मातृभूमि को नमन करूँ

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मातृभूमि को नमन करूँ मैं
मातृभूमि को नमन करूँ,
इसके गौरवशाली चरणों में
मैं अपने शीश धरूँ II 1 II
मातृभूमि को नमन करूँ मैं
मातृभूमि को नमन करूँ I
पाँव पखारे सागर जिसका
और हिमालय मुकुट बने ,
अद्वितीय सभ्यता समेटे
अतुलनीय भू-खंड है ये II 2 II
साक्षी इसकी हिम की चोटी
जो खड़ी हजारों सालों से ,
फहराता ध्वज जहाँ आज तलक
इस देश के जनमे लालों से II 3 II
यहाँ वीर उपजते मिट्टी से
इसका इतिहास पुराना है ,
उनके ही रक्तों से सिंचित
इस देश का ताना-बाना है II 4 II
यहाँ भरत खेलते शावक से
शैशव में रंग दिखाते हैं ,
करते हैं दो-दो हाथ निडर
दुश्मन उन्हें देख लजाते हैं II 5 II

जब-जब आक्रांत हुई ये माँ
जब भी कोई दुश्मन आया है ,
प्राणों को न्योछावर करके
पुत्रों ने मोल चुकाया है II 6 II

हो चन्द्रगुप्त या राजा पुरु
पर हार किसी ने ना मानी ,
कर दिया चूर अरि का घमंड
पड़ गयी उन्हें मुँह की खानी II 7 II

गोरी जब दुस्साहस करके
इस भूमि पर चढ़ आया था ,
अपने ही घर में वधित हुआ
घटना का मोल चुकाया था II 8 II
सन सत्तावन में जब फैली
आज़ादी की चिंगारी थी ,
अबला कहते थे सब जिनको
वह सिंह-सदृश ललकारी थी II 9 II

चढ़ गया अठारह में फाँसी
पर मुँह से उफ़ तक किया नहीं ,
जी गया जो जीवन खुदीराम
वो और किसी ने जिया नहीं II 10 II

वो भगत सिंह जो बचपन से
बंदूके भी उपजाता था ,
घर-बार छोड़कर जोड़ लिया
इस मातृभूमि से नाता था II 11 II

आज़ाद बन गया पंद्रह में
बचपन में कोड़े खाए थे ,
आज़ाद रहा जो जीवन भर
आज़ाद ही प्राण गंवाए थे II 12 II

अनगिनत शहीदों ने दी है
जीवन की अपने कुर्बानी,
सच्चे सपूत थे मातृभूमि के
देश-प्रेम के अभिमानी II 13 II
बापू-नेहरु की थाती ये
टैगोर-तिलक का सपना है ,
लाला-सुभाष की जिद थी ये
स्वाधीन-साँस ही लेना है II 14 II

गंगा-यमुना कल-कल बहती
यहाँ राम-रहीम की भाषा में ,
गुरबानी संग अज़ान उठे
पावन जग की अभिलाषा में II 15 II

सतरंगी धूप छिटकती जब
बन जाता दृश्य मनोहर है ,
सब जाति धर्म और सम्प्रदाय
यह देश जहाँ से सुन्दर है II 16 II

जब जग के प्राणी वनचर थे
सर्वत्र व्याप्त जब जंगल था ,
आदर्श सभ्यता बसी यहाँ थी
सिन्धु घाटी में मंगल था II 17 II

महावीर और बुद्ध ने जग को
ज्ञान का मार्ग दिखाया था ,
सत्य अहिंसा की शिक्षा दी
प्रेम का पाठ पढ़ाया था II 18 II
तक्षशिला से ज्ञान उपजता
जो दुनिया में पहला था ,
चतुराई चाणक्य नीति से
विश्व-विजेता दहला था II 19 II

किसी और के देश-भूमि की
कभी हमें लालसा नहीं ,
हम पर जिसने आँख उठाई
कभी आज तक बचा नहीं II 20 II

संख्या-पद्धति दिया विश्व को
शून्य दशमलव सिखलाया ,
ज्ञान भूमि ये रही सदा से
जो आया उसने पाया II 21 II

आयुर्वेद है देन चरक की
शल्य-चिकित्सा सुश्रुत की ,
दुनिया को विज्ञान दिया था
बात अतीत पुरातन की II 22 II

योरप की सारी भाषाएँ
उनकी जननी संस्कृत है ,
नवगति यहीं से शुरू हुआ था
ये प्रमाण भी उद्धृत है II 23 II
अंतरिक्ष के इस रहस्य को
आर्यभट्ट ने सुलझाया ,
धरा लगाती रवि का चक्कर
सबसे पहले बतलाया II 24 II

गार्गी मैत्रेयी की धरती
जहाँ कालिदास महान हुए ,
विद्वत्ता नर और नारी की
ऊँची उठकर आकाश छुए II 25 II

आज उसी धरती पर कैसा
समय का पहिया घूम गया ,
इतराता था मानव जिस पर
आज उसे वो भूल गया II 26II

मक्कारी सीनाज़ोरी से
अब लूट-खसोट मचाते हैं ,
गाँधी-गौतम की धरती पर
बच्चे भूखों मर जाते हैं II 27 II

अन्याय हो रहे प्रतिपल क्यूँ
रक्षक क्यूँ भक्षक बनते हैं ,
अवमूल्यन मूल्यों का होता
हम चुप बेबस क्यूँ सहते हैं II 28 II
जो नारी देवी थी कल तक
अब कैसे ये होता है ,
दिन में चौराहे पर उसका
चीरहरण क्यूँ होता है II 29 II

उपजे कुछ ऐसे नरपिशाच
जो देश-गर्व से खेल रहे ,
इतने कायर हम कैसे हुए
क्यूँ देश-दुर्दशा झेल रहे II 30 II

कुछ मुट्ठी भर राक्षस जिनसे
ये जनता क्रंदन करती है ,
पददलित देश की आत्मा है
गणतंत्र की आह निकलती है II 31 II

बस अपने मतलब की खातिर
ये सब कुछ ही बाँटते हैं ,
आज़ादी जो मिली हमें
उसकी कीमत आंकते हैं II 32 II

यह आज़ादी जो मिली हमें
इसकी कीमत मत आंकों तुम ,
गर लहू उबाल नहीं ले तो
अपने अतीत में झाँकों तुम II 33 II
राणा-प्रताप की धरती यह
अन्याय को जिसने सहा नहीं ,
सोचो उस वीर शिवाजी को
जो दुश्मन से कभी डरा नहीं II 34II

सौगंध हमें उन वीरों की
अन्याय न अब होने देंगे ,
भ्रष्टाचारी हो सावधान
तुम्हे चैन न अब लेने देंगे II 35 II

अत्याचारी अन्यायी सब
जो बैठ मदों में फूले हैं ,
उनको अहसास दिलाना है
ये हाथ न लड़ना भूले हैं II 36 II

सौगंध शहीदों की हमको
अब राक्षस ना बच पाएंगे ,
गाँधी-इंदिरा की आहुति
हम यूँ ना व्यर्थ गवाएंगे II 37 II

उठो हो जाओ होशियार
अँधियारा ना घिरने पाए ,
दीमक लग आये जड़ में हैं
यह महावृक्ष ना गिर जाए II 38 II

आओ हम इसे बचाते हैं
और शपथ आज ये खाते हैं ,
जो भूल हुई अब ना होगी
फिर स्वर्ण-काल ले आते हैं II 39 II

यह देश हमारा हम इसके
हमें फिर से इसे संजोना है ,
सोने की चिड़िया कहते थे
उस गरिमा को पा लेना है II 40 II

ऋषियों-मुनियों की कर्मभूमि
का गौरव फिर से लाओ तुम ,
निर्वहन करो कर्तव्यों का
सच्चे सपूत कहलाओ तुम II 41 II

इसकी मिट्टी से बने हैं हम
इस मिट्टी में मिल जायेंगे ,
ग़र काम देश के आ न सके
तो कैसे पुत्र कहायेंगे II 42 II

संस्कृति ऐसी अपनी है
सारा जग शीश नवाता है ,
धन्य मनुज वो जिनका
इस पावन भूमि से नाता है II 43 II
ये जीवन इसे समर्पित है
सौ और जनम यदि पाऊँ मैं ,
बस यही लालसा एक मेरी
इस माँ का पुत्र कहाऊँ मैं II 44 II

धन्य हूँ इस धरती पर आकर
बारम्बार प्रणाम करूँ ,
मातृभूमि को नमन करूँ मैं
मातृभूमि को नमन करूँ II 45 II

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