यह देश मेरा जल रहा

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यह देश मेरा जल रहा .. [कविता] – श्रीकान्त ,मिश्र ’कान्त’

आतंक के अंगार बरसे
आज अम्बर जल रहा
त्रस्त घर उसका नहीं
यह देश मेरा जल रहा

भ्रमित अरि के हाथ में
कुछ सुत हमारे खेलते हैं
घात कर के मातृभू संग
जो अधम धन तौलते हैं
आज उन सबके लिये
न्याय का प्रतिकार दो
विहंसता है कुटिल जो
अब युद्द में ललकार दो

नीर आंखों का हुआ है व्यर्थ सब
और अब तो क्षीर शोणित बन रहा
त्रस्त घर उसका नहीं
यह देश मेरा जल रहा

आग यह किसने लगायी
क्यों लगायी किस तरह
राष्ट्र के सम्मुख खड़े हैं
कुछ यक्ष प्रश्न इस तरह
किस युधिष्ठिर की चाह में
राष्ट्र के पाण्डव पड़े हैं
प्रतीक्षा में कृष्ण की हम
मूक जैसे क्यों खड़े हैं

आतंक की हर राह में
सैनिक हमारा छल रहा
त्रस्त घर उसका नहीं
यह देश मेरा जल रहा

कुटिल अरि ललकारता है
मातृभू हुंकारती है
महाकौशल के लिये
फिर जन्मभू पुकारती है
उठो जागो ….
सत्यसिंधु सजीव मानस
कर गहो गाण्डीव
फिर से बनो तापस

रक्त अब राणा शिवा का
युव धमनि में जल रहा
शीष लेकर हाथ में हर
‘कान्त’ युगपथ चल रहा
त्रस्त घर उसका नहीं
यह देश मेरा जल रहा

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