हे मातृभूमि तुझको अर्पण

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हे मातृभूमि तुझको अर्पण, मेरा तृण-तृण मेरा कण-कण
वर्षो तूने दी है ये शक्ति, कभी खंडित न हो राष्ट्रभक्ति
जीवन यह तुक्ष तुझे अर्पण, यह स्वास देह धन और ये मन
किस तरह करू तेरा मान जननी, तुझपे सब वार बनूँ मै धनि
किस तरह और क्या दू तुझको, तुझसे ही मिला सब कुछ मुझको
कामना यही मै कर सकती, मेरा ह्रदय बने तेरा दर्पण
हे मातृभूमि तुझको अर्पण……

करना चाहू तेरि पूजा मै, तेरा अभिनन्दन और मान करू
रज-भूमि तेरि मै ललाट मलूँ, सर्वत्र तेरा गुणगान करूँ
तेरे जल में अधिक मिठास लगे, संपूर्ण मुझे हर स्वास लगे
तेरे खेतो की हरियाली से, तेरे बागो की हर डाली से
तेरी पगडण्डी तेरे मौसम से, मुझे प्रीत हवा मतवाली से
तू है अनुपम नैसर्गिक है, किस तरह करू तेरा वर्णन
हे मातृभूमि तुझको अर्पण…..

तेरे खेतो ने खलिहानों ने, तेरि धरा के पूज्य किसानो ने
सीमा पर डटे जवानों ने, आज़ादी के दीवानों ने
तुझको चाहा तुझको ही जपा, तेरा सुमिरन कर खुद को तपा
शत कोटि कंठ जय गान करे, शत कोटि शीश अभिमान करे
है ममता की अभिलाष हमे, बस एक तुम्हारी आस हमे
तुझको यह दिवस समर्पित कर, शत पुत्र करे तेरा ही मनन
हे जननी करू तुझे अर्पण, मेरा तृण-तृण मेरा कण-कण

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