में चाणक्य बनाता हूँ…..

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विपदाओं ने ऐसा घेरा
निकल न पाया कभी सवेरा
किरणें फैलीं नील गगन पर
धरती पर तो रहा अंधेरा
अंधकार में पुंज तलाशा
उससे दीप जलाता हूँ
मैं चाणक्य बनाता हूँ

शौर्य बंधा हो बाजू में
ऑख़ों में अंगार सजी हो
तर्क पूजतें हों शब्दों को
साँसों में हुंकार भरी हो
विद्रोह से विद्रोह करे जो
उनको शीश नवाता हूँ
मैं चाणक्य बनाता हूँ

शत्रु जब शास्त्रों को भूलें
शस्त्रों की भाषा पहचाने
परमपिता को शीश नवाकर
हत्या, वध में अंतर जाने
गंगाजल का आचमन करके
दिव्य प्रत्यंचा खनकाता हूँ
मैं चाणक्य बनाता हूँ

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