आझादी

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लम्हे की चिँगारी को आग मे बदलना सिखो,
जिँदगी मे खुद की वजह धुंडना सिखो ।
ये वक्त तुम्हारा ही है, जो किसीने छिन लिया है,
अपनी आझादी की लढाई अब तुम भी लढना सिखो ।

पनाह दो सपनो को अपने दिलो मे,
तुम खुद मे ही अपनी एक शान हो ।
एक और, एक और मौका दो खुदको,
ताकि सर आँखो पे सारा जहान हो ।
धडकनो की धुन बनाकर जीत के गीत गुनगुनाओ,
बंधे पंखो को खोलकर खुले आसमान मे उडना सिखो,
अपनी आझादी की लढाई अब तुम भी लढना सिखो ।

Comments

  1. rajat

    October 10, 2012

    what a nice poem…really great

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