तब मुझको प्रेम हुआ भारत से

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जब सम्पूर्ण धरा शिशुओं सी, भटक रही बिन पहचान लिए
जब ढूँढ रहा था विश्व अखिल, देव प्रकाश का दान लिए
तब हरकर अज्ञानता की रजनी और जलाकर सूर्य प्रखर
सभ्यता सृजन करने भारत तब प्रकट हुआ था ज्ञान लिए
बस एक यही है जगद-गुरु एक यही पथ-प्रदर्शक
जब सम्पूर्ण विश्व परिचित हो गया सत्य इस शाश्वत से
तब मुझको प्रेम हुआ भारत से

उठा कृपाण इस दुनिया ने, जीता जब भूभगों को
प्रेम सुधा उर में भरकर,हम चले बुझाने आगों को
यवन हूणों के तलवारों से,गूँज उठा जब विश्व सकल
बुद्ध महावीर और अशोक ने, छेड़ा प्रेम के रागों को
आज विश्व वह दोहराता,जो हमने सदियों सिखलाया
क्रूर और कुत्सित हिंसा दानव जब झुका अहिंसा के हठ से
तब मुझको प्रेम हुआ भारत से

“ये तेरा है ये मेरा है” जग में तो ये चलता आया
शोणित लीक खींच धरा पर,जग ने अब तक क्या पाया
“है कुटुम्ब संपूर्ण धरा ही” कहकर भारत ने किंतु
मुगलों,यहूदी,पारसियों को, सच्चे मान से अपनाया
पीकर कटु गरल भारत ने,जब विश्व को पय का दान किया
जयकारों की ध्वनि उठी,कृतज्ञ मुखों फिर शत शत से
तब मुझको प्रेम हुआ भारत से

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