प्रश्न

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इक लौ की दीपित शिखा, वर्षों से नयनों में जल रही है ,
कभी मंद कभी आरोहित, यह पीढ़ियों दर पीढियां उतर रही है
कुछ बात है दीवानी इसमें कि बुझती नहीं कभी ये,
सदियों से घने मतवाले तिमिरों को हर रही है
राष्ट्र प्रेम में की इस शमां में आहुत होने को परवाने
माँ धरती कल भी सिरजती थी, और आज भी जन रही है

हिमालय के ललित स्वर्णाभ शिखरों से, आज से युगांतर पहले,
दिखता था एक स्वर्ण पक्षी, सुदूर पूर्व से पश्चिम तक पंख पसारे
इस असीम विभव पर विजय लालसा लिए,
जाने कितने चंगेज़ मंगोल चोटियों से उतरे
फिर उन्हीं रास्तों से लौट गए मुँह की खा के
या रह गये फिर सदा के लिए यहीं के हो के
वैमनस्य कहाँ टिक पता है, सदय उदार कुटुंब की छत के तले

पर कभी जो ये ज्योति मंद पड़ने लगी
गिर्द आत्मश्लाघा की कालिख जो जमने लगी
जब कर्मण्यता राजसी ठाटों में बिखरने लगी
तकनीक के प्रति उदासीनता अपनी कीमत भरने लगी
हाय! परतंत्रता तब सादगी का शील हरने लगी !

वीरांगना जब शोषित होती है, छुप के सबसे भले वह रोती है
पर व्यथा न कभी अधरों तक लाती है,
बस संतान को शौर्यगाथाएँ सुनाती जाती है
उसमें ओज बल बुद्धि भर कर, वह अपना टूटा हृदय जुड़ाती है
और संग्राम दिवस के आने पर, रण तिलक स्वयं सजाती है

मातृभूमि भी सहते सहते सिसक उठी जब
खून से अपने, वो आँसू धोने निकल पड़े उसके सुनंद
कितने शरीर निष्प्राण हुए, दूसरों को देने को उन्हीं का ज़मीं-फ़लक
बहुत कुछ खोकर फिर पा लिया हमने,जो होता वजूद का सबब

वो अनमोल चीज़, जो छीनी गयी थी होते हुए भी हमारी
आयी लौट के ले के दिवाली, और दे के कीमत बड़ी भारी
उमर ग़ुलामी में काट उन्होंने हमारे लिए ला दी आज़ादी
और जब मांगी कीमत जालिमों ने, तो दी अपनी जिंदगानी

खो के, पा के पर छोड़ यहीं सब वो चले गए बिन देखे,
कि खुली फिज़ा में साँस लेना क्या होता है,
इसलिए कि हम आयें जब जहाँ में तो यह न देखें,
कि ग़ैर इशारों पर जीना या मरना क्या होता है !
पर जब जोशो-जुनून और हसरते-ज़िन्दगी की बात तौलें,
तो उनका ख्वाब हमारी हक़ीकत पे भारी होता है !

जो आ गया कर पार सारी मुश्किलों को
क्यों आज उसे बस सँवारना मुश्किल हो रहा है
क्योंकि कुछ लोग सीना ठोंक बदल गए तकदीरों को
पर उन्हीं के वंशजों को बस स्वार्थ निहित दिख रहा है

अधिकार जानते हैं हम सभी अपने, साक्षरता दर भी बढ़ी है
पर क्या तब से अब फिर से नहीं वो ज्योति मंद पड़ी है?
स्वअपेक्षा उन्मुख स्वकर्म तो नहीं, पर आशाएं बहुत बड़ी हैं
मैंने अपनी गलतियाँ नेतृत्व पर और नेतृत्व ने मुझ पर मढ़ी हैं
बन्दर ही सब ले जाता, जब दो बिल्लियाँ आपस में लड़ी हैं
छोटा या बड़ा हिस्सा, क्यों उसमें मेरा नहीं, दूसरे चेहरों पर चमकती जो ख़ुशी है
पर हिस्सा तो हम उसके हल में भी नहीं लेते, समस्या दूसरों की जो सीना ताने खड़ी है

अब ख्वाब बस पलने लगे हैं खुद के आराम और इमारत के
जयंतियों को ही बस याद आते हैं लफ्ज़ शहीदों की इबारत के
अपने सुख के आगे कहाँ दिखते हैं किस्से दूसरों की हरारत के
सब यही मानते हैं क्या बने-बिगड़ेगा मेरी एक हिकारत से

किंचित कड़ियों के परिवर्तन भर से, अभिलेख नूतन गढ़ जाते हैं
तारे भरसक आलोकित करते, जब राकेश अमावास में ढल जाते हैं
अगर इमान दिखे हर भारत पुत्र के काम में, तो उनकी क्या बिसातें हैं,
पद, लाभ, प्रलोभन, या जाति, धर्म, वर्ण, वेश में जो उलझाते हैं

आशियाने बनाते हम खुद वहीँ, और फिर कहते फिजाएँ ही मैली हैं
रखवाले से लेकर रहबर तक, पक्ष और विपक्ष सभी बहुत दोषी हैं,
पर जब आये अपनी बारी, तो हमें भी दिखती क्यों बस थैली है

क्या सत्पथ, सनातन गीता-ध्यायी भारत के लिए सच में कठिन है?
भटके पार्थ को लक्ष्य-बोध कराती, जो पार्थेष- पठित है?

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