मत पूछो क्यों तन -मन हँसता

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मत पूछो क्यों तन -मन हँसता

मत पूछो क्यों तन मन हंसता
पगध्वनि में क्यों साज सा बजता
अंग-अंग में थिरकन रहती
अधरों पे मृदु गीत सा सजता
देस अपने थी गई सखि मैं
देस मेरा अँखियों में बसता ।

धरती की केसरिया चुनरी
मनवा पल पल याद करे
पीपल की वो ठंडी छैयाँ
याद करूँ तो आंख भरे
क्यारी- क्यारी, उपवन-उपवन
चित्रकार रंग भरता

देवदारों की शीत पवन
प्राणों में भर देती सिहरन
जलतरंग की स्वर लहरी सा
शाख- शाख में होता गुंजन
नदियों की कल-कल लहरों में
स्नेह वेग न थमता ।

त्योहारों की मेंहदी का रंग
झलके नभ के आंगन में
वांसती फूलों का उत्सव
सजता सब के प्रांगन में
श्र्द्धा और विश्वास का दीपक
मन मन्दिर में जलता

श्वेत पताका लिये खड़े वे
सीमाओं के प्रहरी पर्वत
मौन तपस्या लीन युगों से
संतों से वे साधक पर्वत
ऋषि मुनियों के ज्ञान का झरना
हिम शिखरों से झरता

हर प्राणी की अँखियां जैसे
स्नेह सुधा की गागर
अब जानूँ क्यों कहती दुनिया
गागर में है सागर
कैसे कह दूँ बिन माँ के हूँ
देस मेरा माँ जैसा लगता
तभी तो वो अँखियों में बसता ।

शशि पाधा

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