ये देश मेरी आस्था, यही मेरा गुरूर है

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ये देश मेरी आस्था, यही मेरा गुरूर है

क्यों नहीं रगों में आज तुम्हारे बिजली कौंधती ?
क्यों स्वकेन्द्रीय सत्ताएं आज इंसानियत को रौन्ध्ती ?
क्यों लेन-देन की दुनिया में और बचा नहीं कुछ शेष है ?
इतिहास बदल देने वाले नाम बस रह गए अवशेष हैं…

एक नए बदलाव की क्रांति लाना हमे ज़रूर है….
ये देश मेरी आस्था , यही मेरा गुरूर है….

पढ़ी-लिखी पीढ़ी आज बस ऊपर से चमकदार है,
अन्दर डरती हीन भावना, वोह भी जार-जार है,
अगर देश का भविष्य ही कर्मों से मुंह चुराएगा,
तो खुद का देश बचने क्या अंतरिक्ष से कोई आयेगा?

आओ चलें साथ, भले ही मंजिल अभी दूर है…
ये देश मेरी आस्था, यही मेरा गुरूर है…

इस धरती ने ही जने सुभाष, भगत और गाँधी,
मिल जाओ सब एक जुट, और लाओ ऐसी आंधी.
अकेले यूँ मत घबरा, एक छोटा-सा कदम बढ़ा,
पीछे मुड़के जब देखेगा तो पायेगा पूरा देश खड़ा.

लोग कहेंगे की ये बस मेरे खाली दिमाग की फितूर है…
पर ये देश मेरी आस्था, यही मेरा गुरूर है….

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