देश के ओ वीर प्रहरी ….

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देश के ओ वीर प्रहरी
आभा सक्सेना देहरादून

देश के ओ वीर प्रहरी तू धरा को डगमगादे,
सो गया है आज पौरूष, तू उसे फिर से जगादे।।
गांधी की यह पुण्य भूमि रह गयी अभिशाप बन कर,
नेहरू जी का रोम- रोम भी रो रहा अवसाद बन कर।
ओ धरा के युग प्रवर्तक तू नया इतिहास गढ़ दे।।
देश के ओ वीर प्रहरी तू धरा को डगमगादे,
सो गया है आज पौरूष, तू उसे फिर से जगादे।।
देश के नेता ही देखो देश के गददार निकले
अब वतन के वास्ते उनकी आंख से आंसू न निकले
ओ मसीहा देश के एक, काव्य तू धरती पर लिखदे
देश के ओ वीर प्रहरी तू धरा को डगमगादे
सो गया है आज पौरूष, तू उसे फिर से जगादे
विदेश की बैंकों में जो, चोरी से अपना धन गया है
देश का हो कर भी वह अब देश का न रह गया है
ओ रक्षक देश के निज धन ला करके दिखादे
देश के ओ वीर प्रहरी तू धरा को डगमगादे
सो गया है आज पौरूष, तू उसे फिर से जगादे
राष्ट्र की यह प्रिय पताका अब कभी न झुक सकेगी
आकाश की उँचाइयों से यह सदा बातें करेगी
ओ सिपाही देश के तू जोश हर सीने में भर दे
देश के ओ वीर प्रहरी तू धरा को डगमगादे
सो गया है आज पौरूष, तू उसे फिर से जगादे

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