रे भ्रष्ट तू सिंघासन संभाल

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हिलती है धरा, डोले है गगन
राजा है डरा, सहमा है सदन
उमड़ी है प्रजा, हुआ आन्दोलन
अब झूम उठा, वीरो का मन
लो सजी ध्वजा, बज उठा नाद
यह पुण्य कर्म का, है प्रसाद
क्या सुन्दरता, क्या भोलापन
सब त्याग चला, देखो बचपन
अब मात्रि हेतु, उठ खड़ा हुआ
अधिकार हेतु बस, अड़ा हुआ
ललकार जो सुन ले अब कोई
जग उठे प्रीत मन में सोयी
जिस क्षण की थी अभिलाष सखे
चल शीश उठा अब मान रखें
बस बहुत हुआ शासन उनका
बस बहुत हुआ भाषण उनका
अब तो जनता की बारी है
वहि शासन की अधिकारी है
सदियों से अत्याचार सहे
क्यों शासक ही लाचार रहे
यदि स्वर्ण गला हमने ढाला
सिंघासन को हमने पाला
अब हम ही उसे गलायेंगे
सिंघासन नया बनायेंगे
प्रासाद गिराए जायेंगे
जन भवन उठाये जायेंगे
चलते है जन, मन में उमंग
इतना तो आज करेंगे हम
धरती का ऋण अब बहुत हुआ
सब क़र्ज़ चुकायेंगे अब हम
चल बन्धु चले अब बढ़ निकलें
अपना भविष्य हम गढ़ निकलें
उन हुक्कामो को पता चले
आवाज़ यहाँ भर दम निकले
अब गया दौर उठ रहा आज
बरसो से जो सोया समाज
अब समेट अपना ये जाल
रे भ्रष्ट तू सिंघासन संभाल
की अब तक जिनको कुचल रहा
अब उनका ही ब्रह्माण्ड हिला
अब वापस करने की बारी
जो तुझको दी ज़िम्मेदारी
अब ख़तम हुआ भय राज तेरा
अब होगा यहाँ स्वराज मेरा
चमकेगी बस अब राष्ट्र ध्वजा
कि राज करेगी यहाँ प्रजा

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