आज़ादी

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एक पाती
भीग गया हूँ नेह मेह से , तेरे धागे के स्नेह से
सजा हुआ है ये कलाई पर , स्म्रतियां कर गयी अंतर तर
नन्ही गुडिया सी तू मन में , वही छवि जो थी बचपन में
तू मेरी बहना है प्यारी ,अब तो तेरे कन्धों पर ही छोड़ चला हूँ ज़िम्मेदारी
मोर्चे से उठ रही पुकार , दुश्मन रहा हमें ललकार
क़र्ज़ दूध का चला चुकाने , आज़ादी के गा तराने
ठान लिया है में सीमा से ,दुश्मन को मार भगाऊंगा
सफल नहीं हो सका यदि ,सीने पर गोली खाऊंगा
आंच न आने दूंगा में ,भारत माँ की आन पर
हँसते -हँसते ओढ़ तिरंगा , खेल जाऊँगा जान पर

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