पीले पत्ते …

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छू धरा को पीले पत्तों ने
कुछ यूं आक्रोश जताया था ||
होकर छिन्न-भिन्न मचलती शाखों से
अश्कों का मतलब समझाया था ||

मंडराते श्वेत मेघों को, कर जल-विहीन
निरा श्यामल-रंग पहनाया था ||
बेडी कसे बरगद की रक्तहीन शिराओं में
बन तरुण अमर रक्त, नव-प्रवाह जगाया था ||

जलकर सबने, एक समां में
घर-घर समर-दीप जलाया था ||
बिखरे-बिखरे भारत को
कर तम-विहीन, जीवन नया सिखाया था ||

किया शंखनाद जो सबने मिलकर
विस्तीर्ण नभ का ज़र्रा-ज़र्रा थर्राया था ||
क्या दीवाने थे, वे पत्ते भी
एक-एक कोंपल में रंग नया छलकाया था ||

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