हिंदुस्तान वाया कश्मीर

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मैंने कहा कि धरती की है स्वर्ग ये जगह
उसने कहा की अब तुम्हारी बात बेवजह
सुनता जरुर हूँ कि थी ये खुशियों कि जमीं
धन-धन्य से थी पूर्ण, नहीं कुछ कि थी कमी
हिम चोटियाँ ही रचती जिसका खुद सिंगार हैं
बसता है गर कहीं – यहीं परवरदिगार है
झीलों की श्रृंखलाएं यहाँ मन है मोहती
हरियाली यहीं पर है जलवा बिखेरती
केसर की क्यारियां थी, पंक्तिया गुलाब की
कुछ बात ही जुदा थी इसके शबाब की
लेकिन जो मैंने देखा है मजबूर हो गया
गम , दर्द, आह , अश्क से हूँ चूर हो गया
तुम ये समझ रहे हो मुझे कुछ गुमाँ नहीं
तुमने न देखा खून ,आग और धुआं – नहीं
तुमने फकत सजाई है तस्वीर ही इसकी
तुमने पढ़ी किताबों में तहरीर है इसकी
सुनो आज कह रहे हैं मेरे अश्क दास्ताँ
इंसानियत , ईमान का है तुमको वास्ता
मैं दूध पी सका न कभी माँ के प्यार का
नहीं याद मुझको वक़्त हैं बचपन बहार का
माँ ने कभी लगाया नहीं मुझको डिठौना
गीला हुआ तो बदला नहीं मेरा बिछौना
होती है चीज ममता क्या ये जान न सका
मैं माँ की गोद भी तो पहचान न सका
मैं न हुमक सका कभी माता की गोद में
ना उसको देख पाया कभी स्नेह क्रोध में
कभी बाप की ऊँगली पकड़ के चल न पाया मैं
और मुट्ठियों में उसकी मूंछ भर न पाया मैं
उससे न कर सका मैं जिद मिठाई के लिए
आँगन में लोट पाया न ढिठाई के लिए
राखी के लिए सूनी रही है कलाइयाँ
हैं गूंजती जेहन में बहन की रुलाईयां
दिन और महीना याद है न साल ही मुझे
जिस दिन की मेरी ज़िन्दगी के सब दिए बुझे
कहते हैं लोग आग की लपट था मेरा घर
और गोलियां शैतान की ढाने लगीं कहर
कापी , कलम , किताब , मदरसे नहीं देखे
कहते किसे ख़ुशी हैं वो जलसे नहीं देखे
लाशो को ढोकर , कंधो पे हैं गिनतियाँ सीखी
विद्या के नाम शमशान , सजाना चिता सीखी
अब तुम ही कहो इसके बाद क्या हैं ज़िन्दगी
सर हम कहाँ झुकाए , करें किसकी वन्दगी
एक आस की किरण हैं तो जवान फ़ौज के
है जिनकी बदौलत हिंदुस्तान मौज से
उनके भी हाथ बाँधती है रोज हुकूमत
गर है कोई गिला तो अफ़सोस हुकूमत
हर रोज यहाँ बेगुनाह मारे जा रहे
पर जाने कैसे सोचती है सोच हुकूमत
जाकर कहो उनसे की सियासत न अब करे
आखिर कैसे कोई , कितना सब्र अब धरे
कश्मीर में बहती है रोज खून की नदी
है जिससे दागदार एक पूरी ही सदी
है जल चुका चरार – ए- शरीफ यहाँ पर
हैं हजरत बल में खून के धब्बे भी खुदा पर
दहशत का है गवाह , मंदिर रघुनाथ का
और अब तो पृष्ठ जुड़ गया है अक्षर धाम का
विष्फोट मुंबई का हो या गोहाटी का लहू
काशी में बेटे मर गए और पुणे में बहू
कश्मीर की विधान सभा , दिल्ली की संसद
आतंक जिनका धर्म है आतंक ही मकसद
आखिर कब तलक हम यहाँ सब्र ढोयेंगे
हम जाके किसकी किसकी कब्र रोयेंगे
दिल्ली से कहो जंग का ऐलान अब करे
दहशत को मिटा देने का ऐलान अब करे
आतंक समझाता नहीं है हर्फ़-ऐ-मोहब्ब्बत
इंसानियत को दाग देता , देता है तोहमत
बन्दुक की गोली को नहीं फूल चाहिए
मक्कारों के न सामने उसूल चाहिए
है मुल्क अपना , इसको चलो हम ही बचाएं
हर कोने से “जय हिंद ” की आवाज़ लगाये
हम जाति, धर्म , वर्ण औ मजहब को भुला दे
आओ शहर और भाषा की हर दूरी मिटा दे
मक्कारों , कायरों का तख्तो – ताज पलट दे
माँ भारती के चरणों में हर शीश झुका दे
लहरों पे समंदर के लहराए तिरंगा
और “बेजुबाँ” हिमालय पे फहराएँ तिरंगा

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