धरती वीरों की

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“ये आज़ाद भारत,धरती है वीरों की,
धर्म है,कर्म है,जीवन है शूरवीरों की,
लहू देकर अपना,जिसे सींचा है वीरों ने,
चारों ओर लकीर जिसके,खींचा है धीरों ने,
यही वो उन्मुक्त-चमन है फूलों की|
यही वो आज़ाद धरती है वीरों की|

आओ इस आज़ादी के सही मायने,
समझें आज़ाद-भगत-बिसमिल से,
जो आज़ादी की लौ जलाकर,
चले गये दुनिया की महफ़िल से।
यही वो पतीत-पावन शुभ वेला है,
जब हमे यह विचार करना है,
इस पावन धरती की प्रतिष्ठा के लिए ,
जीना है या इसके लिए मरना है।
इसी पवित्र भावना से,
दुनिया भारत की चलती है,
ज़रा जागो इस निद्रा से,
ये आज़ाद भारत की धरती है|

ऐसा वर हमे दो, हे! भारतमाता!
कि तुम्हारे चरणों मे
बलिदान हम दे सकें।
धन-सम्पत्ती यश-वैभव,
कुछ भी न हो हमारे पास,
फ़िर भी सर्वस्व अपना,
तुमपर निछावर हम कर सकें।
जब भी प्राण निकले इस तन से,
तब तन मेरा तुम्हारी गोद मे हो।
जब भी विकार आये इस मन मे,
तब मन मेरा स्वच्छ गंगाजल से हो।”

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