प्रजातंत्र का अंग

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धीरे धीरे कोहरा छंटने लगा
मानव सभ्यता की देहलीज पर
एक नए सूर्य का
उदय हुआ !
रात के सन्नाटे से परेशान
सोया हुआ आदमी
नींद से जगा !
प्रकाश के चकाचौंध से
उसकी आँखें चुंधिया गईं !
आँखें मल – मल कर उसने देखने की कोशिस की !
कुछ दिखा –
कुछ नहीं दिखा !
लाशों के बीच
तिरंगा पकडे एक बूढा –
कृशकाय !

आजादी की कीमत
“लाश”
आजादी का मतलब
“बंटवारा”
हिस्सा -हिस्सा आजादी !
टुकड़े -टुकड़े आजादी !!
उस बूढ़े की कल्पना साकार हुई !
भारत आजाद हुआ !
और आज
वही भारत ,
धर्म और राजनीति का अखाडा है !
बेबस मजबूर मनुष्य ,
इस आजादी का मारा है !!

अब रावण
राम से नहीं डरता !
क्योंकि उसके पास
खद्दर की शक्ति है !
वर्दी का हथियार है !
खद्दर से बलात्कार होता है !
वर्दी से अपहरण !

किन्तु आखिर में

वह भी तो
“प्रजातंत्र का ही एक अंग” है

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