poem ID: 206

Poet’s Name: Neelam Saxena Chandra
Poem Title: एक आव्हान नौजवानों से
Location: Lucknow, Uttar Pradesh
Occupation: Government
Poem Length: २६ लाइन lines
Genre: Karuna (pathos)
Poem Creation Date: November 3, 2013
Poem Submission Date: November 3, 2013 at 4:53 am

Poem:

अँधेरा कुछ गहरा है,
दिया जलाए रखना…

बिलख रही भारत माँ
चीख रही भारत माँ
उम्मीद की बाती बुझ चुकी
तुम ही धैर्य रखना…

अँधेरा कुछ गहरा है,
दिया जलाए रखना…

आज़ादी भी मिली
आस की कली भी खिली
बदल चुकी अब खुशबू बदबू में
तुमको ही है इसे समेटना

अँधेरा कुछ गहरा है,
दिया जलाए रखना…

आज भ्रष्टाचार का सर ऊंचा है
शोषण के कीड़े ने किसकिसको भींचा है
लुट रही इज्ज़त पलपल बहु बेटियों की
तुम ही इसे बदलना

अँधेरा कुछ गहरा है,
दिया जलाए रखना…

तुम्हारे कांधों पर ही अब देश की आस है
तुम्हारे क़दमों पर ही अब सबको विश्वास है
कुछ कर दिखाओ अब तो
सिखा दो सबको संभलना

अँधेरा कुछ गहरा है,
दिया जलाए रखना…

Poem ID: 207

Poet’s Name: Neeraj Dwivedi
Poem Title: सैनिक
Location: Kannauj, Uttar Pradesh
Occupation: Software
Poem Length: 37 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: November 6, 2013
Poem Submission Date: November 9, 2013 at 6:18 pm

Poem:

सैनिक

वो सैनिक है आसमान सी छाती लेकर फिरता है,
धरती के हक़ में सुभाष की थाती लेकर फिरता है।

हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर, जिद्दी स्वांसों की हलचल है,
जमा हुआ है रक्त, धौंकनी चलती है, कैसा ये बल है,
अग्निपरीक्षा पल पल देता, सीने में भरकर हुँकार,
खौल उठता है शोणित सुनकर, धरती की एक करुण पुकार,
आसमान भी जिसके आगे, नतमस्तक सा रहता है,
उस एक हिमालय की चोटी से, ऊँचा मस्तक रहता है,
पुत्र नहीं वो भ्रात नहीं वो, पति तो छोडो तात नहीं वो,
अपनी दुनिया छोड़ स्वयं को, पहले सैनिक कहता है,
वो सैनिक है आसमान सी छाती लेकर फिरता है,
धरती के हक़ में सुभाष की थाती लेकर फिरता है।

वो धागा कितना दृढ़ होगा, जिसको कभी न मिली कलाई,
कैसी होगी बहन वो जिसने, सौंप दिया इकलौता भाई,
वो माँ भी कैसी माँ होगी, जो माँ का दर्द समझती है,
घर में बूढी माँ भूखी रहकर भी, बड़ी धनी रहती है,
अपने भूखे जिन्दा अरमानों को, बड़े प्यार से छोड़ किनारे,
बैरागी सन्यासी बनकर, उसी गाँव की साँझ सकारे,
मन में मात्र देश की चिंता, कफ़न बांधकर चलता है,
बंदूकों के साये में जीता है, किञ्चित स्वाँसे बुनता है,
वो सैनिक है आसमान सी छाती लेकर फिरता है,
धरती के हक़ में सुभाष की थाती लेकर फिरता है।

रातों के अधियारों में भी, उसकी नींद जगी रहती है,
अंधड़ रेत सहारों में भी, उसकी आँख खुली रहती है,
स्वप्नों के गलियारों में, उसकी बन्दूक तनी रहती है,
दर्रों मैदान पहाड़ों में, कर्तव्यज्योति जगी रहती है,
नमकीन न हो जाये मिट्टी, वो आँखें सूखी रखता है,
पढ़ने का वक्त नहीं मिलता, एक पाती लेकर फिरता है,
तपते रेगिस्तानों में जब, भू पर आग लगी रहती है,
फिर भी चलता है रक्षा का, दायित्व सँभाले फिरता है,
वो सैनिक है आसमान सी छाती लेकर फिरता है,
धरती के हक़ में सुभाष की थाती लेकर फिरता है।

Poem ID: 208

Poet’s Name: Ankesh Jain
Poem Title: हिंद की इमारत
Location: AGRA, UTTAR PRADESH
Occupation: Student
Poem Length: 35 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: November 10, 2013
Poem Submission Date: November 9, 2013 at 7:50 pm

Poem:

यह इमारत खड़ी हिन्द की
उनके गर्म लहू पर
सौप गए जो जीवन निज का
इस पावन वेदी पर
या जिसने इसको है सीचा
अपने श्रम से बल से
चमक रही है इसकी आभा
उनकी मेहनत के फल से

सौभाग्य हिन्द की इस छाया में
हमने जीवन पाया
मिला बहुत कुछ
और बहुत कुछ करने का मौका आया
पहले अभी स्वयं से
हमको और है आगे बढ़ना
जीत चुके है कुछ सीमा तक
पूर्ण विजित है बनना

अभी हिन्द में पलते है दो
भिन्न भिन्न से चेहरे
एक बढ़ रहा तीव्र विकास से
दूजा लिए घाव है गहरे
प्रश्न बड़ा है अभी समय का
नहीं हमें है रुकना
सोचो लेकिन कैसे सबको
लेकर साथ है चलना

नहीं हमारे पंख है छोटे
और न सपना छोटा
छोटे छोटे इन पैरो को
होगा आगे बढ़ना
मुस्काने अपनी ही होंगी
अपना होगा जीवन
लहरायेगी हिन्द पताका
हर्षित होगा हर एक मन

कृते अंकेश

Poem ID: 209

Poet’s Name: GOVIND BALLABH
Poem Title: भारतीयता
Location: NEW DELHI
Occupation: Student
Poem Length: 39 lines
Genre: Shant (peaceful)
Poem Creation Date: January 26, 2012
Poem Submission Date: November 10, 2013 at 7:05 am

Poem:

कल तक भी था, है आज भी,
आगे भी ये रहेगा |
था शीर्ष पर, है शीर्ष पर,
और शीर्ष पर रहेगा |

संघर्ष है इसके लिए,
इसपर समर्पित प्राण है |
भाल है अवनत सदा,
और चरणों में सम्मान है |

ऊंचे हिमालय के शिखर सा ,
है इसकी गौरव की कथा |
ना कर्म हो ऐसा कोई,
माँ के ह्रदय को हो व्यथा |

रहती ह्रदय में शांति,
और वीरता पहचान है |
धर्म है अपनी दया,
और होठों पर मुस्कान है |

ये छंद है उम्मीद के,
जो आदर में हैं शहीद के |
है अपनी भारत एक धागा,
हम सब हैं मोती सीप के |

मन में उमंगें और दिल में,
प्रेम का उफान है |
हमने देना भी है सीखा,
शत्रु को जीवनदान है |

करता नित्य प्रणाम है,
उषाकाल में ये दिनकर |
इतना शुद्ध है इसका कण-कण,
जितना पवित्र है पुष्कर |

जननी है भारत हमारी,
हमें इसका गुमान है |
हिंदी हैं हम, हिन्दू हैं हम,
हमसे हिन्दुस्तान है |

Poem ID: 210

Poet’s Name: Abhishek Khare
Poem Title: प्यास है घनघोर अब
Location: Stans
Occupation: Software
Poem Length: 12 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: October 26, 2013
Poem Submission Date: November 10, 2013 at 6:18 pm

Poem:

प्यास है घनघोर अब हिम को पिघलना चाहिए ।
हिंद है कुरुक्षेत्र अब अर्जुन को निकलना चाहिए ॥

हो गए है बिष भरे गद्दार बहुतों देश में ।
भीम को इन दुश्मनों के फ़न को कुचलना चाहिए ॥

हो रही है शर्मसार माँ भारती की अस्मिता ।
फिर किसी शेखर के बाजु को फडकना चाहिए ॥

हो रहा है छलकपट अब वतन के रणबांकुरों से ।
खौलके आँखों से तेरे खूं को छलकना चाहिए ॥

हो रही है जो कलंकित माँ तेरी तेजवस्विता
तूं शक्ति है अब फिर तुझे दुर्गा में बदलना चाहिए

सो रहा है एक युग से मंदिरों में बैठ कर ।
देव तुझ को फिर से मूरत से निकलना चाहिए ।।

प्यास है घनघोर अब हिम को पिघलना चाहिए ।
हिंद है कुरुक्षेत्र अब अर्जुन को निकलना चाहिए ॥

-अभिषेक

Poem ID: 211

Poet’s Name: jalaj kumar anupam
Poem Title: मै और मेरी कहानी
Location: new delhi,delhi
Occupation: Professional Service
Poem Length: 41 lines
Genre: Adbhut (wondrous)
Poem Creation Date:
Poem Submission Date: November 12, 2013 at 11:08 am

Poem:

मै क्या हुं अब तक समझ न आया
कुछ अहंकार है कुछ प्रतिकार है
मेरे भी कुछ अलग से बिचार है
मै अब तक क्या खोया क्या पाया
जिन्दगी के किस धुन को गाया

बचपन गुजरा कुछ पाने मे
माहौल को अपने ढंग से जानने मे
दुनीया को देखकर कुछ सिखने मे
शब्दो के उलट फेर को लिखने मे

जिन्दगी मे ’कल’ का अर्थ बहुत गहरा होता हैमन
जो बित गया भूल जाते है सभी
आने वाला एक नयी तरंगे लिए सुनहरा होता है
ये कल ही हमे उमीद बढाता है
मंजील की तरफ़ बढते हुये सबसे लडाता है

आज हम किशोरावस्था पार कर चुके है
आधी बातो को लगभग जान चुके है
अच्छे बुरे कर्मो को पहचान चुके है
मै क्यू आया और कब जाऊंगा
या फिर जीवन को दुहराउंगा

कुछ बाते लिपटी पडी है
कुछ अरमाने सिमटी पडी है
जीवन क्या कह्ती है ये मै जान न सका
खुद को अभी तक पह्चान ना सका

क्या हो सकता है मकसद भला
मेरा यहां पर आने का
बचपन से लेकर अभी तक न जाने कितने
प्रकार के ॠणो को पाने का
कैसे ये उतरेगें इसका नही है ज्ञान
इस मौलीक्ता से अभी तक हु अन्जान

परोपकार हित जीवन बिताना
ह्रर एक पे विश्वास जताना
चरित्र को हरदम बचाना
कष्टो को किसी से मत दिखाना
कुछ बाते आज भी मन को झकझोरती है
कुछ नया करने से मेरे कदम को रोकती है
शायद एक दिन मै ’मै ’ को जान जाऊ
जीन्दगी के असली मकसद को पहचान जाऊ
इसी उमीद मे अग्रसर है हमारे कदम
कभी मंजील को जरुर चुमेंगे हम

Poem ID: 212

Poet’s Name: parul sharma
Poem Title: maan
Location: gghazibad/firozabad(UP)
Occupation: House wife
Poem Length: 17 lines
Genre: Other
Poem Creation Date:
Poem Submission Date: November 12, 2013 at 12:16 pm

Poem:

JJaha maan nhi thahre kyo
jaha prem nhi jhuke kyo
Jaha nhi do bate sat ki
Vyrth ke vivad kre kyo
chatanko der kar skte ham
Dariya par kar skte ham
Nabh ki uchai kya he sagar ki gahrai kya he.
dilo ki uchai gahrai chhu skte ham.
Aakhir fir ruke kyo
Aakhir fir jhuke kyo.
Nirasha ke andha kar me simat kar chhepe kyo.
Jaha dharm(manav) nhi tute kyo.
Jaha karm nhi mite kyo.jha nhi do bate nyay ki
Mooon ham rhe kyo..>3

Is kavita ki actual compilation date mene kahi nhi limhi he.or mujhe yaad bhi nhi he.Sorry

Poem ID: 213

Poet’s Name: Dinesh Gupta
Poem Title: क्यूँ लिखता है श्रृंगार का ये कवि शब्दों से अंगार
Location: Pune, Maharastra
Occupation: Software
Poem Length: 18 lines lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: November 13, 2013
Poem Submission Date: November 13, 2013 at 9:52 am

Poem:

क्यूँ लिखता है श्रृंगार का ये कवि शब्दों से अंगार

जब शीश कटता है सीमा पर मेरे देश के जवान का…
लहू उबलता है जब पूरे हिंदुस्तान का………………
मेरी भी रगों का तब खून खोलता है……………….
कतरा-कतरा मेरे जिस्म का तब शब्द बनकर बोलता है

जब अमन का ख्वाब आँखों में, आँसुओं में गल जाता है
जब कोई हाथ मिलाकर फिर हमको छल जाता है…….
जिस्म मेरा तब ऊपर से नीचे तल जल जाता है……….
मेरे अंतर का सारा आक्रोश तब शब्दों में ढल जाता है…

जब राजनीति होती है कटे हुए सर पर, बहते हुए लहू पर
और हाथ पकड़ कर जब कोई सर पर चड़ जाता है……..
अगले ही पल जब कोई जवान फिर दुश्मन से अड़ जाता है
श्रृंगार का ये कवि तब शब्दों से अंगार गड़ जाता है………

जब दुश्मन का ओछापन नसों में जहर घोलता है
जब सब्र की नब्ज़ को कोई हद तक टटोलता है
जब सियासत बेशर्म और निकम्मी हो जाती है…
और पड़ोसी सर पर चड़कर बोलता है……….

ठंडी पड़ी शिराओं का तब मेरी खून खोलता है…
कतरा-कतरा मेरे लहू का शब्द बनकर बोलता है !

Poem ID: 214

Poet’s Name: Basant Singh
Poem Title: एक नयी भारत गाथा
Location: Pune, Maharashtra
Occupation: Professional Service
Poem Length: 79 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: November 13, 2013
Poem Submission Date: November 13, 2013 at 11:56 pm

Poem:

एक नयी भारत गाथा
रात्रि स्वप्न में शंख बज उठे, आरती सजाये गगन खड़ा
एक मूर्ति दिखी अति परिचित सी , जिसके आगे जग नत हो पड़ा

मैं पूछ उठा फिर सृष्टि से , ये किसका वंदन होता है
सृष्टि बोली हे मानव सुन, भारत का अर्चन होता है

वार्ता चली फिर भारत की, सृष्टि गर्वित बोलने लगी
वेदों कि धरती देव भूमि के , गुणगान में रस घोलने लगी

ये धरती वही जहाँ पुरुषोत्तम ने, मर्यादा का पाठ पढ़ाया था
यहीं वो वृंदावन की बगिया, जहाँ कृष्ण ने रास रचाया था

अगणित संस्कृतियां यहीं, एक दूसरे में आश्रय पातीं थीं
पुण्य सलिला सरिताएं, इस धरती को नहलाती थीं

ऐसे वीरों कि जननी ये, जिनकी गाथाएं जग गाता है
जिनके अमरत्व की धारा से, एक वीर वीरता पाता है

इसकी बालाएं शक्ति स्वरूपा, सिंहनी सी गर्जन करती थीं
वो दुर्गा काली बन रण में, शत्रु का मर्दन करती थीं

सहसा खगकुल के कोमल स्वर से, रात्रि का सपना टूटा
उठ सोच रहा खुद से पूछा, अब किसने भारत को लूटा

यहाँ हवा में करुणा घुल गयी , हैं विषाद की काली रातें
नदियों की चंचलता मलिन, हर ओर हैं हिंसा की बातें

एक पथ पर महल विलासित हैं, दूजे पथ पर क्षुधा चीख रही
भारत पुत्रियों की अस्मत लुटती, मानवता दुर्गुण सीख रही

यहाँ ग्राम देवता सिसक रहा, जो अन्न देव का सानी है
कटते जंगल का रुदन यहाँ, दूषित हुई प्रकृति रानी है

शत्रु अड़े हर पल सीमा पर, एक दुश्मन अंदर भी पलता
हे भारत के पुत्रों तुमने, अभी पायी न सच्ची स्वतंत्रता

जब हर हाथों में काम रहेगा, हर प्राणी सुख की किलकारी करता
जब बेटियां निडर विचरण करतीं, तभी होगी सच्ची स्वतंत्रता

इस हेतु हे भारतवासी सुन ले, मैं युध्धनाद अब करता हूँ
तेरी मृतवत आत्मा में फिर से, नवजीवन अब भरता हूँ

दुविधा की शैया अब छोडो, भारत संतानों जाग पड़ो
एक नयी क्रांति की लहर चली, अब अपने अंदर आग भरो

वसुधैव कुटुम्बकम का नारा, अस्तित्व क्यूँ अपना खोता है
धिक्कार तुझे है हर उस पल, जब कोई भूखा सोता है

कहीं दूर क्षितिज तक चलता आया, अब गंतव्य ज्ञान तो कर
दूर चला अति दूर चला, भारतवासी खुद की पहचान तो कर

स्वतंत्रता के अमर शहीदों की, गाथाओं में नव स्वर भर दे
सब धर्मं एकता की वाणी, अब फिर से मुखरित कर दे

अरिदल अट्टहास करता, तुम तलवारें चमका लो प्यारों
भ्रष्ट खेल अब बहुत हो चुका, विजित करो दिशा चारों

भारत की संस्कृति अमर रहे, इस लौ को भड़काते जाओ
ब्रम्हाण्ड भी चकित रह जाये, वो दामिनी कड़काते जाओ

छिन्न भिन्न कर बाधाओं को, जो खड़ी प्रगति की राहों में
धनी-निर्धन का हाथ पकड़ चल, सबल ले निर्बल को बाँहों में

ये युग क्रांति का अवसर है, क़दमों में मारुत की गति ला
जो चले काल तक रहे अटल, उस विजय भावना की मति ला

गहन अंध के वियावान में, रौशनी करो अब शुभता की
जगद्गुरु सदा जगद्गुरु हो, जय होती रहे सदा उस प्रभुता की

ये देश रहे आदर्श विश्व का, सत संस्कृति का उद्घोष करे
असत कभी विजयी न हो, सब में सत शुभ का जोश भरे

राष्ट्र का कर्ज बहुत तुझपे, अब समय ये कर्ज चुकाने का,
कुछ फर्ज हैं मानवता के नाते, अब समय वो फर्ज निभाने का

भारत जग सिरमौर रहा, वो कांति मलिन न हो पाये
हर प्राणी में समभाव रहे , विषमता का मिलन न हो पाये

अब जग फिर से उद्घोष करे, जय जय भारत, भारती कथा
भारत की संतानों लिख दो, अब एक नयी भारत गाथा

भारत की संतानों लिख दो, अब एक नयी भारत गाथा

-बसन्त सिंह

Poem ID: 215

Poet’s Name: mahabhut chandan rai
Poem Title: असुविधाएं
Location: faridabad ,Haryana
Occupation: Writer
Poem Length: 168 lines 13 paragraph lines
Genre: Vibhatsa (odious)
Poem Creation Date: November 14, 2013
Poem Submission Date: November 14, 2013 at 5:06 am

Poem:

असुविधाएं

हमारे हिस्से आयी कितनी ही खतरनाक अनाम असुविधाएं हैं
जो घुन की तरह धीरे-धीरे खोखला कर रही हैं हमे
हम बाथरूम के कोने में लोटे से मारी छींटों में
बहा देते हैं जिनका होना
एक खतरनाक रोग की महामारी कि तरह
दाखिल हैं असुविधाएं हमारे समाज के भीतर
पर हम सुकून भरी चादरे तान कर सो जाते हैं
हमारी समाजिक उत्तरदायित्वता बेशर्मियों से भरी
गुप्तवास में दुबक गयीं हैं
और हमारी संवेदनशीलता ने निष्ठुरताओं की
आत्म-मृत्यु का अंगीकार कर लिया है !

कमजर्फियां हमारी अभिशप्त पाकीजगी का भूषाचार हो चुकी हैं
हम अपनी मुर्दा पक्षधरता के साथ पक्षहीन जिन्दा है
भयातुर अनिर्णयों लाभ हानि नफा नुक्सान के घटा जोड़
के बीच हम करते आये है अपने गूंगे होने का अभिनय
हम अपने शर्मिंदा होने के जिन चुल्लू भर कुंडों में
डूब कर मर सकते थे
वहीँ हमारी अंतरात्माएं जाहिलों की तरह बेतकलीफ
मनुष्यता की घिनौनी बदहाली में पूरी सहजता के साथ जिन्दा थी
पर-पीडायें हमारी वियोग रिक्त छातियों को अब सालती नहीं है
मसलन ये की हत्या कमतर हत्या लगती है
खून कमतर खून लगता हैं
आंसू कमतर आंसू

हमारे सामने हाशिये पर रखी मानुष-खोर चुनौतियां थी
तीसरे दर्जें की विक्षिप्तताएँ खुलेआम दिन दहाड़े
शहर के बीचो बीच कर रही थी नरसंहार
मगर हम हर हत्याकांड पर शांति के बहरूपिये शहंशाह बने
अपनी कृत्रिम सहानभूतियों के गुलाब चढ़ा कर खुश थे
इस जंगल होते शहर में जंगली हो चुकी
हमारी दुश्चिंताओं को बुद्ध हो जाने का लकवा मार चुका था
निष्क्रिय विषादों और उभय लिंगी प्रतिरोधों के साथ
हम कायरों की तरह साफ़ करते रहे थे उन्ही हत्यारों की जूतियाँ
हम इस महाविनाश के खिलाफ खड़े शिव हो सकते थे
मगर हमने अपने तेवरों का खुद ही बधिया करण कर लिया था
हम विद्रोह के विक्षोभ में डूबे सिकंदर हो सकते थे मगर अफ़सोस नहीं थे

याद आता है वो सच्चा ईमानदार आम आदमी
सरेआम जिसकी पीठ में दागी गयी थी गोलियाँ
वो जिसका माथा सच्चाई की आदत में सनक गया था
जिसने कर दिया था इनकार
भेड़ियों की सल्तनत की जी हुजूरी करने से
आख़िरकार झूठे दरिंदों ने उसे शहर की अमन-शांति के खिलाफ
एक खतरनाक पागल साबित कर दिया था
उस पर बागी होने का आरोप था
जो निरंकुश तानाशाहों के तलवे चाटना नहीं जानता था
और वो ले गए उसे काले ताबूत में बंद कर के
जिसकी भाषा दिलों में बगावत की चिंगारियां भड़काती थी
हमने खूब समझाया था उसे
की ईमानदारी एक फ़िल्मी चीज है
तुम क्यों भगत सिंह बने परिवर्तन का झंडा लिए फिरते हो
दी थी उसे उसके मासूम बच्चों की भी दुहाईयाँ
मुझे याद है अब भी उसका
सुर्ख केसरिया तिरंगाई रंग में भीजा रक्त से लथ-पथ चेहरा
मुस्करा कर जिसने कहा था
यार ! असुविधा के लिए अ-खेद है

अ-व्यवस्था जस की तस जन रही हैं असुविधाएं
हम सबसे बड़े लोकतंत्र के उस हिटलर युग में हैं
जहाँ हर लाश हर बलात्कार की विभत्सता
नो बाई नो के शूटिंग स्टूडियों की रंगारंग कार्यक्रम में खुबसूरत बना दी जाती है
हादसों या दुर्घटनाओं से उर्वरित अनाम असुविधाएं
अपने सन्दर्भ सूचनाओं की इतनी अर्थवत्ता रखती थी की
की हम गर्दभियत से भरी परिचर्चा के पोस्टमार्टम में अपने हाथों में
अपनी बौद्धिक बकलौलियत की छुरा आरी गंडासा लिए
करते थे उन दुर्दांत असुविधाओं की बोटियाँ
और इस तरह प्रायोजित दुःख समारोह और पैड वैचारिक विमर्शों के प्रतिभागी
हम अपने भीतर छुपे “माँस के व्यापारी” पर चढ़ा लेते थे
अपने समाज-सेवक होने का मुलम्मा
हमारा विज्ञयापनिक समाजिक सराकोर महज एक नाटकीय चिन्तन था
प्रधानगिरी पार्षद या विधायकी का चुनाव जीत सक लेने का शगूफा
इस तरह हर बार इस्त्री किये कोर्ट के बटन में ख़रीदा गुलाब लगाकर
हम खुद को सिद्ध कर लेते थे एक अघोषित लोकनायक !

हम इतना मीठा बोलने लगते थे की मीठे को आने लगती थी शर्म
जबकि शहर इतना जल चुका था की हम की बो लेते एक नीम अपनी छाती में
या की जला सकते थे अपने बदन के ठन्डे पड़ चुके गोयठे
क्रूरता से भरे इन काले सूर्यास्तों में हमारा कोयला हो जाना
आखिर कुछ तो उजाला करता इन भयानक अमानुष अमावसों में
अब नहीं खौलता हमारा खून देखकर कोई भी जलियाँवाला बाग़
चिर परिचित हमारा विलाप हमारी ट्रेडमार्क बुतपरस्ती है
हम चंद हस्ताक्षर अभियानों और मोमबत्तिया मार्च करते हुए
छूट जाते हैं दुःख के हर भयानक प्रतिघात से
हम मनुष्यता के खून की बनी नदियों में
अपनी अवसरवादी डुबकियाँ लगाते रहे
और हमारे खून सने हाथ हाथ धोते रहे हर जिम्मेदारी से

हम पिछलग्गुओं की तरह दुबक जाते है हर गीदड़ चाल में
जबकि जरुरत थी भीड़ से अलग हमारे पुरजोर चीखने की
क्योंकि चीखना भी एक विद्रोह है
मगर हम कीड़ों तरह रेंकते रहे
अपनी परिभाषित की समाजिक सुविधाओं की नालियों में
जबकि हमारा आदमी होना देश की पहली जरूरतों में था !
और आदमी होना इतना ही था की
हम सच को सच कह पाते
और झूठ को झूठ
अपनी एक आजाद विचारधारा के साथ अमूल्य बने रहना
आदर्शों की बिकवाली से बने तम्बुओं और झंडे से अलग खड़े दिखना !

हम अपने हाथों में व्यक्ति-पूजन की चिमटा सारंगी लिए
निकल पड़ते हैं पार्टी-पूजक रैलियों और जुलूसों के राजनैतिक रंगशालाओं में
हम राजनैतिक झंडों और बैनर लिए भजते हैं अपने ईष्ट-देवों की व्यक्तिवादिता
दासता की आदि हो चुकी हमारी बे-जमीर चेतनाओं को
हो चुका है आनहर श्रद्धेय का कुष्ठ-रोग
हममें शेष नहीं है हमारा अपना कुछ भी न विचारधारा न प्रतिरोध
यहाँ तक कि हमारी आवाज का भी हमने कर लिया पार्टी-करण
हम थाली के बैंगनों की तरह बँटे रहे अलग-अलग खेमों में
हम अपनी छातियों में उनके नाम की क्रेता गुदवाए
और माथे पे चाक किये उन के प्रति हमारी कठमुल्ला प्रतिबद्धता
पालतू कुत्तों कि तरह भौंकते रहे
उनकी सामंती महानता की अनुनायिक भाषा
हमने तोतों की तरह उनके पास गिरवी रख दी अपनी जबान भी !

हम चाश्नियों में भिगोते हैं कुछ शब्द
और डिब्बाबंद प्रोडक्ट की तरह चमकीले रैपरों में
बैकते है हमारी राष्ट्रीयता
हम बरसाती मेढकों की तरह चीखते है इन्कलाब
और बुजदिली के आरामगाह कुओं में लौट जाते हैं
हम मशीनों की तरह दुःख व्यक्त करते हैं
और साँपों की तरह प्रकट करते हैं अपनी सुविधाई निंदा
दांत चियार देना हर सवाल पर निकम्मे नेवलों की तरह
गोया बेशर्मी नहीं हुई हमारे होंठों की लाली हो गयी

हमारी अंधी आस्थाओं ने ही चोर-उचक्कों की जमात
को अवसर दिया किया की वो हमारे माथे पर
मूते अपनी मुनाफे की नीतियां
हमारे कन्धों पर बैठे हमे गुलामों कि तरह हांके
जबकि कोई भी परम-उपदेश अंतिम नहीं
अकाट्य नहीं उनका कोई भी स्व-घोषित त्रिकाल सच
हमारी अंतर्दृष्टियां तौल सकती थी उनकी महात्मयता
मगर स्वगत गर्त में डूबती हमारी महत्वकांक्षाओं ने
हमारी कर्त्तव्यपरायणता का समूल नाश कर दिया !
स्वार्थ भय और लोभ कि गदहापचीसी के विदूषक हम
अपनी अस्तित्व-ह्त्या के आत्म-हत्यारे है
हमारे होने की दुखद त्रासदी
एक हास्यपद सच कि हम जिन्दा हैं

बहरहाल दूरदर्शन पर प्रसारित होते दृश्यों कि क्षणांतर अदला बदली में
जैसे हमारी आवेगित उत्तेजनाएं विचार-बोध से छूट जाती हैं
ठीक इसी तरह कि विषाद-हीनता कि अभ्यासरत हो चुकी हैं हमारी जीवन शैलियाँ
ह्रदय विदारक सूचनाओं और धारवाहिकों के सनसनीखेजनामें के व्यवसायिक दृश्यांतरों में
हमारी भावुकता में भी घुस चुकी है निष्ठुरताओं की व्यवसायिकता
हमारे अंतरात्मा में असभ्यता और सभ्यता कुछ यूँ घुलमिल गयी हैं कि
यूँ घुल मिल मिल घुल मिल मिल घुल घुल मिल
माफ़ कीजिय ये एक किस्म कि असुविधा थी आपको जांचने के लिए
असुविधा के लिए खेद है मगर
देखिये आप भी उब कर झल्ला उठे न
चल दिए थे न अपना पल्ला झाड़ के
ख़ैर कविता आगे भी आपके मनोरंजन के लिए……

मसलन असुविधाएं आपकी मक्कारियों का हाट बाजार हो सकती है !
चाट बाजार भी
आप अपनी छद्म दुश्चिंताओं की सार्वजानिक प्रदर्शनियों से
कुछ मुर्गे चुर्गे गुर्गे फांस सक सकते हैं
किसी मुफलिस का बहता खून आपकी कविता को पुरस्कार दिला सकता है
दंगे की अधजली निर्वस्त्र लाशें बलत्कृत बच्चियों का मनस्विद दर्शन
आपके लिए औपन्यासिक प्रेरणा सकता है
अर्थात आप तीसरे दर्जे के कहानीकार से सीधे प्रथम पंगत में
बैठ सकने वाले उत्तराधिकारी हो सकते हैं
असुविधाएं इतनी ही हानिकारक और लाभप्रद हैं
कि शोक नहीं शौक हैं
हमारी चित्त वृतियों में इतने ही प्रतिक्रियाशील कि
आप जनवादी लोकधर्मी जननायक एक्टिविस्ट होने के
कुलीन शीर्षकों के नामंकन के ठेके उठा सकते हैं
ठेके से याद आया क्या मैं आपसे पूछ सकता हूँ
इंग्लिश का सबसे सस्ता पव्वा कितने का है
असुविधा के लिए अ-खेद है !

ख़ैर इससे पहले की आप मुझ पर भाषा-विद्रोह के पारम्परिक काव्य-मानों
की पदबंध सीमा तोड़ने का मुकद्म्मा ठोंक दें
कविता में यह दोष लिखने के अपराध
कि छूट के साथ मैं यहीं लिखते हुए पटाक्षेप करता हूँ
या तो आपत्तियां खर्च कीजिये
आवाज भी
हाथों में उतारिये अवहेलनाओं की भंगिमा
नहीं तो कीजिये गाल आगे
और उठाईये तमाचे का लाभ
मैं लिखता रहूँगा यूँ ही
असुविधाजनक असुविधाएं
क्रमश:

Poem ID: 216

Poet’s Name: Apoorva Gaurava
Poem Title: वक्र दृष्टि पर पूर्णविराम
Location: Trivandrum
Occupation: Software
Poem Length: 32 lines
Genre: Other
Poem Creation Date: November 14, 2013
Poem Submission Date: November 14, 2013 at 7:40 pm

Poem:

शाश्वत है जाग में वाद-विवाद
अब आज़ादी के इतनी बाद
किंकर्तव्यविमूढ अक़ड़े ना हों
क्षमता पर प्रश्न खड़े ना हों

क्षमता से प्रभावित कण-कण हो
ऐसा अपना प्रक्षेपण हो
गाण्डीव सुसज्जित पार्थ रहें
शर तरकश मे पर्याप्त रहे

जो निर्णय हो, प्रभावी हो
पौरुष प्रारब्ध पे हावी हो
अब ठान लिया तो ठान लिया
पीछे देखेंगे जो होगा

जीवन में जो भी अर्जित हो
राष्ट्र को सहज समर्पित हो
सर्वस्व समर्पण को तत्पर
तन से, मन से, सब नारी- नर

लयबद्ध रहें सबके विचार
मानवता के ना हों प्रकार
निज स्वार्थ में ऐसा ना हो
द्वितिया, प्रथमा के पहले हो

गीता- क़ुरान सहवास करें
सब मिलजुल कर ये प्रयास करें
स्वार्थ रहित संवाद रहे
राष्ट्रगान भी याद रहे

प्रतिबुद्ध समाज, स्वतः इंगित
काया छाया सब परिष्कृत
अव्यक्त, मधुर संवाद सुनें
निज का ही अनाहत नाद सुनें

परितुष्ट, प्रवर प्रजा, परिवेश
सुरभित, सांभ्रांत, समृद्ध देश
सखा, श्रेष्ठ सबको प्रणाम
वक्र दृष्टि पर पूर्णविराम

Poem ID: 217

Poet’s Name: Shachi Srivastava
Poem Title: सपनो का भारत
Location: Lucknow, Uttar Pradesh
Occupation: Government
Poem Length: 38 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: November 10, 2013
Poem Submission Date: November 14, 2013 at 8:01 pm

Poem:

चलो बनाएं आज से अपना देश “महान”
नही महज एक शब्द हो सच में हो जो महान,
अमन चैन सुख शांति जहां हो सच्चाई भरपूर
ह्मी नही दुनिया में जिसका सभी करें गुणगान |
चलो चढ़ायें सबसे पहले कुछ श्रद्धा के फूल
जो शहीद हो गये देश पर उन्हे ना जाना भूल,
सरहद के वीरो पर भी जो तपन सर्द सहते हैं
घर की जब जब याद आए चुपके चुपके रोते हैं |
चलो चलें कुछ आँसू पोछे उस अनाथ बच्चे के
जिसका बचपन सिसक रहा ममता के आँचल बिन,
कंधे पर जिसके कचरे का थैला नही किताबें
रातें कटती फुटपाथों पर बोझा ढोते सारे दिन |
चलो बढ़ाएं देश को कुछ आगे ले जायें
बेरोज़गारी को प्राणोतन से दूर भगायें,
बेरोज़गारी एक बीमारी सी लगती है
कहां जायें चेहरों में बस लाचारी सी दिखती है,
इन्हे तमन्ना थी रोशन करें नाम जहां में
पर अब बातें सभी कटारी सी लगती हैं |
चलो करें ऐसा काम इंसान के भेश में
भूखे प्यासे लोग ना रह जायें देश में,
महलों में रहने वालों झोपड़ियों में झांक लो
उनका भी हो कोई हाल पूछने वाला,
हमदर्दी की हम मशाल जला दें देश में
अमीरी ग़रीबी का बंधन तोड़ आ जायें होश में |
चलो झांक लें अब अतीत के वातायन में
धू-धू कर जल रही वीर बालायें जौहर में,
ऐसा देश जहां अपनी अस्मत की खातिर
दे देतीं आहुति अपने तन की पल भर में,
उसी देश में रोज़ लुट रहीं “दामिनियाँ”
माँ पापा के आखों का जो तारा थी,
बन जातीं असहाय निरीह बेबस अबला
इंसान के चोले में छुपे जानवरों के चंगुल में |
चलो करें कुछ जतन देश आज़ाद बनायें
फिर से आज़ादी की एक मशाल सुलगायें,
कुछ नये दुश्मनों के चंगुल से देश बचाएँ
सूरज सा चमके जग में ऐसा अपना देश बनायें,
आँसू पोछे इन ज़ंजीरों में जकड़ी भारत माँ के
जनम दिया जिस माँ ने उसको अब न लजायें |

Poem ID: 218

Poet’s Name: CA. Amit Kumar Jain
Poem Title: में सिर्फ एक भारतीय
Location: AGRA, UTTER PRADESH
Occupation: Professional Service
Poem Length: 21 lines
Genre: Shant (peaceful)
Poem Creation Date: September 29, 2013
Poem Submission Date: November 15, 2013 at 8:54 am

Poem:

दोस्तों, पेश है आपकी खिदमत में , एक और हमारी लिखी हुई ताज़ा तरीन , मूल रचना. इसका शीर्षक है “में सिर्फ एक भारतीय” आशा करते है आपको पसंद आएगी……

तुम बेड tea , में सुबह का खाली पेट दो ग्लास पानी
तुम बासा burger , में गरम कचोरी
तुम bankok , में आगरा का प्रेम प्रतीक ताज
तुम MNC का culture , में स्वदेशी की विचारधारा/ गाँव की चौपाल
तुम प्रस्तावना , में उपन्सहार
तुम बनावट, दिखावट, और मिलावट, में किसान की असली फसल
तुम deo / perfume spray की चलती फिरती दूकान, में फूलो की प्राकर्तिक खुशबु
तुम वासना , में साधना
तुम non -veg , में veg
तुम खर्चा , में बचत
तुम धन , में तन और मन
तुम कथा , में सार
तुम पति पत्नी और वो , में ब्रहम चारी
तुम ice cream , में बर्फ की चुस्की
तुम रात , में सुबह
तुम शराब , में जलजीरा , निम्बू पानी
तुम रोग , में दवा
तुम AC की बंद कांच की खिड़की , में खुली खिड़की से आती खुली हवा
तुम cineplex , में रंगमंच
तुम गुजराती, मराठी , और बंगाली , में सिर्फ एक भारतीय
तुम हिन्दू, मुस्लिम , सिख , ईसाई और जैन , में सिर्फ एक इंसान……………

आपका लेखक
सी.ए. अमित कुमार जैन

Poem ID: 219

Poet’s Name: Dr.Rashmi Varshney
Poem Title: पनडुब्बी वाले प्रहरी
Location: Hyderabad, Andhra Pradesh
Occupation: Government
Poem Length: 19 (with 4 gaps) lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: November 15, 2013
Poem Submission Date: November 15, 2013 at 10:27 am

Poem:

पनडुब्बी वाले प्रहरी
(14 अगस्त,2003 को भारतीय पनडुब्बी सिंधुरक्षक में हुई दुर्घटना में शहीद होने वालों को श्रद्धांजलि)
– डॉ.रश्मि वार्ष्णेय
देश की रक्षा के लिए तैनात, हे पनडुब्बी वाले प्रहरी !
जिस निष्ठा और लगन से, करते हो देश की चौकसी।।
बुलंद हौसलों को हमारा सलाम। हे पनडुब्बी … …

जल में पसरी हुई वीरानी में, अनंत गहराई में सागर की।
घर-परिवार से रहते तुम दूर, सीमा सुदूर अथाह पानी की।।
इस एकाकी जीवन को सलाम। हे पनडुब्बी … …

कैप्सूल में भरी ताकत जैसे, पनडुब्बी में रहते हो वैसे।
वहाँ रखे हथियारों की सेज पर, सोते-जागते डटे हो ऐसे।।
कठिन जीवन शैली को सलाम। हे पनडुब्बी … …

समुद्री सीमा का खतरा बनते घुसपैठियों पर लगाम कसते।
दुश्मन के जहाजी बेड़ों को जकड़ते, देश को निरापद बनाते।।
नौसेना के सेनानियों को सलाम। हे पनडुब्बी … …

देश के तटों की रक्षा करते, नॉटीकल मील की चौकसी करते।
बंद नली में बिना रोशनी के, मरते दम तक संघर्ष करते।।
जलती चिता की जल-समाधि को सलाम। हे पनडुब्बी … …

Poem ID: 220

Poet’s Name: shashi purwar
Poem Title: स्वर सारे गुंजित हो ………।
Location: indore (m.p.)
Occupation: House wife
Poem Length: 42 lines
Genre: Other
Poem Creation Date: October 8, 2013
Poem Submission Date: November 15, 2013 at 1:43 pm

Poem:


भारत को कहते थे
सोने की चिड़िया
सुख से हम रहते थे।


गोरों को भाया था
माता का आंचल
वह ठगने आया था


याद हमें कुर्बानी
वीरो की गाथा
वो जोश भरी बानी


कैसी आजादी थी
भू का बँटवारा
माँ की बरबादी थी


ये प्रेम भरी बोली
वैरी क्या जाने
खेले खूनी होली

सरहद पे रहते है
दुख उनका पूछो
वो क्या क्या सहते है


घर की याद सताती
प्रेम भरी पाती
उन तक पँहुच न पाती .


बतलाऊँ कैसे मैं
सबकी चिंता है
घर आऊँ कैसे मैं?


हैं घात भरी रातें
बैरी करते हैं
गोली से बरसातें।
१०
पीर हुई गहरी सी
सैनिक घायल है
ये सरहद ठहरी सी।

११
आजादी मन भाये
कितनी बहनों के
पति लौट नहीं पाये।

१२
है शयनरत ज़माना
सुरक्षा की खातिर
सैनिक फर्ज निभाना।

१३
एकजुटता से मोड़ो
राष्ट्र की धारा
आतंकी को तोड़ो .

१४
स्वर सारे गुंजित हो
गूंजे जन -गन – मन
भारत सुख रंजित हो

Poem ID: 221

Poet’s Name: RUPESH CHAUBEY
Poem Title: धरती का स्वर्ग
Location: Varnasi
Occupation: Government
Poem Length: 48 (including gaps) lines
Genre: Other
Poem Creation Date: November 24, 2013
Poem Submission Date: November 24, 2013 at 3:29 pm

Poem:

धरती का स्वर्ग

मुकुट हिमालय का गंग हार शोभता है
सागर चरण इसकी सभ्यता महान है,
हरे-भरे खेतों से सजा है इसका परिधान
विश्व मे अनोखी इसकी आन-बान-शान है I

वीरों ऋषि मुनियों की धरा ये सदा से रही
ज्ञान सीखने को आया सारा ही जहान है
धन्य है वो नर नारी बसते जो इस देश
देशों मे अनूठा ऐसा देश हिन्दुस्तान है I [1]

भिन्न धर्म भिन्न जाति भाषा भी है भिन्न भिन्न
पर सभी यहाँ एक माँ की संतान है ,
यहाँ की फ़िज़ाओं जैसा और कहीं नहीं जहाँ
एक गली पढ़े जाते वेद औ क़ुरान हैं I

अतिथि को देव बना के यहाँ पे पूजते हैं
करते बड़ों का सदा आदर और मान हैं ,
जो भी आया इस भूमि सबको ही अपनाया
वसुधा कुटुम्ब सम इसकी पहचान है I [2]

ऐसा ये विशाल देश ऐसा ये महान देश
अत्याचारी दानव आज कैसा घुस आया है
जल रही आत्मा है इस भूमि भाग की औ
चहुँ ओर कैसा चीत्कार ये समाया है,

भूख से बिलखते बच्चे माँ की सूखी छाती नोचे
और कहीं गोदामों मे अन्न को सड़ाया है
राम औ रहीम का बाजार यहाँ बिक रहा
स्वार्थ साधना ने भाई-भाई को लड़ाया है I [3]

कर रही आवाहन अपने सपूतों का माँ
उठे चले आगे बढ़े हाथ अब मिलाते हैं
जो भी हुआ अब तक अब न आगे होने देंगे
माँ की अस्मिता पर होते हमलों को बचाते हैं ,

धर्म और विज्ञान का संगम बनेगा जहाँ
चहुँ ओर खुशहाली सुख शांति लायेंगे
नमन तुझे है माँ ये प्रतिग्या ले रहे है
इसे धरती का स्वर्ग फिर से बनाएँगे I [4]

Poem ID: 222

Poet’s Name: Ashish Saurav
Poem Title: क्रांति की भीख
Location: Kolkata, West Bengal
Occupation: Student
Poem Length: 16 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: February 20, 2012
Poem Submission Date: November 29, 2013 at 6:15 pm

Poem:

हे अर्जुन अब तू जाग-जाग
हाथों में ले कर आग-आग

उस कुरुक्षेत्र ने दी पुकार
सुना गांडीव की वही हुंकार

दुर्योधन बहुत इस देश में
दुस्शाशन फिर उसी वेश में

अब की न फिर तो सोच बहुत
कधों पर है ये बोझ बहुत

जो होगा तो मौन फिर
गीता कहेगा कौन फिर

हैं कृष्ण नहीं अब साथ यहाँ
हाथों में उनका हाथ कहाँ

पर अर्जुन, कब तक सोयेगा?
और दुःख के आंसूं रोयेगा?

मां की पुकार सुन – तू सुन बहन की चीख
मांगते हैं आज तुझसे क्रांति की भीख!

Poem ID: 223

Poet’s Name: sombhartiya dash
Poem Title: hein azaad, toh q nahin?!
Location: gwalior, madhya pradesh
Occupation: Student
Poem Length: 20 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: December 20, 2013
Poem Submission Date: January 10, 2014 at 3:28 pm

Poem:

HEIN AZAAD TOH Q NAHIN!?

ek arse se ud ne ka jee karta h…,
kehte hein ve hun azaad….toh q nahin…
samandaro ko paar karne ka, lehron se ladh, paar jaane ka jee karta h…
gar hu azaad jo, q nahin….!?
aas paas khushiyon ko sametkar,
aapno k liye jeene ka jee karta h,
nahin ghulam jo mein toh q nahin..!?
bhula kar saare gile-shikve…aaj fir
jeene ko jee karta h …
hun azaad toh..q nahin…. ?

kali rahein, girte aansoo … khushio ki jagah, q leti hein yahaan
q koi suraj doobjata h ghar ka…
q andheri raatein…andheri kar jati hein galiya…
q nahi koi deepak jala rha h yahaa….
jee karta h, sab jag mag kar du…hata kar sab andhyara yaha…
gar hu azaas toh, q nahin…

dana dana, khoon pasina… insaan ne insaan ko kab h jana…!?
khoon khoon ki hai ladai…pasine ki bhi toh kadar karlo bhai….
q bhookh kisi ko cheer dale…
mere desh m kisi ko maar daale.!?je
aaj fir dil se awaaz nikalti h,
bhale bhookh lele meri jaan… zamir mera chhin na paye…!
kehta hein log, hun m azaad …
toh q nahin…badaldu apno ki halat…
q na todu m nafrat ki diwaar
hun azaad, toh q nahin…..!?

Gyaan – vigyaan se jodu apno ko….
naye saveri ka intzaar kya…haatho se apne boonu suraj chanda…nahin m hu koi kal ka banda…badal dalu m kal ki tasveer, ankit karu m, hun sur veer…
naya, alag,anokha…kuchh alakh sa, jyotmaye, prakash purn…naya ho bharat…ho prakhar…!
saath saath …rahe haatho m haath…kal ki aur badhein…hum azaad…
gar, hum hein azaad toh q nahin!?!.

Poem ID: 224

Poet’s Name: Ajeet Maurya
Poem Title: Ganatantra Divas
Location: Varanasi, Uttar Pradesh
Occupation: Other
Poem Length: 28 lines
Genre: Other
Poem Creation Date: January 26, 2014
Poem Submission Date: January 28, 2014 at 5:53 pm

Poem:

Rashtra Janani Ma Bharat ko
shat-Shat Naman hai,
ganatantra DIvas ke avasar par
aap sabka abhinandan hai|
Uttar me parvat raj himalay
Dakshin me Bahata Sagar hai,
Purab ke bete ham kahlate
pashchim ki jhalak vihangam hai|
ganatantra DIvas ke avasar par
aap sabka abhinandan hai|
dharm aneko yaha base hai
sanskritiyon ka anootha sangam hai,
teej, tyauhar base hai dhero
prem ka madhur bandhan hai|
ganatantra DIvas ke avasar par
aap sabka abhinandan hai|
karte hai baat ham samvidhan ki
sabse bada likhit hamara hai,
8 suchiya, 395 anuchchhed 22 isake bhag
ise banane valo me pramukh Bhimrao Ambedakar hai
ganatantra DIvas ke avasar par
aap sabka abhinandan hai|
isme likhe hai kanoon aneko
aur likhe hamare adhikaar hai,
in sabka karna hai palan hame
isme desh ka gaurav vandan hai
ganatantra DIvas ke avasar par

Poem ID: 225

Poet’s Name: Trisha
Poem Title: Love you sister
Location: Bhopal,Madhya Pradesh
Occupation: Student
Poem Length: 10 lines
Genre: Karuna (pathos)
Poem Creation Date: November 29, 2012
Poem Submission Date: February 11, 2014 at 6:42 pm

Poem:

ये तुझसे कैसी यारी बहना, कैसी बेकरारी है,
तू पास हो कर भी पास नहीं, ये कैसी लाचारी है
तू मेरी बेबी डॉल है Baby, तू मेरी दुलारी है
मीठी सी आवाज़ है तेरी, तू जहाँ में सबसे प्यारी है
नन्ही सी गुड़िया थी तू, मेरे पास जब आती थी,
तेरी बातें सुनते-सुनते, में भी बच्ची बन जाती थी,
तेरे वो किस्से कहानियां, जाने क्यूँ तू सिर्फ मुझे सुनाती थी
तुझसे सिर्फ कुछ पल मिलने के लिए क्यूँ मैं तरस सी जाती थी
वो तेरी एक ख़ुशी के लिए भाइयों से लड़ना आज भी मुझे भाता है
तू इतनी दूर रहती है, फिर भी तेरे लिए “cousin” शब्द नहीं आता है
मेरे साथ मेरे पीछे पीछे घूमती, तू मेरी परछाई है
रबजी से मैंने कि थी प्रार्थना, दुआ में तू आयी है.

Poem ID: 226

Poet’s Name: Yateendra
Poem Title: ज़र्रे ज़र्रे में हिंदुस्तान
Location: Ambernath, Maharashtra
Occupation: Professional Service
Poem Length: 20 lines lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date:
Poem Submission Date: February 20, 2014 at 4:02 pm

Poem:

कही अल्लाह कही राम लिख देंगे !
इंक़लाब का तूफ़ान लिख देंगे !!
जितना मर्ज़ी चाहे मिटा लो दुनिया वालो !
हम ज़र्रे ज़र्रे में हिंदुस्तान लिख देंगे !!

ज़मीने बदल गई , आसमान बदल गए !
इक चादर में सोने वालो के मकाँ बदल गए !!
इस बदलाव के नाम एक पैग़ाम लिख देंगे !
हम हर उगते हुए माथे पे एक हिंदुस्तान लिख देंगे !!

सच कि तलाश में आईने निकल गए !
अँधेरा इतना गर्म था कि उजाले पिघल गए !!
हम ऐसे मौसम के नाम फ़रमान लिख देंगे !
मंदिरो कि हवाओं पे अ- सलाम लिख देंगे !!

न रहे राज़ कोई न राज़दारी रहे !
दुनिया में कुछ रहे तो ईमान और वफादारी रहे !!
हर बिगड़े हुए ईमान को बे-ईमान लिख देंगे !
हम हर जुबां पे सर ज़मीने-ए-हिंदुस्तान लिख देंगे !!

यतीन्द्र श्रीवास्तवा

Poem ID: 227

Poet’s Name: shiv narayan johri vimal
Poem Title: mera hindustaan bachaalo
Location: Bhopal
Occupation: Legal Service
Poem Length: 20lines lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date:
Poem Submission Date: March 21, 2014 at 4:02 am

Poem:

मेरा हिन्दुस्तान बचालो

मेरा देश बचालो कोई
लुटी जा रही चंदनबाडी
कोई रास सम्भालो बढ़कर
चढ जाए मेरा देश पहाड़ी
(१)

सूखी नदी प्यास के द्वारे
कुआ खोदन चले खिलाडी
सरपट दौड़ रहे हे पहिए
टूट गई रस्ते में गाड़ी
हरेक मिकेनिक बनकर आया
लेकिन निकले सभी अनाड़ी
मेरा देश——————

(२)

घर में चलता रहा सिनेमा
बाहर लुटती रही बज़ारिया
कौए सब आज़ाद हो गये
फसी जाल में सोन चिरैया
जिनको लकवा मार गया है
वे क्यों चला रहे है गाड़ी
(३)

श्रावन ने कुवेर को बाँधा
राम क्षीर सागर में सोए
दशरथ के बेटा नहीं होता
शृंगी ऋषि समाधि में खोए
सीता रोज़ हरी जाती है
सबने की लंका से यारी
मेरा देश——————–
(४)
चारों तरफ धूल की आँधी
बैठी साँस घुटन के का धे
उजली फिर हो जायें दिशायें
मुट्ठी भर कोई धूप दिखा दे
बेचैनी को इंतज़ार है
चमकदार मिल जाए खिलाड़ी !!!!

कवि–शिव नारायण जौहरी विमल

Poem ID: 228

Poet’s Name: Surender Singh Rawat
Poem Title: कुछ करने के लक्ष्य से.
Location: Delhi, New Delhi
Occupation: Writer
Poem Length: 24 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date:
Poem Submission Date: April 1, 2014 at 5:45 am

Poem:

कुछ करने के लक्ष्य से…।
जाने से पहेले कुछ दिल अजीब सा एहसास था,
13 लोगो की टीम थी और आपका प्यार था ।
कुछ पाने की तमन्ना तो दिल में थी नहीं,

फिर भी कुछ पाने के लिए एक संकल्प साथ था ।
धीरे-धीरे बड़ते कदम.…. चले रहे थे राह पे,
कही पे सड़क टूटी तो कही सड़क का नामो निशान ना था ।
सोचा मेने यही दिल में तब, बस हमे आगे बढना है,
चाहे जो भी मुश्किल रास्ते में आये, उसका निवारण हमे करना है ।

100 से अधिक सड़को का विस्तार गंगा नदी पास था,
बहना जिनकी किस्मत में था, और वही उनका बिनाश था ।
प्रकति की रौद्र रूप से लड़ना, ना हमारा विश्वास था,
ना बची वो मिट्टी भी अब, जिससे हमे इतना प्यार था ।

सब कुछ बिखरा देवभूमि का, जितना हमारे पास था,
ना केदार की सुन्दरता रही, जो पुरातात्विक इतिहास था ।
त्रासदी आयी देवभूमि में, शायद प्रकर्ति का अभिशाप था,
गंगा नदी के चारो ओर पड़े , लाशो का अम्बार था ।

काली गंगा काली हुई, जो देवभूमि का द्वार था,
बिखरे हुए थे सब लोग, जैसे कुम्भ का प्रकार था ।
विकास की गति से अधिक, ये हुआ हाहाकार था,
नुकशान उनसे ज्यादा हुआ, जो विकास का द्वार था ।

सोचा ना होगा कभी किसी ने, देवभूमि का जो हाल था,
विकास की नजर में अब, पुरा राज्य बेहाल था ।
सेना और संस्थाओ के जज्बे को, नमन हमारा सत्कार था,
जिन्होंने अपनी जान पे लड़कर, बचाया एक परिवार था ।

सत नमन, सत श्रंदांजलि, उन अमर शहीद जवानों को, हे ईष्ठ देवता, उत्तराखंड आपदा में जान गवाने वाले सभी की आत्मा को शांति से रखना, और उनके परिवार को इस भयानक दर्द के उभरने की शक्ति देना ।

Poem ID: 229

Poet’s Name: Amit Kumar
Poem Title: UNSE MIL KAR KYA HAI HAL
Location: Goa
Occupation: Professional Service
Poem Length: 19 lines
Genre: Shringaar (romantic)
Poem Creation Date: December 5, 2014
Poem Submission Date: May 18, 2014 at 4:39 am

Poem:

UNSE MIL KAR KYA HAI HAL
Unse mil kar kya hai hal, aa dil tujhe batao kase
Hajaro sikwe hai jindgi se use batao kase,

Tujse milne ka ek khwahish hai is dil me,
Par ye bat tujhe bato kase,

Ek bechani sa dekhe hai tere chere pe,
Par ye bat pata lagao kase,

Chahta tha tere dard ko apne banana,
Par is bat ka yaki tujhe dilao kase

Arman hai hota ek dost tujsa,
Par iske faryaad lagao kaise,

Hai ek faryad tujse ho sake to man lena
Khwahish hai ek dost tujsa,
Kabool ho to muskura dena.

Maskare ki maskari ka such to batlata hu
Aaine me dard is dil ka
Jhalak tujhe dikhlata hoo.

Jindagi ka kya bharosa kal hum ho na ho
Par hai tujse ek gujaris
Meri arthi ko apne dosti ka ek phool jarror ada dena.
————–

Poem ID: 230

Poet’s Name: pratibha soni
Poem Title: प्यारी माँ
Location: pillibangan distt-hanumangarh. state-rajasthan
Occupation: Student
Poem Length: near abt 25-27 lines lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: May 11, 2012
Poem Submission Date: May 26, 2014 at 7:08 am

Poem:

दिल मे जो मेरे ज़ज्बात छुपे है,
हाँ माँ वो है तेरे लिए बस।
के दुरी से भी तेरी दिल कहना चाहता है कुछ, और तू पास हो तो कह दूं तुझे कि………………….

ममता से भरी तेरी गोद में माँ,
सर रखने से मुझको है सुकून मिला।
कभी भीड़ में जब थी तन्हा सी मै,
मेरी आँखों में तेरा इंतजार मिला।
दूरियों से कभी,जो जो जाता मन ये मचल,
के बाहों में आउ तो फिर, मिल जाये सहर।
उन नन्ही उंगलियों से माँ,
अब तुम्हारे कंधे तक हु मै।
कैसे कहु सुक्रिया क साथ रहती हो,
मेरे हर पहर।।।।
है शांत दिल मेरा,पर आँखे रोती है।
दुरी से तेरी माँ मेरी ज़ुबा ये कहती है के…..
माँ तेरी याद ने मुझे,
फिर से रुलाया है।
सिस्कियों ने मेरी तुम्हे,
फिर से आज पुकारा है।
मेरे बिन निकले आँसुओ को,
तुमने ही तो जाना है।
दूर बैठे दर्द को मेरे,
तुमने ही तो माना है।
गिरे चलते हुए कई बार हम,
तुमने ही तो संभाला है
आज एक दूजे से दूर है हम,
हालात से क्योंकि मजबूर ह हम

Poem ID: 231

Poet’s Name: RATAN VARSHNEY
Poem Title: Song Lyrics Jindgi Ki Kitab
Location: Chandausi , Uttar Pradesh
Occupation: Student
Poem Length: 23 lines
Genre: Other
Poem Creation Date: February 22, 2014
Poem Submission Date: June 6, 2014 at 4:10 am

Poem:

CHORUS…

Aa Abhi Abhi Abhi ……
Meri to ye Kitab Hai…..
Kya mila Mujhe Jindgi Se …..
Ye Mera Hisab hai….
Aaaaa Aaaah
Aaaah Aaaah
Aaaaa Aaahhh Aaahhhhh…

Slogan …
Kehte Hai Log Pyar Koi Inaam Nahi…
Ye To Bo Dastur Hai Jiska Koi Naam Nahi…

Chorus …
Aa Abhi Abhi Abhi …
Tu Hi To Mera Khwab Hai …
Milja Mujhko Tu Abhi ….
Tu Hi To Mera Khwab Hai…
Aa Aa Aah Aah Aah …
Aaaaaaaaa Aaaahhh…

( 2)…
Aa Abhi Abhi Abhi …
Meri To Ye Taalash Hai …
Jindgi Ki Ye Meri …
Aakhri Kitab Hai …
Aa Aaah Aaah Aaah …
Ho Hooh Hooh ………..
Aa Aaah Aaah Aaah …..
Ho Ho Hooho Hooooho ….

By :- Ratan Varshney

Poem ID: 232

Poet’s Name: Pavni Sharma
Poem Title: भारत का ‘सिंह’ भगत
Location: agra (uttar pradesh)
Occupation: Student
Poem Length: 16 lines lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: August 17, 2011
Poem Submission Date: June 17, 2014 at 5:31 pm

Poem:

एक छोटे से बालक को नामंज़ूर थी गुलामी ।
इसलिए बचपन के खिलौने छोड़ बंदूक उसने थामी ॥

उसका प्रण भारतमाता को स्वतन्त्र कराना था ।
और अंग्रेेजी हुकूमत को भारत के दामन से दूर भगाना थ॥

मन में उसके स्वतंत्रता की तेज़ धधकती ज्वाला थी ।
था वो बड़ा वीर क्योंकि गले में उसके तिरंगी माला थी ॥

इंकलाब का नारा उसका असरकारी हो गया ।
और हर सच्चा भारतवासी क्रांतिकारी हो गय॥

अपनों की इस लड़ाई में उसको अपनों ने ही लूटा ।
फिर क्या था ?उसका दामन अपनों से ही छूटा ॥

अंग्रेज़ो की अदालत में बिक गए भारतवासी ।
स्वतंत्रता की इस लड़ाई में उसको मिल गयी फांसी ॥

अपनी निडरता से अंग्रेज़ी हुकूमत की कुर्सी उसने हिलाई ।
इसलिए कायर अंग्रेज़ो ने उसकी फांसी जल्दी लगाई ॥

उसका बलिदान १९४७ को कामयाब हो गया ।
और उसके संघर्ष से भारत आज़ाद हो गया ॥

पावनी शर्मा

Poem ID: 233

Poet’s Name: Nidhi deswal
Poem Title: माँ
Location: gurgaon, haryana
Occupation: Student
Poem Length: 20 lines
Genre: Shant (peaceful)
Poem Creation Date: December 23, 2012
Poem Submission Date: July 4, 2014 at 9:39 am

Poem:

इक मुदद्त हुई माँ तुझे चैन से सोते नही देखा,
तकिये पर तेरे आँसू थे माँ , तुझे रोते नही देखा.
खुद के लिए जीना तो तूँ जानती ही कहाँ थी,
पर अब अरसे बीत गये माँ तुझे अपने लिए कभी खुश होते नही देखा.

मेरी हर ग़लती पर माँ जो तूँ धीमा सा मुस्कुरकर हस्ती है,
वोही एक हस्सी तेरी माँ मेरी इस रूह में बस्ती है.
खो ना जाए तेरी हस्सी कहीं वो, ये सोच कर डरती हूँ,
इसीलिए माँ जानकर मैं ये ग़लतियाँ करती हूँ.

तेरे बिना मैं हूँ ही क्या,
ये मेंने कभी दिखाया तो नही है.
लाख बातें सीखती है माँ तूँ,
पर खुद बिन जीना तो तूने सीखया ही नही है!

रब की इनायत है माँ तूँ इस जहांन में,
जहाँ हर दिन हर रिश्ता बिकता है.
और एक रोज़ तेरी सूरत माँ आँखो में उतर आई थी,
उसी रोज़ यूँही कोई कह गया,
मेरी आँखों में रब दिखता है. मेरी आँखों में रब दिखता है!

Poem ID: 234

Poet’s Name: Sonali Singhal
Poem Title: एक ऐसा देश हमारा है जो सारे जहाँ से प्यारा है
Location: Delhi
Occupation: House wife
Poem Length: 20 lines lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: July 28, 2010
Poem Submission Date: July 11, 2014 at 7:51 am

Poem:

एक ऐसा देश हमारा है, जो सारे जहाँ से प्यारा है,
जहाँ धरती को माता कहते है, ऐसा देश ये न्यारा है,
मज़हब चाहे अनेक हो यहाँ, पर फिर भी एक ही नारा है,
जय हिंद, जय हिंद, जय हिंद का ही जयकारा है,
हर रोज़ जहाँ उत्सव होते है, नित दिन नयी हर्याली है,
जहाँ आज भी बैठ कर पूरा परिवार मनाता साथ मे दीवाली है,
जहा बड़े बड़े ज्ञानी और विद्वनो ने लिखे वेदांत है,
यह ऐसी अदभुद भूमि है, जहाँ हर दिल मे भगवान है,
चाहे कितनी भी भाषाएं हो, पर सब मे कुछ विशेष है,
जैसे किसी भी काम को करने से पहले, कहते श्री गणेश है,
आज आज़ादी से जो जी रहे हैं, उन वीरो का बलिदान है,
जिन्होने हस्ते-हस्ते दी, इस देश के लिए अपनी जान है,
जहाँ आज भी गुरु से भड़कर नही किसी का स्थान है,
वहाँ आज भी बडो की सेवा करना, दिया जाता ये ज्ञान है,
इस पवित्र भूमि के लिए, कुछ ऐसा करके दिखलाएँगे,
आओ सब मिलकर वादा करें दोस्तों, इस देश को आगे बढ़ाएँगे,
क्योंकि हम उन वीरो के वंशज हैं, जो इस देश के सितारे हैं,
अब समय आगया है, सिद्ध कर दिखलाने का,
कि सारे जहाँ से अच्छा है जो हिन्दुस्तान, हम भी उस ही के प्यारे हैं
जय हिन्द

Poem ID: 235

Poet’s Name: Chanchal Meghani
Poem Title: आखिर किसके लिए जय हिन्द के नारे लगाऊँ ?
Location: Dabra, Madhya Pradesh
Occupation: Student
Poem Length: 24 lines
Genre: Vibhatsa (odious)
Poem Creation Date: January 26, 2012
Poem Submission Date: July 31, 2014 at 11:31 am

Poem:

कौन-सी आजादी का जश्न मनाऊँ ?
आखिर किसके लिए जय हिन्द के नारे लगाऊँ ?

देश की बागडोर राजघरानों के हाथों में,
बलात्कारी घूमे खुले बाजारों में,
लड़की भ्रूण पड़ी रहे पत्तों-झाड़ियों में,
और लाखों करोड़ों के घोटालें हो जिस भारत में,
क्या में उस भारत के लिए जश्न मनाऊँ ?
आखिर किसके लिए जय हिन्द के नारे लगाऊँ ?

हज़ारों लोग मारे जाते हैं साम्प्रदायिक दंगों में,
देश की गद्दी पर बैठने वाले पाए जाते हैं अय्याशियों के धंधों में,
शिक्षा को रुपयों में तौला जाता है स्कूल-कॉलेजों में,
और शहादत की कीमत दिखती हो जहाँ सिर्फ स्मारकों में,
क्या उस भारत की आजादी का जश्न मनाऊँ ?
आखिर किसके लिए जय हिन्द के नारे लगाऊँ ?

किसान के चेहरे की शिकन सिर्फ बारिश के जरिए मिटती है,
बेकसूर की पूरी ज़िन्दगी सलाखों के पीछे गुजरती है,
बुढ़ापे में जहाँ सिर्फ वृद्धा आश्रम की उम्मीद रहती है,
और जहाँ ‘पान सिंह तोमर’ फ्लॉप और ‘द डर्टी पिक्चर’ हिट होती है,
क्या उस भारत की आजादी का जश्न मनाऊँ ?
आखिर किसके लिए जय हिन्द के नारे लगाऊँ ?

Poem ID: 236

Poet’s Name: Prerana
Poem Title: उम्र का खेल
Location: bangalore, karnataka
Occupation: Student
Poem Length: 20 lines
Genre: Hassya (comic)
Poem Creation Date: October 10, 2012
Poem Submission Date: September 25, 2014 at 6:34 am

Poem:

उम्र होगई दस,
खेलना-कूदना बस!!!
उम्र होगई बीस,
शरीर में आगयी रीस!!!
उम्र होगई तीस,
बीवी मांगे हर चीज़!!!
उम्र होगई चालीस,
भरो डॉक्टर की फीस!!!
उम्र होगई पचास,
पोता-पोती से आस!!!
उम्र होगई साठ,
मार नहीं सकते लात!!!
उम्र होगई सत्तर,
फलते रहो मटर!!!
उम्र होगई अस्सी,
पीते रहो लस्सी!!!
उम्र होगई नब्बे,
दिमाग़जी होगए खली डब्बे!!!
उम्र होगई शतक,
अब जाओगे तुम थक!!!

Poem ID: 237

Poet’s Name: rajnibhatia
Poem Title: kyunnnnnnnnnnnn??
Location: jalandhar punjab
Occupation: Teacher
Poem Length: 23 lines
Genre: Adbhut (wondrous)
Poem Creation Date: October 8, 2014
Poem Submission Date: October 28, 2014 at 7:26 am

Poem:

औरत का बलिदान कौन देखता हैं
उसकी तपसया कौन देखता हैं
कभी सोचा हैं औरत का वज़ूद क्या हैं ??
कभी सोचा हैं औरत की पहचान क्या हैं ??
सोच कर देखों तुम
खुद उलज जाओगे
वो मां हैं या एक वेचारी
वो राखी हैं या किस्मत की मारी
वो धुप में जीती हैं
वो शाओ का पेड़ है
वो बोहत चुप सी हैं
पर शोर में घूम सी हैं
औरत दूध हैं बच्चे की भूख का
औरत पानी हैं आँखों के समुन्दर का
औरत शान हैं मर्द की आबरू की
औरत प्यास हैं दिल के जज्बातों की
औरत दर्द हैं अपनी ही ज़िन्दगी का
औरत सिसकी भरी वो साँस हैं जो हर रात आँखों में भर आता हैं
वो देवी हैं अपने बजूद में
वो पवितर नूर में
फिर भी हो वेज्जत हर गली
फिर भी जलील हो हर घड़ी
क्यों क्यों क्यों ???

Poem ID: 238

Poet’s Name: Adya Upasana Routray
Poem Title: HOCKEY-OUR NATIONAL PRIDE
Location: Bhubaneswar, Odisha
Occupation: Student
Poem Length: 18 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date:
Poem Submission Date: July 23, 2016 at 5:50 am

Poem:

Despite the Cricket mania,
Hockey managed to be the national game of India.
1928 to 1956 was the peak time of Indian Hockey under star hero Dhyanchand,
when the team had brought six consecutive Olympic gold medals to homeland.
But the flow of time resulted in extinct of magical Indian touch and their juggling feats,
and thus no more Hockey is in star lime lights.
Our national pride will soon lose its shine,
due to lack of Indian Hockey fans in the cheering line.
Indian Hockey players are losing the support and
hence the team is unable to bring back the glory that is lost.
The time is here to fight back for the lost Indian Hockey pride,
this would be the best dedication for star hero Dhyanchand.
Let’s join our hands to cheer for Indian Hockey team and
encourage them to perform the best and bring back the GOLDEN ERA of Indian Hockey team.

Poem ID: 239

Poet’s Name: Sunil Gairola
Poem Title: Pitaah
Location: delhi
Occupation: Other
Poem Length: 12 lines
Genre: Other
Poem Creation Date:
Poem Submission Date: April 9, 2017 at 7:56 pm

Poem:

Ek Zanaza Ghar Se Nikla dil Talak Hota Hua
Maa Bilakti Sabne Dekhi Deekha Pita Na Rota Hua

Kal Talak Socha Pita Ne Bojha Uthaega Mera
Beta Rakh Hone Chala kandhe Pita ke Hota Hua

Jab Kabhi Thokar lagi baap Uth Khada Hua
Aaj Vo behosh Tha Bete Ko Aag Deta Hua

Charo Dham ki Yatra Beta Karaega Mujhe
Ganga Kinare Dekha Pita Ko Asthiyan Dhota Hua

Kheer Poodi Daan Pandit Sab wahi per Mahol Or
Yaad Aaya Din Janam Ka Bete Ka Jab chotha Hua

Rango Bhare Din The Uske Khushiyon Bhari Ratein Tamam
Udas bahu ka Chehra Na Bhula safed Jode mein Rota Hua

Poem ID: 240

Poet’s Name: Aubrey Maurice King Lee
Poem Title: The Perfect Cup
Location: bangalore
Occupation: Professional Service
Poem Length: 34 lines
Genre: Other
Poem Creation Date: January 1, 2012
Poem Submission Date: April 14, 2017 at 10:30 am

Poem:

A storm in a tea cup, the warm liquid downed,
What was, what is, what could be.
Emotions twirling with the spoon.
My cup, tasting too sweet,
too sweet for me, I cannot drink,
too sweet for a life as drab as mine.

I ask for another, my mind a perfect storm.
“Sugar separate please”.
I look at the cup wondering whether I should have it plain:
My life.
I take a sip; tasteless.
Should I add the sugar? a dilemma over my consternation.
Get rid of this tastelessness, add the sugar to it – an adventure.
So simple yet so complex a thought.
‘What adventure’, I’m scared of what’s beyond.
Do I need this sweetness?
Question awaiting an answer.

I take one lump – one small lump.
What if I start with something small?
The cup a little sweet, but no big change.
I add a bit more.
My dreams expanding – the cup tasting better.
My smile widens – a plan takes its shape.
A little more sugar – the cup just amazing,
I am awake to the future.

No more sugar – thank you.
I know where I need to draw the line.
Thinking too much is a little too much sugar for me.
Before I sweeten it too much that I throw the cup away.
I make my plan, the dawn of a new me.
Two lumps sugar please – the cup perfect.

Poem ID: 241

Poet’s Name: uday pratap
Poem Title: सच
Location: deoria
Occupation: Other
Poem Length: 2to10line lines
Genre: Karuna (pathos)
Poem Creation Date: January 7, 1977
Poem Submission Date: July 12, 2017 at 7:36 am

Poem:

आँख अब खुलती नही
धङकन भी शायद सो गयी
क्यो परेशां है ये सांसे
कोई समझाये इन्हे.

Poem ID: 242

Poet’s Name: Nandita
Poem Title: The letter to a son
Location: Delhi
Occupation: Student
Poem Length: 17 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: May 8, 2017
Poem Submission Date: August 5, 2017 at 1:13 pm

Poem:

The dearest one,
You have a son
You should be careful
For being respectful.
The much you ‘ll care
The much you ‘ll be fair
It is the time of intelligence ,
For having a good sense
Son, you became a father
Don’t go so much further
Be a man,
Don’t be a pen
Only One work to write
But, you’ ve to be responsible
For each and every kind
Be a father of your son
So , that you ‘ll won….

Poem ID: 243

Poet’s Name: anuj Shrivastava
Poem Title: baat hi kuch or hai
Location: Jabalpur
Occupation: Student
Poem Length: 21 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: November 25, 2011
Poem Submission Date: September 14, 2017 at 6:45 pm

Poem:

hamare desh m raajya anek hai
lekin sab dete ek dushre ke sukh dhuk m sath hai
milta h sukoon maa ki haath ki roti se hame..
kyuki hamare bharat ki baat hi kuch or hai..

yah paai jate dharma anek hai
sabka apna alag alag hi rang hai
dhum dhaam se manate har tyohaar hai
isliye to hamare bharat ki baat hi kuch or hai….

yah bhati nadhiya anek hai
hum unhe maa ka darja h die
qki maa karti nahi koi bedbhav h
isliye to hamare bharat ki bat hi kuch or hai…

hote yha dange anek hai..
par sabme bada prem h
kanoon k samne bhi sb ek hai
isliye to hmare bharat ki baat hi kuch or hai….

kaarya k liye nikalte paise har baar h
par hota nahi isse koi kaarya hai..
kyuki brast hai hamari 50 fisdi Sarkar h..
isliye sirf ho rhe ghotale hai..
isliye to hamare bharat ki baat hi kuch or hai….
hamare bharat ki baat hi kuch or hai….

Poem ID: 244

Poet’s Name: Ankit Arora
Poem Title: देश मेरा दौड़ रहा है
Location: New Delhi
Occupation: Software
Poem Length: 20 lines
Genre: Rudra (wrathful)
Poem Creation Date: October 13, 2012
Poem Submission Date: October 13, 2017 at 11:05 am

Poem:

देश मेरा दौड़ रहा है
देश मेरा दौड़ रहा है , अँधेरी गलियों से होता हुआ .. सूरज की सुनहरी किरणों की और…
लेकिन न जाने क्यों उजाला देखते ही, वो फिर लौट पड़ता है अँधेरे की कोठरी में…
भूल भुलाके इंसान अपनी इंसानियत… कर रहा है अत्याचार…
कही नारी का तो कही समाज की सोच का हो रहा है बलात्कार…
सबके आगे आम इंसान है बस लाचार बस लाचार…
कुएं में डूबा वो मेंढक है आम इंसान… जिसकी सोच बढ़ नहीं पाती..
सरकारी नीतियाँ और देशो की जंग… सपनो के पंख लगने से पहले हे है दबा देती..
उड़ना चाहकर भी वो उड़ नहीं पाता… जबसे परिंदो ने चलना शुरू कर दिया…
अपनी ताकत को जब आम इंसान ने भुला कर खुद ही अपने आप को दीवार के पीछे खड़ा कर दिया…
डरा हुआ है… सहमा हुआ है… बस घर में बैठ के देख रहा है..
दम नहीं है उसमे बाहर आने का… मुँह छुपा के बैठा है दुपट्टा ओड अपनी माँ का…
बैठे बैठे ना तो कभी हुआ है कुछ… जो जीना है अपने लिए.. तो बहार निकल और लड़ना सीख…
आवाज उठानी भी पड़ेंगी.. लाठी खानी भी पड़ेगी…
जहां जरुरत पड़ेगी .. वहां अपनी औकात दिखानी भी पड़ेगी…
ना झुकना है ना रुकना है .. जो है गलत वो ना सहना है…
चल शुरू कर तू चलना मेरे साथ … हम सब मिलकर बने एक हाथ… बस एक हाथ..
ना किसी नेता का ना किसी ज्ञानी का… ये वक़्त है अपनी खुदकी कहानी बनाने का..
चल शुरू कर तू चलना मेरे साथ … हम सब मिलकर बने एक हाथ… बस एक हाथ..

Poem ID: 245

Poet’s Name: Trisha Saxena
Poem Title: नेता
Location: Bhopal,Madhya Pradesh
Occupation: Student
Poem Length: 20 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: January 26, 2012
Poem Submission Date: October 17, 2017 at 5:50 pm

Poem:

क्यूँ नही और बन रहे नेहरू और गाँधी
क्यूँ हम भूल गये 1857 का युद्ध और दांडी
क्यूँ पैसा कमाने की चल रही है आँधी
क्यूँ जवान जवानी को कर रहे हैं मंदी

इतिहास ने कभी पैसे को याद नही रखा
राजगुरु सुखदेव भगत सिंग थे आज़ादी के सखा
क्या आज़ादी मिल जाती देकर हार नौलखा
याद की गयी वो कुर्बानी हज़ारों दफ़ा

क्यूँ इस देश में कोई नेता नही बन रहा
क्यूँ देश का पसीना आई टी सेक्टर से सन्न रहा
कहने को ये देश पाँच प्यारों का वतन रहा
पर क्यूँ अब देश के लिए अब धन सर्वप्रथम रहा

राजनीति बड़ी बुरी है ये चर्चा करते हैं
और खुद उसे ठीक करने से ये बड़ा डरते हैं
कहने को ये देश के नौजवान इस पर मरते हैं
पर विदेश जाने के किसी भी अवसर पर ये बढ़ते हैं

इस देश का दीपक क्यूँ विदेश को उजाला देता है
पाले बढ़े इस देश में जैसे दीपक सारा तेल लेता है
अगर घर गंदा है तो ये इस घर का ही तो बेटा है
तो घर साफ करने की पहेल करने के लिए बनता क्यूँ नही ये नेता है

Poem ID: 246

Poet’s Name: puja roy
Poem Title: Kamjor nhi nari
Location: BOKARO JHARKHAND
Occupation: Student
Poem Length: 62 lines lines
Genre: Other
Poem Creation Date: January 11, 2016
Poem Submission Date: November 15, 2017 at 7:16 am

Poem:

Ham aise kali hai

Poem ID: 247

Poet’s Name: Kusumakar Panr
Poem Title: मीरा भई जोगन
Location: Jaipur, Rajasthan
Occupation: Software
Poem Length: 18 lines
Genre: Karuna (pathos)
Poem Creation Date: February 20, 2017
Poem Submission Date: November 26, 2017 at 6:34 pm

Poem:

अपने संग ले श्याम का रंग, भरे श्याम-दृश नवरंग विस्मय लोचन,
संत भी करें सब प्रेम-रस बहुगान, श्याम दीवानी मीरा भई जोगन |

प्रेम रस का करती रही, वो तो निस-दिन विस्तार बखान,
जीवन की एक ही अभिलासा, तन-मन का एक ही त्राण,
साँझ-पखारे मन-मुरली पुकारे जैसे नाम बस तेरा मोहन,
संत भी करें सब प्रेम-रस बहुगान, श्याम दीवानी मीरा भई जोगन |

जग-झूठा सलोना ही सत्य, रोग करे निरोग सब उसकी माया,
क्या हो जब लग जाए श्याम-रोग, दिन-दिन जलती उसमें काया,
रंग भी श्याम पिया भी श्याम, अब काहे का जग का रंग-रोगन,
संत भी करें सब प्रेम-रस बहुगान, श्याम दीवानी मीरा भई जोगन |

सखी सहेलियाँ सब गई हैं छोड़, मेरा तो बस मोहन प्यारा,
सब बैठे बीच मंझधारे, वही बस एक सर्व-व्यापक किनारा,
अब तुम्हरे हाथ ही हमारी कश्ती, करोगे बस अब तुम ही पोषण,
संत भी करें सब प्रेम-रस बहुगान, श्याम दीवानी मीरा भई जोगन |

किसने लिया है ऐसा जोग, किसने लिया है ऐसा रूप,
श्याम ही बस अब मेरी छाया, श्याम ही है अब मेरी धूप,
मेरा तो अब श्याम है स्त्रोत, श्याम ही मेरा अब है दोहन,
संत भी करें सब प्रेम-रस बहुगान, श्याम दीवानी मीरा भई जोगन |

Poem ID: 248

Poet’s Name: Tejeshweeni Balasaheb shep
Poem Title: Iam
Location: Ambajogai
Occupation: Student
Poem Length: 12 lines
Genre: Other
Poem Creation Date:
Poem Submission Date: November 28, 2017 at 10:36 am

Poem:

Sometimes things goes wrong,
But your happiness is not soo long.
As you are attached to many persons,
They may hurt you at least for once.
Then why to have such attachments,
Your heart is not a house to buy it on rent.
You came alone on this earth,
Then why to say i have noone.

Try to smile, even when you are sad,
If you think, someone is ther for you then you are mad.
Realising this feeling as soon as possible, then be glad,
It’s very better to behave with others very bad.

Poem ID: 249

Poet’s Name: Puja roy
Poem Title: Mite ka tan
Location: Bokaro jharkhand
Occupation: Student
Poem Length: 52 lines lines
Genre: Other
Poem Creation Date: January 12, 2017
Poem Submission Date: January 7, 2018 at 8:35 am

Poem:

Mite ke hm bane hai putle mite me mil jana hai

Poem ID: 250

Poet’s Name: YASH KUMAR
Poem Title: आज़ादी की जंग
Location: COCHIN,KERALA
Occupation: Student
Poem Length: 22 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: March 6, 2012
Poem Submission Date: February 26, 2018 at 6:48 am

Poem:

एक समय महान था भारत, पूरे विश्व की शान था भारत, फिर गए दौर पूराने, आए नए जमाने। जब धर्म ने ज्ञान को बाँटा, जात ने इंसान को बाँटा, आए अंग्रेज व्यापार करने, और यही पर रहकर हिंदुस्तान को बाँटा।
फूट डालों और राज करो, ये उन लोगों की हिक्मत थी, उनकी चालों में आना, हम लोगों की जिलत थी। फिर उठी स्वतंत्रता की चिंगारी, सन् सत्तावन में,
आ गई खून की लहर सावन में।
रानी लक्ष्मीबाई, मंगल पांडे और अनेक वीरों ने बलिदान दिया,
स्वतंत्रता की लड़ाई चालु रखो, देशवासियों को फरमान दिया,
किसी को परेशानी दी, तो किसी को आजादी का अरमान दिया।
ब्रतानी सरकार के खिलाफ आंदोलन बढ़ते गए, वीर-जवान, हँस-हँसकर फाँसी पर चढ़ते गए। जलियाँ वाला बाग मेँ, बहनोँ ने भी जान गँवाई,
देश भक्तोँ ने आजादी के नारोँ के साथ, ‘काले पानी’ मेँ जिंदगी बिताई। नेताजी,भगत सिंह,राजगुरु,सुखदेव और बिस्मल ने अंग्रेजो पर सीधे वार किया, और गाँधी जी ने अहिंसा के बोलो से सबका दिल जीत लिया।
सालों के संघर्ष के बाद, आजादी आई हाथ, जब आई सैंतालिस की, पंद्राह अगस्त वाली रात।
उस दिन हटें बादल भारत से, गुलामी और काल के, मंजिल पर आया मुल्क, और सदियों बाद रंग उड़े गुलाल के।
-जय हिंद
नाम: यश कुमार

Poem ID: 251

Poet’s Name: Avinash kumar jha
Poem Title: बेपनाह मोहब्बत
Location: Faridabad, Haryana
Occupation: Student
Poem Length: 28 lines
Genre: Other
Poem Creation Date:
Poem Submission Date: March 18, 2018 at 6:48 am

Poem:

चिलमन कि आढ़ ले के
सनम यू रूकसत हुए
बेपनाह मोहब्बत
बेपाक सारी कर गए।
ख्याले गम की कश्ती
निल समन्दर दूर तक
बिच भवर हम फंसे
वो दूर हम से चल दिए।
रूखसार उनका बाखुदा
दीदार रब से कम नही
बन खुदा नवाजी बना
किस ओर को निकल गए।
है ढूंढता ये दिल उन्हे
आवाज देता बार-बार
किसी मूकदर्शक कि भांति
बुत है वो बन गए।
ऐ खुदा होती मोहब्बत
चीज क्या है तू बता
जो मिल गए तो सवर गए
जो न मिले तो बिखर गए।
रहमत है मेरे मालिक तू
दूर है दुनिया कि भीर से
औकात उन की क्या यहा
जो मोहब्बत के सागर मे उतर गए।
अदम से आदमी बनाया ये कमाल इश्क कर गया
और फिर आदमी से अदम ये कैसा चल गया
हाले बया लफ्जो मे कैसे करे तू ये बता
तकिया-ए-आग़ोस ही बस जानती हाल क्या है अब मेरा।।

Poem ID: 252

Poet’s Name: Ravi Bohra
Poem Title: Kavita
Location: Maharashtra
Occupation: Student
Poem Length: 37 lines
Genre: Other
Poem Creation Date:
Poem Submission Date: March 23, 2018 at 7:25 am

Poem:

कविता

इस प्यारी सी जिंदगी में अपनी पहचान छोड़ जाती है
किताबों के पन्नों पर रहकर भी हमें जीना सिखा जाती है
एहसास इसका बस इतना ही है की एक युग बदल जाए
हां ये कविता ,जहाँ होती है अपनी याद छोड़ जाती है

बैरंग कागज पर बनने वाली रंगीन तस्वीर होती है
जिंदगी को फूलों से बाँधने वाली जंजीर होती है
क्या कहूँ अब की इसे मर कर भी नहीं भूल सकते
अपने प्यार डोर से बाँधने वाली तकदीर होती है
हर पल में देखने वाला इक ख्वाब बन जाती है
हां ये कविता, जहाँ होती है अपनी याद छोड़ जाती है

न जाने क्यूँ इसके कम शब्दों में भी जीवन का सार है
मानो की जमीं से लेकर स्वर्ग का दिदार है
काल्पनिक से वास्तविकता की है ये पहचान
तभी तो इसमें हर कलाओं की मनमोह धार है
मनचली हवाओं को यह मोड़ लाती है
हां ये कविता ,जहाँ होती है अपनी याद छोड़ जाती है

शायरों की शायरी का ख्वाब
टूटे हुए दिलों का शराब
प्यार भरी अदाओं का गुलाब बन जाती है
भावनाओं के सागर से भरी स्याही से लिखें
तो ये कविता कभी न उतरने वाला शबाब बन जाती है
कड़ी धूप में एक बहारों के मौसम का खुमार चढ़ाती है
हां ये कविता ,जहाँ होती है अपनी याद छोड़ जाती है

मुस्कान पर लिखने वाली वो पहचान है
शक्ति ,युक्ति ,साहस ,स्नेह
दृढ़ता के संकल्प का यही तो वो गुमान है
सिर्फ कोरे कागज पर यह जान लाने वाली
हर लेखनी की महकता से निकली हुई वो कविता महान है
मेरे जीने की चाहत बन कर रहना यूँ ही
ताकि मैं कह सकूँ की मेरी कविता ही मेरी पहचान है
शब्दों के साहिल से ये हमें हँसना रोना सीखा जाती है
हां ये कविता, जहाँ होती है अपनी याद छोड़ जाती है

Poem ID: 253

Poet’s Name: Ravi Bohra
Poem Title: Kavita
Location: Maharashtra
Occupation: Student
Poem Length: 37 lines
Genre: Other
Poem Creation Date:
Poem Submission Date: March 23, 2018 at 7:25 am

Poem:

कविता

इस प्यारी सी जिंदगी में अपनी पहचान छोड़ जाती है
किताबों के पन्नों पर रहकर भी हमें जीना सिखा जाती है
एहसास इसका बस इतना ही है की एक युग बदल जाए
हां ये कविता ,जहाँ होती है अपनी याद छोड़ जाती है

बैरंग कागज पर बनने वाली रंगीन तस्वीर होती है
जिंदगी को फूलों से बाँधने वाली जंजीर होती है
क्या कहूँ अब की इसे मर कर भी नहीं भूल सकते
अपने प्यार डोर से बाँधने वाली तकदीर होती है
हर पल में देखने वाला इक ख्वाब बन जाती है
हां ये कविता, जहाँ होती है अपनी याद छोड़ जाती है

न जाने क्यूँ इसके कम शब्दों में भी जीवन का सार है
मानो की जमीं से लेकर स्वर्ग का दिदार है
काल्पनिक से वास्तविकता की है ये पहचान
तभी तो इसमें हर कलाओं की मनमोह धार है
मनचली हवाओं को यह मोड़ लाती है
हां ये कविता ,जहाँ होती है अपनी याद छोड़ जाती है

शायरों की शायरी का ख्वाब
टूटे हुए दिलों का शराब
प्यार भरी अदाओं का गुलाब बन जाती है
भावनाओं के सागर से भरी स्याही से लिखें
तो ये कविता कभी न उतरने वाला शबाब बन जाती है
कड़ी धूप में एक बहारों के मौसम का खुमार चढ़ाती है
हां ये कविता ,जहाँ होती है अपनी याद छोड़ जाती है

मुस्कान पर लिखने वाली वो पहचान है
शक्ति ,युक्ति ,साहस ,स्नेह
दृढ़ता के संकल्प का यही तो वो गुमान है
सिर्फ कोरे कागज पर यह जान लाने वाली
हर लेखनी की महकता से निकली हुई वो कविता महान है
मेरे जीने की चाहत बन कर रहना यूँ ही
ताकि मैं कह सकूँ की मेरी कविता ही मेरी पहचान है
शब्दों के साहिल से ये हमें हँसना रोना सीखा जाती है
हां ये कविता, जहाँ होती है अपनी याद छोड़ जाती है

Poem ID: 254

Poet’s Name: नारी का सम्मान
Poem Title: नारी का सम्मान
Location: Gaya bihar
Occupation: Student
Poem Length: 38 lines
Genre: Other
Poem Creation Date: December 8, 2016
Poem Submission Date: March 25, 2018 at 8:21 am

Poem:

हमको आज कथा बतलानि है,
कुछ मर्दों को सीखलानी है।
हमको आज अपनी औकात बतानी है,
क्या है इनके पास जरा जो सब को आज बतानी है।

हर मर्दों में हम की बातें हैं,
नारी को निचा करने की ही बातें हैं।
आज नारी का सम्मान चाहिए,
ईनका पुरा अधिकार चाहिए।

नारी खूद को भुल गयी जो,
दामिनी बन वो लुट गयी जो
फिर भी अभी जो नहीं हो चेते,
खचद को तु पहचान जरा।

मिट्टी का तन है तेरे पास
मिट्टी का तन है मेरे पास,
सांसों का प्रणय है तेरे पास
सांसों का प्रणय है मेरे पास।

फिर यह दोनों दुजे कैसे,
सृष्टि के दो पहिए जैसे,
तुम बिन हम है आधे-आधे
हम बिन तुम हो आधे-आधे।

राधा बिन थे श्याम अधुरे
राम कहां सीता बिन पुरे,
गैरा बिन कैलाश अधुरी
तुम बिन नहीं यह सृष्टि पुरी।

खुद को नर उमनाद न समझे
तुम जाये हो नारी के,
इस पर तुम अधिकार न समझे।
नारी ही जननी सृष्टि की,
नारी से सुख समृद्धि सृष्टि की।

नारी का अप‌मान धरा पर महाप्रलय का सुचक है,
चिरहरण में कुल गवाई,
पर नारी में जात गवाई,
नारीशाप में ही कई राजाओं ने अपनी छाप गवाई।

फिर क्यों नारी अबला है
तु खपर सी कैलाशी बन,
रणचंडी सी तु मर्दन कर,
तु ही जग का सृजन कर ,
तच जग का नव सृजन कर।।

Poem ID: 255

Poet’s Name: Anshula Sardesai
Poem Title: A bizzare feeling
Location: Gurugram,Haryana
Occupation: Student
Poem Length: 22 lines lines
Genre: Vibhatsa (odious)
Poem Creation Date:
Poem Submission Date: April 13, 2018 at 4:17 am

Poem:

I am in a perpetual cave
A cave like an impenetrable prison
A confinement full of self-hatred and despair
Exhausted by wearing a façade of happiness
Deep down sinking in unknown ocean
Where blackness gets darker

Possibly no one cares
Ultimately I am just a zilch in the universe
I don’t want to live long
Just till the extent I can bear

Unable to understand this feeling
Which has been with me since a catastrophe
Have been carrying a concealed trauma
Locked with a key
That I have swallowed

Want to get rid of this strange feeling
Despite sorrow and immense suffering
I am living with a delusion
That world is a blissful place

Poem ID: 256

Poet’s Name: Anshuman Aryav
Poem Title: काश मैं तिरंगा होता
Location: Patna,Bihar
Occupation: Student
Poem Length: 14 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: August 13, 2017
Poem Submission Date: April 14, 2018 at 3:56 am

Poem:

ना हिन्दू का होता, ना मुस्लमान का,
काश मैं तिरंगा होता इस प्यारा हिन्दुस्तान का,
ना मुझे धर्म के तराजू में तौला जाता,
ना ही मुझे लाल और हरे में तोड़ा जाता,
ना राम का होता, ना रेहमान का,
काश मैं तिरंगा होता इस प्यारा हिन्दुस्तान का.
ना मेरा कोई मजहब होता, ना कोई जात,
बिना कोई भेद-भाव के सबको जोड़ रखता एक साथ.
ना मैं गीता में होता, ना मैं कुरान का,
काश मैं तिरंगा होता इस प्यारा हिंदुस्तान का,
ना मैं भगवन का होता, ना मैं इंसान का,
मैं हमेशा प्रतिक होता हर भारतीयों के सम्मान का,
काश मैं तिरंगा होता इस प्यारा हिन्दुस्तान का,
काश मैं तिरंगा होता इस प्यारा हिन्दुस्तान का…

Poem ID: 257

Poet’s Name: Arunish Ankit
Poem Title: वतन
Location: Bhubaneswar, Orissa
Occupation: Student
Poem Length: 10 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: July 29, 2011
Poem Submission Date: April 18, 2018 at 7:49 am

Poem:

मिलूँ जो ख़ाक में चाहे, चिता पर राख हो जाऊँ,
धुले गंगा में मन मेरा, यों धुलकर पाक़ हो जाऊँ।

मेरी मिट्टी पे ज़ाया हो, मेरे ख़ून का हरेक कतरा,
जफ़र अंज़ाम हो जिसका मैं वो आग़ाज़ हो जाऊँ।

जिसके शौक पत्तों के, मैं पतझड़ का वो मौसम हूँ,
मुझे है शौक गाते कोयल की मैं आवाज़ हो जाऊँ।

बहुत है आज़ मुझमें भी, हिमालय से लिपटने की,
वतन के इश्क़ में मिटकर भी मैं आबाद हो जाऊँ।

तू शाह ज़न्नत का, मैं मिट्टी का, अब्तर खिलौना हूँ,
जलूँ इस आग में पल पल कि आफ़ताब हो जाऊँ।

Poem ID: 258

Poet’s Name: Sahaj
Poem Title: Mother
Location: Jammu
Occupation: Student
Poem Length: Max 30 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: April 17, 2012
Poem Submission Date: April 21, 2018 at 5:34 pm

Poem:

Nice

Poem ID: 259

Poet’s Name: Sneha
Poem Title: Maa Teri jagah
Location: Ramgarh
Occupation: Student
Poem Length: 25 lines
Genre: Karuna (pathos)
Poem Creation Date: January 18, 2000
Poem Submission Date: April 23, 2018 at 2:32 pm

Poem:

Maa Teri jagah

Poem ID: 260

Poet’s Name: Saumya tiwari
Poem Title: माँ पुकार रही है
Location: Madhya Pradesh
Occupation: Student
Poem Length: 11 lines
Genre: Other
Poem Creation Date: October 1, 2012
Poem Submission Date: April 28, 2018 at 2:29 pm

Poem:

भारत वासी तुम्हे कोई पुकार रही है ।
सुन कर अनसुनी न करो वह चीख चिल्ला रही है
कहि एक कोने में बैठे आंसू बहा रही है ।
यु एकता और भाईचारे को बेड़ियो में न देख पा रही है
पहचानो उस माँ को भारत माँ पुकार रही है ।
हाथ में तिरंगा लिए , तिरंगे पे भ्रषटाचार का दाग लिये।
तुम्हे वह पुकार रही है
सुन कर अनसुनी न करो
वह आंसू पे आंसू बहा रही है ।
आंसू पोछ सको तो पोछ लो,
वरना गंगा बाढ़ ला रही है ।
द्वारा-सौम्या तिवारी

Poem ID: 261

Poet’s Name: Sai Nirale
Poem Title: अगाध
Location: Udgir, Maharashtra
Occupation: Student
Poem Length: 11 lines
Genre: Bhayanak (terrifying)
Poem Creation Date: May 1, 2018
Poem Submission Date: May 1, 2018 at 10:26 am

Poem:

दिल की गेहराई मे देख जरा।
अंदर जो जल रहा ,उसे रोख जरा
जला तो राख सा तू,दिये के साये मे तू।।

दिल की गेहराई मे देख जरा।
उठी है जो लेहरे अंदर, उसे तू पहचान जरा
डुबा तो लाश सा तू,यादो के अंगण मे तू।।

दिल की गेहराई मे देख जरा।
हाथ अपनो का थांबे, खुशी को संभाल जरा
हसा तो चांद सा तू,कभी सया तो कभी उजाले मे तू।।

Poem ID: 262

Poet’s Name: AJAY KUMAR SHARMA
Poem Title: है शर्म की बात किसके लिए??
Location: Bagodar,jharkhand
Occupation: Student
Poem Length: 13 lines
Genre: Other
Poem Creation Date: November 5, 2012
Poem Submission Date: May 28, 2018 at 9:27 am

Poem:

हैं सरहदों पे जो जागते
बस यही दुआ वो मांगते
खुश रहे हर एक वो
जो हैं जुड़े इस राष्ट्र से

सम-विषम परिस्तिथियों में भी
जो हैं पड़े,जो हैं अड़े
जो हैं अड़े,रह कर खड़े
है चाह नही उनकी कुछ भी
बस देश पर उनके कोई न चढ़े

जो अपनी साडी चाह मारकर
लड़ते हैं हमारे लिए
दे रहे नही सम्मान उन्हें
है शर्म की बात किसके लिए??

Poem ID: 263

Poet’s Name: Lavanya
Poem Title: आखिर कौन हो तुम?
Location: Ranchi, Jharkhand
Occupation: Student
Poem Length: 18 lines
Genre: Shringaar (romantic)
Poem Creation Date: September 8, 2012
Poem Submission Date: May 30, 2018 at 10:54 am

Poem:

मेरे पास शब्द  नहीं है कुछ जताने को,
     तुम मेरे कौन हो ये तुम्हें समझाने को |
जिसे मैं खुली आँखों से देखती हुँ,
    वो हसीन  खबाव हो तुम |
या जिसका जबाव मैं सपनों मे भी धूधंती हुँ,
   वो जटिल सवाल हो तुम |
मेरी हर दुआँ , मेरा हर  ‘काश ‘ हो तुम |
   तुमसे ही दुरियाँ सब, फिर भी आस-पास हो तुम |
कभी मेरे अपनो से भी ज्यादा अपने,
   तो कभी बिलकुल अजनबी हो तुम |
कभी मेरा सबकुछ तो  कभी कुछ भी नहीं हो तुम |
‌ एक पल  को मेरी आँखों का इंतिजार हो तुम,
  तो दूजे ही पल इंकार हो तुम |
जिसे पा के मैं अपनो से दूर हो जाउँ मेरी वो  हार  हो तुम,
  या जिसे भूल के मैं खुद को हीं खो दूँ मेरा वो प्यार हो तुम |
मेरे ख़ुदा की रहमत की निशानी हो तुम,
   या फिर मेरी अधूरी कहानी हो तुम |
   या फिर मेरी अधूरी कहानी हो तुम

Poem ID: 264

Poet’s Name: Rohit Kumar Das
Poem Title: देश का मान बढाना है|
Location: Kolkata
Occupation: Student
Poem Length: 24 lines lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: February 6, 2018
Poem Submission Date: June 2, 2018 at 6:37 pm

Poem:

जिस देश मे जन्म लिए हो,
उस मिट्टी का कर्ज चुकाना है|
देश का मान बढाना है,
हमे देश का मान बढाना है|

Poem ID: 265

Poet’s Name: SHIKHAR ADHOLIA
Poem Title: भारत एक विश्वगुरु
Location: greater noida, uttarpradesh
Occupation: Student
Poem Length: 24 lines lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date:
Poem Submission Date: June 9, 2018 at 6:20 pm

Poem:

**** भारत एक विश्वगुरु ****

न रहे कुछ वीर रण में ,
अब तो हैं शत्रु अपने ही घर में|

न रहे साधु अब तपवन में,
अब तो हैं राक्षस हर डगर में|

न रहे भोले कण-कण में,
अब तो है पाखण्डी हर शहर में|

फिर भी दोहराता हूँ मैं इस मिट्टी की वो कहानी,
जब वीरों ने लहू से सींची थी ये रवानी|

आज़ाद, भगत, सुखदेव, राजगुरु ने अपना ख़ूँ बहाया,
और कई आज़ादी के सिरफ़ीरो ने अपना शीश कटाया|

उनके बलिदानो का ऋण रहेगा अपने हर एक जीवन में,
फिर लडेंगे कई अभिमन्यु इस कालयुगी रण में|

फिर जगेंगे दीर्घ विष्णु अपने एक स्वप्न में,
क्यूंकि हो रहा है चीरहरण द्रौपदी का हर एक आँगन में|

फिर से ग़ालिब की फ़क़ीरी का युग आयेगा,
सेठो की तिज़ोरी का धन न उनको सुख दे पायेगा|

फिर सुभाष के नारों पे अपना लहू उबलेगा,
कश्मीर क्या लाहौर में भी फिर अपना ध्वज फरेगा|

फिर गाँधी की डण्डे से अहिंसा की गूंज उठेगी,
तब जाके मानवता अपने सिंहासन बैठेगी|

फिर बौद्ध के शब्दों से कुछ तलवारें टकराएंगी,
छिन-भिन होकर वे पुष्पों में बदली जायेंगी|

सरहदों में वीरों का ये बलिदान व्यर्थ नही जायेगा,
उनमे शौर्य से फिर भारत विश्वगुरु बन पायेगा ||

– शिखर अधोलिया

Poem ID: 266

Poet’s Name: Himanee Bisht
Poem Title: नमन
Location: Dehradun, Uttarakhand
Occupation: Student
Poem Length: 245 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: September 5, 2018
Poem Submission Date: June 22, 2018 at 2:14 pm

Poem:

कुर्बान हुए जो अपने वतन के खातिर कभी उन्हें भी नमन कर लिया करो !!
तपती धूप, जाड़े की ठंड, तूफान एवं बरसते बादलों के नीचे खड़े उस जवान को कभी दिल से धन्यवाद तो कर लिया करो!!

उस मां की कोख, जो सुनी रह गई है उसे कभी दिल से सलाम तो कर लिया करो!!
खुश नसीब है, वह पिता जिसके अंश का लहू देश के काम था आया!
ए दोस्तों, कभी उस पिता के छुपे आंसुओं को पोंछ तो लिया करो!!

शहीद, दोस्त के सूनेपन को कभी महसूस तो कर लिया करो!!
रक्षाबंधन के पर्व में आए उस बहन की आंख में आए आंसुओं की इज्जत तो कर लिया करो!!
उस शहीद की राख के हर कण में बसे उस पत्नी के दुख को पूछ कर तो देख लिया करो!!
उस शहीद के छोटे भाई की हिम्मत का सहारा तो बन के देख लिया करो!!

कभी दिल से उनके उस लहू को नमन तो कर लिया करो!!
उनकी इस जीत, वतन की रक्षा एवं वतन के लहराते तिरंगे पर रोशनी डाल कर तो देख लिया करो!!
अपने नव जीवन तथा उनकी थमी सांसो को झुक कर सलाम तो कर लिया करो!!

ऐ दोस्त, हर “शहीदी दिवस” पर उस शहीद और सरहद पर खड़े जवान को “JAI HIND” कहकर नमन तो कर लिया करो!!

Poem ID: 267

Poet’s Name: Raj Sahu
Poem Title: Starved Stomachs
Location: Burhanpur, Madhya Pradesh
Occupation: Student
Poem Length: 14 lines
Genre: Karuna (pathos)
Poem Creation Date: May 17, 2012
Poem Submission Date: June 23, 2018 at 7:57 am

Poem:

The eyes were constantly searching,
Searching for the food to quench the appetite.
But the stony passers were ignoring
the hungry mouths, imagining of a bite.

Poverty has become an antagonist,
In the story of starved stomachs.
Each character and himself the protagonist
Just thinks and their thumbs they sucks.

The eyes shed bitter tears
And their hearts complained to the Lord,
“O Almighty! Are we lacking in prayers
or had done the deeds so abhorred?”

Unbeatable crying, but still lives the hope
And it will live until breaks the life’s rope.

Poem ID: 268

Poet’s Name: Pinkal Kothiya
Poem Title: Stay a little longer with me
Location: Hyderabad
Occupation: Professional Service
Poem Length: 33 lines
Genre: Shringaar (romantic)
Poem Creation Date:
Poem Submission Date: June 27, 2018 at 1:09 am

Poem:

There was this smart boy, who loved cars.
There was this pretty girl, who loved bikes.
They never knew life would bring them together on road rides.

The boy was arrogant, so was the girl polite.
They never knew their destiny would collide.

The boy and the girl met daily on the way,
Looking at each other, they passed their day.

One day they got a chance to talk,
They kept talking throughout the little walk.

They got to know each other well,
All the secrets they used to tell.

In few days, they became friends,
This is where the story begins,
They smiled, laughed and joked,
Together they always rocked.

Here comes a wonderful twist in the story,
The boy now likes another girls glory.

He goes crazy behind the beauty,
Not realizing that he was being naughty.

The girl never tried to express her feelings,
She decided to let go of things.

She decided to move on in her life,
Finally, she was going to be a wife.

Don’t know what made the boy stop her,
Maybe he was finally in love with her.

But they didn’t let their feelings out,
Internally their hearts did shout.

At last, their ego collapsed, they had to depart.
It was the time they had to apart.

They kept saying to each other, stay a little longer,
With distance, their love became stronger.

They are still not together,
But they have their memories forever.

Poem ID: 269

Poet’s Name: Madhu Bhagat
Poem Title: ये अफ़साना बहुत है पुराना , सुकून साथ सुना रही हूं ,
Location: Haldwani
Occupation: Student
Poem Length: 14 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: January 25, 2017
Poem Submission Date: June 30, 2018 at 1:11 pm

Poem:

ये अफ़साना बहुत है पुराना ,
सुकून साथ सुना रही हूं ,
बीते पन्नो की गाथाएं हैं ऐ,
बस यु ही बता रही हूं।
अश्क था उन आखों
दर्द का सितम देखकर
खामोशी थी उन चेहरो पर ,
खिदमत की सजा पाकर
खेल खून की होली नफरत का आगोश ले आयी
लेकिन आजाद कर गए कौम को मुस्कराहट और खुशियों का तोहफा ले आयी ।

ये अफ़साना बहुत है पुराना ,
सुकून साथ सुना रही हूं ,
बीते पन्नो की गाथाएं हैं ऐ,
बस यु ही बता रही हूं।
मुश्किलें थी उन राहों में
वक़्त समंदर को देखकर
गुलामी थी जहा में
आज़ादी आरज़ू सुनकर
कबूल उनकी हार मुस्कुराहट पैगाम ले आई ,
लेकिन जख्म दे छोड़ गए इस दुनिया को
गमो का शैलाब ले आयी
ये अफ़साना बहुत है पुराना ,
सुकून साथ सुना रही हूं ,
बीते पन्नो की गाथाएं हैं ऐ,
बस यु ही बता रही हूं।

Poem ID: 270

Poet’s Name: akash gupta
Poem Title: उससे इज़हार किया फिर मनाया देर तक
Location: muzaffanagar,U.P
Occupation: Student
Poem Length: 10 lines
Genre: Shringaar (romantic)
Poem Creation Date: June 16, 2000
Poem Submission Date: July 1, 2018 at 8:49 am

Poem:

उससे इज़हार किया फिर मनाया देर तक
उसने भी फिर मुझे कई रोज़ देखा देर तक

कैसे दंग रह गया वो देखकर मुझे
जब उसके मना करने पर मैं मुस्कुराया देर तक

अब चलते हुए दिख जाए रास्तो में अगर
मैं भी साथ चलता हुं चुपचाप देर तक

कभी मुझसे बात हो जाएं इत्तेफाक़ से अगर
तो लगता हैं युही वक्त ठहर जाए देर तक

दरख़्तो के साये मैं बैठकर लिखता हूं आजकल
तमन्ना हैं मेरी वो भी मुझे कभी पढहे देर तक

आकाश (मुसाफिर)

Poem ID: 271

Poet’s Name: Swetha Javedar
Poem Title: Lady in a Scarlet Gown
Location: Bangalore
Occupation: Other
Poem Length: 19 lines
Genre: Shringaar (romantic)
Poem Creation Date:
Poem Submission Date: July 1, 2018 at 9:53 am

Poem:

Lady dressed in a scarlet gown,
Bustling in the green woods,
Far away from her home town,
Followed by men in hoods.

A fear of line on her face,
Her hands turning cold,
With every step, increasing her pace,
She clouted herself to be bold.

Cognizant of nearing the eventide,
Made it an avenue of escape,
The path was open for her to glide,
From the men in hoods with weird cape.

Hit with a branch of tree on the way,
Lying on the ground wholly subtle,
What is the destiny, none can say.
For she found herself with her prince in a castle.

Poem ID: 272

Poet’s Name: Amit Kumar Dhiman
Poem Title: ऐ आजा़द हिंद के पंछी सुन
Location: Chandigarh
Occupation: Student
Poem Length: 36 lines
Genre: Karuna (pathos)
Poem Creation Date: December 22, 2012
Poem Submission Date: July 24, 2018 at 11:03 am

Poem:

ऐ! आज़ाद हिंद के पंछी सुन
आज़ादी के सपने बुन,

सन् 57 कि यादें सुन
कुछ धोखे कुछ वादे सुन,

सन् 97 के अन्याय सुन
फिर आज़ादी के सपने बुन,

सन् 61 की बर्बरता सुन
फिर आज़ादी के सपने बुन,

आज़ादी को हुए 68 साल
आज भी होता वही बवाल,

संविधान का एक-एक अक्षर
अंग्रेज़ियत से है साक्षर,

ऐ! आज़ाद हिंद के पंछी सुन
आज़ादी के सपने बुन,

मंगल पांडे, वीर भगत सिंह
आज़ादी के थे सच्चे सिंह,

याद दिलाता जलियाँवाला
दुर्भाग्यशाली वो दिन काला,

सन् 75 का आपातकाल
आज़ादी तो बन गई जाल,

हिंदी हैं हम, हिंदी हैं हम
वतन है हिंदुस्तान हमारा,

मैं और तुम रहें हमेशा
भारतमाँ की आँख का तारा।

Poem ID: 273

Poet’s Name: Ravi Panwar
Poem Title: मेरे आंगन के पेड़ से
Location: SAHARANPUR
Occupation: Teacher
Poem Length: 23 lines
Genre: Shringaar (romantic)
Poem Creation Date: July 12, 2012
Poem Submission Date: July 24, 2018 at 1:13 pm

Poem:

अठखेलियाँ खाती, अपने केश बिखराती,
रंग बिरंगे फूलों के गहनों से सजी,
एक लता बेवजह लिपट गई
मेरे आँगन के पेड़ से।

कहाँ से निकली पता नहीं,
कहाँ रुकेगी पता नहीं,
पर बाँध लेगी अपनी बाँहों में बेसुध,
मोहब्बत सी हो गई जैसे
मेरे आँगन के पेड़ से।

डाल से डाल चलने लगे,
पात से पात हिलने लगे,
दो शरीर एक जान से
एक दूसरे मे वो मिलने लगे,
नहीं मिली अगर वजह,
पूछना उनका परिचय,
मेरे आँगन के पेड़ से।

कुछ रिश्तों के नाम नहीं होते हैं,
वो मूक होते हैं,
अकल्पनीय किन्तु विस्तृत,
उस असीम प्रेम की तरह
उलझे हुए,
धूप, जाड़े और बारिश में,
मेरे आँगन के पेड़ से।

Poem ID: 274

Poet’s Name: SHREYA ARORA
Poem Title: The Shreshth -My Little Brother
Location: NEW DELHI
Occupation: Student
Poem Length: 14 Lines lines
Genre: Other
Poem Creation Date: June 24, 2018
Poem Submission Date: July 25, 2018 at 9:54 am

Poem:

Oh Dear my little brother Shreshth, What shall I say,
Just want to express, On this special day
That in spite of our share of fights
I always enjoy, spending time with you.
In so many ways, together we grew.
You are very naughty this poem is all true.
I’m sure you’d make lots of friends at the zoo
Sometimes I think, you belong in a zoo.
Look at the bright side, dear brother of mine.
The zoo is a great place, where you’ll prosper and shine.
We are brother Sister, and a close team.
Together we conquer, together we dream.
Without a thought,we offer a helping hand.
Next to each other, proudly we stand.

Poem ID: 275

Poet’s Name: Sahaj Sabharwal
Poem Title: RESPECT
Location: Jammu
Occupation: Student
Poem Length: 25 lines
Genre: Shant (peaceful)
Poem Creation Date: March 17, 2002
Poem Submission Date: July 27, 2018 at 3:22 pm

Poem:

RESPECT

*1Respect is the Desire of everybody’s mind,

But is only given to people who are kind.

*2Respect is given to those who deserve it,

And is not given to those who are unfit for it.

*3Respect is like a fuel of life,

Without which a man cannot work rife.

*4Respect to our elders plays an important role,

As its the blessing to achieve our goal.

*5Respect is like a bullet of a gun,

Which Travels with us in long run.

*6Respect when given to all,

His reputation will never fall.

©sahajsabharwal.

-Sahaj Sabharwal.

-Chowk Chabutra, Jammu

-11th Class.

Delhi Public School, Jammu #India #Poem #Jammu #sahajsabharwal12345 #DelhiPublicSchool #DpsJammu

Poem ID: 276

Poet’s Name: Chanda Arya
Poem Title: नन्हा सिपाही
Location: Pantnagar/Uttarakhand
Occupation: Government
Poem Length: 18 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: January 28, 2012
Poem Submission Date: July 30, 2018 at 6:02 am

Poem:

वो भीड़ में चलता छोटा बच्चा
रुक जाता है यूँ ठिठक कर
बैठ गया है वहीं सड़क पर,
कुछ अनमोल पा गया है शायद
हाथ में उठा कुछ झाड़ पोंछ रहा है शायद,
चेहरे का भाव बदल रहा है
वो मासूमियत में गर्व छलक रहा है,
माथे से लगा अपनी कमीज पर सजा लेता है
वो नतमस्तक हो तिरंगे को दिल से प्रणाम करता है।
वो भीड़ में चलता छोटा बच्चा
सीने पे संभाले तिरंगे को चल रहा है यूँ सिंह की भाँति,
जैसे डटा हो सीमा पर अपनी धरा की रक्षा को
बर्फ के योगी हिमालय की की भाँति,
देश का प्रहरी ….. वो सजग, निडर नन्हा सिपाही
कर लिया है प्रण जैसे देश के लिए मर मिटने का
वो भीड़ में चलता छोटा बच्चा
दे रहा है वचन स्वयं को भारत माँ की सुरक्षा का।
वो भीड़ में चलता छोटा बच्चा……

Poem ID: 277

Poet’s Name: Disha kumawat
Poem Title: आखें भर आई हमारी।
Location: Mumbai
Occupation: Student
Poem Length: 21 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: February 10, 2000
Poem Submission Date: August 2, 2018 at 2:51 pm

Poem:

आखें नम हूई हर उस माँ की,
जिसके बेटे ने कहा की,
मेरे शव को देखकर रोना नहीं,
बचाऊँगा हर उस माँ व बहन को जिसे होगी मेरी जरुरत,
फिर आकर सो जाउँगा तेरी गोद में अगर मिली मुझे फुरसत।

आखें भर गई हर उस बहन की,
जिसके भाई ने कहा की,
राह न तू देखना मेरी बस यू ही आँगन सजाऐ रहना,
अगर में न लोंटू तो मेरी तसवीर के सामने राखी सजाऐ रहना।

दिल पे पतथर रखकर छोंड आई उसे दवार तक,
सोचके यही कि लौट आऐगा आज नहीं तो कल तक,
हर पल मुशकिल से कटने लगा था,
इंतजार हर दिन होने लगा था।

उसकी गाड़ी एक दिन चौराहे पर आई,
तिरंगे में लपेटे थी उसे लाई,
उनके आखों से आँसू थम नहीं रहे थे,
बस यादों के पिटारे खुल से रहे थे ।

Poem ID: 278

Poet’s Name: Nisha kashyap
Poem Title: वो आखिरी पल
Location: Delhi
Occupation: Student
Poem Length: 23 lines
Genre: Karuna (pathos)
Poem Creation Date: May 7, 2018
Poem Submission Date: August 5, 2018 at 3:46 am

Poem:

न जाने कैसी बेचैनी थी
दम सा घुट रहा था
मुझे क्या पता था
आखिरी पल था वो मेरा
मौत बहुत नजदीक थी
बिल्कुल घर की दहलीज पर
पर इन नजरों को इंतजार था
तुम्हारा
और ये नजरें जो बार-बार
मुझसे कह रही थी
बहुत थक गयी हूँ
अब तो इन्हें बंद कर लेने दो
और यूँ ही इंतजार करते करते
मेरी नजरे टिक-सी गयी
थम सी गयी
घर की उसी दहलीज पर
ना जाने आज सब मुझे घेरे हुए थे
इस उम्मीद से की शायद
अब कुछ बोलूंगी
पर अब उठूं भी तो किसके लिये
बहुत वर्ष हुए मुझे सोए हुए
अब मैं बस इस हरी घास में
शांति से सोना चाहती हूं

Poem ID: 279

Poet’s Name: MANPREET GABA
Poem Title: Dard motivational poem
Location: yamuna nagar, haryana
Occupation: Student
Poem Length: 30 lines
Genre: Shant (peaceful)
Poem Creation Date: January 12, 2017
Poem Submission Date: August 5, 2018 at 1:02 pm

Poem:

कुछ दर्द ऐसे भी होते हैं, जिनकी आवाज़ नहीं होती,
कुछ सुख ऐसे भी होते हैं, जिनकी ख़ुशी नहीं होती,
ख़ुशी देती हैं मंजिले,पर रास्ते दर्द भरे होते है,
इसलिए हर किसी की ख्वाहिशें पूरी नहीं होती,
कुछ छू लेते हैं आसमान पंछी बनकर,
और किसी के होसलो में उड़ान नहीं होती !

चाँद के पास चांदनी तो है,
लेकिन रोशिनी ज्यादा चमकदार नही होती,
फूलो के पास खूबसूरती तो है,
पर ज्यादा दिनों की मेहमान नही होती,
इंतजार करती हैं कामयाबी,
पर उस तक पहुचना हर किसी के बस की बात नही होती,
इसलिए कामयाबी हर किसी के पास नही होती कुछ पहुंच जाते हैं,
कामयाबी तक भंवरा बनकर और किसी की कामयाबी किस्मत को स्वीकार नही होती,

उड़ने की ताकत पतगों के पास भी होती हैं,
लेकिन क़ाबलियत उसका सबसे बड़ा हथियार होती हैं,
किस्मत भी देती हैं साथ हमारा,
पर सबको अपने हुनर की पहचान नहीं होती हैं,
कुछ तोड़ देते हैं किस्मत की जंजीरे हथोडा बनकर,
और किसी के पास किस्मत से लड़ने की ताकत नही होती !
BY MANPREET GABA

Poem ID: 280

Poet’s Name: Ragni
Poem Title: पूर्वजों की देन ये धरती
Location: Hyderabd
Occupation: Teacher
Poem Length: 19 lines
Genre: Other
Poem Creation Date: August 3, 2000
Poem Submission Date: August 11, 2018 at 12:43 pm

Poem:

To my Mother Earth a Poetry Dedication
To my Mother Earth a Poetry Dedication

पूर्वजों की देन ये धरती ,
चलो इसको स्वर्ग बनाए I
स्वच्छ धरा बना कर हम ,
धरती को सुंदर बनाए I
इस धरा को जब हम माँ बुलाते हैं ,
तो क्यों इस जन्मदायिनी ,माँ धरती पर गंदगी फैलाते है I
जननी जन्म भूमि इतनी पावन तू थी ,
माफ़ करना हम नासमझो को ,जो हमने आपको प्रदूषित की I
यूँ तो हम सब पौरुष बुद्धिमता दिखा रहे हैं ,
पूरी दुनिया में अपना ध्वज लहरा रहे है I
लेकिन अपनी ही धरती को के आँगन को बंजर बनाये जा रहे हैं I

तो फिर चलो हम छोटे सैनिक ;
मिल – जुल कर माँ के संरक्षक बन जाये ,
प्रदूषण नामक शत्रु से माँ को मुक्त कराये I
गुज़ारिश और निवेदन आप सबसे करती हूँ ,
अपने स्कूल के प्रांगण से प्लास्टिक को मुक्त करें I
बंद करे प्लास्टिक का उपयोग बनाये अपनी धरती को स्वच्छ ;
यही संदेश जन – जन को पहुँचाना है ,
प्लास्टिक को हमारे वातावरण से मुक्त कराना है I
Ragini
Educator
Silver Oaks School

Poem ID: 281

Poet’s Name: desh ke veer jawan
Poem Title: देश के वीर जवान
Location: jabalpur mp
Occupation: Student
Poem Length: 21 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: August 15, 2000
Poem Submission Date: August 15, 2018 at 4:26 am

Poem:

देश के वीर जवान
देश की शान हे,हे देश का मान,
ये हे हमारे वीर जवान.
देश के गौरव ये,देश के रक्षक हे,
हे हमारे वीर जवान.

हमारे लिए सरहद पर खेड़े, हमारे खातिर बो दुश्मन लड़े.
ईन्होने छोड़ा सुखमय परिवार का साथ,
देश के लिए आखरी सास तक लदे.

वतन के लिए मार मिट जाए ये,
जे भारत मा का नारा लगते जान दे जाए ये.
देश को समर्पित की ईनहोने अपनी आबरू ,
हमारे हिट के लिए हर पल लेड.

हे मात्रभूमि ईन्को प्रधान,
सारा जीवन करते ईसका सम्मान
धरती की मीटटी ईनको प्यारी,
आवाद रहेगी हमेसा ईनकी दिलदारी.

तिरंगा ईनाकी जान हे ,
मीट्टी से हमारी पहचान हे.
हर सीपाही यही कहता.
देश से ही हमारी पहचान हे.

Poem ID: 282

Poet’s Name: Chetna Kumari
Poem Title: आंसू
Location: Motihari, Bihar
Occupation: Student
Poem Length: 20 lines
Genre: Karuna (pathos)
Poem Creation Date: January 20, 2012
Poem Submission Date: August 15, 2018 at 5:14 am

Poem:

आग जो मेरे अंदर हैं,
आंखों से बहती निर्झर है।
आंसू ना होते तो जल गए होते हम,
शायद मर गए होते हम।
कसक होने पर फूट-फूट कर रोते हैं हम,
आंसू ना होते तो घुट-घुट के मर गए होते हम।

आंसू वो है–
जो अंदर की आग बुझाती है।
दिल बेचैन हो तो समझाती है।
सीने की आग पिघलाती है।
जीने का सबब बतलाती है।
अकेले में भी साथ निभाती है।
उलझन को छम-छम बरस सुलझाती है आंसू।

कभी अपनी सी लगती है
आंसू, तो कभी छलनी सी लगती है
आंसू। आग जो मेरे अंदर है,
आंखो से बहती निर्झर है, निर्झर है।

Poem ID: 283

Poet’s Name: Akashdeep Dhar
Poem Title: In The Surge Of Blood
Location: Pune, Maharashtra
Occupation: Student
Poem Length: 51 lines
Genre: Bhayanak (terrifying)
Poem Creation Date: November 1, 2012
Poem Submission Date: August 21, 2018 at 2:29 pm

Poem:

IN THE SURGE OF BLOOD
Composed by Akashdeep Dhar
With the deep wounds of the past, I still remain,
Red ran dry and left back in an unbearable pain.
I carry in my mind, the same old fear;
Sufering, in the wait, to see it disappear.
Obstinacy in its veins, it vows to last,
Long, brandishing the blood thirsty cutlass.
Break loose, they dig into my guts deep;
Pure crimson fowing out through a big leak.
Patched up to glory and returned to the feld,
Vengeance was the only path visible to me.
In a surge of blood to my head, I recall ;
The nights, spent awake, I’ll prove this to all!
Rendered nearly lifeless with a sudden betray,
With a heartbreak, too hard to handle.
Come for me! Instead of relying on the fate;
I’d fght you. I’d rather bleed to my death.
Warcry becomes louder as the moment closes in,
Prepared to fght in a place we’re not supposed to be.
To rewrite the rules, To paint it on the walls;
That we’d rule and you’d be the one who falls!
Own turns against own, still a truth we deny,
Bereft of all guilt. Unheard will go our cries.
In a surge of blood to my heart, I still crawl;
Still limp but don’t give in to this fall!
Flags and swords remain there, painted red,
All sides lost, damned in a futile struggle.
Those ruling kingdoms, voiding sentiments;
To make a kill, lie here in eternal silence.
With the trade turning too expensive on me,
Peace can’t be aforded, harmony is luxury.
Punished to see those innocent faces again;
The guilt inside devours me into a nightmare.
Having back the rule still feels like a battle lost,
Seeing warm afection of ours turn into frost.
In a surge of blood to my mind, I was caught;
Sacrifces went in vain and it was all my fault!
All the violence and the war took its toll on me,
Those moments pull me out of all the sanity.
Families torn into pieces, children orphaned;
A happy past was just a memory getting faint.
They don’t have a punishment for my guilty head,
Too heavy of a burden to carry, nowhere to rest.
Old comrades stop me from a self-chastise;
I’d rather start hearing to those painful cries.
I’ll be here, dedicate myself to serve this place,
Its all on me, so it will be me to clear this mess.
In a surge of blood to my soul, I’ll be reborn;
To cure all the wounds that I have torn!

Poem ID: 284

Poet’s Name: Vanshika Gupta
Poem Title: Your dreams are valuable
Location: Kakinada
Occupation: Student
Poem Length: 30 lines
Genre: Other
Poem Creation Date: July 7, 2002
Poem Submission Date: August 27, 2018 at 4:11 pm

Poem:

It is in English

Poem ID: 285

Poet’s Name: suraj prajapati
Poem Title: यूं ही
Location: RAMPURA
Occupation: Professional Service
Poem Length: 36 lines
Genre: Shringaar (romantic)
Poem Creation Date: August 1, 2012
Poem Submission Date: September 5, 2018 at 5:56 am

Poem:

कोशिशें करता हूँ हजारों
यूं ही कभी बात होती नही।

फिजाएं बहती है चाहत पाने के लिए
रोज तो सावन होता नहीं।
कह दो आसमां से आने दें बादल
यूं ही करीब वो आती नहीं।

रट गयी है किताबें सारी
हल कहीं नजर आता नहीं ।
आ जाता हूं दर खुदा के
यूं ही कोई इबादत करता नहीं ।

होठों पर हसीं , दिल में बैचैनी ?
यूं ही किसी की परवाह होती नहीं।
शायद रुके हुए हैं जसबात लबो पर
यूं ही किसी की आंखें नम होती नहीं।

है दुनिया में हसीन चेहरे लाखों
दिल को अब कोई और भाता नहीं।
कुछ तो बात होगी चाहत में उनकी
यूं ही किसी से दिल की पहल होती नहीं।

बता पाए जो अपने हर एहसास को
मैं वो गुलज़ार बन पाता नहीं ।
चला आता हूं बस्ती में तेरी
यूं ही किसी का दीदार मैं करता नहीं ।

समझ सके जो मेरी समझ को
ऐसी समझ कोई मिलती नहीं।
क्या करूं इस दिल को तेरे सिवा
यूं ही किसी से मोहब्बत होती नहीं ।

कोशिशें होती रहे करीब आने की
शायद मिल गयी है जिंदगी नयी ।
ढूढता हूं जब भीतर झांक के
यूं ही खुद से मैं जुदा होता नहीं ।

खुली आंखों से सपने देखना
नींद तो मुझे अब आती नहीं ।
लिख देता हूं भाव सारे
यूं ही कविता मैं लिखता नहीं ।

कोशिशें करता हूँ हजारों
यूं ही कभी बात होती नही।

Poem ID: 286

Poet’s Name: Anju Damodaran
Poem Title: अनंत काल से भी पुरातन भारत
Location: Karnataka
Occupation: Government
Poem Length: 39 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: August 15, 2012
Poem Submission Date: September 22, 2018 at 1:39 pm

Poem:

जो अनंत काल से भी पुरातन,
ऐसे भारत का वर्णन करती हूँ
जो मृदुल मुकुल से भी नूतन,
प्यारे भारत की चर्चा करती हूँ।

जो अनंत काल से भी पुरातन,
ऐसे भारत का वर्णन करती हूँ
जो मृदुल मुकुल से भी नूतन,
प्यारे भारत की चर्चा करती हूँ।

ऋग, यजुर् अथर्व, सामवेदों का दर्शन है, -२
उपनिषद देते आध्यात्म का संदेश हैं,
संहिताओं में बसता विज्ञान विशेष है,-२
जहाँ निर्माता, निर्वहनकर्ता और मोक्षदाता,
श्री ब्रह्मा, विष्णु और महाकाल महेश हैं,
ऐसा पुरातन भारत मेरा देश है-२।

उत्तर में नगराज हिमालय विराजते,
दक्षिण में सिंधु चरण पखारते,
पूरब में अरब सागर है और,
पश्चिम में बंगाल की खाड़ी है।
जहाँ छः ऋतुएँ बड़ी ही श्रेष्ठ हैं
जहाँ की सभ्यता सबसे ज्येष्ठ है,
मैं ऐसे भारत का विवरण देती हूँ।

भारत का प्रतिक्षण विकास होता है,
कलाम और अटल जैसे भारत रत्नों से निर्माण होता है,
अब चाँद पर ही नहीं, मंगल पर भी पहुँच है हमारी,
प्रथम है भारत जो एक सौ चार
उपग्रहों का प्रक्षेपण एक बार करता है,
प्रथम है भारत जो एक सौ चार
उपग्रहों का प्रक्षेपण एक बार करता है।

सीमा पर जो हमारी सुरक्षा में तैनात रहता है,
बर्फ़ीली आँधियों में भी लड़ता रहता है,
बेटा, भाई, पति है जो किसीका,
उसे भारत का बेटा कहने पे नाज़ होता है-२
सर हमारा झुकता है उसे नमन को,
जो भारत माता की जय का स्वरनाद करता है।
जो भारत माता की जय का स्वरनाद करता है।

Poem ID: 287

Poet’s Name: swati grover
Poem Title: द्रोपदी का पत्र
Location: Delhi
Occupation: Teacher
Poem Length: 29 lines
Genre: Karuna (pathos)
Poem Creation Date: May 11, 2000
Poem Submission Date: September 23, 2018 at 4:39 pm

Poem:

प्रिय नारी

तुझे अबला कहो, सबला या बेचारी

क्षमा करना देवी तेरी भावनाओ को आहत करने की मंशा नहीं हैं

इस वीभत्स पुरष का अनाचार अभी तक रुका नहीं हैं

मैं सोच रही थी कि अगर उस समय भी सविधान होता

तो में कोर्ट के चक्कर लगाती रहती

और दुशासन बड़ी शान से बरी होता

मेरे केश तो खुले रह जाते

और यह हृदय सदा के लिए छलनी होता

तुम्हारी सरकार का यह कैसा इन्साफ हैं

बालिग़ अपराध करके नाबालिग की सजा माफ़ हैं

आज भी न्याय किसी सभा में परास्त हो रहा हैं

तेरा इंन अंधे, बहरे अहंकारियों के बीच हास-परिहास हो रहा हैं

यह चाहते तो ऐसा सम्मान कराते

उस क्रूर को राष्टपति के हाथो सिलाई मशीन दिलवाते

इस पत्र का अंत इस बात से करती हूँ

जो दिखता हैं वही छीन लिया जाता हैं

चीर तो चीर हैं किसी सभा में भी खीच लिया जाता हैं

तेरा आत्मसम्मान इस अस्मिता से कही बड़ा हैं

याद रखना इसी गौरव के आगे पूरा कौरव वंश

कुरुक्षेत्र की रणभूमि पर हारकर गिरा पड़ा हैं

रीति-रिवाज हमसे हैं हम उनसे नहीं हैं

मंन की पवित्रता किसी के गिराने से गिरी नहीं हैं

गली में चलते हुए कोई पागल कुत्ता काट जाये

तो घर से निकलना बंद नहीं करना

मैं भी नहीं डरी तू भी न डरना

आज तू कितने दुशासन और जयद्रथो से घिरी पड़ी हैं

सच तो यह हैं कि तू द्रोपदी से भी बड़ी हैं

तू द्रोपदी से भी बड़ी हैं……………………..

Poem ID: 288

Poet’s Name: Debashis Mazumdar
Poem Title: देख तमाशा हिन्दूसस्थान का,
Location: Pune, Maharashtra, India
Occupation: Other
Poem Length: 27 lines lines
Genre: Other
Poem Creation Date: December 9, 2018
Poem Submission Date: September 27, 2018 at 5:03 pm

Poem:

देख तमाशा हिन्दूसस्थान का,
अपने ही ज़मीं पे नारा लगे,
परायी मुल्क पाकिस्तान का,
देख तमाशा हिन्दूसस्थान का ।

स्वच्छ भारत का नारा लगे, बात चली नारी के स्वाभीमान का,
शौचालय तो खूब बने, फिर भी राह करे खेत खलीहान का,
देख तमाशा हिन्दूसस्थान का ।

धर्म के नाम पर दंगे फसाद, हिंसा लूट चारों ओर हाहाकार,
पदमावती पदमावत बने, एक कहानी राजस्थान का,
देख तमाशा हिन्दूसस्थान का ।

बड़ा नोटबंदी करे, छोटा करे बैंक बंद,
नाक नीचे चोरी करे, चौकशी , नीरव, माल्या के गैंग,
हाय रे जनता क्या करे, लाज रखे कौन हमारे सम्मान का,
देख तमाशा हिन्दूसस्थान का ।

पूजे जाते हैं यहाँ दुर्गा काली, दरगाह मे गाए जाते क्ववाली,
तीन तलाख मे बीवी छोड़े, घरवाली को देते गाली,
जिस जहाँ पर ना होती इज्जत नारी, किसान ओर जवान का,
कौन करे जुगाड़ उसके उत्थान का,
देख तमाशा हिन्दूसस्थान का ।

अब भी सम्भलो मेरे देश के प्यारों,
न कचड़ा फेंको न सिगनल तोड़ो,
बाबा और मौलवी को छोड़ो,
उठो जागो तेज़ दौड़ो,
अब हमारी बारी है,यह मौका अब ना छोड़ो,
तमाशा बनके ऐसा तमाचा मारो,
के विश्व करे बयाँ हमारी दास्ताँ का,
और कहे यह होता है तमाशा हिन्दूसस्थान का ।

कवि देबाशीष

Poem ID: 289

Poet’s Name: kirti phirke
Poem Title: दरीया
Location: alandi
Occupation: Student
Poem Length: 16 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date:
Poem Submission Date: October 2, 2018 at 9:32 am

Poem:

क्या करू मैं तारीफ ‘तेरी,
तू खुद्द एक समा है!
तुझ मैं समा जाऊ ,
तू तो खुद्द एक समंदर है!
इश्क कि हर बाजी तू,
इश्क कि हर नाराजी तू है!
तेरे खयाल सारे मेरे ख्वाब,
उन आँखो का हर लम्हा मेरी जान है!
तुझसे शुरु मेरी दिवानगी,
तुझपे खतम मेरी हर मदहोशी है!
तू तो हर मौसम बरसात,
तुझ मैं समाने का यही तो एक जरिया है!
नदी , समंदार सारे तेरे अंदर,
तुफान तो बस तेरे इश्क मैं है!
तू हि राहत , तू हि चाहत , तू हि मेरी मंजिल,
तुझ तक पहुचने का बस इश्क हि तो दरिया है!

Poem ID: 290

Poet’s Name: AMIRUDDIN SHAMS
Poem Title: बात उस रात की।
Location: Madhubani, Bihar
Occupation: Student
Poem Length: 24 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date:
Poem Submission Date: October 8, 2018 at 10:41 am

Poem:

“ ना हम भूले है, ना दुनिया भूलेगी, लम्हा वो।
जब, मार गिराया था आतंकियों को, घुसकर उनके अड्डों में। ”

➡ ये बात उस रात की है। जिस रात सारी दुनिया तो सो रही थी, लेकिन हमारे वीर-सैनिक, देश को आतंकियों से बचाने की तैयारियों में जुटे हुए थे। जिसे, मैंने अपने शब्दों में, कुछ यूँ बयाँ किया है। कि!

“ रात थी अंधेरी, सो रही थी, दुनिया सारी।
फिर भी, जग रहे थे, भारत के वीर सिपाही।

जज्बा था, देश पर मर मिटने का।
फैसला था, आतंकियो को मार गिराने का।

फिर, बाँध कफ़न, सर पे, वो चल पड़े।
मार गिराने, दुश्मनो को, वो निकल पड़े। ”

➡ फिर हमारे वीर-सैनिक, आतंकियों के अड्डे की तरफ बढ़ने लगते है। और एक-दूसरे की हिम्मत बढ़ाते हुए कहते है। कि!

“ आज उन्हें, सबक ये, सिखानी है।
मैं क्या हूँ, बात ये, उसे बतानी है।

ये टोली है, भारत के उन वीर जवानों की।
जो, डटे रहते निडरता से, हटते नही पीछे कभी।

डर कर, वो सब, भाग जाते हैं।
जब, कंधो से कंधे, हम मिलाते है। ”

➡ जब, हमारे देश के वीर-सैनिक आतंकियों के अड्डे पर पहुँच जाते है। तो आतंकियों से कहते है!

“ कितना साहसी, कितना निडर हूँ।
देख मुझे, तेरे सामने खड़ा हूँ।

सर काटे थे, जिनके तूने, धोके से।
बदला उनका, आज लेने, मैं आया हूँ।

फना होने की इजाजत ले आया हूँ।
तुम्हे मौत के घाट उतारने, मैं आया हूँ।

बड़ी गहराई है, मेरे देश के संस्कारों में।
बदौलत जिसके, आज तक, तूने ज़िन्दगी पायी है। ”

➡ और फिर आतंकियों को मार-गिराते हुए, हमारे वीर-सैनिक, शहीद-सैनिकों के बारे में, आतंकियों से कहते है। कि!

“ बुझ दिल नही, साहसी था वो, जो वतन पे मिट गया।
अमन चाहता था वो, शायद इसलिए, तेरे हत्थे चढ़ गया। ”

AMIRUDDIN SHAMS

Poem ID: 291

Poet’s Name: AMIRUDDIN SHAMS
Poem Title: बात उस रात की।
Location: Madhubani, Bihar
Occupation: Student
Poem Length: 24 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date:
Poem Submission Date: October 8, 2018 at 10:43 am

Poem:

“ ना हम भूले है, ना दुनिया भूलेगी, लम्हा वो।
जब, मार गिराया था आतंकियों को, घुसकर उनके अड्डों में। ”

➡ ये बात उस रात की है। जिस रात सारी दुनिया तो सो रही थी, लेकिन हमारे वीर-सैनिक, देश को आतंकियों से बचाने की तैयारियों में जुटे हुए थे। जिसे, मैंने अपने शब्दों में, कुछ यूँ बयाँ किया है। कि!

“ रात थी अंधेरी, सो रही थी, दुनिया सारी।
फिर भी, जग रहे थे, भारत के वीर सिपाही।

जज्बा था, देश पर मर मिटने का।
फैसला था, आतंकियो को मार गिराने का।

फिर, बाँध कफ़न, सर पे, वो चल पड़े।
मार गिराने, दुश्मनो को, वो निकल पड़े। ”

➡ फिर हमारे वीर-सैनिक, आतंकियों के अड्डे की तरफ बढ़ने लगते है। और एक-दूसरे की हिम्मत बढ़ाते हुए कहते है। कि!

“ आज उन्हें, सबक ये, सिखानी है।
मैं क्या हूँ, बात ये, उसे बतानी है।

ये टोली है, भारत के उन वीर जवानों की।
जो, डटे रहते निडरता से, हटते नही पीछे कभी।

डर कर, वो सब, भाग जाते हैं।
जब, कंधो से कंधे, हम मिलाते है। ”

➡ जब, हमारे देश के वीर-सैनिक आतंकियों के अड्डे पर पहुँच जाते है। तो आतंकियों से कहते है!

“ कितना साहसी, कितना निडर हूँ।
देख मुझे, तेरे सामने खड़ा हूँ।

सर काटे थे, जिनके तूने, धोके से।
बदला उनका, आज लेने, मैं आया हूँ।

फना होने की इजाजत ले आया हूँ।
तुम्हे मौत के घाट उतारने, मैं आया हूँ।

बड़ी गहराई है, मेरे देश के संस्कारों में।
बदौलत जिसके, आज तक, तूने ज़िन्दगी पायी है। ”

➡ और फिर आतंकियों को मार-गिराते हुए, हमारे वीर-सैनिक, शहीद-सैनिकों के बारे में, आतंकियों से कहते है। कि!

“ बुझ दिल नही, साहसी था वो, जो वतन पे मिट गया।
अमन चाहता था वो, शायद इसलिए, तेरे हत्थे चढ़ गया। ”

AMIRUDDIN SHAMS

Poem ID: 292

Poet’s Name: Vidushi Rai
Poem Title: ये स्वतंत्रता महान है
Location: Lucknow , Uttar Pradesh
Occupation: Student
Poem Length: 17 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: January 12, 2012
Poem Submission Date: October 12, 2018 at 11:02 am

Poem:

ये स्वतंत्रता महान है….
कितने सपूतों की बली ,
मातृभूमि पर चढ़ी ,
तब मिला सम्मान है ,
ये स्वतंत्रता महान है।
प्रगति पथ प्रशस्त हो ,
हर नागरिक आश्वस्त हो ,
प्रखर किरण के ओज सी,
हर आशा प्रचण्ड हो ।
आस तब साकार है,
ये स्वतंत्रता महान है।
उम्मीद पर खरे रहें,
ईमान पर डटे रहें,
देश के सम्मान हेतु ,
चट्टान से जमे रहें।
आस तब साकार है,
ये स्वतंत्रता महान है।

Poem ID: 293

Poet’s Name: Rohan Khimavat
Poem Title: Bish
Location: pune
Occupation: Student
Poem Length: 20 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: November 14, 2012
Poem Submission Date: November 28, 2018 at 4:21 pm

Poem:

Be a bish!
This is for all the ladies and girls,
You deserve all the respect in the world
Your body isn’t weak, it’s their souls who think it is,
You’re just as powerful as them, those who call you small are just full of frizz
You don’t need to fit in glass slippers, shatter the glass walls that hold you back,
Because when free, only then will you be strong, you won’t need to hide behind walls or peep thru cracks
No one can tell you what to wear or how to speak, you will be the queen of your own thoughts and body,
Dress what makes you feel confident and face the crowd as a proud lady
Don’t change yourself to be likable, you don’t need to be a good girl to be loved,
Be how the world deserves to know you, be bold, never numbed
Love fiercely and have deep feelings, that’s a quality which makes you special,
You will be what people heed in pain and trouble, you’ll be their lifeline, you’ll be crucial
Loving yourself should be on top of your list, your self-respect higher than Mount Everest
Because no one can help you except yourself, your goals are your dreams, your quest
Don’t look for a knight, be one for all,
Be so great that they can’t pull you down but help those below you, who are weak and crawl
You can have real flaws, you don’t need to hide them,
But also have great qualities, deserve the people and the respect you wish from
Be like water, soft enough to give them lives,
But if they cross the bar, drown them down with your knives!

Poem ID: 294

Poet’s Name: Pawan Kumar Upadhyay
Poem Title: तुम्हारे मूरत से बढ़कर इस जहाँ में कोई खूबसूरत नहीं है
Location: Noida, Uttar Pradesh
Occupation: Software
Poem Length: तुम्हारे मूरत से बढ़कर इस जहाँ में कोई खूबसूरत नहीं है lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date:
Poem Submission Date: December 3, 2018 at 12:39 pm

Poem:

मेरे लिए परिवार से बढ़कर
इस जहाँ में कोई दौलत नहीं है
मेरे लिए सम्मान से बढ़कर
इस जहाँ में कोई सोहरत नहीं है ||

हक़ीक़त से वास्ता रखता हूँ
हवा में कोई भी बात नहीं करता
झूठी दिलासा से बढ़कर
इस जहाँ में कोई फितरत नहीं है ||
मेरे लिए परिवार से बढ़कर
इस जहाँ में कोई दौलत नहीं है
मेरे लिए सम्मान से बढ़कर
इस जहाँ में कोई सोहरत नहीं है ||

संदेश चाहे अनुशाशन का हो
या फिर चैन और अमन का हो
आपस की लड़ाई से बढ़कर
इस जहाँ में कोई नफरत नहीं है ||
मेरे लिए परिवार से बढ़कर
इस जहाँ में कोई दौलत नहीं है
मेरे लिए सम्मान से बढ़कर
इस जहाँ में कोई सोहरत नहीं है ||

ए मेरे जीवन के मालिक और
इस जहाँ के रखवाले तुम हो
तुम्हारे मूरत से बढ़कर
इस जहाँ में कोई खूबसूरत नहीं है ||
मेरे लिए परिवार से बढ़कर
इस जहाँ में कोई दौलत नहीं है
मेरे लिए सम्मान से बढ़कर
इस जहाँ में कोई सोहरत नहीं है ||

Poem ID: 295

Poet’s Name: Rohan Srivastava
Poem Title: मतदान
Location: Bengaluru
Occupation: Software
Poem Length: 24 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date:
Poem Submission Date: December 31, 2018 at 9:16 am

Poem:

ना आन दो, ना शान दो
मेरी रक्षा मे आज बस मतदान दो |

आज वक़्त है तुम्हारे पास, मेरे लिए कुछ करने का
ये वक़्त नई मैदान-ए-जुंग का, ये वक़्त है शांति से लड़ने का
विकल्प होंगे मार मिटने वाले, तो कुछ मुझे मिटाने वाले
ना बनो मौन मूर्ख तुम, बनो आवाज़ उठाने वाले
कहते हो भारत माँ मुझे, तो बस माँ जैसा ही सम्मान दो |

ना आन दो, ना शान दो
मेरी रक्षा मे आज बस मतदान दो |

ये वक़्त नई है सोने का,
ये वक़्त नया बीज, है बोने का,
इस वक़्त को यू ना बर्बाद कर
अपने सही मत से इस देश को आबाद कर
मेरी धार को संभाल ले जो,चुनकर ऐसी उचित एक म्यान दो |

ना आन दो, ना शान दो
मेरी रक्षा मे आज बस मतदान दो

वीर पथ है ये ना तुम रुकना कभी,
कितनी भी हो मुश्किले ना तुम झुकना कभी
ना चुनना भ्रष्टाचारी को
ना चुनना कोई अहंकारी को
चुनना मेरी सेवा हेतु सिर्फ़ ईमानदारी को
मैने क्या क्या नई दिया तुम्हे, तुम भी चुन कर, मुझे एक सुपूत महान दो |

ना आन दो, ना शान दो
मेरी रक्षा मे आज बस मतदान दो |

Poem ID: 296

Poet’s Name: Rahi Mastana
Poem Title: HINDI KE SAMMAAN MAIN
Location: GHAZIABAD
Occupation: Professional Service
Poem Length: 10 lines
Genre: Other
Poem Creation Date: October 1, 2019
Poem Submission Date: January 10, 2019 at 5:34 pm

Poem:

हिंदी के सम्मान में कुछ काव्यात्मक व्याख्यान करूँ,
कभी दिनकर, कभी प्रेमचंद, कभी निराला का आह्वान करूँ |
यूँ तो हिंदी हर रग में है, पर कवियों के लिए बनी जान है हिंदी,
कभी दिखती दोहों में तो, छन्दों की बनी शान है हिंदी |
कभी दर्शाये गीतों को तो, कभी पाठ का पद्यांश है ये,
मुझ अदने से कवि के लिए, सारे जीवन का सारांश है ये |
हे तुलसी के श्री राम प्रभु, सूरदास के नटखट कृष्णा,
हिंदी में मुझे परिपक़्व करो, दूर करो मेरी ये तृष्णा |
सच्ची महत्ता बखान करूँगा, जब हिंदीभाषी बन जाऊंगा,
सरल ह्रदय हो जायेगा मेरा, में भी मृदुभाषी कहलाऊंगा |

Poem ID: 297

Poet’s Name: Vaishnavi Singh
Poem Title: ओ जनाब ज़रा ठहरिये
Location: Gwalior
Occupation: Student
Poem Length: 16 lines
Genre: Other
Poem Creation Date:
Poem Submission Date: February 1, 2019 at 5:25 pm

Poem:

ओ जनाब ज़रा ठहरिये
एक सवाल करना है
वोटों की राजनीति में
क्यों देश को बरबाद करना है?
जब यह देश है सबका तो
क्यों इसे हिंदु-मुसलमान करना है?
पल-पल बिखरते देश को देख
रोता है मेरा दिल
यूँ हर जवान की शहादत का
क्यों अपमान करना है?
माँ भारती के लिए तो
रक्त बहुतों ने बहाया है
पर अपनों को अपनों से लङवाकर
क्यों देश को बरबाद करना है?
ओ जनाब ज़रा ठहरिये
एक सवाल करना है

Poem ID: 298

Poet’s Name: Ratikanta mohapatra
Poem Title: Indian
Location: Bubaneswar Odisha
Occupation: Student
Poem Length: 13 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: December 1, 2015
Poem Submission Date: February 12, 2019 at 8:55 pm

Poem:

Indian

Poem ID: 299

Poet’s Name: Dua
Poem Title: बस प्यार नहीं है
Location: Kathgodam
Occupation: Student
Poem Length: 29 lines
Genre: Shringaar (romantic)
Poem Creation Date: November 2, 2019
Poem Submission Date: February 15, 2019 at 6:10 am

Poem:

मैं हूँ, तू भी है

बस प्यार नहीं है

कभी रातों में यूँ ही हँसा देता है तू मुझे

तू होता नहीं फिर भी तुझे महसूस कर लेती हूँ

अपने ख़्वाबों में तुझको महफूज़ कर लेती हूँ

खामोशी का आलम पहले भी था, अब भी है

बस अब, उस अनकही आहट का इंतज़ार नहीं है

मैं हूँ, तू भी है

बस प्यार नहीं है

यूँ ही नहीं एक रोज़ मुझे परदा सा अपने बीच दिखा

यूँ ही नहीं बैठे हो, नाराज़ तुम हमसे

कह क्यों नहीं देते, चंन्द अलफ़ाज़, तुम हमसे

क्या भादो की पहली बारिश में धुल गया है प्यार तुम्हारा

कुछ तो है, जो तुम्हे हम पर ऐतबार नहीं है

मैं हूँ, तू भी है

बस प्यार नहीं है

एक बात बताऊं, प्यार कभी ऐसी ही नहीं मिट सकता

कुछ बात पुरानी है, दामन पर दाग लगाना चाहती है

है एक गलत फहमी, रिश्तों में आग लगाना चाहती है

आँखें कर लेती जो, लफ़्ज़ों में क्यूँ करें वो गुफ़्तगू

कौन कहता है वहाँ इश्क़ नहीं, जहाँ इज़हार नहीं है

मैं हूँ, तू भी है

बस प्यार नहीं है

Poem ID: 300

Poet’s Name: Sahaj Sabharwal
Poem Title: SWACHH BHARAT
Location: Jammu,Jammu and Kashmir
Occupation: Student
Poem Length: 20 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: January 1, 2019
Poem Submission Date: February 26, 2019 at 3:03 am

Poem:

लो आ गया नया ज़माना, 

स्वच्छ भारत  बन गया है एक बहाना ।

क्या भारत की स्वच्छता का इरादा ,

टूट रहा है यह स्वच्छ भारत का वादा ।

सैलानी  हैं  आते यहाँ, 

दिखती है गंदगी देखें जहाँ  ।

क्या  वैष्णो देवी की पवित्र पहाड़ियां 

लिपटी  जो रहतीं  हैं,  बर्फीली  साड़ियां 

एवं  मनुष्य  की अपवित्रता  का साथ

दया करो हम पर तो भैरवनाथ  ।

इसी गंदगी का करना है अंत

तभी काम करेंगी भक्ति और मेलों में प्रभु या संत

                                           -Sahaj Sabharwal

              -Jammu city, Jammu and Kashmir, India. 

                     -Delhi Public School ,Jammu ,J&K,India. 

                    – 16 years old student 

+917780977469

sahajsabharwal12345@gmail.com

Poem ID: 301

Poet’s Name: Priyanka sharma
Poem Title: लो काली रात आ गई
Location: Shimla
Occupation: Student
Poem Length: 28 lines
Genre: Other
Poem Creation Date:
Poem Submission Date: March 21, 2019 at 6:04 pm

Poem:

लो आज फिर काली रात आ गई

उन दरिंदो की हैवानियत फिर मेरी एक बहन की आबरु मिटा गई

लो आज फिर काली रात आ गई।

दिन के उजाले को वो दरन्दगी अमावस्या बना गई

फिर एक बेटी का अस्तित्व मिटा गई

लो आज फिर काली रात आ गई।

न जाने इन पापियों की आत्मा कहाँ सोती होगी

ना हो किसी की बहन बेटी , माँ तो ज़रूर होती होगी

अरे ! ओ नीच हरकत करने वालों सुनो

कोई रोए न रोए तुम पर , तुम्हारी माँ ज़रूर रोती होगी।

जब वो अबोध बालिका उन राक्षसों से घिरी होगी

हाथ पावँ जोड़कर उसने सिसकियाँ भरी होगी

माँ ने घर पर गरमा गरम रोटियां पकाई होगी

पिता ने सारी पगडंडियां ताकि होंगी

कौन जानता था कि उस रात वो नन्ही कलि घर न गई ,

उसकी रूह उन दरिंदो क आगे अपना दम तोड़ गई

लो आज फिर काली रात आ गई।

उसकी हर चीख यही पूछ रही होगी

आखिर क्या गलती की थी उसने

क्यों उसे ये सजा भुगतनी पड़ी,

जाते जाते बस ईश्वर से प्रार्थना कर रही होगी कि

मेरे साथ जो हुआ ना भूलना न भुलाने देना

फिर किसी माँ से उसकी बेटी ना छीनने देना

फिर किसी पापा की लाडली को ये ना भुगतने देना

किसी और को ‘गुड़िया’ ना बनने देना।

लो आज फिर एक बेटी के लिए काली रात आ गई

आज फिर मेरी एक बहन का अस्तित्व मिटा गई

लो आज फिर काली रात आ गई ।।

-प्रियंका शर्मा..

Poem ID: 302

Poet’s Name: Satya Priya
Poem Title: माँ तुम बदल गई हो क्या?
Location: Patna,Bihar
Occupation: Student
Poem Length: 50 lines
Genre: Karuna (pathos)
Poem Creation Date: January 13, 2012
Poem Submission Date: March 22, 2019 at 4:26 pm

Poem:

माँ तू बदल गई है क्या-२
जो पहले मुझे कहती थी अलग हज़ारो मे,
अब खुद नजाने क्यों गायब है उस आसमान के लाखो चाँद तारो मे,
अब तू मुझे हर पल नही कहती खोने को उन किताबो मे,
मगर हा-२
तू अब भी मुझे कही दिख जाती है मेरे छोटी सी छोटी मुश्किलो के सहारा मे,
जैसे अगर मै गिरु कस्तियो के किनारो पे
तो तू मुझे दे सहारा बचा लेती है सारे सैतानो से।।

आज पता नही पापा कुछ ज़यादा रो रहे है,
जैसे तुझे वो हमेसा के लिए खो रहे है,
नानाजी कहते की तेरी अंतिम डोली अपने कंधो पे वो ढ़ो रहे है,
और एक फूलमाला और एक मोमबत्ती एक ऊँचे से जगह पे जाने क्यों हम सब संजो रहे है ,
आज पता नही माँ,
पापा तेरे साथ नही ब्लकि तेरी एक तस्वीर और बिस्तर पे अपने साथ आँखों में नमि लिए सो रहे है।।

नजाने कैसी नुका छिपी तू खेल रही है मेरे साथ माँ
जो छुप तो जाती हूँ मैं मगर धप्पा के साथ नही बजते पीठ पे मेरे तेरे वो हाथ,
नजाने क्यों शांत है तु,
जाने क्यों नही डांटती हर पल मुझे यु,
मै तो बताती तुझसे
अपनी हर दिन कि बात,
वो जिसे मै किसी से न बोलती थी ना
हर वो राज,
मगर शायद तू मुझसे थोड़ी है नाराज़,
इसलिये शायद करती नही अपनी बातो कि शुरूआत,
तेरी याद आये तो तेरे पास आ मै रोती हर रात
तूने मगर मेरी सुनी नही शायद वो सिसक सिसक कर रोती हुई आवाज़,
जाने कितने सख्त है तेरे वो जज़्बात,
जो मेरे आँशु भी न पहुचे तेरे दिल के पास,
आब तू ही बता दे माँ की,
क्या अब मै नही हूँ तेरे लिए बेटी वो खास।।

कभी पापा से तेरे बारे में पुछु तो कहते की
गहराई में है तेरा घर,
धरती के नीचे बंद डब्बे में बसा है तेरा और तेरे जैसों का अपना एक शहर,
भले हो यहाँ दिन या दोपहर
वहां तो हर पल है अँधेरे का ही कहर,
मग़र जाने क्यों ये कहते कहते बरसे पापा के चेहरे से आंशुओ कि लहर।।

म्गर अभी छोड़ि नही तेरे हाथो से फिरसे खाना खाने कि मैंने आस
और जभी तेरे याद आए तो देखती हूँ मै वो नीला आकाश
क्योंकि लोग मुझसे कहते है कि तेरा अब वही है वास
जाने क्यों तुझे कहते एक लाश।

माँ पता नही तू कहा चली गई है,
मेरी बातो को नजाने अनसुना क्यों कर रही है
मेरी आंशुओ को क्यों नही तू पूछ रही है
मेरी उदासी देख तू क्यों नही मुझे फिरसे मना रही है
माँ क्या तू बदल गई है?-२

Poem ID: 303

Poet’s Name: AJAY KUMAR
Poem Title: मुखौटा……
Location: Jamshedpur, Jharkhand
Occupation: Other
Poem Length: 31 lines
Genre: Other
Poem Creation Date: December 30, 2012
Poem Submission Date: March 26, 2019 at 3:32 am

Poem:

मेरे व्यक्तित्व का एक हिस्सा
कल खामोश था
न रोष, न जोश
छत – विछत गिरा
खुद के आगोश में था
मेरे व्यक्तित्व का एक हिस्सा…
मुखौटा मेरा
बातें मुझसे ही कर रहा था
रह – रह मुझको देख रहा था
और पूछ रहा था
क्यों मुझको लगाते हो ?
आकर अक्सर पीछे मेरे छिप जाते हो
हँसते कम, खुद को ज्यादा रुलाते हो
क्या हासिल कर लेते हो ?
अक्सर खाली हाथ ही तो घर को आते हो
फिर क्यों .. फिर क्यों, नहीं खुद को आज़माते हो
बेवज़ह ही न मुझको लगाते हो
सुन बातें उसकी,
मैं खामोश था
बेज़ान, पर होश में था
छत बिछात, पर खुद के आग़ोश में था
फ़िज़ाओं में एक अज़ाब का शोर था
दूर क्षितिज पर होने को अब भोर था
डूबा अतीत की स्मृतिओं के मैं
खुद को तलाश रहा था
अंदर ही अंदर खुद को तरास रहा था
और कर रहा था खुद को तैयार
कल के आरम्भ को …..2
सृजित, संचित
दूर मुखौटे से…..
दूर मुखौटे से….

Poem ID: 304

Poet’s Name: Vivek Verma
Poem Title: Salute To The Indian Soldiers!
Location: TANDA AMBEDKAR NAGAR DISTRICT
Occupation: Student
Poem Length: 38 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: February 8, 2004
Poem Submission Date: March 29, 2019 at 8:02 pm

Poem:

For us they are on border,
Who can’t break the order.
Who always ready to sacrifice,
They are as hard as Himalayan ice.
Salute to the Indian soldiers!

Because of them we are alive,
And, we are secure in Indian hive.
Who always look for command,
Who have only one brand.
Salute to the Indian soldiers!

They fight in Battle without any fear,
There is no security of future year.
Who don’t know the difference of day and night,
Who always ready to fight.
Salute to the Indian soldiers!

Who celebrate their festivals with bullets and guns,
We play Holi with colours;
But they play with rifles and guns.
They know only one colour which is ‘Blood Red’.
Salute to the Indian soldiers!

We complain for hot and cold day,
While they stay in harsh Siachen everyday.
They are never sure of their own life,
They don’t know will they ever meet his daughter, son, and wife.
Salute to the Indian soldiers!

Their village’s routes are best friends of their wife.
Why Politicians play with their life?
And, why payment of their life is done by some amount of money,
Is that all our duty towards our great Indian Army?
Again and again salute to the Indian soldiers!

Poem ID: 305

Poet’s Name: Ragni Ragni
Poem Title: Tu shurveer hai
Location: Hyderabad
Occupation: Teacher
Poem Length: 19 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date:
Poem Submission Date: April 5, 2019 at 5:13 pm

Poem:

तु शूरवीर है
तु शूरवीर है बढ़े चल ,
इम्तिहान के मैदान में I
कलम को तलवार बना ,
बढ़ता जा बिना रुके I
डर को त्याग दे ;
हिम्मत से तु आगे बढ़ ,
कोशिश करते जा तु बंदे ,
बिना रुके, और थके हुए I
जीत तुम्हारी ही होगी ,
बस इतना तु मन ले I
राह में जो मुश्किल आये, पार कर लेना तु उसे I
अपने अंदर के लौ को तु ! कभी ना बुझने देना I
जीवन में सफलता की ज्योति ,
उसी से अर्जीत करना I
एक सुनहरा भविष्य हैं ,
तु जा के ,उसको थाम ले
बढे जा ; वो बंदे रुक मत,
मेरी बात मान ले I

रागनी रागनी

हैदराबाद

Poem ID: 306

Poet’s Name: Raina
Poem Title: फौजी
Location: Ranchi, Jharkhand
Occupation: Student
Poem Length: 40 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: January 25, 2012
Poem Submission Date: April 18, 2019 at 5:02 pm

Poem:

स्मार्टफोन के जमने में भी मै चिट्ठियां लिखता हु,
घर वालो से मिल नहीं सकता ना,
इसी लिए अपना प्यार हाथो से लिख कर भेजता हु।
मेरी भी माँ मेरा इंतज़ार कर रही होगी ना,
वो भी तो आस लगाए बैठी होगी ना,
मेरे बच्चे भी तो ये खाब रखते होंगे ,
अपने जन्म दिन पर मेरे हाथो से प्यार और तौफों की ।
हाथो में थाली लिए रक्षाबंधन पर,
मेरी बहन भी तो मेरा इंतज़ार करती होगी,
लेकिन क्या मै चला जाऊ ?
तो उन माँओं का क्या होगा जो, अपने बच्चों को सुबह तैयार कर भेज देती है,
उनके बच्चे सही सलामत वापस आ जायेगें ये भरोसा रखती है। क्या मैं उनका भरोसा टूट जाने दू?
क्या मै अपने बच्चे के पास चला जाऊ?
तो उन् बच्चों का क्या होगा जो,
ये उम्मीद रखते ह की पापा आते वक़्त जरूर कुछ ले कर आएंगे।
नहीं, मैं नहीं जाऊंगा उस उम्मीद के दिए को नहीं बुझाऊगा। पहचाना मुझे?
हाँ मै फौजी
वही जो सरहद पर पहरा देता है वही जिसके लिए ईद होली दिवाली सब एक है जो होली और दिवाली रंग,अबीर और पटाखों से नहीं खून और बन्दुक की गोली से मानते है ।
जो क्रिसमस पर तोफे नहीं,
अपने मुल्क की खुशियां मांगते है।
मै वही जो ईद सवाईआं खा कर और नमाज़ अदा कर नहीं,
बस गले लग कर मना लेते है।
जो हाथ फैला रब से बस,
शांति और अमन मांगते है।
मै वही जो हफ्तों कुछ भी खा कर बीता लेता हू ,
अौर जब घर पर बात होती है ,
तो यही कहता हु की खाना आच्छे से खा रहा हु ।
हाँ मै वही जो ये जनता है,
की अब वो शायद घर नहीं लौट पायेगा,
फिर भी खत में ये लिखता है,
की माँ इंतज़ार करना तेरा बेटा एक दिन वापस ज़रूर आएगा।

Poem ID: 307

Poet’s Name: Gourav Paliwal
Poem Title: बहन तेरा बचपन
Location: Saharanpur
Occupation: Student
Poem Length: 24lines lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: June 10, 2018
Poem Submission Date: April 24, 2019 at 1:32 am

Poem:

बहन! तेरा बचपन…….

बहन!
क्या होती है बहन
इक भाई के सिर का ताज होती है
या शीतल मन में बहती प्रेममय रसधार होती है

वो होती है करुणा का रूप दिव्य ज्योति का स्वरुप
या ये कहें कि वह इस जग में आई प्रभू की एक छाया है

वो मां कि शान हैं
पिता कि पहचान है
और भाइयों के लिए एक नन्ही सी मुस्कान है

वो स्नेह जो उसने हाथ पर बांधा है
वो प्रेम माथे पर सजाया है
या जो चरणो में अमृत रूपी जल छलकाया है

चलो! चलो उसका कर्ज चुकाते हैं
दुनिया भर की खुशियां, सुकून, विश्वास आज उनके दामन में भर आते हैं

आज दिन बहुत खास है बहन के लिए कुछ मेरे पास है
तेरे सुकून के खातिर ओ बहना तेरा भाई हमेशा तेरे साथ है

दुनिया भर की खुशियां तेरे चरणों में लाऊंगा
अब मैं भाई होने का फर्ज निभाऊंगा

मैं रक्षक हूं तेरे सम्मान का, इज्जत का, प्रेम का, तेरे अंतर्मन कि दुविधा का एकमात्र उजाला हूं

अब खुदा से इक दुआ चाहता हूं
वो अनमोल वचन मैं फिर से मांगता हूं
वो ख्वाब जो शायद ही सच हो
मेरे पास ओ बहना तेरा बचपन हो

गौरव पालीवाल

Poem ID: 308

Poet’s Name: Anisha watts
Poem Title: सुपूत का प्रण
Location: Abohar, punjqb
Occupation: Student
Poem Length: 30 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: January 2, 2012
Poem Submission Date: May 7, 2019 at 4:03 pm

Poem:

वीरता की जो छवि दिखलाते,
वही है असली सुपूत कहलाते।
जान न्यौछावर जिन्हें करनी आती,
बलिदान करता दिल में वास,
जान कुर्बान करते राष्ट्र पर,
वही है असली सुपूत कहलाते।।

अपने से ज्यादा राष्ट्र को चाहते,
हर वक्त रहते तैयार ,
अपनी जान से ज्यादा करते अपने वतन को प्यार,
दुश्मन के सामने डट कर खड़ते,
मुसीबत से कभी न डरते ,
वही है असली सुपूत कहलाते।

अपने चमन को मंदिर मानते ,
करते सुरक्षा धर्म समान ,
वतन की सुरक्षा श्रेष्ठ धर्म ,
करते सुरक्षा जी जान से,
वही है असली सुपूत कहलाते।

दुश्मन से कभी न डरते ,
चाहे वीरगति को प्राप्त हैं करते,
चमन लगता जान से प्यारा,
करते हिफाज़त के लिए प्राण न्यौछावर,
वही है असली सुपूत कहलाते।

देश पर जान न्यौछावर करने सिखाते,
देश प्रेम की भावना जगाते,
हर वक़्त जागृत रहते,
वही है असली सुपूत कहलाते।

सुपुतो से तुम लो प्रेरणा,
अपनी जान कुर्बानी की,
देश भक्ति के लिए ,
बलिदान अपने प्राणों का।।

Poem ID: 309

Poet’s Name: Abhijit Sinha
Poem Title: Drop is Life
Location: Bangalore
Occupation: Professional Service
Poem Length: 8 lines
Genre: Shant (peaceful)
Poem Creation Date: January 15, 2012
Poem Submission Date: May 24, 2019 at 6:11 am

Poem:

A drop is a life

Like every drop of rain, I want to pour in thy ocean of love to remain.
Ecstatic to lose the fact of the drop of I and mix with the ocean of truth of one.
I pray you to permit me to remain in this state of being in the vastness and be nothing
expressing my gratitude with tears and folded hand for letting me be inside the gate of heaven.

But again with the new dawn of the day, you will trap me in the light of knowing.
You will let me form the small world of a drop of mine and with the labor of action to the clouds
When I reach the end of my journey I know not where to go like the kite in the sky limited by its thread of freedom

I fly with the cloud in the sky until a thunder wakes me up to the reality and I pour into thee.

Poem ID: 310

Poet’s Name: Payal Pokharna
Poem Title: दुनियाँ की रीत
Location: Deogarh (Rajsamand)
Occupation: Writer
Poem Length: 16 lines
Genre: Other
Poem Creation Date: June 4, 2012
Poem Submission Date: June 6, 2019 at 3:36 pm

Poem:

कितनी ग़ज़ब ये दुनियाँ की रीत हैं,
जो जिसको मिल जाए वो उसकी तक़दीर हैं…
जन्म से कोई अच्छा या बुरा नही होता हैं,
जिस हालात में जन्म हो वो उसका नसीब होता हैं…
दुनियाँ कैसे दो हिस्सों में बिख़र गई हैं,
एक तरफ़ अमीर तो दूसरी तरफ़ ग़रीब हैं…
यहाँ हर किसी को दौलत की भुख हैं,
कोई ईमानदारी से कमाता है तो कोई बेईमानी से पेट भरता हैं…
कोई अपनी मर्ज़ी से किसी के सामने नही झुकता हैं,
हालात उसे बेबस बना देता हैं…
जब खाने को दो वक़्त का खाना ना मिले,
तब इंसान चन्द रुपये में बिक जाता हैं…
कैसा ये हाल है यहाँ,
एक को रुपये का मोल नहीं तो दूजे के लिए पैसा भी अनमोल हैं…
कितनी ग़ज़ब ये दुनियाँ की रीत हैं,
जो जिसको मिल जाए वो उसकी तक़दीर हैं…

Poem ID: 311

Poet’s Name: Shivani chaudhary
Poem Title: Aatmnirbhar naari
Location: Kashipur uttarakhand
Occupation: Student
Poem Length: 21 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: December 4, 2019
Poem Submission Date: June 12, 2019 at 11:25 am

Poem:

Bojh nahi hai ya kisi par
Yeh hai aatm Nirbhar naari
Jaisi kisi khait main ho
Phoolon ki kyaari
Apne supno ko pankh deti khud
Khud hi udd jaati
Na hai koi sahara
Na koi saathi
Phir bhi yeh kisi se naa haari
Kyunki ye hai …..
Aatm nirbhar naari
Sir par bojh kaam ka hai
Samay nahi aaram ka hai
Tapti dhoop main jhulas rahi
Kadi thand main thithur rahi
Apni thakavat bhool gayi
Ye toh jag ki janani..
Phir bhi kose duniya saari
Ye hai aatm nirbhar naari
Jo badlegi duniya saari
Yahi hai aatm nirbhar naari….

Poem ID: 312

Poet’s Name: anamika dhawan
Poem Title: पर्यावरण
Location: Bangalore
Occupation: Teacher
Poem Length: 18 lines lines
Genre: Shant (peaceful)
Poem Creation Date: January 4, 2000
Poem Submission Date: June 24, 2019 at 11:52 am

Poem:

धरती मां की है मांग मत
कुल्हारी मारो अब,

रहने दो इस प्रकृति को मेरी गोद उजारो मत,
खुशहाली को आने दो,
बुरी नजर अब डालो ना,
मां से खिलवाड़ करें मूर्ख मानव,

जिस डाली पर बैठा है,
उसी डाली को काट रहा तू,
जिसने जीवन दिया वह प्रकृति,
बदले में तूने काट दिया,
उस दौर की खातिर,
बंजर किया उस माता को,

मूर्ख मानव मिला तुझे क्या,
प्रदूषित वातावरण भूख और महंगाई,
अब भी वक्त है संभल जा,
पेड़ लगाकर मां की गोद में,
फिर हरियाली को आने दे,
मां को फिर हरा भरा हो जाने दे.

Poem ID: 313

Poet’s Name: Vikas Singh Bungla
Poem Title: सुमेर
Location: New Delhi
Occupation: Student
Poem Length: 21 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: December 1, 2012
Poem Submission Date: July 11, 2019 at 6:45 pm

Poem:

सुमेर

नब्ज़ जब जम सी गयी थी,
साँस जब थम सी गयी थी,
अंधियारा चारों ओर था,
हज़ार- टन दबाव में जब हमारा वो ठोर था,
वो साल था 1971 का,
जब चारों तरफ़ समन्दर का ही शोर था।।

हम सुमेर से डटे हुए थे,
थोड़ा सा बटे हुए थे,
एक अनदेखी अनसुनी सी जंग में,
हमारे पाँव जमे हुए थे।

वो साल था 1971 का,
जब दुश्मन के दाँत खट्टे हुए थे।।

हम उस समन्दर से लड़े,
PNS- ग़ाज़ी के सामने थे खड़े,
वीरता का ऐसा बेमिसाल नज़ारा फ़िर कभी ना देखा किसी ने,
उस जंग में थे खतरे इतने बड़े,
S-21 के थे वो वीर जाँबाज़,
जिन्हें करता है आज भी देश सलाम,
आने वाली पीढ़ी भी याद रखेगी वीरता का वो मंज़र,
जिसने किया था पाकिस्तानी मंसूबों का काम तमाम।।

Poem ID: 314

Poet’s Name: Rajiv Mani
Poem Title: न जाने क्यूं
Location: Patna, Bihar
Occupation: Journalist
Poem Length: 87 lines
Genre: Other
Poem Creation Date:
Poem Submission Date: July 13, 2019 at 7:33 pm

Poem:

कविता 1
न जाने क्यूं

न जाने क्यूं
मैं भी बन जाना चाहता हूं
आदिवासी
रहना चाहता हूं
जंगलों में
नंग धड़ंग आदिवासियों के बीच
समझना चाहता हूं
उस समाज को
जहां नंगे रहने पर भी
वासनाएं नहीं जागतीं
परखना चाहता हूं
उन मर्दों की मर्दानगी
जो हर लड़की को
समझते हैं बेटी-बहन
न जाने क्यूं …
– –
न जाने क्यूं
मैं भी जीना चाहता हूं
उस पहाड़, नदी और झरनों को
शहर में रहकर
पर्यावरण पर कविताएं लिख
नहीं चाहता कागज काला करना
जंगल के कैनवास पर ही
अब लिखना चाहता हूं
अपनी नई कविता
और उस कविता में
सजाना चाहता हूं
पीपल, कटहल, जामुन के पेड़
तेंदू के जंगल को
बनाना चाहता हूं
वह विशाल मंच
जहां आदिवासी भाषण नहीं
नई पीढ़ी के लिए
लगाते हैं जंगल
फिर भी नहीं मनाता कोई
वहां पर्यावरण दिवस
न जाने क्यूं …
– –
न जाने क्यूं
मैं भी चखना चाहता हूं
उस गड्ढे के पानी को
जिसे पीकर आदिवासी
रह लेते हैं स्वस्थ
अब उब-सा गया हूं
बिसलेरी के पानी और
डाॅक्टरों की चैखट से
समझना चाहता हूं
जन और जल के बीच का
वह गहरा समीकरण
देखना चाहता हूं
तालाब, नदियों और
जंगली जानवरों की रक्षा के लिए
कैसे लगा देते हैं वे
अपने प्राणों की बाजी
न जाने क्यूं …
– –
न जाने क्यूं
मैं नहीं जाना चाहता
स्कूल और काॅलेज
रह जाना चाहता हूं
अनपढ़ … गंवार
जीना चाहता हूं
वह सरल सपाट जिन्दगी
जो मिट्टी के घर को ही
मानते हैं अपना मंदिर
और उस गांव में
नहीं होता कोई पहरा
न कोर्ट कचहरी, न पुलिस
फिर भी नहीं मिलती ‘निर्भया’
मैं समझना चाहता हूं
उस संस्कृति को
जो दूसरों की संस्कृति के
नकल के बिना भी
कितनी ठोस है
फिर भी गुमान नहीं उन्हें
न जाने क्यूं …
– –
न जाने क्यूं
मैं जाना चाहता हूं वहां
इस समाज के
ज्ञानियांे की बातों से दूर
नहीं लेना चाहता अब
ज्ञान की बातें
नहीं सीखना चाहता अब
विज्ञान की बातें
रह जाना चाहता हूं
एकदम मूर्ख … अनपढ़
मैं जीना चाहता हूं
प्रकृति को
सारी सुख-सुविधाओं को छोड़कर
न जाने क्यूं … !

कविता 2
तुम्हारा यह पगला !

कितना सूना-सूना लगा था मुझे
तुम्हारे जाने के बाद
जैसे किसी देवालय की मूर्ति
चुरा ले गया हो कोई
और मैं ‘पगला’ देखा करता था
सूनी आंखों से जाकर वहां
और अर्पण किया करता था
अपना प्रेम-पुष्प
हां, उसी देवालय में
जो मैंने बनाये थे
कभी तुम्हारे लिए
और तब तुमने ही कहा था मुझे
‘पगला’ कहीं के ।
– –
कितना खुश हुआ था मैं
तुम्हारे ‘पगला’ कहने पर !
जैसे मुझे सबकुछ मिल गया हो
बिना मांगे, वरदान में
कितना अपना-सा लगा था तब
वह स्थान, वह पल
मैं जी लेना चाहता था
मिनटों में सदियों को
और लगा ही था
बस मोक्ष की प्राप्ति होने ही वाली है
कि ना जाने क्या हुआ
एक बवंडर उठा
और जब शान्त हुआ तो
तुम वहां नहीं थी ।
– –
बिल्कुल सूना था – मेरा देवालय
लेकिन, तब भी अर्पण करता रहा मैं
अपना प्रेम-पुष्प
देवालय तो वही था
तुम्हारी मूरत मेरे मन में थी
और विश्वास था मुझे
एकदिन जरूर मिलोगी किसी मोड़ पर
लेकिन यह नहीं जानता था
ट्रेन की प्रतिक्षा करते हुए
प्लेटफाॅर्म पर यूं मिल जाओगी
एक पराये शरीर के रूप में !
– –
तुम चलती रही अंजाने पथ पर
किसी और के साथ
लेकिन मुड़-मुड़ कर
तकती रही मुझे दूर तक
और तब मुझे यकीन होने लगा
एक अटूट रिश्ता बन चुका है
मेरे मन-मूरत के साथ
सुना था – ईश्वर, देवी-देवता
मंदिर, देवालय में नहीं
पवित्र मन में बसते हैं
आज सच प्रतीत होने लगा
हां, बिल्कुल सच
उतना ही, जितना तुम ।
– –
अब मैं मानने लगा हूं
सूफी संतों की बात
कि सच्चे प्यार में ही
रचते-बसते हैं देवी-देवता
और किसी परिधि के बाहर ही
होता है वह ‘प्रेमनगर’
तुम वहीं निवास करती हो अब
और चढ़ा जाता है प्रेम-पुष्प
तुम्हारा ही यह ‘पगला’ ।

Poem ID: 315

Poet’s Name: Anisha Watts
Poem Title: सुपूत का बलिदान
Location: Abohar
Occupation: Student
Poem Length: 35 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: December 31, 2012
Poem Submission Date: July 17, 2019 at 6:52 pm

Poem:

वीरता की जो छवि दिखलाते,
वही है असली सुपूत कहलाते।
जान न्यौछावर जिन्हें करनी आती,
बलिदान करता दिल में वास,
जान कुर्बान करते राष्ट्र पर,
वही है असली सुपूत कहलाते।।

अपने से ज्यादा राष्ट्र को चाहते,
हर वक्त रहते तैयार ,
अपनी जान से ज्यादा करते अपने वतन को प्यार,
दुश्मन के सामने डट कर खड़ते,
मुसीबत से कभी न डरते ,
वही है असली सुपूत कहलाते।

अपने चमन को मंदिर मानते ,
करते सुरक्षा धर्म समान ,
वतन की सुरक्षा श्रेष्ठ धर्म ,
करते सुरक्षा जी जान से,
वही है असली सुपूत कहलाते।

दुश्मन से कभी न डरते ,
चाहे वीरगति को प्राप्त हैं करते,
चमन लगता जान से प्यारा,
करते हिफाज़त के लिए प्राण न्यौछावर,
वही है असली सुपूत कहलाते।

देश पर जान न्यौछावर करने सिखाते,
देश प्रेम की भावना जगाते,
हर वक़्त जागृत रहते,
वही है असली सुपूत कहलाते।

सुपुतो से तुम लो प्रेरणा,
अपनी जान कुर्बानी की,
देश भक्ति के लिए ,
बलिदान अपने प्राणों का।।

Poem ID: 316

Poet’s Name: Vikash Varnval
Poem Title: क्यो और किस बात का गुमान है तुझमे
Location: New Delhi
Occupation: Professional Service
Poem Length: 20 lines
Genre: Other
Poem Creation Date: January 31, 2012
Poem Submission Date: July 20, 2019 at 4:59 pm

Poem:

क्यो और किस बात का गुमान है तुझमे
मत भूल, किसी और की दी हुई जान है तुझमे

डिग्री, डिप्लोमा, सर्टिफिकेशन ये सब तूने कर लिया
इंसानियत का भी पाठ है, क्या तूने इसे पढ़ लिया?

पर्सनॅलिटी डिव्ल्पमेंट, मॅनेज्मेंट जाने क्या क्या लोग पढ़ रहे है
दोस्ती और खून के रिश्तो को ताख पे रख, मैं मैं कर लड़ रहे है

सुबह शाम पैसे का नशा-ए-जाम है तुझमे
मत भूल, किसी और की दी हुई जान है तुझमे

अब भी समय है मानव सेवा तू सिख ले
इंसानियत क्या चीज़ है इस ज्ञान की तू भीख ले

धन जितनी मर्ज़ी कमा ले, बंदा खाली हाथ जाता है
ये सत्य है, कि आदमी ही आदमी के काम आता है

भलाई करता जा, फिर देख भगवान है तुझमे
मत भूल, किसी और की दी हुई जान है तुझमे

यहा की रेटिंग के चक्कर मे वहा की रेटिंग ना जाया कर
दूसरो के अच्छे काम को अपना गिना, क्रेडिट ना चुराया कर

मेहनत कर ग़लती से सिख, जग को अब तू जीत ले
फिर सफलता वाली गाड़ी हे, और आगे की तू सीट ले

रौशन कर दे नाम की मा बाप का अभिमान है तुझमे
मत भूल, की किसी और की दी हुई जान है तुझमे

Poem ID: 317

Poet’s Name: Guranchal Gill
Poem Title: the backbone of a soldier
Location: Navi Mumbai
Occupation: Student
Poem Length: 26 lines
Genre: Bhayanak (terrifying)
Poem Creation Date: January 27, 2019
Poem Submission Date: July 21, 2019 at 3:45 pm

Poem:

O my mother
I am going to serve
my other mother
please my dear don’t cry
I will return soon and bring wrinkles of pride
on your face with laughter
I may die but hide your sorrow in your mind
I know it will not be less than crime
but I know you will do it for my sake
O my mother
I will return either with cries or joys
but surely make you feel proud
I plead you if I will return with mourns
lay the tricolour flag on my royal breast
and bury my cadaver in the mud of nation
Alack! Life is short to serve
but no worries I will try best
to pay tribute towards nation
which is towards my countrymen
and bring smile of peace on their faces
and force their heart
to vow for our tribute
This is a small payment towards my mother
my pride and a true symbol of flag
where saffron represent hindus
the white shows peace and unity
and green represent muslims,
chakra shows antique

Poem ID: 318

Poet’s Name: Bansari Shah
Poem Title: Don’t just die
Location: Ahmedabad, Gujarat
Occupation: Student
Poem Length: 24 lines
Genre: Adbhut (wondrous)
Poem Creation Date: January 2, 2019
Poem Submission Date: August 4, 2019 at 10:19 pm

Poem:

Something is enveloped deep inside,
Can’t find what it is!
Something hidden is known to heart,
But mind fails in this.

Reality of life is straight,
Past is confusing,
Willing to get the future,
Stop it is confronting.

Trying to love someone,
Love them with most of heart!
Trying to hate someone,
Hate them with that left part.

Being a man is needed,
Working as a human is appreciated!
Behaving like a child is accepted,
Turning it to immaturity is rejected.

Work while you’re bold,
Live while you’re old!
Spend years here not to die,
Survive here for the highest fly.

Poem ID: 319

Poet’s Name: Bansari Shah
Poem Title: Don’t just die
Location: Ahmedabad, Gujarat
Occupation: Student
Poem Length: 24 lines
Genre: Adbhut (wondrous)
Poem Creation Date: January 2, 2019
Poem Submission Date: August 4, 2019 at 10:19 pm

Poem:

Something is enveloped deep inside,
Can’t find what it is!
Something hidden is known to heart,
But mind fails in this.

Reality of life is straight,
Past is confusing,
Willing to get the future,
Stop it is confronting.

Trying to love someone,
Love them with most of heart!
Trying to hate someone,
Hate them with that left part.

Being a man is needed,
Working as a human is appreciated!
Behaving like a child is accepted,
Turning it to immaturity is rejected.

Work while you’re bold,
Live while you’re old!
Spend years here not to die,
Survive here for the highest fly.

Poem ID: 320

Poet’s Name: Ishavi
Poem Title: मां
Location: Fategarh sahib
Occupation: Student
Poem Length: 8 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date:
Poem Submission Date: August 19, 2019 at 10:35 am

Poem:

Poem ID: 321

Poet’s Name: Peeyush Umarav
Poem Title: लक्ष्य
Location: FATEHPUR
Occupation: Software
Poem Length: 15 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: December 31, 2012
Poem Submission Date: August 25, 2019 at 8:19 am

Poem:

विलंब अभी हुआ नहीं,लक्ष्य की प्राप्ति को।
उठा पग बना डगर,विजय के एहसास को।

कल मिली पराजय,क्यों बनी है व्यथा आज को।
कर फिर एक कोशिश,विजय उन्माद को।

जीव-जीवित कर्म से,निश्चल मन विश्वास को।
पाप की तो व्यथा निराली,जीता सिर्फ स्वार्थ को।

मन में रख लक्ष्य अडिग,सरयू भी निगलती पहाड़ को।
तू व्यथा का सारथी नहीं,नहीं बना तू प्रलाप को।

धैर्य है, सीख है,पथ खुला नये आगाज़ को।
तेज है, कीर्ति है,मंजिल बनी नए अंजाम को।

है समुंदर में बना साहिल भी,कुछ ठहराव को।
थक जा अगर तू, ठहर एक पल
याद कर संघर्ष को,फिर निकल रचने नए इतिहास को।

विलंभ अभी हुआ नहीं,लक्ष्य की प्राप्ति को।
उठा पग बना डगर,विजय के एहसास को |

Poem ID: 322

Poet’s Name: Prachi gupta
Poem Title: मंज़िल
Location: Alwar
Occupation: Student
Poem Length: 22 lines lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: August 28, 2019
Poem Submission Date: August 28, 2019 at 12:33 pm

Poem:

मत डर, चलता चल हर पल सफलता की तरफ ,
देखो एक मंजिल है बढ़ती हुई तुम्हारी तरफ ,
चलता जा मुसाफिर बस बढ़ता जा उसी तरफ ,
राह में कठिनाइयां बहुत है तो समाधान भी है ,
कुछ रास्ते बंद हैं , तो कुछ बढ़े भी हैं , तुम्हारी तरफ
मत डर चलता चल हर पल सफलता की तरफ ।

Poem ID: 323

Poet’s Name: Gourav Paliwal
Poem Title: तेरी यह चंचल मुस्कान
Location: Saharanpur
Occupation: Student
Poem Length: 22 lines lines
Genre: Other
Poem Creation Date: October 8, 2010
Poem Submission Date: September 17, 2019 at 8:47 am

Poem:

तेरी यह चंचल मुस्कान……

इस धरती पर जब तू आई थी
मेरे आंगन में खुशियां छाई थी

तेरी नन्ही नन्ही आंखों में
न जाने किसकी परछाईं थी

तेरी हंसती बेजुबां किलकारी में
मेरे हर मर्ज की दवाई थी

कांटों से भरी इस जिंदगी में
जब एक नन्ही मुस्कान खिलाई थी

तेरे पग की धानी मिट्टी ने
मेरे घर आंगन की महक बढ़ाई थी

तेरे चंचल ख्वाबों की दुनिया
मेरे आंगन को घेरे हैं

ये मंत्र मुग्ध धारी हवा
अपना हर रंग बिखेरे है

तू परी है मेरे सपनों की
या खिली खिली इक धूप है

तू है हस्ती इस जीवन की
या पंछी है उस अंबर की

तू बता क्या चाहती है जग से
ये जहां तेरे कुर्बान है

तेरे जीवन में आने से
मेरी एक नई पहचान है

गौरव पालीवाल

Poem ID: 324

Poet’s Name: Madan Mohan
Poem Title: फिर से नया अध्याय
Location: Ratanpur Darbhanga Bihar 847307
Occupation: Student
Poem Length: 14से 20 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: December 7, 2019
Poem Submission Date: September 22, 2019 at 8:37 am

Poem:

तू ने तो कहने की ठान ही ली मै मौन खङा मेरी कविता गौन हुई!

Poem ID: 325

Poet’s Name: Zannat zakir
Poem Title: Intezar
Location: Lucknow uttar pradesh
Occupation: Student
Poem Length: 2 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: September 29, 2019
Poem Submission Date: September 29, 2019 at 4:31 pm

Poem:

Kaash ki tum yun aate jaise koi hawa aati ,
Gullo ki khilti hui fiza me koi shbnami taswaur ki paigam aati………….

Poem ID: 326

Poet’s Name: Aakanksha
Poem Title: रिश्ते
Location: Gurugram,Haryana
Occupation: Professional Service
Poem Length: 14 lines
Genre: Other
Poem Creation Date: April 10, 2019
Poem Submission Date: October 4, 2019 at 7:11 am

Poem:

क्या वक्त था जब सालगिरहों पर
मिल कर बैठते थे सब रिश्ते
खुद ही पका कर खाते थे पकवान
खुशियों का स्वाद बाँटते थे रिश्ते
कभी जन्मदिन तो कभी त्योहार
हसीं ठहाके और मुस्कान थे रिश्ते
एक दूजे की तकलीफ़ है आज
कभी जो दवा बन जाते थे रिश्ते
अब व्हाट्स अप पे दे देते है बधाई
मिलके गले जो कभी लगाते थे रिश्ते
दिल से निभाने वालों से रिक्त है अब
बंधन या ज़रूरत के हैं अब रिश्ते
पुराने भी है तो दम नहीं कुछ खास नहीं
सिर्फ़ और सिर्फ़ नाम के है अब रिश्ते

Poem ID: 327

Poet’s Name: Nikhilesh Bagade
Poem Title: संग संग मोरे साजन पधारे
Location: Ahmednagar
Occupation: Student
Poem Length: 24 lines
Genre: Other
Poem Creation Date: January 1, 2014
Poem Submission Date: October 7, 2019 at 9:19 am

Poem:

संग संग मोरे साजन पधारे ,
मुझ बिरहन पर प्रेम पसारे ,
ना कुछ दूजा चाहे मनवा ,
धन धन मोरे भाग उजारे ।१।
ठेस लगी ना ध्यान ठिकाने ,
पकड़ बाह को सजन सवारे ,
ना गिरने से डरता मनवा ,
पल-पल साजन संग हमारे ।२।
पिया धरे ना छोड़े कलाई ,
करू जतन हारी चतुराई ,
जीत पिया की चाहे मनवा ,
झूट-मुठ ही जुगत लगाई ।३।
सूरत पिया की तकते रहना ,
अब काहे सखियन संग जाना ,
बस अपना ही सोचे मनवा ,
सजन मिले सो दूर जमाना ।४।
पिया संग सुध-बुध मै हारी ,
ना  कजरा ना  मांग सवारी ,
अब कहे की खटपट मनवा ,
ना कोई श्रृंगारिक दुरी ।५।
भेद रहा ना संग पिया के ,
ना  सिमित हूँ  पार सभी के ,
अब क्या तन काहेका मनवा ,
मिट जाऊ आनंद समाके ।६।

Poem ID: 328

Poet’s Name: Sneha Lata
Poem Title: Hamara Bharat desh
Location: Delhi
Occupation: Student
Poem Length: 20 aprox lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: December 6, 2012
Poem Submission Date: October 21, 2019 at 6:05 am

Poem:

Jab likhu is despar
Likhu to kagaj Kam pad jaye

Poem ID: 329

Poet’s Name: KOMAL MUSKAN PANDITA
Poem Title: Soldiers
Location: Jammu , Jammu And Kashmir
Occupation: Student
Poem Length: 26 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date:
Poem Submission Date: October 31, 2019 at 4:33 pm

Poem:

At the age when we bunk classes
He vomits blood for day together to earn the badge for protecting their country ,
His family awaits for his arrival and his body comes wrapped in the tri colour .

At the meal when you squall at your mother
He learns the art of digesting pebbles
In the nights during the reign of frosty winter when you crumble under your blanket,
He stands at the border as your guardian
So that you can sleep carefree and enjoy.

Many mothers lose there sons
Many wives were getting widowed
Many children lose their father ,
Many are left shattered but when they are not respected it hurts ;

In the wars when you watch headlines
He lies somewhere admist the barrels of guns and grease bleeding to his stabbing memories of love , life and vicious death ..

Poem ID: 330

Poet’s Name: Gourav Paliwal
Poem Title: सफलता
Location: Saharanpur
Occupation: Student
Poem Length: 18 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: January 7, 2000
Poem Submission Date: November 5, 2019 at 2:11 pm

Poem:

सफलता….

सफल हुआ है वहीं परिंदा
जिसने इस जग को देखा है

अपने अमूल्य आदर्शों की
गांठ को जिसने जोड़ा है

है जिसकी आत्मा स्वपनों को
साकार करें सारे जग में

निम्न अंगारों को जिसने
हंसकर इस जग में झेला है

बना जो जग में लाल किसी का
वो पुत्र अमृत का प्याला है

ना कभी किसी से बैर किया
ना कभी किसी को ललकारा है

तू इस भावी पीढ़ी का ही
मंत्र एक उजियारा है

सेवा ही है दान हमारी
हम ही देख पहचान है तेरी

ना मिटने देंगे नाम तेरा
ना शान तेरी झुकने देंगे

तू जहां चलेगी मातृभूमि
हम शत् शत् नमन तुझे देगे।

Poem ID: 331

Poet’s Name: Chhavi
Poem Title: Dawn
Location: Bhiwani, Haryana
Occupation: Student
Poem Length: 10 lines
Genre: Shringaar (romantic)
Poem Creation Date: January 1, 2000
Poem Submission Date: November 10, 2019 at 6:36 am

Poem:

Calmness of dawn makes me feel we aren’t apart anymore,
Heart starts building sand castles on the shore.
Somehow I gets to meet myself in hurry of loving you a little more,
This heart is broken and only you are its cure.
Calmness of dawn makes me feel we aren’t apart anymore….

Poem ID: 332

Poet’s Name: Chhavi
Poem Title: Dawn
Location: Bhiwani, Haryana
Occupation: Student
Poem Length: 10 lines
Genre: Shringaar (romantic)
Poem Creation Date: January 1, 2000
Poem Submission Date: November 10, 2019 at 6:37 am

Poem:

Calmness of dawn makes me feel we aren’t apart anymore,
Heart starts building sand castles on the shore.
Somehow I gets to meet myself in hurry of loving you a little more,
This heart is broken and only you are its cure.
Calmness of dawn makes me feel we aren’t apart anymore….

Poem ID: 333

Poet’s Name: Meghal Kumawat
Poem Title: Nature
Location: Ajmer
Occupation: Student
Poem Length: 19 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: November 4, 2019
Poem Submission Date: November 12, 2019 at 9:06 am

Poem:

Everyday their is a new challenge,
In your life their are many things that you need to balance.

Everthing in this life is possible ,
Their is nothing that can make your life so horrible.

Start overcoming your fears,
Or else it will always leave you pin tears.

Many people are their who love and care,
Their are thousand of relations that you share.

It might be the worst mistake,
But its not the right option to take.

Our life is surely a roller coster ride,
But its not all about suicide.

Poem ID: 334

Poet’s Name: Swapnil Bhaskar Gavali
Poem Title: शेतकरी राजा
Location: Babhaleshwar,Maharashtra
Occupation: Student
Poem Length: 25 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date:
Poem Submission Date: November 21, 2019 at 9:57 am

Poem:

नमस्कार मित्रहो! मी कोणी कवी किंवा लेखक नाही पण आजच्या घडीला सर्वसामान्य शेतकरी बांधवांची झालेली कोंडी बघून मी ही छोटीशी कविता आपल्या शेतकरी
साहेब खूप सोपी वाटते ओ अजून तुम्हाला शेती..
पण एकदा करून बघा ना,
काय नेमकी राहती..
जीव जायला होतो ओ,
दिवसरात्र करून मशागती..
पण तुम्ही म्हणता,
आहे ना तुला एवढी शेती..
साहेब खूप सोपी वाटते ओ अजून तुम्हाला शेती..

साहेब खूप सोपी वाटते ओ अजून तुम्हाला शेती..
बी बियाणासाठी,
दुकानदार वरवर फिरवती..
मोटार चालू करायला गेलेल्या बापाची,
येईल की नाही वाट पिल्लं त्याची पाहती..
काय उपयोग ओ
त्या लाईटचा,
जी रात्री येऊन दिवसा जाती..
बापावर आमच्या दिवसा काम अन,
रात्री पन त्याचीच वेळ येती..
साहेब खूप सोपी वाटते ओ अजून तुम्हाला शेती..

साहेब खूप सोपी वाटते ओ अजून तुम्हाला शेती..
एकदा खरच करून बघा,
साहेब काय आमची जिरती..
कधी दुष्काळ तर,
कधी अवकाळी होती..
हाता तोंडाशी आलेला घास,
पण अनेकदा घेऊन जाती..
एवढ होऊनही आम्ही,
कधीच नाही खचती..
पण देवही नाही आमच्या बाजूने याची,
आम्हाला नक्की होते प्रचिती..
साहेब खूप सोपी वाटते ओ अजून तुम्हाला शेती..

साहेब खूप सोपी वाटते ओ अजून तुम्हाला शेती..
साहेब एसी मध्ये बसून तुम्ही मंडळी आमच्या,
समस्यावर अभ्यास करती..
एखादा दिवस घालवाना सोबत,
आमच्या शेताच्या बांधा वरती..
साहेब हिरव्यागार पिकाला आमचं,
रक्त आणि घाम असतो सोबती..
बघणारी तुम्ही लोक तर,
वरवर अंदाजच लावती..
साहेब खूप सोपी वाटते ओ अजून तुम्हाला शेती..

साहेब खूप सोपी वाटते ओ अजून तुम्हाला शेती..
निसर्ग पण कधी कधी,
आमच्या सोबत खेळ खेळती..
पोटच्या पोरासारख जपलेल
पीक,
आमच्या समोरच संपताना,
आम्ही ढसाढसा रडती..
आतून तुटलेला आमचा बाप मात्र,
गपगुमान सगळं बघती..
आमच्या समोर हसून मनात,
वाईट विचार त्याच्या घर करती..
साहेब खूप सोपी वाटते ओ अजून तुम्हाला शेती..

साहेब खूप सोपी वाटते ओ अजून तुम्हाला शेती..
सगळं झाल्यावर नेतेमंडळी आमच्या शेताकडे जाती..
तोपर्यंत पिकाच उरलेल औषध,
आमच्या बापाच्या येत हाती..
साहेब तुम्हाला कशाच पीक आहे ,
हे पण नसत ओ माहिती..
अशात तुम्ही विचारलेल्या प्रश्नाचं,
उत्तर देताना आम्हालाच लाज वाटती..
साहेब खूप सोपी वाटते ओ अजून तुम्हाला शेती..

साहेब खूप सोपी वाटते ओ अजून तुम्हाला शेती..
पंचनामे करायला अन् मदत,
करायला तुम्ही महिना लावती..
एवढ सोंग करून तुम्ही तुटपुंज्या,
करता जाहीर मदती..
साहेब वाटत तुम्ही पण आमच्या,
सोबत चेष्टाच करती..
देव तर नाहीच नाही पण, सरकारही नाही वाली,
जाणीव आम्हाला मग होती..
साहेब खूप सोपी वाटते ओ अजून तुम्हाला शेती..

साहेब खूप सोपी वाटते ओ अजून तुम्हाला शेती..
साहेब एखाद पीक नक्की करून बघा,
काय शिल्लक राहती..
उगाच काहीतरी अंदाजपंचे बोलून,
नका करू तुमच्याच जाहिराती..
या शेती आणि नुकसानी पायी,
सोबतच्या बापाला पोरं
त्याची फोटोत पाहती..
दिसत तस नसत अस,
उगाच नाही म्हणती..
साहेब विचार करा शेतकरी
बांधवाचा,
नाही तर येणार नाही ओ,
तुमच्या पण काहीच हाती..
साहेब खूप सोपी वाटते ओ अजून तुम्हाला शेती

आपला देश कृषीप्रधान आहे अस तुम्ही मंडळी म्हणती..
शेतकरी जगाचा पोशिंदा आहे अस तुम्हीच बोलती..
हमीभाव तर सोडाच ओ साहेब पण,
दहाची भाजीची जुडी पाच ला दे,
यासाठी तुम्हीच लोक त्याच्याशी भांडती..
साहेब खूप सोपी वाटते ओ अजून पण तुम्हाला शेती…

Poem ID: 335

Poet’s Name: ANJALI KUMARI
Poem Title: LET HUMANISM BE
Location: DHANBAD,JHARKHAND
Occupation: Student
Poem Length: 35 lines
Genre: Rudra (wrathful)
Poem Creation Date: April 25, 2019
Poem Submission Date: December 20, 2019 at 1:58 pm

Poem:

#Let Humanism Be!!!!
Let the life be at an instance,
Where everything goes dark,
There is dusk all around;
Fears and disappointment in you!!
Where success and failure,
Counterparts of evil desires,
Make you a sin.
Where ideology is trapped,
By mind-boggling sociology,
Leaving behind a massacre in you.
Where diplomacy of selfishness-
Gives the output of injustice
Truth becomes opaque by wrong aspects!!!
Where millions of hearts oust-
Humanism to take within terrorism;
Giving shelter to the dreadful root!!!
Where life becomes opaque by 24 hours,
For thou when hunger dies,
Forgetting the span of 86400 seconds!!
Where the crucial stand,
Has to face emptiness-
By the dreary jealousy
Where the new births of infants,
Are in contrast to broadness of mind,
And every soul becomes dead.
Where the molestations are increasing,
And the victims are crying;
And the world is sleeping!
In those upheavals of world,
Be the one,
To proclaim that-
Even in the darkest of hours,
Let the mind be lightest.
In the closed room of fears,
One spark of light,
Has the power to dispel,
The whole blackness.
Giving the hope to men,
To rise,
Above Non-Humanity-
Giving the hope of #Let Humanism Be!!!

Poem ID: 336

Poet’s Name: Sawan mishra
Poem Title: प्रकृति की खुबसुरती
Location: Varanasi uttar Pradesh
Occupation: Student
Poem Length: 14 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: January 7, 2020
Poem Submission Date: January 8, 2020 at 9:53 am

Poem:

प्रकृति की ये खूबसूरती आज नीखर कर आया है,
कहीं सूनामी कहीं बवंडर बवाल यह आज मचाया है,
प्रकृति को सुंदर कहते कहते हमने उसे नजराया है,
कहीं भूकंप कहीं बाढ़ ने अपना चमत्कार दिखलाया है।।

प्रकृति देती है हमें सब कुछ जल, पल और बल कुछ कुछ,
प्रदूषण देते हैं हम सब उसको ध्वनि, मृदा, जल और नभ में कुछ कुछ,
वृद्धियों के नाम पर हमने उसे बहलाया है,
प्रकृति की ये खूबसूरती आज नीखर कर आया है।।

बदल रहे हैं मौसम बदल रहा है वातावरण,
बदल रहे हैं इंसान बदल रहा है समाज,
इस बदलते हुए समय ने प्रकृति में भी बदलाव लाया है,
प्रकृति की ये खूबसूरती आज नीखर कर आया है।।

Poem ID: 337

Poet’s Name: akshay kharat (Ak)
Poem Title: सफर
Location: maharashtra
Occupation: Entertainment
Poem Length: 19 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: January 12, 2020
Poem Submission Date: January 28, 2020 at 5:42 pm

Poem:

Poem ID: 338

Poet’s Name: Kosuru Sai Sathwik
Poem Title: Humanity
Location: Vanastalipuram
Occupation: Student
Poem Length: 30 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date:
Poem Submission Date: February 9, 2020 at 1:34 am

Poem:

Finally Humane grounds to the error
Rest lies to the god’s server
I landed in the beautiful mirage
Oh…so you landed in a money garage!
An animal in another animal
Des himmels in small infinitesimals
Where forth this humanity foresees?

Finally humane grounds to the error
Rest lies with the god’s server
Blood on the hands
With funerals under the bands
Funerals celebrated than rest alot
Where can they be never again bought
Animals in lower stage
So are they put in cage
But where did you come from? A maze
Where forth this humanity foresee?

Great are your ancestors
But proud are your success
A fruit obtained without looking up
Acute served without working up….
Dubious tales are of your parents
But still dubious are of your richness
Why would I accuse one another else for my mistakes
It is the accused of my own behaviour to remain inhumane in my stakes!
Where forth does this humanity foresee?

Poem ID: 339

Poet’s Name: Smruti Suresh Chandra Beohar
Poem Title: Meree Pitaa Mahaan
Location: Pune, Maharastra
Occupation: Writer
Poem Length: 20 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: January 27, 2020
Poem Submission Date: February 27, 2020 at 2:41 pm

Poem:

Mere Pitaa Mahaan

Phaulaadi iraadon ke hain woh,
Himalaya kee chotti kee samaan…. (1)

Har pal chalteee, na ruktee woh,
Hai mujhe unpee badaa abhimaan…(2)

Kamaal kee kalaakrutti taraashtee woh,
Hai taknekee vishaayon ka unko gyaan…(3)

Pakke iraadon kee hain bandee woh,
Hai hastee unkee bahut mahaan……….. (4)

Har dil ko hai bhaate woh,
Pyaaro se pyaare woh,
Kudrat ne badee pyaar se taraasha jinko,
Hai woh mere pitaa mahaan………..(5)

Chahee gum ke baadal chaaye,
Ya ho sankat badee mahaan,
Bass chaltee hee jatee woh,
Doobtee naiyaa ko kar detee paar….(6)

Dhanyawaad detee hoon rabb ko,
Mujhee heraee ke jaisa diyaa jeevan daan,
Yug Yugaantaron mein bhi jo naa mil sakee joh,
Aisee milee hain mujhe mere pitaa mahaan…. (7)

Poem ID: 340

Poet’s Name: Pinki pandey
Poem Title: ममतामयी जननी
Location: Lucknow uttar pradesh
Occupation: Student
Poem Length: 20 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: January 12, 2000
Poem Submission Date: April 26, 2020 at 2:44 am

Poem:

हे मातृभूमि ममतामयी नमन करें हम शीश नवा,
करो प्रदान सामर्थ्य हमें ,रक्षा में तुम्हारी सब दे लुटा ,
हम काम ,लोभी,पापी बालक हैं तेरे माँ,
आँचल में अपनी दो जगह,
थक हार गए इस जग के तानों बानों में,
गोदी में हमको लो सुला ।
ममतामयी माता माफ करो ,
जो भूल चूक हुई हमसे,
जग में आखिर कौन भला ,
जो त्यागी हो तुमसे बढ़के ।
मैं वचन आज ये देती हूँ,
सर्वस्व लुटा दूंगी तुमपे ,
जो आँच लाये इस पावन आँचल पर,
अस्तित्व मिटा दूंगी उसका ,
जो आन पड़े तुमपे ज़रा भी,
तो शीश कटा दूंगी अपना ,
हे ममतामयी मातृभूमि जननी,
तेरी रक्षा में मैं दम तोड़ू,
तेरी गोद में जीवन को छोड़ूँ,
बस जीवन का है यही सपना।

Poem ID: 341

Poet’s Name: Alok Kumar Yadav
Poem Title: वीर शहीद
Location: Tehri Garhwal Uttarakhand
Occupation: Teacher
Poem Length: 24 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: February 14, 2000
Poem Submission Date: May 12, 2020 at 4:46 pm

Poem:

पुलवामा के वीर शहीदों
है तुझको शत-शत नमन
तुम हो सच्चे वीर सपूत
भारत माता के सच्चे बेटे हो
इस धरा की रक्षा की खातिर
सदैव कफन लपेटे हो
तुम्हारी गौरव का
जितना भी गुणगान करें
वह सब कम ही होगा
तुम्हारे अमर बलिदान पर
जिसकी आंखें नम ना हो
वह कायर बुजदिल ही होगा
तुम डटे रहते हो सीमा पर
बनकर एक चट्टान
तनिक ना डिगते हो कभी
बुलंद है तुम्हारे अरमान
नापाक इरादे हैं दुश्मन के
करता है वह पीछे से वार
अपने शौर्य और पराक्रम से तुमने
किया हर बार उनका संहार
तुम्हारे अमर बलिदान की गाथा
जब भी गाया जाएगा
भारत माता होंगी प्रफुल्लित
दुश्मन का जर्रा जर्रा थर्राएगा

Poem ID: 342

Poet’s Name: Tripti Garg
Poem Title: Covid 19
Location: Gautam buddha nagar,Uttar pradesh
Occupation: Student
Poem Length: 1500 lines
Genre: Karuna (pathos)
Poem Creation Date: October 5, 2020
Poem Submission Date: May 15, 2020 at 8:45 am

Poem:

Poem ID: 343

Poet’s Name: Shivi
Poem Title: Kabhi socha hai
Location: Chas
Occupation: Student
Poem Length: 18 lines
Genre: Other
Poem Creation Date: May 31, 2012
Poem Submission Date: May 16, 2020 at 10:17 pm

Poem:

Kabhi socha hai
Kya hoga jaab janage tere ghar se niklenge
Kya hoga jaab tere apne teri rooh se na mil payenge
Kabhi socha hai uss mehfill me jaane se pehle
Kabhi socha hai tumne ye ghar se niklne se pehle

Tumhari galti us katil ki jeet hogi
Tumhari geet preet sarabjeet mitti me mallit hogi
Tumse khus hone waale maa baap khi dukhi baithe rahenge
Tumhe khidki se dekh muskurane waali ki aankhen aasuon se bhare honge

Apni fikr se pehle unki krte ho na
Toh unke liye unke saath rah lo
Thoda unhe taalash lo jinhe kabhi kehte the tumhare nur hai
Thodi madad un weeron ki krdo jo apno se dur hai

Kuch is mahamari ke halat se krlo sauda
Kuch apne sabr se hi krlo abada
Us sawaal se kitni taqlif hoti hai hame
Jaab apne puchte ghar kaab aaoge
Kaam se kaam mil toh paoge
Kabhi socha hai

Poem ID: 344

Poet’s Name: Nilanchali Singh
Poem Title: एक डॉक्टर माँ की वीरता
Location: Delhi
Occupation: Government
Poem Length: 22 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: March 10, 2000
Poem Submission Date: May 19, 2020 at 6:05 pm

Poem:

एक डॉक्टर माँ की वीरता

भोर हुई और मैं जागी, चूल्हे पे चाय चढ़ा दी थी।
अस्पताल भी जाना था, सारी तैयारी कर ली थी ।
एक भय आया अंतर्मन में, बाहर एक दैत्य है खड़ा हुआ ।
क्या मैं इससे बच पाऊँगी, डर का सन्नाटा पड़ा हुआ।।

बेटी की भोली प्यारी सी, सूरत देखी एक न्यारी सी।
माँ का कलेजा पिघल गया, एक डॉक्टर अंदर सिहर गया ।
अपने की है फिक्र किसे, पर अपनों संग मैं रहती हूँ।
जाने अनजाने में ही, अपनों की हानि न कर दूँ।।

अभी कल ही की तो बात है, महिला इक क्लिनिक में आयी।
पति दुबई से आया था, बच्चे की ‘अर्जेंट’ चाहत थी लायी।
दूसरी जो आयी थी कल ही, ट्रैन पकड़ के बिहार से।
सीधा ओपीडी आयी, चेहरा धक् के रुमाल से।
मैंने पूछा क्या हुआ, बोली हल्का सा दर्द रहता है।
कबसे है, मोहतरमा ने कहा, ‘चार साल’ से होता है।

इस गैर ज़िम्मेदारी का क्या कुछ भी हल हो पायेगा।
खुद न समझे जन जब तक, कानून भी क्या कर पायेगा।
खुद की है परवाह किसे, अपनों की फिक्र तो होती है।
माँ का दिल तो रोता है, जब भय की आंधी चलती है।

अंदर से आयी इक आवाज़, ‘तू माँ है, बेटी है, है बहन ।
पर सब से पहले इंसान है, सबकी सेवा ही तेरा धर्म।’
फिर बाहर से आयी आवाज़, “मैडम जाने की नहीं क्या जल्दी?”
अंतर्द्वंद में फंसी हुयी, फिर बैग उठा कर मैं चल दी!

– डा नीलांचली सिंह

Poem ID: 345

Poet’s Name: Richa anupam
Poem Title: Covid-19 फ़िलहाल कुछ ऐसा है
Location: Jamunaha bazar,Gopalganj,bihar
Occupation: Student
Poem Length: ३० lines
Genre: Karuna (pathos)
Poem Creation Date: March 20, 2020
Poem Submission Date: May 20, 2020 at 4:17 pm

Poem:

हर एक मन में सवाल उठ रहा
कथावाचन लगातार चल रहा
साँसे थमी है एक आश बनकर
ना कोई धंधा व्यापार चल रहा
बंद पड़ी है खिड़कियाँ
चबूतरा सुना साँझ कर रहा
ज़िन्दगी एक बूँद पानी-सा है
वह भी जलकर राख बन रहा
चौकोने पेज जैसा दुनिया उसका
उसे हीं बेच अपना पेट भर रहा
आग लगी है मौत के तराज़ू में
जाशूअ,वाहेगुरु,ईश्वर,अल्लाह
सारा जहाँ कर रहा ……….
जीने की तमन्ना उस अधेड़ उम्र की भी है
रास्ता चलता वह नाक बाँध रहा
ढीली पड़ी है कमान जिसकी
वह दुनिया को अलविदा कर रहा
धनुष पकड़ बैठे ह सभी
पता नहीं किधर से बाड़ चल रहा
महाभारत की रणभूमि-सा …..
क्या फिर कोई हमें लाईव कर रहा
बंद होगा यह राज कबतक
कितनी दुआएँ एक साथ मर रहा
ज़प्त क़र लो खुदको……..
हिंदुस्तान कह रहा
बुलबुलें हैं इसकी उड़ान का उद्देश्य भर रहा
ऐ आशाएँ दीप बनकर जलते रहना है
सोने की चिड़िया बार-बार कुछ कह रहा
चमक उठेगा इसमें ज्वालामुखी-सा उबल रहा ।

Poem ID: 346

Poet’s Name: Richa anupam
Poem Title: एक सवाल
Location: Gopalganj
Occupation: Student
Poem Length: १८ lines
Genre: Shringaar (romantic)
Poem Creation Date: February 24, 2012
Poem Submission Date: May 20, 2020 at 4:32 pm

Poem:

चर्चा होता है
एक खिलौना का
वह इश्क़ है क्या ?
आँखो पर पट्टी होगी
तस्वीर बन दूँगा
ऐसा……..
तेरे साथ हुआ क्या?
ख़ैर ………
.हक़ीक़त छोड़ तु
सपनो में एक अक़्स
छुआ था मुझे
तूने महसूस किया क्या?
चल………
तेरे-मेरे मत सोच
दफ़न कर सवालों को
आइने से पूछ …….
बिन वजह उसने
तेरा ख़ैरियत लिया क्या?

Poem ID: 347

Poet’s Name: CA Brijesh Ramanlal Surana
Poem Title: || इंसानकी हैसीयत ||
Location: Nashik, Maharashtra
Occupation: Professional Service
Poem Length: 14 lines
Genre: Bhayanak (terrifying)
Poem Creation Date: May 16, 2020
Poem Submission Date: May 21, 2020 at 10:08 am

Poem:

बस भूलने की कगार पर था तू, यह इंसानियत होती है क्या?
एक अस्तित्वहीन जीवने दिखाया, हे इंसान तेरी हैसियत है क्या?

बम और गोली के बलबूतेपर तू, छाती ठोक ठोक कर उछलता था।
गिरगिटकोभी शर्मा आ जाए इस भांति, पल-पल रंग बदलता था।
चल पड़ा था हैवानको सिखाने, देख मुझे हैवानियत होती है क्या?
एक अस्तित्वहीन जीवने दिखाया, हे इंसान तेरी हैसियत है क्या?

पैसों के बलबूते पर लगी आदतों ने, तेरे आंखों पर बांधी पट्टी है।
आखिर जलकर खाक है होना, या तेरे नसीब में मिट्टी है।
अच्छे-अच्छे ने यहाँ खाख है छानी, पगले तेरी शख्सियत है क्या?
एक अस्तित्वहीन जीवने दिखाया, हे इंसान तेरी हैसियत है क्या?

कुदरत ने दिया है फिर एक बार इशारा, अब वक्त रहते संभल जा।
चाहता है अगर वो फिर बदले करवट, तो उठ पहले खुद बदल जा।
आदत डाल ले अपने अंदर झांकने की, फिर समझेगा तेरी असलियत है क्या?
एक अस्तित्व हीन जीवने दिखाया, हे इंसान तेरी हैसियत है क्या?

Poem ID: 348

Poet’s Name: aparna
Poem Title: MAA
Location: warangal, telangana
Occupation: Student
Poem Length: 18 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date:
Poem Submission Date: June 1, 2020 at 12:50 pm

Poem:

Maa,
We were born and raised in your lap
And we were breastfeeded with your ethics
Your hard past make us stronger
We will be determined and dedicated
Because we are born to a strong woman
Your sons and daughters who fought for you
Teaches us that one life is not enough to repay your gratitude and to experience your love
Your culture and traditions make our life joyful
The greatness of you is that you create a family even for an orphan
And those brothers who stand at the border and protect you from those dangerous evils
Preventing the spread of that hell into your heaven
Teaches us to be courageous in the time of hardships
And those people who selflessly sacrifice their lives just to feed the country’s stomach
Teaches us the selfless service and our happiness in others satisfaction
And your beauty make us feel peaceful
Finally,I think our real patriotism and love for you lies when we treat our brothers and sisters with respect,love and care

Poem ID: 349

Poet’s Name: usha gupta
Poem Title: JAI KISAN!
Location: Hoshangabad
Occupation: Student
Poem Length: 28 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: April 19, 2020
Poem Submission Date: June 6, 2020 at 11:17 am

Poem:

समत संसार जब थम सा गया, म का नह पर चलता गया! संकट म जब जब आया यह देश, बना थके म बढ़ता गया!
कहां गए आधुनक पकवान? कहां गई वह ऊं ची कान? लेकन भूख लगी जब सबको , याद आया यह कसान?
सोचा आज ना होता म ? या खाते यह भूखे इंसान? ना धूप छांव बारश का यान, यह फज मेरा म ं कसान!
ना कभी मने कया अंतर, हो गरीब या अमीर इंसान! सबके घर म आज रखा है, मेरी मेहनत का अंजाम!
मेरा नाम न लेगा कोई, चाहे संकट हो या आम घड़ी, देखो उस खाने के पीछे, मेरी कतनी मेहनत है कड़ी!
कज के तले जब झुक जाता ं, जीना नह ,मरना चाहता ं, लेकन याद आ जाता है देश, जसक म म जमा ं!
इस महावीर योा को , म करती ं सलाम! फ है तेरे जबे पर, पंचा ंगी सबको यह पैगाम!

Poem ID: 350

Poet’s Name: Swikriti Basnet
Poem Title: The last petal
Location: Kalimpong
Occupation: Student
Poem Length: 73 lines
Genre: Karuna (pathos)
Poem Creation Date: July 6, 2020
Poem Submission Date: June 9, 2020 at 3:58 am

Poem:

The Last Petal
– Swikriti Basnet

As the last petal fell
The flower was no more,
She was astounded
That it survived so long.

As she got up to walk back
She uprooted the rest,
Carefully she put it in her bag
And walked back through the rain.

She desperately clenched her jacket tighter
Took long paces and walked faster,
It was getting dark and cold
All she could think of was home.

She floundered and meandered
She was tired to take another step,
She pushed her self harder
For her destiny was much farther.

She felt pain and distress
Fatigue and hunger,
Yet she moved on for her son
Through the storm, much stronger.

Her legs were shaking
Every inch of her body aching,
Drenched from head to toe
Now she didn’t know where to go.

She lost her way through the woods
The night was closing in on her,
From every corner and making her helpless
Like struggling in quicksand is needless.

She checked for the flower
It was damp and seemed fragile,
Even through the storm it stayed with her
Lifeless yet projecting hope.

She recalled in her mind
When the flower was young and bright,
Full of love and happiness
Swaying gracefully in the wind.

Now, as the wind hit against her face
She felt shivers down her spine,
In her heart she longed to be
Next to the flower when it was alive.

She looked around no sign of help
The rain made it harder for her to see,
All she could think of was the flower
How it must has survived many such showers.

Putting up through alot of pain and hardships and
As the last petal fell and the flower was no more,
Adding another to a dismal list
That we could count no more.

Poem ID: 351

Poet’s Name: Simran Malhotra
Poem Title: वो देश का वीर जवान है
Location: LUCKNOW , UTTAR PRADESH
Occupation: Student
Poem Length: 24 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: May 6, 2000
Poem Submission Date: June 12, 2020 at 12:39 pm

Poem:

वो अान है, वो मान है ,
वो देश का सम्मान है ,
लड़ रहे हैं जो, देश के लिए,
वो वीर जवान है।

किसी का बेटा,
किसी का पति,
किसी का पिता है।
अपनी मातृ भूमि का,
वो वीर जवान है।

ना धन ,ना दौलत,
ना सुख सुविधा की चाहत।
जिसे अपनी वर्दी पर गुमान है ,
वो वीर जवान है।

त्यागकर अपना घर परिवार,
खड़ा है जो सरहद पे।
लड़ रहे है जो ,
दुश्मनों को गोली के निशाने पे लेके,
अपनी ज़िन्दगी को मौत के हवाले करके।
बचा रहे को अपनी मातृ भूमि को,
वो वीर जवान है।

Poem ID: 352

Poet’s Name: Pooja Gour
Poem Title: Fallen
Location: Nagda, madhya pradesh
Occupation: Student
Poem Length: 25 lines
Genre: Other
Poem Creation Date: May 29, 2020
Poem Submission Date: June 13, 2020 at 6:28 pm

Poem:

I ‘m flowing with the wind.
Walking alone, by putting smile, on my face….
But you know! It all a lie.
I wore the same mask till i die?

There is dust of broken faith.
Jamming the rays, to fall, on right place….
Want to get rid off ,…this mess,
OR  I  being blind by their sake?

I’ve always hated the world.
It likes,they always wanted to try and control us…..
I Tried to look the same
Did i kill, myself for them?

I ‘m standing in between,
The sand of hourglass, just fall and drift by….
Making me older,making me weak
Is this me or you feeling the same?

Above the earth,beyond the brain
Where being worst, doesn’t haunts my shine….
Where everyone listen what i signs
place, where i enjoy my rain.
Is this real or just my dream?

Poem ID: 353

Poet’s Name: Ankit bajpai
Poem Title: बेशक समाज रुका है
Location: Lucknow
Occupation: Student
Poem Length: 16 lines
Genre: Karuna (pathos)
Poem Creation Date: May 25, 2020
Poem Submission Date: June 16, 2020 at 5:53 am

Poem:

बेशक समाज रखा है सब कुछ पल भर में थमा है आज मानवता पर एक बड़ा प्रश्न चिन्ह खड़ा …..

Poem ID: 354

Poet’s Name: pranuthi kabilan
Poem Title: Can you answer my questions?
Location: chennai
Occupation: Student
Poem Length: 24 lines
Genre: Karuna (pathos)
Poem Creation Date: September 27, 2012
Poem Submission Date: June 21, 2020 at 11:21 pm

Poem:

I’m not sure if depression has pills,
if it does, are they bitter?
because the suffering sure is.

They say age matters,
does it really?
for I’ve seen glasses shatter.

Heard there are people who care,
ever found anyone?
They sure are pretty rare.

I’ve seen people lie,
why shouldn’t they?
if they’re only other option is to die.

There are a lot of answers I’m searching for,
Can I ask you a few?
Or am I just another page,
waiting to be torn?

I know they can’t all be answered,
now can they?
I just want to know what people would say.

Poem ID: 355

Poet’s Name: Shairy gupta
Poem Title: मेरे भारत की कहानी!
Location: Hoshangabad,Mp
Occupation: Student
Poem Length: 27 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: January 7, 2020
Poem Submission Date: July 1, 2020 at 4:32 pm

Poem:

हिमालय की गोद में सुरक्षित हूं मैं जबसे,
इस मिट्टी का रहस्य छुपा नहीं है सबसे;

उन वीरों का बलिदान जिसके शीश तले मैं आजाद हूं
उस भारत की मिट्टी में जन्मा मैं एक आम इंसान हूं;

फक्र होता है उस जज्बे पर जिसने हमें आजाद किया,
एक आह! ना निकली मुख से जिन्होंने यह बलिदान दिया;

एकता में अनेकता भारतीय आंदोलन का सिद्धांत था,
एकजुट होकर हिंदुस्तान बनाने का वल्लभ जी का पैगाम था;

पूरे विश्व में जब जब हिंदुस्तान का नाम गर्व से लिया जाएगा,
“बापू” का अहिंसा और सत्याग्रह परिवर्तन की बेला लाएगा;

सर्वधर्म संभव आज भी याद है,
दिलों में बस चुका हर एक जवान का नाम है ;

“यह देश सौंप के जा रहा हूं लौट के ना आ सकूंगा ,
संभाल कर रखना इसे अपने खून से जो रंगा हूं;

सम्मान करना इस हवा का जिसमें तुम सांसे ले रहे हो ,
उन जवानों को याद करना जब बिना डरे घरों में सो रहे हो; “

यह संदेश आपका ए जवान! सब तक पहुंचा दूंगी,
खयाल रखना अपना उन सितारों के बीच हिंदुस्तान को खुशियों और प्रेम से सजा दूंगी!

जय हिंद !जय भारत! जय जवान!

Poem ID: 356

Poet’s Name: Avani Rajput
Poem Title: नन्ही सी अल नाजुक परी….
Location: Gujrat
Occupation: Student
Poem Length: 23 lines lines
Genre: Karuna (pathos)
Poem Creation Date: July 1, 2020
Poem Submission Date: July 3, 2020 at 4:08 pm

Poem:

स्त्री
नन्ही सी एक नाजुक परी बड़ी हो गई…
गुड़िया के खेल में वोह शामिल हो गई
मम्मी और पापा की लाडली बेटी बन गई,
नन्ही सी एक नाजुक परी बड़ी हो गई…
स्कूल जाने की नई शुरुआत होने लगी,
आगे बढ़ने की अलग ही राह होने लगी,
नन्ही सी एक नाजुक परी बड़ी हो गई…
कॉलेज में प्रवेश मिल ने से खुश होने लगी,
मम्मी को ही अपनी दोस्त मानने  लगी,
नन्ही सी एक नाजुक परी बड़ी हो गई…
नई जॉब आने से नए सपने देखने लगी,
आगे पढ़ने का दिल में ख्याल लाने लगी,
नन्ही सी एक नाजुक परी बड़ी हो गई…
तभी ज़िंदगी में अलग ही शुरुआत हो गई,
नए लोग,और नए शहर में शादी हो गई,
नन्ही सी एक नाजुक परी बड़ी हो गई…
सबके रीत रिवाज  अच्छे से समजने लगी,
तभी उसके घर में आई एक नन्ही सी परी,
नन्ही सी एक नाजुक परी बड़ी हो गई…
उसके सारे सपने अपनी बेटी में देखने लगी,
आज भी वोह हार नहीं मानी….
नन्ही सी एक नाजुक परी बड़ी हो गई…..

Poem ID: 357

Poet’s Name: Suman Mishra
Poem Title: Greed
Location: Boudh, odisha
Occupation: Student
Poem Length: 8 lines, 2 stanzas lines
Genre: Other
Poem Creation Date:
Poem Submission Date: July 6, 2020 at 3:51 am

Poem:

Greed
I worked hard and got zillions,
But cried to spend a penny,
No mercy do I have in me.
Then my coffin under nyoka tree.

I reached a place where I was naked,
And saw God peeping on my deeds.
I asked if where my millions of pound.
“I have no dues on you” Then came a sound…

Poem ID: 358

Poet’s Name: Shivam Mishra
Poem Title: She
Location: MUMBAI
Occupation: Teacher
Poem Length: 16 lines
Genre: Shringaar (romantic)
Poem Creation Date: December 5, 2012
Poem Submission Date: July 6, 2020 at 7:18 am

Poem:

Drunk on a little sunshine.
Smoked on a bit of burned heat.
She looks at the stars in the day light.
Turned them to a magic beam.
I can see her dancing in a spotlight.
She keeps on twisting her hips.
The beat of her heart is loud.
Music is in the wind.
Every breath that I take in this time.
Feels like I’m waking up from a dream.
Head is heavy from last night.
But brain is making it’s way to the scene.
Caught up at this moment so hard.
I can never talk about my feelings.
So, I keep on looking at one lie.
Who’s dancing on the rhythm of her heart beat.

Poem ID: 359

Poet’s Name: Shivali Thakar
Poem Title: आत्मनिर्भर
Location: Mumbai, Maharashtra
Occupation: Teacher
Poem Length: 21 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: March 6, 0020
Poem Submission Date: July 13, 2020 at 5:40 pm

Poem:

देश को अपने आत्मनिर्भर बनाना है

आज माँ भारती तुझसे प्राणों का बलिदान नहीं
विदेशी वस्तुओंका बहिष्कार मांगती है
जंग नहीं ये, देश प्रेम की पुकार है
देश को अपने आत्मनिर्भर बनाना है

ऐसा नहीं के द्वेष है,  विदेशी वस्तुओं से कोई
किन्तु देश को भी तो सक्षम बनाना है
लघु और कुटीर उद्योगों में उत्साह जगाना है
देश को अपने आत्मनिर्भर बनाना है।

स्वदेशी इतिहास को आज जागरूक करना है
फिर वो गाँधी की गरिमा को बढ़ाना है
विरोध प्रदर्शन नहीं ये, स्वदेशी भावना का संचार है
देश को अपने आत्मनिर्भर बनाना है।

क्षमताओं की कमी नहीं,
ये तो स्वचेतना का आव्हान है
भिन-भिन नहीं एक जुट होकर
इस अभियान को सफल बनाना है
देश को अपने आत्मनिर्भर बनाना है

-शिवाली

Poem ID: 360

Poet’s Name: Shivali Thakar
Poem Title: आत्मनिर्भर
Location: Mumbai, Maharashtra
Occupation: Teacher
Poem Length: 21 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: March 6, 0020
Poem Submission Date: July 13, 2020 at 5:50 pm

Poem:

देश को अपने आत्मनिर्भर बनाना है

आज माँ भारती तुझसे प्राणों का बलिदान नहीं
विदेशी वस्तुओंका बहिष्कार मांगती है
जंग नहीं ये, देश प्रेम की पुकार है
देश को अपने आत्मनिर्भर बनाना है

ऐसा नहीं के द्वेष है,  विदेशी वस्तुओं से कोई
किन्तु देश को भी तो सक्षम बनाना है
लघु और कुटीर उद्योगों में उत्साह जगाना है
देश को अपने आत्मनिर्भर बनाना है।

स्वदेशी इतिहास को आज जागरूक करना है
फिर वो गाँधी की गरिमा को बढ़ाना है
विरोध प्रदर्शन नहीं ये, स्वदेशी भावना का संचार है
देश को अपने आत्मनिर्भर बनाना है।

क्षमताओं की कमी नहीं,
ये तो स्वचेतना का आव्हान है
भिन-भिन नहीं एक जुट होकर
इस अभियान को सफल बनाना है
देश को अपने आत्मनिर्भर बनाना है

-शिवाली

Poem ID: 361

Poet’s Name: Litty Lokanath
Poem Title: A True Patriotic
Location: kozhikode
Occupation: Teacher
Poem Length: 14 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: October 30, 2020
Poem Submission Date: July 16, 2020 at 8:18 am

Poem:

A patriotic loves his country,
A patriotic protects his country.
A patriotic believes in his country,
A patriotic ‘behaves’ in his country.
A patriotic breaths for his country,
A patriotic beats for his country.
A patriotic feels for his country,
A patriotic heals for his country.
A patriotic sees for his country,
A patriotic hears for his country.
A patriotic dies for his country
Because, he can’t sleep in his country.
And he holds our flag high among others,
And that is our proud ‘Javaans’.
Vande Matharam

Poem ID: 362

Poet’s Name: Arunima Srivastava
Poem Title: वक़्त के निशाँ
Location: new delhi
Occupation: Student
Poem Length: 20 lines
Genre: Shringaar (romantic)
Poem Creation Date: October 11, 2020
Poem Submission Date: July 17, 2020 at 9:55 am

Poem:

वक्त के निशां…

बाल्कनी में रखे काठ के टेबल पर
कोहरे में लिपटी हुई
हमारी उस सुबह के
दो कप चाय के निशां रखे हुए हैं
अभी तक ।

रात भर गिरी थी
जब गिले- शिकवों की ओस
नम हुए थे सारे लम्हें
उन दो चाय के कपों ने फिर
सुबह की थी कोशिश
हमारे उस ठिठुरती रिश्ते की
साँसों को सेकने की ।
उस नाकाम कोशिशों के निशां रखें हैं
अभी तक ।

वक्त की धूल जमने से ज़रा
धुंधले दिखते हैं अब
ठीक वैसे ही जैसे हम दोनो
एक दूसरे की यादों में
धुंधले से दिखते हैं अब..।।।

Poem ID: 363

Poet’s Name: Sanskriti Garg
Poem Title: ख्याल
Location: Saharanpur , U.P
Occupation: Student
Poem Length: 8 lines
Genre: Karuna (pathos)
Poem Creation Date: January 7, 2021
Poem Submission Date: July 20, 2020 at 7:33 pm

Poem:

ख्याल भी कितने अजीब होते है ना…..
किसी का ख्याल आ जाएं ,तो बस एक बेचैनी सी हो जाती है उससे मिलने की…
किसी को अपना बनाने का मन करने लगे , तो सौ ख्याल मन में उमड़ पड़ते हैं….
ख्याल होते अच्छे – बुरे दोनों है,
बस हमारा सोच का पैमाना बदल जाता है।।

Poem ID: 364

Poet’s Name: Kritish Palrecha
Poem Title: effects of corona in india
Location: PUNE
Occupation: Student
Poem Length: 28 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date:
Poem Submission Date: July 22, 2020 at 9:48 am

Poem:

The world’s daily chaos is halted ..
People are spending time with their families with movies and popcorn salted..

The birds are chirping and dancing joyfully..
Why not?..
They have got their happy world back which they deserve truly

People are running back to theirs hometowns..
The NRIs suddenly realised they are brown..

The forgotten parents got back their children home…
Lets pray for our friends in Wuhan and Rome

No more pollution in the magnificent blues..
No superpowers have any curable clues..

The air is getting clean and clear..
Where are your nuclear weapons my dear..?

Can your bank account improve your health account..?
Can your gold reserves decrease the death count?..

Where is the religion for which you guys fight ?..
The virus isn’t racist it attacks indiscriminately everyone with all its might…

I see unity as the only light..
Which will make the world again bright..

~Kritish Palrecha

Poem ID: 365

Poet’s Name: Kritish Palrecha
Poem Title: गाँधी बापू
Location: PUNE
Occupation: Student
Poem Length: 20 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: October 6, 2018
Poem Submission Date: July 22, 2020 at 9:57 am

Poem:

गांधीजी लेकर आए सबको एक सात;
और अंग्रेज़ो से मनवाई अपनी बात|
महात्मा गांधी की थी लंबी छड़ी
जो अंग्रेज़ो से डटकर लड़ी;
और ब्रिटिशर को उनकी बात माननी पड़ी;
और अंग्रेज़ो की भाग गई गाडी।
महात्मा गांधी ने दिलाई आज़ादी;
और भारत को बचाया from बरबादी;
लेकर सबको आए एक जूट;
और छोड़ दिए उनके बनाए सूट बूट।
नहीं होते वह तो अंग्रेज़ हमें लेते लूट;
हम को मिला उनकी मेहनत का फ्रूट;
अहिंसा का मार्ग चुना; और आज़ादी का बीज बुना।
महात्मा गांधी को देते हम श्रद्धानजली,
गूँज उठता हे उनका नाम गली गली,
दिलाई आज़ादी देकर खुद की बलि,
गुलामत की रात ढली।

कृितिश पालरेचा

Poem ID: 366

Poet’s Name: Himanshu Mani
Poem Title: Andhkaar se roshini ki taraf
Location: Chapra, Bihar
Occupation: Student
Poem Length: Many but not over the limits lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: February 1, 2022
Poem Submission Date: July 23, 2020 at 1:10 pm

Poem:

Neend kaha hai ab aakho me
Khoj khoj ke sare news dekh rha hu
Itihas ko bante dekh rha hu
Hindu Muslim ko ek hote dekh rha hu
Ab neend kaha in aakho me
Ab to poore desh ko jaagte hue dekh rha hu
Sochta tha kaisa woh manjar hoga
Azaadi ke pehle ka
Jb sara desh ek ho gya tha
Inquilab ke liye larr rha tha
Jb sara desh jag chuka tha
Gulami se thak chuka tha
Ae mitro, Jara Socho,
Kaisa lagta hoga apne bhaiyo ke sath milkar inquilab ka nara lagakar
Kaisa lagta hoga andhkaar me apni awaaz uthakar
Kaisa lagta hoga ek dusre ka sath akhiri sas tk dekar
Sach me woh etihasic pal tha
Sach me yeh etihasic pal
hai
Waha pe angerjo se larna tha
Aur yha pe kattarpan soch se
Uss samay Azaadi desh se chahiye thi
Iss samay Azaadi chahiye bhukhmari se, berojgari se,dharm ki rajneeti se.
Ha kahne ki azaadi chahiye
Na kahne ki azaadi chahiye
Sawal puchhne ki azaadi chahiye .
Jb darr uss samay nhi laga tha .
To iss samay kya khaak lagega .
Hum kal bhi dekh liye the
Hum kal bhi dekh liye the
Hum aaj bhi dekh lenge
Dekh rha hu
Logo ko dharm se upar
Uthte hue dekh rha hu
Apne adhikaro ke liye
Ladte hue dekh rha hu
Andhkaar se Roshini ke taraf kadam
badhate hue dekh rha hu

Poem ID: 367

Poet’s Name: Bhimank trehan
Poem Title: यह बरसात की जो बूंदे है
Location: Jalandhar, Punjab
Occupation: Student
Poem Length: 12 lines
Genre: Shringaar (romantic)
Poem Creation Date:
Poem Submission Date: July 23, 2020 at 8:11 pm

Poem:

यह बरसात की जो बूंदे हैं
मुझमे तुझको ढूंढे हैं
वजूद मेरा मुझसे क्या पूछे
मेरी पहचान तो तुझसे है

आवारगी कह दीवानगी कह
जो भी है _ बस तु है वजह
कल तक तो न जानता जिसे
ढूँढू उसे हर शहर हर जगह

वाक़िफ़ हु मैं तेरी हर एक रग से
वो भी जानु जो तु बोले ना
दुनिया से तुम्हे रखा छुपाकर
क्योंकि एक ही डर है तुझे खोने का

यह बरसात की जो बूंदे हैं
मुझमे तुझको ढूंढे हैं
वजूद मेरा मुझसे क्या पूछे
मेरी पहचान तो तुझसे है

Poem ID: 368

Poet’s Name: Abhinav Sharma
Poem Title: लक्ष्य
Location: Pathankot
Occupation: Student
Poem Length: 18 lines
Genre: Other
Poem Creation Date: January 7, 2022
Poem Submission Date: July 27, 2020 at 3:01 pm

Poem:

बचपन से ही एक सपना था,
जब न कोई पराया न अपना था,
सोचा देश के लिए कुछ कर जाऊँ मैं,
वतन की खातिर मिट जाऊँ मैं l

वक्त बीतता गया, मुश्किलों से मैं जीतता गया,
लक्ष्य पास आता रहा, मैं उसमे समाता रहा,
रोज़ दोस्तों से दूरी का बोझ ढोना पड़ता है,
एक सच यह भी है कि,
कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है l

अब मौका भी है, दस्तूर भी है,
इस पल के लिए दिल मे सुरूर भी है,
आज मंज़िल मेरे सामने खड़ी है,
दिल को सुकून दे जो, यह वह घड़ी है l

अपने सपने को मैंने शिद्दत से संवारा है,
इसकी खातिर मुझे मरना भी गँवारा है,
देश के लिए मौत भी जर जाऊँ मैं,
अभिलाषा भी तो यही थी मेरी,
कि अपने देश की खातिर मर जाऊँ मैं ll

Poem ID: 369

Poet’s Name: Dharmendra Soni
Poem Title: मत निकलो घर से बाहर आप अपने परिवार की जान हो।
Location: Jabalpur
Occupation: Professional Service
Poem Length: 14 lines
Genre: Karuna (pathos)
Poem Creation Date: August 7, 2021
Poem Submission Date: July 28, 2020 at 5:48 pm

Poem:

मत निकलो घर से बाहर आप अपने परिवार की जान हो ।

रोते देखा एक माँ को ,रोते देखा एक बाप को
रोते देखा एक पत्नी को,रोते देखा एक नन्ही जान को
मत निकलो घर से बाहर आप अपने परिवार की जान हो ।

मुँह को ढकना ,हाथों को धोना अब इसकी आदत डाल लो।
भीड़ जहाँ भी दिखे वहाँ दो गज की दूरी का ध्यान दो।
मत निकलो घर से बाहर  आप अपने परिवार की जान हो।

मत निकलो बाहर तुम घूमने फिरने अभी समय को जान लो
थोड़ा सा अभी परहेज करो फिर आजाद पंछी सी उड़ान भरो।
मत निकलो घर से बाहर आप अपने परिवार की जान हो।

माना कि मुसीबत बड़ी विकट है पर जोकिम उठाना ठीक नही
आप ही उम्मीद हो अपने घर की आप ही जलता चिराग हो
मत निकलो घर से  बाहर आप अपने परिवार की जान हो।

Poem ID: 370

Poet’s Name: Arpita Saxena
Poem Title: On Time
Location: JAIPUR
Occupation: Professional Service
Poem Length: 8 lines lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: June 2, 2020
Poem Submission Date: July 29, 2020 at 10:08 am

Poem:

Clock is ticking, things are happening
People are modifying as per the situation
Keeping emotions intact, legs are moving forward!

Be on time everyone says,
Like the Sun shines and the day glows
Night comes when the Moon rose!

Time is running, so are you
Don’t let your fears cross you!

Poem ID: 371

Poet’s Name: varun chaudhary (antriksh)
Poem Title: हर जुबान की खबर हो जाते हैं
Location: Agra/Mathura
Occupation: Professional Service
Poem Length: 15 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: October 1, 2020
Poem Submission Date: July 31, 2020 at 6:16 pm

Poem:

मिटते हैं सरजमीं पर
वह शख्स अमर हो जाते हैं।
नाम की भूख नहीं
वह हर जुबां की खबर हो जाते हैं।

जिन्दा है ज़मीं की धड़कनें
जिनके कदमों की ताल से।
गूंजते हैं जयघोष जिनके
आकाश और पाताल से।

वतन के रखवाले
वतन पर बलिदान हो जाते हैं।
सांसें मिलाकर मिट्टी में
वतन की जान हो जाते हैं।
जिनके जिक्र हवाओं में
सुबह शाम दोपहर हो जाते हैं
नाम की भूख नहीं
वह हर जुबां की खबर हो जाते हैं।

कितनी दुल्हनों के किस्से खत्म हो गए।
कितनी माँओं के हिस्से खत्म हो गए।
लेकर अपनों से विदा
वो निडर बेखबर हो जाते हैं
नाम की भूख नहीं
वह हर जुबां की खबर हो जाते हैं।

जय हिंद
वरुण चौधरी

Poem ID: 372

Poet’s Name: CA RANJIT JHA
Poem Title: जात बनी सीमा पर
Location: KOLKATA,WEST BENGAL
Occupation: Professional Service
Poem Length: 150 lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: March 8, 2020
Poem Submission Date: August 4, 2020 at 1:41 pm

Poem:

जात बानी सीमा पे,काहे रोअत बारू माई-2
जात बानी सीमा पे,,,,,
अभी उमिर बा बाईस के,बानी हम जवान हो
खून खौलता हमार,जितब
चीन-पकिस्तान हो
जीति के हमनी सभे ,जय भारत बोलत आइब
जात बानी सीमा पे,काहे रोअत बारू माई-2
एहि रक्षाबंधन में,राखी हम बंधाईब
मेहरारु के लह्ंगा-चुडी,तोहरा खातिर साड़ी लाईब
तोहार आशीष बाटे,केहू कुछो ना बिगारी
जात बानी सीमा पे,काहे रोअत बारू माई-2
गोली खाईब सीना पे,ना पीठ देखाईब
मरिके आइब तिरंगा में,ना तोहार नाम हसाईब
जा जा बेटा कहली माई,खुशी से आँख भरी आईल
जात बानी सीमा पे,काहे रोअत बारू माई-2
धन्य धन्य ई लाल,जेकरा से सुरक्षित ई देश बा
संप्रभुता आ समृद्धि से,
सुगंधित प्रफुल्लित ई देश बा
तोहरा जैसन बेटा के पाई के,भारत माता धन्य हो जाई
जात बानी सीमा पे,काहे रोअत बारू माई-2

Poem ID: 373

Poet’s Name: Sai Sathwik
Poem Title: Truce with time
Location: Hyderabad
Occupation: Student
Poem Length: 40 lines
Genre: Other
Poem Creation Date: June 7, 2022
Poem Submission Date: August 6, 2020 at 4:18 pm

Poem:

The man stands ubiquitous stationery
Looking at melancholy at his life machinery
Doubted, frustrated, fainted and stagnated
Sticking to the gloomy fate of life magneted
The man fainted with the eyes closed tight
Being defeated in the life’s fight
The sun seemed darker
The moon blackened
Steams hotter
Ice warmer
The house shorter
The day longer
Time slower
Chyme faster

Coming out I ask
O’ time, when is there a morrow
A night to my feeling’s burrow
The end to my sadness hollow
The stuck to my eye’s furrow.
My eye drops in their way to their own deck,
I scream the nature
Go fast
All the now past
A day to forget must
In order to have that feelings just.
The tornados seem to vanish
The happiness in tarnish
And the mind in crushing molish
And where to polish.
So I say my mind stop this.

This is my truce with time
The test of mine.

Poem ID: 374

Poet’s Name: ANUPAM DEY
Poem Title: वविकलांग नहीं दिव्यांग है ये
Location: BILASPUR
Occupation: Writer
Poem Length: 40lines approx lines
Genre: Veer (heroic)
Poem Creation Date: October 6, 2019
Poem Submission Date: August 7, 2020 at 7:25 pm

Poem:

महक उठती धरा स्पर्श से
छू लेते गगन जो चाह ले
लड़खड़ाते कदम गर बड़ गए
समंदर भी इनको राह दे
विकलांग नहीं दिव्यांग है ये

है प्रतिभा गजब की , साहस अदम्य है
याम को भी हराये है ये
दे देते चुनोती है उसे
ईश्वर भी अगर टकराये है
विकलांग नहीं दिव्यांग है ये

मिटा डाले उसके रहस्य को
ब्लैक होल इनसे हारे है
बिग – बैग थ्योरी दे दिये
मिथ्या को मिटाये है ये
विकलांग नहीं दिव्यांग है ये

झुक जाता पर्वत शिखर भी
मस्तक जिधर ये घुमा दिया
मुड़ जाती नदिया राह से
कदम अगर ये बड़ा दिये
इनके हिम्मत की देती दाद दुनिया
कुदरत अचम्भा माने है
विकलांग नहीं दिव्यांग है ये

छीन ली गयी नज़र इनसे
श्रवण क्षमता छीन ली
हाथो को दोषित कर दिया
और चलन क्षमता छीन ली
सब छीन कर जो खुश हुआ
था वो नृत्य तांडव कर रहा
इसने भी छीना दर के उसके
रहस्य को चुनौती दे दिये
विकलांग नहीं दिव्यांग है ये।