माँगा जिस मिटटी ने कभी …….

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माँगा जिस मिटटी ने कभी, बलिदान अपने सपूत से ,
आज वही मिटटी हमसे, ज़बाव माँगती है ।
वही पुनीत भावना , वही स्वर्ण कल्पना ,
संस्कृति और दर्शन का , वही इतिहास माँगती है ।
माँगा जिस मिटटी ने कभी …….

लाखों अबाल बृद्ध नर नारी , जिनके सपने छले गए ,
त्याग और बलिदान की गाथा , लिखाकर के जो चले गए ।
उस भगत सिंह आजाद को , चौराहों पर गड़ाने वाले ,
उस शिल्पकार कारीगर से , उन जैसा व्यक्तित्व माँगती है ।
माँगा जिस मिटटी ने कभी …..

इक अदम्य शक्ति का , जन जन में संचय हो ,
जहाँ प्रीत श्रद्धा भक्ति का , फिर कभी न क्षय हो ।
जहाँ जीने की न शर्त हो , हर कोई समर्थ हो ।
ऐसे कल्प देश की , वही पुकार माँगती है ।
माँगा जिस मिटटी ने कभी ……..

जब मानवता और लोकहित , इक छलावा मात्र है ।
जब हर तरफ कर्तव्य पथ पर , अंधकार व्याप्त है ।
जब आदर्शों और मूल्यों को , असली अर्थों में खो दिया ।
तब शील , शिष्ट और सदभावाना का वही चरित्र माँगती है ।
माँगा जिस मिटटी ने कभी ………….

जब एतिहासिक पर्व था , उसको हम पर गर्व था ।
हर मानते पर चन्दन था , मिटटी का एसा वंदन था ।
आज सभ्यता के विक्ष युग में , उपेक्षित सी उदाशीन सी ,
अपने लिए वो मिटटी हमसे , वही सम्मान माँगती है ।

माँगा जिस मिटटी ने कभी बलिदान अपने सपूत से ,
आज वही मिट्टी हमसे ज़बाव माँगती है ।

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