यह आज़ादी, जो मनाने का त्यौहार नही…..

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पुष्प की अभिलाषा कभी ये कहती थी,
उस राह पर फेके जाने को मचलती थी
कहती धन्य भाग्य सर आ जाए उनके चरणो तले
दिल में जिनके वतन का प्यार पले
आज वह अभिलाषा प्रवंचना बन गई है
बस एक मनोरंजक कविता भर रह गई है
कहाँ गाँधी, कहाँ नेहरू, कहाँ उनके सपने
रह गये ख्वाब वे हो भी न सके अपने
वतन की मिट्टी बिकती है जहाँ कौडियों के मोल
रह गया रत्ती भर न अब सत्य का भी तोल
गाँधी जेबों तले अब सिसकियाँ भरते हैं
उन्ही के नाम पर लोग बिका करते हैं
रंग गई उनकी सूरत भी अब सरेआम
रंगों से बदल गई है उनकी पहचान
कहते आज़ादी पर आज़ादी क्या जब कितने लोग
आज़ादी का मतलब भी नहीं जानते
भूखी नंगी तस्वीर और फूटी तकदीर से
आज़ादी जैसी नेमत कैसे पहचानते
यह तो चंद धनपतिओं को पड़ी हुई गिरवी है
जहाँ ग़रीबों के ठठरियो की मशाल जल रही है
आज़ादी पर्व मना कर उत्सव मनता है कहीं
दिल में मेरे उठती है पुकार यहीं
कोई जाकर जरा उनसे ये तो कह दे
ये आज़ादी जो मनाने का त्यौहार नहीं……….

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