क्या यही सिला दोगे ?…

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क्या यही सिला दोगे ?…
क्या यही सिला दोगे ,तुम उनकी सहादत का ?
उनके त्याग का बलिदान का और उनकी बगावत का,
क्या यही सिला दोगे तुम उनकी सहादत का ?

प्राण आहुति देकर जिसने, तुम सब को आज़ाद किया,
शांति,स्वतंत्रता, सुख, समृद्धि का फिर से यहाँ आगाज़ किया,
देशसेवा अज़ान था जिसका ,उनके किये इबादत का ,
क्या यही सिला दोगे ,तुम उनकी सहादत का ?

शौर्य ही श्रृंगार था जिसका,धरती जिसकी माता थी,
फांसी के फंदे से गूंजी जिसकी गौरव गाथा थी,
वीरों के इस वीरभूमि में, वीरता के विरासत का,
क्या यही सिला दोगे, तुम उनकी सहादत का ?

अपने खून को जिसने खून न समझा, बहा दिया पानी कि तरह,
कोई है जो जाँ दे सकता है अब,आज़ाद कि कुर्बानी कि तरह
राजगुरु,सुखदेव, भगत की,माँ की लुटी अमानत का,
क्या यही सिला दोगे ,तुम उनकी सहादत का ?

माँ चाहती है, कुर्बानी फिर,उठो देश का उद्धार करो,
भ्रष्ट, भ्रष्टाचार,व्यभिचार, सबका तुम संहार करो,
या फिर तुम तमाशा देखो,राजा, तेलगी, कसाब के जमानत का,
क्या यही सिला दोगे ,तुम उनकी सहादत का ?
– दीपक कुमार दुबे”दीप”

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