नवरस भारत

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नौ रसों का मेलन,
है देश हमारा “ए” वन |
हर रस की है इक गाथा,
अजूबा देश जहाँ भिन्नता का है सांधा |
श्रृंगार रस से ओत प्रोत,
धानी उर्वरा, पूजनीय गंगा और चोटी हिमालय की ..
अद्भुतं रस तो है नितांत,
कान्तता ताज की हो, या धर्मों के अनन्य प्रकार…
हास्य रस का छौंका भी है लगा,
कपडे जितने सफ़ेद धन
उतना ही काला करने का कमाल,
आम आदमी का एक है फलसफा, हर चीज़ का है जुगाड़…
वीर रस को ना हम भूले आज भी ये देश की मांग है,
गाँधी, भगत, सुभाष के रक्तबीज
आज भी भारत में फूंके जान है |
परन्तु आज माहौल का रस है भयंकरम
लहू से लथपथ हैं शरीर, आदमी ही आदमी को भक्षकम |
वीभत्स है हर जगह नज़ारा
हाथो में बारूद और मुख पर मुखौटा
घृणा का, हवास का, लालच का |
घिरी हु मैं रौद्र्य और कारुण्य से,
देश की स्थिति पे तैश खाऊ या भुक्त भोगियो को दया का पात्र बनाऊ,

अंततः एक रस है छुपा हुआ, जिसे करना है उजागर
शान्तं को फैलाना है हर और
भारत को स्वतंत्र बनाना है एक बार और!

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