सियाचिन का शहीद

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वह प्रहरी था
उस हिमनद का
जो करता रहा छुप छुप कर वार
सर्द हवा की तलवार से
शिखर स्तब्ध खड़े
नाम लिखते रहे
वतन पर मिटने वालों का
मैदान खड़े रहे
बस वसंत के लिए
लेकर फूलों के हार.

रात घिर आयी
और वह नहीं लौटा
आँखों में बसता था जो तारा
दिन भर पत्तों पर टिकी बर्फ
रात की सर्दी में
बूँद बन पिघलती रही
नम होता रहा धरा का आँचल
यादों की ऊष्मा से.

फिर वह लौटा
तीन रंग लपेटकर
धरती का सीना
रंगों से फूला
वसंत सारी खुशबू और रंग लिए
जल उठा टेसू सा
अब वह कभी वापस नहीं जायेगा.

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