भारत : सोने की चिड़िया

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था कभी सोने कि चिड़िया, देश मेरा किसी काल में ।
पर लग गयी इसको नज़र, डाला फिर डेरा काल नें ।
आए बहेलिये परदेस से, इसको फंसाने जाल में ।
आकाश में फिर उड़ सके, छोड़ा नहीं इस हाल में ।

छाया अँधेरा देश पर, सब लोग घबराने लगे ।
भेष धर मेहमान का, और बहेलिये आने लगे ।
करके भरोसा उनपर दिया था, धोखा वतन की आन को ।
छीना उसीने घर हमारा, पूजा था जिस मेहमान को ।

रख सकता नहीं लेकिन, पिंजरे में कोई तूफ़ान को ।
चल पड़े वीर फिर जोड़ने, बिखरे हुए सम्मान को ।
लाए वो आज़ादी छीनकर, देकर स्वयं की जान को ।
दे दिया उन्होंने देश यह, अपनी हर इक संतान को ।

फिर हुआ सवेरा एक दिन, पर जागा न को कोई नींद से ।
हो गयी थी चकनाचूर, यह देश, छीना था जिस उम्मीद से ।
देश अपना पर हर इक, वासी पराया हो गया ।
एक गहरी नींद में, हर एक भारतवासी सो गया ।

है नहीं गुलाम कोई भी अब, पर आज़ादी नज़र आती नहीं ।
अपनी यह पावन सभ्यता, अब किसी को भाती नहीं ।
नींद में है प्रत्येक मानव, पर दिन रात है वो जाग रहा ।
उगते हुए सूरज को छोड़, उलटी दिशा में भाग रहा ।

क्यों किसी के ज्ञान को, अंग्रेज़ी में अब हम नापते हैं ।
मातृभाषा बोलने में, अल्फाज़ क्यों अब कांपते हैं ।
यह देश क्यों है इंडिया, अब मन को ये भाता नहीं ।
आज़ाद है गर देश तो, भारत ही क्यों कहलाता नहीं ।

यूँ तो कहने को सभी में, प्यार हम बस बांटते हैं ।
लेकिन धरम के नाम पर, इंसान को हम काटते हैं ।
हर गली-कूचे में बस, दंगे और फंसाद हैं ।
फिर भी हमें यह मान है, की देश अब आज़ाद है ।

हर शख्स दोषी है, नहीं माफ़ी के काबिल कोई भी ।
भारत माँ यह सब देखकर, चिल्लाई भी और रोई भी ।
कर अनसुनी माँ की पुकार, बस प्रगति हम करते रहे ।
फिर भी हैं लाखों लोग जो, भूख से मरते रहे ।

चिर नींद में सोने से पहले, इक बार तो जागो भी अब ।
ऋण है तुम पर भी तो माँ का, पर उसे उतरोगे कब ।
समय यही है श्रेष्ठ, तुम अब तो निद्रा त्याग दो ।
इस देश को भारत बनाने में, सभी अब भाग दो ।

अपनी यह पावन सभ्यता, हर एक जन अपनाएगा ।
ऋण चुकाने के लिए, वापस हर बेटा आएगा ।
चमकेगा सूरज एक दिन, फिर जग में भारतवर्ष का ।
होगा वही सबसे अधिक, मेरे लिए दिन हर्ष का ।
होगा वही सबसे अधिक, मेरे लिए दिन हर्ष का ।

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