हे! भारत के राम

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हे भारत के राम

शयन हुआ संपूर्ण तुम्हारा, आगे मात्र समरांगण है,
घर-घर दंगा, हर घर लंका, हर घर में एक रावण है,
भेद चुके जो नाभि उसकी, मैं उसे बुलाने आया हूँ,
हे भारत के राम! तुझे मैं आज जगाने आया हूँ।
धवल ध्वजाएँ धर्मच्युत हों, मलिन हुई फहराती हैं,
तालिबान की आदिम शक्ति, जिहादी भिजवाती हैं
स्वर्णमृग मारीच बने हैं, मैं तुम्हें चेताने आया हूँ
हे भारत के राम! तुझे मैं आज जगाने आया हूँ।
आज प्रकंपित सबल राष्ट्र यह, अपने घर के शत्रु-दल से,
हमें तोड़ना है कुचक्र को, अपने ही अंतर्बल से,
इस संबल की वानर – सेना, मैं आज माँगने आया हूँ,
हे भारत के राम! तुझे मैं आज जगाने आया हूँ।
विस्फारित उनके हैं नेत्र, जो अंग हमारे होते थे,
वो करते युद्ध की भाषा बुद्ध जिनके यहीं पर बसते थे,
इस प्रेम-दया से पूरित जन को ब्रह्मास्त्र थमाने आया हूँ,
हे भारत के राम! तुझे मैं आज जगाने आया हूँ।
अतिथि को हम मान देवता , अपने अंग लगाते हैं,
करगिल के हत्यारे को भी हम पलकों पर सजाते हैं,
गर वह समझे युद्ध की भाषा तो बिगुल बजाने आया हूँ,
हे भारत के राम! तुझे मैं आज जगाने आया हूँ।
पतित हो गए आज विभीषण, चल पड़े रावण के द्वार,
कुंभकर्ण की नींद सो रहे आज नागरिक व सरकार,
इस पाप नगर में घूम – घूम मैं आग लगाने आया हूँ,
हे भारत के राम! तुझे मैं आज जगाने आया हूँ।
आश्रम सूने, गुरु मौन, निर्जन संसकार की शाला है,
सर पर गाँधी टोपी और एक हाथ में हाला है,
रामभक्तों की यह मर्यादा मैं तुम्हें दिखाने आया हूँ,
हे भारत के राम! तुझे मैं आज जगाने आया हूँ।
रामनाम की लूट मचाई, देश के इन कर्णधारों ने,
जाने क्या – क्या खा डाला, देश के इन गद्दारों ने,
भ्रष्टाचार का यह सागर मैं आज सुखाने आया हूँ,
हे भारत के राम! तुझे मैं आज जगाने आया हूँ।
आरुढ़ भरत सिंहासन पर, यह गठजोड़ों का मेला है,
लक्ष्मण तज गए मचा तहलका वन में राम अकेला है,
वनवास छोड़ के लौट चलो, मैं तुझे बुलाने आया हूँ,
हे भारत के राम! तुझे मैं आज जगाने आया हूँ।
मायावी सत्ता की शूपर्णखां अंकशायिनी होती है,
सीता जैसी संस्कृति आज अग्निपरीक्षा देती है,
मंथरा कैकयी के तंत्रजाल को आज काटने आया हूँ,
हे भारत के राम! तुझे मैं आज जगाने आया हूँ।
ऊर्जासिंधु युवावर्ग की आज कतारों में खड़ी है,
शस्त्रों का आडंबर पहने, अँधियारे में आज पड़ी है,
बाँध सके जो शक्ति सागर, वो पत्थर तिराने आया हूँ,
हे भारत के राम! तुझे मैं आज जगाने आया हूँ।
मातृशक्ति की पावन प्रतिमा क्यूँ खंडित हो जाती है,
कभी जलाई जाती है, कभी नग्न घुमाई जाती है,
इस अहिल्या की मूरत में प्राण फूँकने आया हूँ,
हे भारत के राम! तुझे मैं आज जगाने आया हूँ।
सुख-समृद्धि इस धरा पर, हम तो फिर से लाएंगे,
मर्यादा – मंडित अयोध्या, हे ! राम यहीं बनाएंगे,
जन-जन में हे ! राम, तुझे मैं आज बसाने आया हूँ,
हे भारत के राम! तुझे मैं आज जगाने आया हूँ।

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