नज़र आता है

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नज़र आता है

असली नही है ये चेहरे,
हर चेहरे पे मुझे इश्तिहार नज़र आता है.
हालत-ए-मुल्क गौर करो,
जैसे सबको तबाही का इंतज़ार नज़र आता है.
वतन क्यों गिर रहा है नीचे,
वतनपरस्त तो मुझे सरे बाज़ार नज़र आता है.
वोह अलग दौर था कोई यारो,
अब कहाँ मुल्क में परवरदिगार नज़र आता है.
अब क्यों न हवा दे थोड़ी सी हम,
जबकि हर सीने में आज अंगार नज़र आता है.
ज़माने की कोई विसात नही कोई,
क्या करे जब राह रोके अपना ही दीवार नज़र आता है.
कड़ी कर लो अब छाती तुम अपनी,
मुझे अब हिमालय में भी एक दरार नज़र आता है.
अब क्यों शहादत नही होता जबकि,
हर खून में आज हौसला तो बेशुमार नज़र आता है.
ये दिए न जलाओ मेरी चौकट पर,
जब तक कि मुझे हर जलसा उधार नज़र आता है.
होने दो अब रौशनी बर्क से ही राघव,
इससे इस साँझ के धुधलके के पार नज़र आता है .

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