जिन्दगी, ऐ माँ तेरे लिए

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जिन्दगी, ऐ माँ तेरे लिए

अपनी जवानी मैंने पहाड़ों के नाम लिख दी,
जवानी की बहारें जंगलों के नाम लिख दी,
जवानी की गर्मी से बर्फ मैं पिघलाता रहा,
जवां जिस्म की नर्मी, राजस्थान के रेत में उडाता रहा,

जिन हाथों से सहलाता मैं सजनी का चेहरा,
उन हाथों में बन्दूक मैं थमाता रहा ।

जब भी आता खत सजनी का,

पहरा है मेरा सरहद पर, मैं ये बताता रहा ।

जवानी की रंगिनियाँ, मैं सफेद बर्फ में मिलाता रहा,
जो पिघली बर्फ तो स्याह पत्थरों से मन बहलाता रहा
एक पहाड़, से दूसरे पहाड़, बनकर रखवाला मैं जाता रहा।

ख़ुशी हो या गम, बेखबर ! मैं झूमता रहा।

इस कदर खोया मैं, सरहद के पहरे में,
दिल की बातें कभी न झलकी मेरे चेहरे में।
बिते सत्तरह साल –
‘‘राम राम साहब’’, ‘‘जय हिन्द’’, मॉं, चला घर तेरा लाल ।
टूटा भ्रम, सपनों के महल से निकला जो बाहर,

बैठकर सोचा तो हिसाब किताब नहीं है बराबर ।

सरहद पर जवानी की कुर्बानी, ये है महज दीवानगी ।
सरहद का पहरेदार ! कहते हैं लोग ‘‘ परे हट, चौकीदार ! ’’

उत्तर में, सबसे ऊँची चोटी पर पहरा मेरा –
सोचता था मैं, मेरी ऑंखों के नीचे अमन से है हिन्दूस्तान ।
करता था मैं अपने भाग्य पर अभिमान

है ये बिते दिनों का फसाना, मुझसे है रूबरू अब जमाना ।
दुनिया सौदे की बात करती है
दुनिया हर हिसाब को किताब में लिखती है ।

बस और जिरह मैं नहीं करूँगा लोगों से,

वो मेरी जिन्दगी थी, ऐ माँ तेरे लिए ।
मेरी वो बन्दगी थी,
बन्दूक से मैने निभाई वो बन्दगी थी,
‘ ऐ माँ ’ तेरे लिए

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