वीर सुभाष बाकी तो हैं………

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मानचित्र में जड़ा हुआ, या बीच सड़क पर खड़ा हुआ
रामलीला में अड़ा हुआ, या फिर संसद में पड़ा हुआ
जन-गण का भाग्य-विधाता वह,हम कहें किसे भारत है?
वहीं भारत जिसकी महिमा सारे संसार ने गाया,
नई दिशा दे सकल विश्व को जगतगुरु कहलाया|
आज वहीं जननी अपने कुछ कपुतों पर रोती,
जिसके कारण भारतमाता अस्मिता अपनी खोती|
जो संसद को बना दुकान, ईमान को रखकर गिरवी
करते सौदा संस्कार का, जिनसे शरमाती दिल्ली|
पूछ रहा है आज हर बच्चा राजा, कलमाडी से,
क्या गरिमा बढ़ जाती इनकी मंत्री जैसे गाली से|
सत्तर साल के कंधे पर बूढ़ा भारत रोया है,
और हमारा यूवा आज़ाद जाने कहाँ सोया है?
नोट उछाले, इज़्ज़्त बेची, कुर्सी-जूते चला दिया,
संवैधानिक मंदिर को तुमने मयखाना बना दिया|
कभी जला सिंगूर, कभी जलते मंदिर-मस्जिद भी,
मजहबों की ले आड़ फिर इंसानियत भी जला दिया|
पाँच साल पर जयहिन्द कहता वह कथित देशभक्त है,
संवैधानिक पुतलों के हाथों में तिरंगा त्रस्त है|
है एक कटु सवाल मेरा नक्सलपोषक ठेकेदारो से,
जो बनते समाजवाद के नायक, दम भरते बस बातों से|
क्या कभी धमाके उनके दिल्ली का दिल दहलाते हैं?
बस उनके निशाने पर मासूम सिपाही आते हैं|
दोनों ने रोटी की खातिर बंदूक संभाला है पर,
फ़र्क होता बस वर्दी का, क्या इसलिये मारे जाते हैं?
हर बार जली है रेल सामूहिक नरसंहार के जलवे में,
क्या कभी सुना है हुई मौत, मंत्री की नक्सल हमले में|
यह सवाल नही तमाचा है, समाजवाद के चेहरे पर,
क्या कभी भ्रष्ट नेता के बेटे होते लाशों की मलवों में|
क्यों लोकतंत्र है मौन, खौलता लहू नहीं इन बातों से?
क्यों उदासीन हो गये हार, हौसला हम हालातों से?
डायनिंग से निकल चौक तक आक्रोश आज आया पर,
सड़क से संसद तक उसका जाना अभी बाकी तो है|
मत भूल सत्ता के गलियारे, है बूढ़ा शेर बस थका अभी,
याद रखना उसके कई वीर सुभाष बाकी तो हैं…….||

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