Gaurav Gatha 2020 – Poems Submitted so far

Gaurav Gatha 2020 – Poems Submitted so far

Ms. Meenakshi Daga

Location: Jodhpur Rajasthan,
Occupation: Student
Education: Other
Age: 17-22
Poem ID: 463
Poem Genre: Veer (heroic)
Poem Length: 25 lines
Poem Creation Date: August 15, 2020
Poem Submission Date: September 22, 2020 at 4:10 pm

Poem Title: गुलाम आजादी

चौहात्तर साल आजादी को
पर आजादी भी पक्षपाती है
माताओं महिलाओं बेहन बेटी
पर आज भी गुलामी ही छाइ है

हर पांच साल मे बदलतीं रही सरकार
वादे करती रही बरकार,
और
हर पंद्रह मिनट मैं
होता है एक बलात्कार

जरूरत कानून से ज्यादा
सोच बदलने की है
इंसान में इंसानियत जगाने की है
रोज कोई न कोई द्रोपदी का
चीर हरण होता है
क्योंकी आज भी कहीं ना कहीं
दुशाशान जिंदा है

सीमा पर तैनात है सेना
लेके चौड़ा सीना
पर अंदरूनी आंतकवाद का क्या?
लोगो को अपना बदलना होगा नजरिया
स्त्री है वोह !
ना कि मनोरंजन का कोई जरिया,

आजादी का सपना तब होगा साक्षत्कार
जब छेड़ छाड़, घरेलू हिंसा , बलात्कार
का नहीं आए कोई समाचार…!

Ms. Meenakshi Daga

Location: Jodhpur Rajasthan,
Occupation: Student
Education: Other
Age: 17-22
Poem ID: 462
Poem Genre: Veer (heroic)
Poem Length: 25 lines
Poem Creation Date: August 15, 2020
Poem Submission Date: September 22, 2020 at 4:07 pm

Poem Title: गुलाम आजादी

चौहात्तर साल आजादी को
पर आजादी भी पक्षपाती है
माताओं महिलाओं बेहन बेटी
पर आज भी गुलामी ही छाइ है

हर पांच साल मे बदलतीं रही सरकार
वादे करती रही बरकार,
और
हर पंद्रह मिनट मैं
होता है एक बलात्कार

जरूरत कानून से ज्यादा
सोच बदलने की है
इंसान में इंसानियत जगाने की है
रोज कोई न कोई द्रोपदी का
चीर हरण होता है
क्योंकी आज भी कहीं ना कहीं
दुशाशान जिंदा है

सीमा पर तैनात है सेना
लेके चौड़ा सीना
पर अंदरूनी आंतकवाद का क्या?
लोगो को अपना बदलना होगा नजरिया
स्त्री है वोह !
ना कि मनोरंजन का कोई जरिया,

आजादी का सपना तब होगा साक्षत्कार
जब छेड़ छाड़, घरेलू हिंसा , बलात्कार
का नहीं आए कोई समाचार…!

Ms. Meenakshi Daga

Location: Jodhpur, Rajasthan,
Occupation: Student
Education: Other
Age: 17-22
Poem ID: 461
Poem Genre: Karuna (pathos)
Poem Length: 30 lines
Poem Creation Date: May 2, 2020
Poem Submission Date: September 22, 2020 at 3:42 pm

Poem Title: मजदूर है वो या मजबूर है वो?

गाड़ी आई गाड़ी आई
रेल नहीं पर ट्रक आई
सौ सौ बोरी धान लाई
गाड़ी आई गाड़ी आई
उसमें से उतरे तीन भाई
दो मजूर और एक माइक
पहले पी गरम चाई
फिर काम की बारी आई
एक मजदूर दे बोरी
दूजा उसको लादे
लाद कंधे पर बोरी
को, दुकान के अंदर
पटके, पर
बूंद- बूंद कर पसीना
टपके
पर रुके ना क्षण भर
एक
आई ना मुझको एक
बात समझ कि
मजदूर है वों,या
मजबूर हैं वो?
चिलचिलाती धूप में
दो रोटी की भूख में
दिन -रात
करें मेहनत
मेहनत की जो कीमत पाई तो
चेहरे पर छाई मुस्कान
हाय! वोह सोने की खान
फिर बात समझ में आई कि
मजदूर है वो पर
मजबूर भी है!

Mr. YASH MISHRA

Location: ajmer,rajasthan,
Occupation: Student
Education: Bachelor’s Degree
Age: 17-22
Poem ID: 460
Poem Genre: Veer (heroic)
Poem Length: 17 lines
Poem Creation Date: September 22, 2020
Poem Submission Date: September 22, 2020 at 9:34 am

Poem Title: भारत की आजाद

भारत की आजादी का सपना,
हम सब देखा हैl
गााँधी जी के इरादे पे ,
हम सब ने चलना सीखा है l
भरत ससिंह के मूछ के तरह ताव देना सीखा है ,
आ जाओ अिंग्रजो की फ़ौज ,
हम सब ने सीने पे गोली खाना सीखा है I
सदल मे है भाई चारा ,
हमने गले समलना सीखा है I
सहिंसा को दूर बघाओ,
हमने अिंसहिंसा को अपनाना सीखा है I
सहन्दू,मुस्लिम ससख,ईसाई,
हम सब है भाई भाई I
आ जाओ गलेसमले,
दूर भागय हम सब बुराई I
याद रखेगा हर युवा भरत का इतहास,
यही हैमेरा भारत इसी मेहैमेरा सवश्वास I

Ms. Tasnima Yasmin

Location: Kolkata, West Bengal,
Occupation: Student
Education: Other
Age: 23-28
Poem ID: 459
Poem Genre: Shant (peaceful)
Poem Length: 19 lines
Poem Creation Date: September 22, 2020
Poem Submission Date: September 22, 2020 at 5:21 am

Poem Title: Such Is My Country

Such Is My Country

Where streams meander to intertwine into magnificent rivers,
By the banks some swing with the breeze,
Others garner the nectar sucking bees that flit on its premises,
Its bounty has nourished, soothed and nurtured
Generations with anecdotes and experiences,
Its sagacious perspectives render it timeless,
Where the glimmering Sun shines bright
On its plains, deserts, plateaus, snowy peaks alike,
Only to shy away into the heart of the clouds,
Through monsoon to winter then spring and summer,
It sees many seasons but its moods are constant:
Sublime, poignant, selfless and tranquil,
It gushes forth with fruits and flowers,
Textured soils that recount tales from the past,
Where the land hosts many voices,
Yet is firm and steady,
Youth and senility in their varied appearances,
Coexisting with respect for one other,
Such is my country.

Mr. Ayush Sharma

Location: Greater Noida,
Occupation: Professional Service
Education: Bachelor’s Degree
Age: 29-35
Poem ID: 458
Poem Genre: Veer (heroic)
Poem Length: 32 lines
Poem Creation Date: September 14, 2020
Poem Submission Date: September 19, 2020 at 9:13 am

Poem Title: अब सीमा पर गूँजे हर हर महादेव का नारा

कभी युद्ध में और कभी हो विरत युद्ध की भू से
वीरों ने पूजा भारत माता को नित्य लहू से

कायर कोई जब करता है अप्रत्याशित हमला
प्राणाहुति के बोझ तले तब दब जाती है अचला

पर चुनौतियों से बिलकुल नवयुवक नहीं घबराते
सेना की भर्ती में बेटे उमड़ उमड़ कर आते

इसी चेतना को प्रभुता सर आँखों पर धरती है
इसी भाव को ही समस्त नरता प्रणाम करती है

किंतु मानवों में रहते हैं पशु-समूह कुछ छिपकर
वे ही करते नहीं सैन्य-क्षमता का समुचित आदर

जो स्वयं देशहित में कोई बलिदान नहीं करते हैं
वे नीच महाबलिदानों का सम्मान नहीं करते हैं

हर प्रयास करते हैं वे पौरुष को कम करने का
ज्ञान बाँचते हैं ये नव ऊधौ संयम रखने का

ये क्या जाने किन त्यागों से मिलता संरक्षण है
मातृभूमि पे शीश कटाने का क्या आकर्षण है

कोई करे प्रहार मगर निज शक्ति नहीं हम तोलें
रघुकुल के वंशज रिपु से संयम की भाषा बोलें

क्या परशुराम विचलित हों दुरबुद्धों की मनमानी से
रणचण्डी निज प्यास बुझा ले क्या ठंडे पानी से

क्या अर्जुन के शर तरकश में पड़े पड़े सड़ जायें
क्या नारायण चक्र सुदर्शन के रहते घबरायें

चौहानी तलवार म्यान में रखे जंग खा जाए
क्या भारत की संप्रभुता गुंडों को शीश नवाए

हमने हर आतातायी से लड़ अस्तित्व बचाया
पर इतिहास उठा कर देखो संयम से क्या पाया

जो लड़ता है उसे समूचा जग योद्धा कहता है
एक बार का भीरू भीरू ही मगर सदा रहता है

हमको प्रलयंकर तीखी आवाज़ उठानी होगी
विश्व पटल पर भारत माँ की साख बचानी होगी

नहीं चाहते हम कोई छिटपुट उपचार दुबारा
अब सीमा पर गूँजे हर हर महादेव का नारा

Ms. Swati grover

Location: delhi,
Occupation: Writer
Education: Graduate of Professional Degree
Age: 29-35
Poem ID: 457
Poem Genre: Veer (heroic)
Poem Length: 38 lines
Poem Creation Date: September 18, 2020
Poem Submission Date: September 18, 2020 at 10:08 am

Poem Title: हिंदुस्तान

हिंदुस्तान

तुम कहते हो मेरे देश में घूसखोरी, भ्रष्टाचार
काला बाजारी, गंदगी, बलात्कारी और सीनाज़ोरी है
फिर मैं तो कहूँगी तुमने
मैसूर के शेर टीपू सुल्तान नहीं देखे
शिवाजी का युद्ध कौशल, रिपु संहार नहीं देखे
तुम झाँसी के उस मैदान से नहीं गुजरें
कानपुर, बरेली, बिहार, लखनऊ ग्वालियर
की गलियों में नाना साहिब, कुँवर सिंह, तांत्या तोपे
भक्त खाऩ और छबीली की वीरता से लबालब
वो दीवारों पर तलवारों के निशां नहीं देखें।
पंजाब की मिट्टी को माथें से नहीं लगाया
क्या कभी कोई ऊधम सिंह, भगत सिंह
जलियाँवाला बाग के बाहर खेलता नज़र नहीं आया
आज भी अमृतसर में शहीदी के मेले लगते है
साहिबे कमाल हो, उनके लाल, या लाल-बाल-पाल
धर्म और देश भक्ति के लिए खून से लथपथ सीने
और कटे सिर नहीं देखे
साबरमती के आश्रम में दीपक नहीं जला सकें।
अंखड भारत के निर्माता पटेल के समक्ष
सिर नहीं झुका सकें।
कारगिल की बरफीली पहाड़ी पर लहराते तिरंगे नहीं देखे
तुमने पुलवामा के शहीदों के जनाजे़ नहीं देखें
आज भी कश्मीर की घाटी में कोई जवान चिर निद्रा में सोता है
माँ का अँचल कफन होता, राखी का धागा और पक्का होता है
यह वो देश है जहाँ गंगा-जमुनी संस्कृति का संस्कार दिखता हैं
होली के रंगों से जात-पात का भेद मिटता है।
देवकी-यशोदा की गोद में पलते
वो पाँच से पचास के हुए लाल नहीं देखें
माना मेरे देश में कई कमियाँ है
मगर पाप धोती गंगा मैया है
इसकी गौरव गाथा का गान विश्व में गाया जाता है
जब आज़ादी मिलते-मिलते दो-सौ साल लग गए
तो कुछ शब्दों में देश के शौर्य का बखान कैसे करो
तुमने देख तो लिया होगा देश
पर तुमने पत्थरों में भगवान नहीं देखे
जिनके दिलों में हिन्दुस्तान न बसता हो
मैंने वो इंसान नहीं देखे
वो इंसान नहीं देखे।।।।।।।।

Mr. yash mishra

Location: ajmer,rajasthan, india
Occupation: Student
Education: Bachelor’s Degree
Age: 17-22
Poem ID: 456
Poem Genre: Veer (heroic)
Poem Length: 18 lines
Poem Creation Date: September 16, 2020
Poem Submission Date: September 16, 2020 at 7:50 am

Poem Title: भारत का सपूत

मैं भारत का सपूत ,
मर मिट जाऊँगा ,
आंधी आये या तूफान ,
भारत माँ को बचाऊंगा l

हे दिल मैं तमन्ना,
कुछ ऐसा कर जाऊँगा,
भारत माँ का सर ,
गर्व से ऊंचा कर जाऊँगा l

खा लूंगा सीने पे गोली ,
अब लहू से खेलनी होली,
दुश्मन को मार भगाऊंगा,
सर उठा के भारत माँ के पास जाऊँगा,

करू कुछ ऐसा काम ,
भारत माँ का हो जग मे नाम ,
सब करे भारत की प्रशंसा,
जीता रहे भारत का सपूत,
और जीता रहे उसके अंदर का सपना l

Mr. Margoob Husain

Location: Amroha, U.P.,
Occupation: Teacher
Education: Graduate of Professional Degree
Age: 41-50
Poem ID: 455
Poem Genre: Veer (heroic)
Poem Length: 20 lines
Poem Creation Date: August 13, 2020
Poem Submission Date: September 16, 2020 at 5:26 am

Poem Title: देश मेरा सोने की चिड़िया

*देश मेरा सोने की चिड़िया*
देश मेरा सोने की चिड़िया, ये मेरा अभिमान है।
मर मिट जाऊँ इस पर मैं तो, बस इतना अरमान है।।

देश ने देखे दौर अनेकों, फिर भी शक्तिमान है।
झुकता नहीं है आगे ये तो, ऐसा ये बलवान है।।

आँँच ना आने देंगे इस पर, लुट जाए चाहें जान है।
कण कण के दीवाने इसके, हम इस पर क़ुर्बान हैं।।

अंग्रेजों ने बरसों बरस तक, राज किया मेरे देश पे।
भाग गए फिर एक दिन वो तो, देश में इतनी जान है।।

फाँसी पे चढ़ गए हँसते हँसते, वीरों की यही आन है।
एक नहीं है लाखों का फिर, बस ये तो बलिदान है।।

धरम किसी को माने चाहें, तिरंगा मेरी शान है।
एक ही माँ के बेटे हम तो, हम सब की ये जान है।।

रानी लक्ष्मी देश में मेरे, और टीपू सुल्तान है।
वीर योद्धा ऐसे ऐसे, भारत मेरा महान है।।

सत्य, अहिंसा शस्त्र थे जिनके, बापू का ये जहान है।
देश पे मिट गए हँसते हँसते, ये उनका बलिदान है।।

हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, फूल और इसकी शान हैं।
फैलाते सब खुशबु मिलकर, ऐसा ये बाग़ान है।।

मन्दिर, मस्जिद, और गिरजाघर, चारों ओर निशान हैं।
कथा कीर्तन और आज़ाने, रहती गुंजायमान हैं।।

लेखक-मरग़ूब अमरोही

Ms. Shalini Shukla

Location: Sidhi,
Occupation: Student
Education: Pursuing Bachelor’s Degree
Age: 17-22
Poem ID: 454
Poem Genre: Veer (heroic)
Poem Length: २६ lines
Poem Creation Date: September 15, 2020
Poem Submission Date: September 15, 2020 at 4:32 am

Poem Title: अंतिम इच्छा

प्रथम नमन मै करती उसको जिसने ये संसार बनाया,
दूजा नमन है चरणों में उनके जिसने ये संसार दिखाया।
फिर नतमस्तक हूं मै सामने है गुरुवर मेरे,
मातु पिता सा स्नेह दिया है भगवन मेरे।।
आज की चाल से मै भविष्य का काल लिख रही हूं,
आशा के सपनों से भावी का स्वर्णिम भाल लिख रही हूं।
जानती नहीं मुकद्दर नसीब क्या मैंने पाया ,
वर्तमान के सपनों से भावी का दिया जलाया ।
पता नहीं क्या लिखा है इन सपनों के भाग्य में,
सीप में पड़े मोती बनेंगे या गिर पड़ेंगे अंगार में।।
नहीं चाहती मै जीवन ऐसा,
वर्षों सा लंबा सदियों जैसा।
मेरे ईश्वर भले तू कुछ पल की जिंदगी का त्योहार दे,
मर सकू मै वतन पर ऐसा मुझे उपहार दे।
कतरा कतरा लहू का मेरे इस वतन पे कुर्बान हो,
अंतिम क्षण में लबों पे मेरे मां भारती का नाम हो।।
मेरे मरने पर तुम ऐसा व्यवहार करना,
मेरी लाश का ऐसा तुम श्रंगार करना…
तीन रंगों से सजी हो अर्थी मेरी ,
मुख में हो गंगे की पावन धरा।
जन गण मन वंदे मातरम् का सरगम हो
भारत की जय से गूंज अम्बर सारा।।
आस लगाती हूं भगवन से, है विनती बारम्बार,
जो मृत्यू का यही नसीब हो, तो स्वागत है शत बार।।

Mr. Yogesh Amrit Raj

Location: Ranchi Jharkhand,
Occupation: Professional Service
Education: Pursuing Graduate degree
Age: 17-22
Poem ID: 451
Poem Genre: Veer (heroic)
Poem Length: २५ lines
Poem Creation Date: May 5, 2020
Poem Submission Date: September 15, 2020 at 4:15 am

Poem Title: शील एवं शौर्य

मानव! भीष्म में भी तुम हो, कृष्ण भी तुम,
भूत भी तुम, भविष्य भी तुम,
जो बदल के रख दे पुरातन सोच,
उस ऊर्जा से युक्त भी तुम,

तुम वीर शिवाजी की धरती पर,
जन्मे भारत की शान हो,
चंद्रशेखर,भगत लड़े जिस मातृभूमि की आजादी को,
उस पवित्र भूमि की आन हो,
जिस मिट्टी को राणा ने चूम लिया,
उस मातृभूमि की अभिमान हो।

हो तुम मातृभूमि के सपूत,
सरहद पर अड़े चट्टान हो,
हो वीर तुम न अधीर तुम,
दुश्मन की सेना को बांध ले
ऐसे हो जंजीर तुम,

ना डर है ना तनिक सिकन चेहरों पर,
मृत्यु के पश्चात भी,
यमराज भी है चकित,
देख ऐसे स्वर्णिम मुस्कान को,
मानो वे कह रहे हो,
जब निकले अर्थियां वीरों की,
मजार में जब वे हो दफन,

मिट्टी के हर एक कण से रूहानियत महसूस हो,
उनकी शौर्य गाथा में कुरबानियत महसूस हो।

Ms. Mansi Mohandas Gaikar

Location: Nasik,
Occupation: Professional Service
Education: Bachelor’s Degree
Age: 23-28
Poem ID: 450
Poem Genre: Veer (heroic)
Poem Length: 14 lines
Poem Creation Date: May 22, 2020
Poem Submission Date: September 12, 2020 at 2:48 pm

Poem Title: Ladkiya

“लडकीया”
लडकीया बोहोत बहादूर होती हैं……
लेकिन न जाने उन्हे क्यू जानबुझकर
हराया जाता हैं……
लोग क्या कहेंगे ये बोलकर न जाने क्यू
उन्हे डराया जाता हैं….
काबिलीयत होकर भी कुछ न कर पाती
उनके सपनो को मारा जाता हैं…..
गल्ती न होकर भी चूप चाप सेहती जुलम
और समाज क्या कहेंगा बोलकर सवारा जाता हैं…..
क्या करेगी इतना पढकर रसोई सम्भाल
केहकर उसकी उडान को रोका जाता हैं…..
पिता के घर पराया धन बोले तो भरी
आँखो से रोया जाता हैं…….
न जाने कितनी लडकीयोको आज भी दुष्ट
समाज क्या कहेंगा बोलकर खोया जाता हैं…..✍️

Mr. Dinesh Sohanlal Kumawat

Location: Surat,
Occupation: Student
Education: Other
Age: 11-16
Poem ID: 449
Poem Genre: Shant (peaceful)
Poem Length: 16 lines
Poem Creation Date: September 12, 2020
Poem Submission Date: September 12, 2020 at 7:18 am

Poem Title: देवनागरी

वक्त और मुसाफिर जिंदगी

वक्त अपना कहर तू
इतना क्यों बरसाता हैं?
कभी दुःखी करता तो
कभी हँसाता हैं ।

जिंदगी के खेल बड़े बड़े, फिर क्यों
इंसान जान पूछकर अपने आप को हराता हैं?
शायद उसे पसंद हैं वो खुशियाँ,
जो हारने के बाद वो पाता हैं।

कभी कभी मैं पूछता इंसान से,
क्या प्यारी नहीं जिंदगी तुझे ,जो तू सब कुछ गवाता हैं?
उसने कहा “मेरे लिए जिंदगी बस एक मज़ाक हैं”,
शायद इसलिए वो उसे मौज मस्ती के साथ जीना चाहता हैं।

हाहाकार भरे इस जीवन में हर कोई,
सुख और समृद्धि से कहा रह पाता हैं।
अगर आगे बढ़ने की कोशिश करे तो
उसे अपना ही गिरा कर तडपाता हैं।

अब तो हर इंसान अपना रिश्ता गहरा बनाना
और मौत को घुटनों पर कर, अपनी बिगुल बजाना चाहता हैं ।
मुश्किलों की हर सीढ़ी अब कौन आराम और
बिना कोई ज़हमत के साथ चढ़ कर विजय पथ सजाना चाहता हैं।

Mr. Shashwat Singh

Location: Ghaziabad, Uttar Pradesh,
Occupation: Other
Education: Bachelor’s Degree
Age: 29-35
Poem ID: 448
Poem Genre: Rudra (wrathful)
Poem Length: 16 lines
Poem Creation Date: September 10, 2020
Poem Submission Date: September 11, 2020 at 5:39 pm

Poem Title: परिस्थितियों से युद्ध

दिल्ली की ऊष्मा से मुक्ति की ईच्छा थी,
कर्कश ध्वनियों से दूर भगाना चाहता था मैं।
जूतों को चमकीले फर्श की आदत लग गई थी,
उन्हें पत्थरों पर रगड़ना चाहता था मैं।
इतालवी, अंग्रेज़ी व्यंजनों ने महोदर कर दिया था,
कुछ पहाड़ी देशी का स्वाद चखना चाहता था मैं।

हड्डी चीर गई तीर जो शीत ने चलाया,
कोसो दूर तक कोई देहात नज़र नहीं आया।
कठोर भूधर खड़े हर ओर,
पग ने कहा अब ये राह ही छोड़।
आहार दुर्लभ दिख रहा है यहां,
हरियाली सारी आखिर गई कहां।

बंजर जमीन पर दिखा ना एक भी शाख,
आपकी सोंच से भी ज्यादा निर्मम है लद्दाख।

Ms. Kumkum A Thanvi

Location: Jodhpur, Rajasthan,
Occupation: Student
Education: Pursuing Bachelor’s Degree
Age: 17-22
Poem ID: 447
Poem Genre: Shant (peaceful)
Poem Length: 17 lines
Poem Creation Date: September 5, 2020
Poem Submission Date: September 10, 2020 at 5:20 am

Poem Title: Tears upon all

Tears upon all
raining and all,
they are all gone,
and the time is allotted to all.
I’m afraid for not only one
but all,
wait is not worth at all
but with a heavy heart we wait for all.
It’s all alone
relaxing in an aura without
having them all,
how can I see their faces covered with a cloth?
having a thought of their last thought,
what they were thinking? Oh it’s a lot!
I love & miss them all,
tears upon all,
raining and all..

Mr. Dr. Paras Shantilalji Tejavat

Location: Ahmedabad Gujarat,
Occupation: Government
Education: Graduate of Professional Degree
Age: 29-35
Poem ID: 446
Poem Genre: Veer (heroic)
Poem Length: 18 lines
Poem Creation Date: August 8, 2020
Poem Submission Date: September 9, 2020 at 5:50 pm

Poem Title: “देश को तुम पर नाज़ है “

“देश को तुम पर नाज़ है “

घर से दूर, अपनों से दूर…
चल पड़ते हैं, ये एक जुनून लिए…

सो सकते हैं चैन से घरों में,
तब हम सब सुकून लिए…

मुल्क की हिफाजत,
बस यही एक चाहत…

रूके ना कदम इनके,
चाहे जैसी भी हो आफत..

डटे रहते हैं, लगे रहते हैं,
धूप, ठंड सब हंसकर सहते है …

जंग के मैदान के लिए हमेशा रहते राज़ी,
देश के लिए लगाते जान की बाज़ी…

मातृभूमि पर न्योछावर करते अपने प्राण,
वतन ही है उनके लिए उनकी जान…

ऐसे शूरवीरों को मेरा शत शत प्रणाम,
देश की मिट्टी के कण-कण में रहेगा तुम्हारा नाम…

तुम हो तो कल और आज है
देश को तुम पर नाज है…

जय हिंद

Mr. Ghanshamdas Ahuja

Location: Navi Mumbai,
Occupation: Other
Education: High School
Age: 61-70
Poem ID: 443
Poem Genre: Veer (heroic)
Poem Length: 8 lines
Poem Creation Date: March 1, 2019
Poem Submission Date: September 9, 2020 at 5:48 am

Poem Title: पुलवामा

देश के दुश्मन का यह पीठ पीछे का वार,
पुलवामा में हमारे जवानों पर क्रूर प्रहार।
कैसे कोई कर सकता था इसको मुआफ़,
बालाकोट में कर दिया इनका सूपड़ा साफ।
भविष्य में भी जब-जब होगी ऐसी वारदात,
दुश्मन रख ले अब गांठ बांध करके ये बात।
तुम अगर एक को मारोगे तो दस को हारोगे,
दुश्मनी कर के कैसे अपने देश को तारोगे।।

Ms. Vanisha Arora

Location: NEW DELHI,
Occupation: Student
Education: High School
Age: 6-10
Poem ID: 441
Poem Genre: Shant (peaceful)
Poem Length: 16 lines
Poem Creation Date: September 4, 2020
Poem Submission Date: September 7, 2020 at 11:37 am

Poem Title: Hold my hand Mummy

God bless mummy, God bless mummy
Hold my hand, hold my hand
Teach me the basics, teach me the basics,
And then let me learn, and then let me learn

Hold my hand mummy, hold my hand mummy
Cheer me up, cheer me up
When I am feeling sad, When I am feeling sad
Dry my tears, dry me tears

Hold my hand mummy, hold my hand mummy
show me the sunshine, Show me the sunshine
you raised free, you raised me free
To be the brilliant person, to be the brilliant person

Hold my hand mummy, hold my hand mummy
Show me the way, show me the way
So I can go out, So I can go out,
in the big word one day.

Happy birthday mom!

Ms. Reena – Rai

Location: Kolkata, west bengal,
Occupation: Student
Education: Bachelor’s Degree
Age: 17-22
Poem ID: 440
Poem Genre: Veer (heroic)
Poem Length: 24 lines
Poem Creation Date: July 22, 2020
Poem Submission Date: September 5, 2020 at 6:03 pm

Poem Title: सैनिक:हमारे रक्षक

सैनिक:हमारे रक्षक।
जान हथेली पर लिए औरों के लिए जो फिरते है दैनिक।
कोई और नहीं मेरे पाठकों वे होते हैं सैनिक।।
इनके लिए होता है देश हीं है पूरी कायनात।
इसी की सेवा हेतु सीमा पर रहते हैैं तैनात।।
हमारी ही भांति होता इनका भी तो परिवार है।
परन्तु क्या करें ये भी सेवा-भाव सर पर सवार है।।
जाते है अपना परिवार छोड़ हर परिवार की रक्षा में।
कमी नहीं होती देश-प्रेम में भले हो चूक आत्म – सुरक्षा में।।
बाप,भाई,पति,बेटा इनकी और भी जिम्मेदारी है।
क्या कहूं आप सबसे ये कितने सम्मान के अधिकारी है।।
किसी एक पेड़ से निकले यह भी एक डाली है।
मोल करो सदैव इनका किसी के सिंदूर के ये भी लाली है।।
परिवार हीं जाने कैसे बीतता इनका महीना – साल है।
सीमा पर देश के लिए सदैव तत्पर जिनका लाल है।।
जाती हमारी ही सुरक्षा में हमेशा उनकी जान है।
जो नहीं जानते करना सम्मान इनका वो अब भी नादान है।।
कैसे मारे गए देश-रक्षा में इसके ये ही चश्मदीद है।
हृदय टूट जाता है सुनकर आज फिर जवान शहीद है।।
हमेशा ये जो हमें आराम से रहने की आदत है।
ये समझना आवश्यक है इसके पीछे शहादत है।।
भले हीं देखने में हम जैसे ही वे इंसान है।
परन्तु रक्षा करते देखो तो प्रतीत होते भगवान है।।
सुरक्षित हम हैं इनके ही कारण जीवन भी आबाद है।
कम ही होगा यह भी यदि रोज़ हम उनका धन्यवाद कहें।।
-रीना राय।।

Mr. Dharmendra Kumar Singh

Location: Raigarh,
Occupation: Government
Education: Graduate of Professional Degree
Age: 36-40
Poem ID: 439
Poem Genre: Veer (heroic)
Poem Length: 32 lines
Poem Creation Date: September 2, 2020
Poem Submission Date: September 2, 2020 at 2:38 pm

Poem Title: है सारे जग से न्यारा यह भारत देश हमारा

है सारे जग से न्यारा
यह भारत देश हमारा

दिन-रात अर्चना करता
सागर अपनी लहरों से
चंदन माथे पर रखता
गिरिवर निज हिमशिखरों से

अमरत्व दिया नदियों ने
बन-बन कर अमृत-धारा

फलती हैं सब संस्कृतियाँ
इसकी उर्वर धरती में
पलती हैं सौ भाषाएँ
इस ममतामय गोदी में

अनगिन त्योहारों से है
जगमग हर इक पखवारा

जाने कितने हमलावर
है लील गई ये माटी
हँसते-हँसते सर देना
है वीरों की परिपाटी

मजबूत किया चोटों ने
त्रुटियों ने हमें सुधारा

विज्ञान, गणित, ज्योतिष सब
हमने जग को सिखलाया
है योग स्वास्थ्य की कुंजी
दुनिया भर को दिखलाया

हम पूज्य मानते सब को
क्या पत्थर क्या ध्रुव तारा

है नृत्य हमारा अनुपम
संगीत हमारा पावन
जन-गण-मन को हरषाते
हैं लोकगीत मनभावन

लहराता शीश उठाकर
दिन रात तिरंगा प्यारा

Ms. sunita singh

Location: Lucknow, Uttar Pradesh,
Occupation: Government
Education: Other
Age: 41-50
Poem ID: 438
Poem Genre: Veer (heroic)
Poem Length: 34 lines
Poem Creation Date: September 1, 2020
Poem Submission Date: September 1, 2020 at 11:57 am

Poem Title: भारत-भूमि

भारत-भूमि

भारत की इस देवभूमि को, जगजननी! बारम्बार नमन।
ये दिव्य शांति की दीपशिखा, कर दे मन-अंधकार शमन।।
धन्य रहा वो जीवन जिसने, इस दिव्यभूमि में जन्म लिया।
ज्ञान जोत से इस नैया का, हो निर्भय पर-संसार गमन।।

संस्कार साथ जो लाए थे, इस धरती पर जब आए थे।
वो जोड़ो जो मन स्थिर कर दे, कर लो सर्व विकार दमन।।
कुदरत के सब अवयय भी तो, तन्मय हो अपना काम करें।
कर्तव्य निर्वहन से हटते जो, उनको है धिक्कार गहन।।

प्राच्य रही या नवल संहिता, बिखरा जीवन का दर्शन है।
क्यों पीर-ताप में जला रहे मन, करो सहज स्वीकार चलन।।
शांति, मधुरता, शीतलता की, अंतस में मूल प्रवृत्ति रहे।
दुख के भवसागर से लड़कर, संहार करो तुम पीर तपन।।

जगत-गुरू भारत की महिमा, मानी है जग ने सदियों से।
इसको स्वर्णिम खग करने को, फिर कर लो अंगीकार लगन।।
विश्व पटल पर छा जाने को, गौरव का दिया जलाने को।
तीक्ष्ण वायु के झोंकों का भी, सब कर लो तुम प्रतिकार सहन।।

सजे नम्रता हृदय में सदा, दमक शौर्य की रहे भाल पर।
बढ़ें अगर पग श्रृंग भला क्या, हो जाता है अभिसार गगन।।
धैर्य, शौर्य, बुद्धि, या मन शुद्धि, नित कौशल रत्न करें अभिवृद्धि।
विश्व-कुटुंब पर करते राज, इस गौरव पर है देश मगन।।

प्रतिक्षण न्यौछावर को तत्पर, हम अखंड भारत के प्रहरी।
गौरव गाथा लिखना नभ पर, मन में है गहरी पली लगन।।
बाह्य शत्रु पर भारी सेना, अंत शत्रु से हमको लड़ना।
न देश कलंकित होने देंगे, रहे दुपहरी या शीत गहन।।

साहस बल जग में है चर्चित, कौन नहीं इससे है परिचित।
चहुँ दिश विजय पताका लहरी, न शीश झुकाना हमें सहन।।
पूरब से पश्चिम तक जाती, उत्तर से दक्षिण तक आती।
मानस-धागे की रेख इकहरी, विविध पुष्पों का एक चमन।।

Ms. sunita singh

Location: lucknow,
Occupation: Government
Education: Other
Age: 17-22
Poem ID: 437
Poem Genre: Veer (heroic)
Poem Length: 59 lines
Poem Creation Date: November 5, 2019
Poem Submission Date: September 1, 2020 at 9:44 am

Poem Title: राष्ट्रीयता पर 20 दोहे

राष्ट्रीयता पर 20 दोहे

बड़ी पुरानी सभ्यता, भारत की पहचान।
बहुरंगी झाँकी मिले, बनी विविधता शान।।

प्रगति आर्थिक सामाजिक, दिखते बहुआयाम।
भारत नित आगे बढ़े, जग में फैले नाम।।

राष्ट्रीय पहचान के, परिचय और प्रतीक।
मूल विरासत चिन्ह से, जागे भाव सटीक।।

गर्व हृदय अति जागता, गौरव-गाथा देख।
पृथक रही छवि देश की, पृथक रहा आलेख।।

गान गीत ध्वज देश का, भाषा, पशु, फल, फूल।
चिन्ह रहे सबके अलग, लिए विरासत मूल।।

राष्ट्रीय पशु बाघ है, ताकत फुर्ती रूप।
फूल कमल में शुद्धता, स्वर्ण किरण सी धूप।।

क्षैतिज आयत में बँटा, सम रहता अनुपात।
हरा श्वेत फिर केसरी, करे तिरंगा बात।।

सारनाथ स्तम्भ पर तो, चार खड़े हैं शेर।
सत्यमेव जयते कहे, धर्म चक्र का घेर।।

अन्तस भी गर्वित करे, जन-गण-मन का गान।
गाकर वन्दे-मातरम्, बढ़े स्वयं का मान।।

गंगा या भागीरथी, भारत की पहचान।
बरगद तरूवर देश का, फल में आम निशान।।

मन में नित निज देश की, गूँज रही जयकार।
अंतस चाहे ईश दे, जन्म यहीं हर बार।।

देख लिया जब जग सभी, मिला एक ही ज्ञान।
सबसे प्यारा देश है, अपना हिंदुस्तान।।

हुए धरा पर हिन्द की, ऐसे वीर सपूत।
गर्व करे माँ भारती, कुढ़ते रहें कपूत।।

झुक जाए सिर आप ही, मन में उमड़े मान।
मीठे स्वर में गूँजता, जहाँ देश का गान।।

प्रिय प्राणों से भी सदा, अपना भारत देश।
मधुर बसंती प्रीत सा, प्यारा ये परिवेश।।

सुनकर वन्दे-मातरम्, जन-गण-मन का गान।
सत्यमेव जयते कहे, झूमे हिंदुस्तान।।

अंडमान रामेश्वरम, दमन लेह कश्मीर।
अरुणाचल गुजरात सब, गुथे एक जंजीर।।

पुलकित मन करते रहें, देशभक्ति के गान।
सबसे प्रिय हैं भाव ये, आन-मान पहचान।।

लहर-लहर लहरा उठा, पुलक तिरंगा आज।
व्यग्र हुई जाती हवा, पहनाने को ताज।।

तीन रंग की है ध्वजा, हरा केसरी श्वेत।
सदभावों की रागिनी, देती शुभ संकेत।।

Ms. sunita singh

Location: lucknow,
Occupation: Government
Education: Other
Age: 41-50
Poem ID: 436
Poem Genre: Veer (heroic)
Poem Length: 85 lines
Poem Creation Date: April 29, 2020
Poem Submission Date: September 1, 2020 at 4:51 am

Poem Title: राष्ट्रीयता

राष्ट्रीयता (मुक्तक)

देश में जो बाहरी बहुरूपता है,
अन्तःकरण में उसी के एकता है।
ऐ विघटनों के प्रवक्ताओं जान लो,
ये बड़ी सुलझी हुई परिपक्वता है।।

इस धरा पर वास करते देवता है,
विश्व सारा मान करता पूजता है।
हिन्द में है बात कुछ ऐसी अनोखी,
सर झुका देता इसे जो देखता है।।

इन हवाओं में घुली ज्यौं दिव्यता है,
भावनाओं में सहेजी शुद्धता है।
हिन्द के वासी निवासी जानते हैं,
भिन्नता में एकता की भव्यता है।।

बँधी रेशम डोर से आबद्धता है,
चकित हो जाती स्वयं सम्भाव्यता है।
कौन सी हैं शक्तियाँ मजबूत करतीं,
भिन्न धारा थामने की दक्षता है।।

भारत माँ के चरणों में हम, शीश नवा कर आएंगें।
इसकी खातिर हम अपना सब, न्यौछावर कर जाएंगें।।
अग्नि परीक्षा भी दे देंगे, मातृ भूमि की रक्षा में।
दीप एकता का लेकर हर, जगह समन्वय लाएंगें।।

नफरत की हम दीवारों को, मिलकर तोड़ गिराएगें।
परम पावनी गंगा-धारा, हम सब जगह बहाएगें।।
सम्भव होगी बात जहाँ तक, ये दिल सेवा को तत्पर।
सद्भाव रहेगा हर दिल में, सब मतभेद भुलाएगें।।

निश्चित भू में रहने वाले, नागरिकों की वो धरती।
उसी देश में राष्ट्रीयता, प्राण-वायु बनकर रहती।।
संजीवनी की तरह दिल में, भाव एकता के सजते।
सद्भाव समन्वय की गंगा, जन-मानस में नित बहती।।

भेद-विभेद चले संग-संग, संस्कृतियों मे रंग रहे।
भाषा-बोली, खान-पान सब, रीति-रिवाज उमंग रहे।।
बात रहे स्वीकार भाव की, और नहीं कुछ मुश्किल है।
सबकी ही है अदा निराली, मन में सजी तरंग रहे।।

नहीं देशहित में होता है, बाधक तत्वों का बढ़ जाना।
क्षीण शक्तियाँ करते हैं जो, उनको है मुश्किल समझाना।।
हर मानस को जोड़ रही जो, उस धागे की रेख इकहरी।
रहकर सदा सजग होगा हर, बाधा का आधार मिटाना।।

साम्प्रदायिकता के संवाद, माने धर्म देश के ऊपर।
फूट डालते समाज में हैं, बाँटे घृणा द्वेष फैलाकर।।
मतभेदों से मनभेदों तक, दौर जटिल चलता रहता है।
कुटिल चाल से सदभावों की, छोटी पड़ जाती है चादर।।

भाषा बनती वाद जहाँ पर,करती राष्ट्रवाद कमजोर।
अपनी-अपनी बोली भाषा,की बस पकड़े रहते डोर।।
भाषा के आधारों पर भी,हुआ प्रदेशों का बँटवारा।
जोड़ सके जो हिन्दी भाषा,आपत्ति उस पर रही है घोर।।

क्षेत्रवाद बाधक की तरह, रहा राष्ट्रवाद का रोड़ा।
क्षेत्रीय कट्टरता ने भी, तन भाव एकता का तोड़ा।।
धन वाले तो कुछ निर्धन भी, विकसित तो कुछ कम विकसित भी।
स्वीकार नहीं इक दूजे को, पथ सदा समन्वय का मोड़ा।।

वर्गभेद जातीय विखण्डन, जोड़ते नहीं हृदय के तार।
ऊँच-नीच के भेदभाव से, द्वेषपूर्ण होता संसार।।
कलुषित भाव भरे जो मन में, समरसता हरती जाति-प्रथा।
जातिवाद ने छीन लिये हैं, सामाजिक एकता का सार।।

हो उदासीन कर्तव्यों में, नैतिक पतन या भ्रष्टाचार।
अनुशासन से हीन सिरफिरी, भौतिकता ने लिया आकार।।
साम, दाम या दण्ड भेद सब, चलते साथ सदा रहते हैं।
मधुर समन्वय भावनात्मक, स्वप्न किस तरह हो साकार?

पूरब से पश्चिम तक रहती, उत्तर से दक्षिण तक।
सदभाव, समन्वय समता हो, भाईचारा साधक।।
वो डोर बड़ी मजबूत रहे, जो है कोमल रेशम सी।
लेकिन बाँध रही मानस को, बनी एकता की वाहक।।

उत्तर में पर्वतराज हिमालय,शुभ्र मुकुट सिर पर सुन्दर है।
दक्षिण में सजती सागर माला,पावन पग धोता सागर है।।
पूरब में हरियाली के अंचल, पश्चिम के अनुपम भूमण्डल।
ज्यौं हाथ हुए भारत माता के, नेह भरी मन की गागर है।।

जिसे हम हिन्द कहतें हैं, वो देवों की धरती है।
जहाँ पर पावनी गंगा, धरा की गोद भरती है।।
स्वर्ग से है उतर आयी, स्वंय भागीरथी देखो।
सुधामय धार से सिंचित, धरा जय हिन्द करती है।।

भले हों भेद कितने भी, एकता संग रहती है।
समन्वय भावनाओं का, रहता मन में कहती है।।
हृदय के तार जोड़े है, एक धागा रेशमी सा।
सरस जल-धार अमृत की, हर इक दिल में बहती है।।

धर्म या सम्प्रदायों की, आस्था दिल में रहती है।
अन्तरों में रूहानी सी, किरण की धार बहती है।।
जहर कुछ लोग उगले हैं, आचमन के दियालों में।
बिना कारण वेदना का, हारकर दंश सहती है।।

लहर जब झेलती पत्थर, भँवर बनकर लहरती है।
हृदय की भावनांए सब, पीर सहकर सिहरती है।।
समझ पाते नहीं कुछ क्यों, निजी हित साधते रहते।
धार्मिक दुष्प्रचारों से, देश की नब्ज गिरती है।।

जिस धरती पर गंगा की,पावन धारा बहती है।
उस धरती पर देवों की,बस्ती आकर रहती है।।
मुकुट हिमालय का सिर पर है,गोदी में हरियाली है।
जिसका पाँव पखारे सागर,सुन्दर छटा निराली है।।

जिस धरती की गौरव गाथा, झूम हिमालय गाता है।
जिस गाथा पर गर्वित होकर, सागर भी लहराता है।।
उस धरती पर जनम लिया,जिसने भी, वह धन्य हुआ।
हर बार जनम हो इस पर ही,दिल करता अब यही दुआ।।

भारत की इस धरती पर,विविधता स्वाद चखती है।
मगर हर भिन्नता अपनी,पृथक पहचान रखती है।।
बड़ी मजबूत जड़ है ये,समझ लें तोड़ने वाले।
एकता मुस्कुराकर के,स्वंय का बल परखती है।।

विविध भाषा, धर्म बोली, स्याह में रंग भरती है।
सरस सद्भावना एका, भिन्न का मेल करती है।।
खान-पान, आचार, रहन, विविध है संस्कृति तो क्या?
बाँधता एक धागा है,अनुपम अपनी धरती है।।

सभी त्यौहार भारत के, चलो मिलकर मनातें हैं।
सुहानी रीत एका की, चलो जग को दिखाते हैं।।
दिवाली, ईद या क्रिसमस, हो नवरोज या लोहड़ी।
रौशनी से उमंगो की, हृदय अपना सजाते हैं।।

जय-जय भारत माता की हो, धरती पर, अम्बर में।
सिर पर मुकुट हिमालय का हो, पग धुलता सागर में।।
करती अर्पण पुष्प दिशाएं, गायें गीत हवाएं।
माँ की दैवी छवि के आगे, सिर झुक जाए आदर में।।

शांति प्रेम भाईचारा, संग एकता बनी रहे।
सदा हिंद की धरती पर, सदभाव की गंगा बहे।।
भौगोलिक अन्तर मधुमय,रस मानस में भरते हैं।
अब न कभी भारत माता, दंश द्वेष का कहीं सहे।।

रहन-सहन जीवन शैली, समरसता के कथ्य कहें।
भेदभाव या राग द्वेष, विष वाले सब किले ढहें।।
समझ सभी में विकसित हो, आओ सभी प्रयास करें।
फसलें महके पुष्पों की, मानस-पट पर सदा लहें।।

हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा, हर हृदय को जोड़ती है।
ये मुश्किल सर्वमान्यता के, हर मिथक को तोड़ती है।।
पूरब, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, मध्य के जुड़ते सिरे हों।
हर जगह ये भावनाओं पर, असर गहरा छोड़ती है।।

वाहक बनी है एकता की, हिन्द की हिन्दी हमारी।
बसती धड़कनो में सभी के, प्राण सी हिन्दी हमारी।।
गैर कोई भाषा नहीं है, बोलियाँ फूलें फले सब।
भाव जिसके हैं सब समझते, वो रही हिन्दी हमारी।।

भावनाओं का समन्वय, कर रही हिन्दी हमारी।
गहन मन की रिक्तता को, भर रही हिन्दी हमारी।।
कश्मीर से रामेश्वरम तक, बंगाल से गुजरात तक।
मधु अपनत्व से सभी को, तर रही हिन्दी हमारी।।

प्रेम भाव की शुष्कता को, हर रही हिन्दी हमारी।
आसमान के अमृतों सी, झर रही हिन्दी हमारी।।
सक्त रस से हर हृदय को, बाधा विविध सब तोड़कर।
एकता का तार स्वर्णिम, कर रही हिन्दी हमारी।।

कृष्ण के जैसा सारथी, बन रही हिन्दी हमारी।
सामने है विघटनों के, तन रही हिन्दी हमारी।।
शक्ति रखती सोखने की, भाप जो उठती कलह की।
एकता के पर्व जैसी, मन रही हिन्दी हमारी।।

मौन धीरे से हृदय में, छन रही हिन्दी हमारी।
मधुर रस में अमृतों के, सन रही हिन्दी हमारी।।
शूरता के संग मिठासें, भाव रस हर रंग के हैं।
नित नयी सम्भावना को, जन रही हिन्दी हमारी।।

एक भारत, श्रेष्ठ भारत, श्रेय है, श्रद्धेय भी।
शूरवीरों की धरा ये, परम पावन प्रेय भी।।
हो सकेगा ना विखण्डित, कोशिशों में विघटनों की।
ये समझ ले शत्रु एका, धर्म है तो ध्येय भी।।

देश प्रेम के गीत सभी, कर्ण प्रिय हैं, गेय भी।
देश भक्ति में पगे हुए,अमृतों से पेय भी।।
जोश की अनमिट लहर दे, भाल उन्नत राष्ट्र का।
जो न झूमे इस लहर में, वो रहेगा हेय भी।।

देश-प्रेम की प्रबल धार को, हर मन में बहना होगा।
बुरी नज़र न डाले कोई, दुनिया से कहना होगा।।
जो विघटन के स्वप्न बुन रहे, घात लगाकर बैठे हैं।
समझें वे भारत का बनकर, भारत में रहना होगा।।

जो डटा हुआ सीमाओं पर,देश-प्रेम को पहना होगा।
मुश्किलें जहाँ प्रतिपल पथ में, साहस-बल ही गहना होगा।।
रसधार ह्रदय में भावों की, जब उन्मत हो बहती है।
शीश झुकाकर द्वेष-महल को, टूट-टूटकर ढहना होगा।।
भारत अखंड बड़ा, तेजबल प्रचंड बड़ा।
भव्य आन-बान है, जन-गण-मन गान है।।

सूर्य स्वर्ण-रश्मियां, दग्ध तप्त वृत्तियां।
सिन्धु है सँवारता, पूज्य पद पखारता।।

हिमगिरि का है मुकुट, शत्रु हाल है विकट।
कोशिशें जो खंड की, तो तय फिर दंड भी।।

बाहर भी शत्रु हैं, अंदर भी शत्रु हैं।
साथ मगर मित्र हैं, तत्पर भी पुत्र हैं।।

सहन सर्व आँच है, यह सशक्त साँच है।
हिन्द नहीं काँच है, गौरव जग में बाँच है।।

Ms. Mahima Purohit

Location: Kashipur,
Occupation: Student
Education: Pursuing Bachelor’s Degree
Age: 17-22
Poem ID: 435
Poem Genre: Shringaar (romantic)
Poem Length: 15 lines
Poem Creation Date: March 10, 2020
Poem Submission Date: August 31, 2020 at 5:17 pm

Poem Title: तुम्हें अपना बना लेना

तुम्हें अपना बना लेना,
चाहत नहीं थी मेरी,
तेरा पास से गुजर जाना ही काफी था।
साथ बीते पूरा दिन तेरे,
ख्वाहिश नहीं थी मेरी,
तेरा ख्वाब में आ जाना ही काफी था।
घंटो बातें हो तुझसे,
ज़रूरत नहीं थी मेरी,
तेरी नज़रों से नज़रें मिलाना ही काफी था।
देखूं मैं पूरी दुनिया,
सपना नहीं था मेरा,
तेरे दिल में घर कर जाना ही काफी था।
मंजिले एक हो दोनों की,
चाहत नहीं थी मेरी,
राहों का एक हो जाना ही काफी था।

Ms. Prabha Bhadouriya

Location: Gwalior,
Occupation: Writer
Education: Other
Age: 23-28
Poem ID: 434
Poem Genre: Veer (heroic)
Poem Length: 16 lines
Poem Creation Date: July 15, 2020
Poem Submission Date: August 31, 2020 at 5:53 am

Poem Title: जानवरों का इंसानो से सवाल

वो कहते हैं कि जानवर ही तो है,
जानवर हैं तो क्या हम में जान नहीं,
क्या हमारी कोई पहचान नहीं,
शायद हमारे दर्द का तुमको कोई भान नहीं,
हमको भी दर्द सताता है,
हमको भी रोना आता है,
और तुम कहते हो हमको कोई ज्ञान नही,
हम जानवर हैं तो क्या हम में जान नही।।
हम जंगल की जान है, हम इस प्रकृति की शान है,
क्या तुम्हें ये ध्यान है, कि हमसे ही तुम्हारी पहचान है,
सभ्य होने का प्रचार, करते हो हम पर क्यों इतना अत्याचार,
कभी सरकस में नचाते हो, कभी वे वजह ही मार कर खुश हो जाते हो,
वे जुवां हम कुछ कह नही पाते है,
बस यूँ ही सब सह जाते है,
क्यों करते हो ऐसा व्यवहार,
क्या यही है तुम इंसानो का प्यार?

Ms. Madhu Pradhan Madhur

Location: Maharashtra Mumbai,
Occupation: Professional Service
Education: Graduate of Professional Degree
Age: >70
Poem ID: 433
Poem Genre: Veer (heroic)
Poem Length: २०लाइनं lines
Poem Creation Date: August 22, 2020
Poem Submission Date: August 30, 2020 at 8:59 pm

Poem Title: सबसे न्यारा भारत, हेआतंकी

[6/19, 5:59 PM] Madhu: बगिया का माली

एक पिता ही होता है
अपने बच्चों की
‌ बगिया का माली
कठिन परिश्रम से
सींच सींच पौधों को
मजबूत बनाता है
आनंद विभोर हो जाता है
पौधा जब वृक्ष बन
इठलाकर सबके सम्मुख आता है
सीना चौड़ा हो जाता है
सुख सपनों में खो जाता है
बच्चों के लालन-पालन का
श्रेय उसी को है जाता
कठोर नियम की धारा
अनुशासन को अपनाता है।
‌‌दिखता नारियल सा है सख्त
‌ किंतु सदय हृदय
और होता भावुक हैं
कठिन समय में
आंसू एक नहीं छलकाता है
मन ही मन बहुत है रोता
सब में ढांढस की
किरण जगाता है
बच्चों का जीवन बनाने को
कुछ भी है कर जाता
घर घर का आदर्श
पिता ही होता है
निडर भाव से जीते हैं
जीवन के रस भी
वह पीता है
नन्हों मुख देख देख
वह अपनी तपन
कोसों दूर भगाता है
बच्चों का सच्चा
साथी ही कहलाता है।।।।

मधु प्रधान मधुर
[7/9, 10:31 AM] Madhu: हस्ती पहचानो

चीन तुम बजाओ बीन
अपनी हस्ती को पहचानो
भारत से पंगा मत‌ ठानो
रह जाओगे अति क्षीण
धोखे से मार जवानों को
वलगाव घाटी के सरताज
‌‌नहीं बन पाओगे
धोखेबाज ही कहलाओगे
अपना मान गवांओगे
यह जीत नहीं हार हुई है
‌‌ अब अपने मुंह की खाओगे
भारत में आग लगाई है
उसमें जलकर भस्म हो जाओगे
विश्वास जीत न पाओगे
हर बात में ,हर चीज में
धोखा देते हो
फिर तुम भी धोखा खाओगे।।।

मधु प्रधान मधुर

शूर साहसी

अदम्य शूर साहसी
बढ़े चलो बढ़े चलो।।
तुम निडर डरो नहीं
तुम निडर डटो वहीं।।
‌ चीन की गीदड़ भभकियां
लगी हुई हैं होंसले छुड़ाने को
किन्तु तुम वीर हो विजयी हो
वतन की तुम शान हो
हमको तुम पर नाज है
बढ़े चलो बढ़े चलो।।
माना, राह बहुत कठिन है
जान जोखिमों से भरी हुई
तार आशा का जुड़ा है
जन जन तुम्हारे साथ है
न हो हताश ऐ जवान
बढ़े चलो बढ़े चलो।
चीन में न है इतना दम
भुजाओं की फड़क
को वे सह सकें
बिजलियां सहस्त्र कड़क उठे
निर्भय तुम खड़े रहो
सैन्यदल है साथ साथ
भारत मां के लाल भी
सभी चलेंगे साथ साथ
बढ़े चलो बढ़े चलो।।।।।

मधु प्रधान मधुर
[8/17, 1:32 PM] Madhu: मेरा प्यारा सबसे न्यारा मेरा भारत देश

कल- कल करके नदिया बहती

झर-झर करके झरने बहते

आँखों में बसते दृश्य मनोहर।

नित्य नये त्योहार मनाते

आलाप मधुर संगीत सुनाते

बच्चो के मन चहक -चहक है जाते

रसमयी गागर सब छलकाते।

सूर्य चन्द्र नक्षत्र और पशु-पक्षी भी

यहाँ पूजे जाते हैं।

खुश तुष्ट हो अतिथि जाते

गुणगान यहा का वे सुनाते कमी नहीं है।

पर्वत घाटो की गेंहू चना धान मक्का के

खेत खूब लहराते

फल फूलो के बाग बगीचे

इस धरती की शान है।

भरी हुई है प्रकृति संपदा

भारत में आपस में मेल बढ़ाती सी है

अनेक भाषाएँ वेशभूषा यह बात किसी

को पच नहीं पाती

इस देश की यही है थाती।

बारी-बारी मौसम है आते

रोज नये रंग बरसाते हैं

परिवारों का बंधन है मजबूत

यहाँ चट्टानों सा है जीवन सबका।

वीर शिवाजी औ लक्ष्मीबाई की

गाथाएँ सबको याद जवानी है

शहीद भगत और आजाद की

सरफरोशी की तमन्ना सबने ही समानी है।

वेद व्यास औ कृपाचार्य का

बुद्धि बल व्याप्त हुआ जगह में

गौतम बुद्ध महावीर से ऋषियो ने

अपने उपदेशों से लोगों में फूँका

ऐसा मन्त्र मनोहर

उमड़ी त्याग तप की भावना

भरत नाम से बना यह भारत देश

करते शत-शत तुम्हें प्रणाम।।
मधु प्रधान मधुर

Ms. Swati Sharma

Location: Rohtak, Haryana,
Occupation: Student
Education: Other
Age: 17-22
Poem ID: 432
Poem Genre: Veer (heroic)
Poem Length: 48 lines
Poem Creation Date: August 29, 2020
Poem Submission Date: August 30, 2020 at 1:11 pm

Poem Title: शिलाएं इतिहास की

कलम कह रही लिख दूं गाथा
स्वर्णिम हिंदुस्तान की
भूतकाल से वर्तमान तक
नारी के स्वाभिमान की

जी चाहता है लिखूं कथा मैं
राजनीति, विज्ञान की
जी कहता है लिखूं कहानी
इंदिरा , कल्पना की शान की

शौर्य लिखूं लक्ष्मीबाई का
विद्रोह की पहचान थी
और गार्गी का ज्ञान लिखूं
विद्वानों की विद्वान थी

भक्ति लिख दूं मीरा की
विष को अमृत बना दिया
दुर्गावती की शक्ति लिख दूं
मुगलों को जिसने रुला दिया

हज़रत महल का साहस लिख दूं
लखनऊ से संग्राम किया
धाय पन्ना का लिखूं समर्पण
पुत्र को बलिदान किया

इंदिरा गांधी की ताकत लिख दूं
बांग्लादेश आज़ाद किया
सुषमा स्वराज की लिखूं कुशलता
सबके दिलों पर राज किया

किरन बेदी की योग्यता लिख दूं
पहला पद ग्रहण किया
फूलन देवी की लिखूं चेष्टा
अपमान का प्रतिकार लिया

साक्षी, सिंधू की उपलब्धि लिख दूं
ओलंपिक में आन बचाई
कर्णम की लिखूं चुनौती
पहली थी जो मेडल लाई

ये तो कथा थी कुछ नामों की
असंख्य हैं नाम यहां
सबका सबकुछ लिख पाऊं
ये मेरी औकात कहां

जो लिखे , जो रह गए
सबको नमन करती हूं
जय हिन्द, जय हिन्दी कहकर
अब मैं कलम रखती हूं ।

Ms. Divya Singh

Location: Dehradun, Uttarakhand,
Occupation: Other
Education: Other
Age: 17-22
Poem ID: 431
Poem Genre: Karuna (pathos)
Poem Length: 16 lines
Poem Creation Date: August 27, 2020
Poem Submission Date: August 30, 2020 at 12:35 pm

Poem Title: वर्दी की जुबानी, उस आशिक की कहानी।

वो तिरंगा में लिपटी वर्दी भी, देखना चाहती थी उसके माथे पर सिंदूर,
सुनना चाहती थी, उन चूड़ियों की खनखनाहट,
पैरों में पायल की झंकार,
चूमना चाहती थी, उन हाथों की मेहंदी,
सूँघना चाहती थी, उन गजरों की खुशबू,
छूना चाहती थी, वो रेशम से बाल,
बताना चाहती थी, वो दर्द भरी अकेली रातों की दास्तान।

पर बदकिस्मती तो देखो!
जिसे महफ़िल की ख्वाहिश थी
मिलीं तनहाईयाँ उसको।

क्या बेबसी है कि अपने हालात बता भी नहीं सकती,
बस अँधेरों में बंद एक याद बन गई है,
उनकी तनहाईयों का साथ बन गई है।

शायद, उस खुदा को इतना भी गँवारा न था,
कि उन्हें पता भी न चला, कि कितने लाजिमी थे वो उनके लिए
कि उससे पहले ही, अपने पास बुला लिया।

Ms. Divya Singh

Location: Dehradun, Uttarakhand,
Occupation: Other
Education: Other
Age: 17-22
Poem ID: 430
Poem Genre: Karuna (pathos)
Poem Length: 16 lines
Poem Creation Date: August 27, 2020
Poem Submission Date: August 30, 2020 at 12:34 pm

Poem Title: वर्दी की जुबानी, उस आशिक की कहानी।

वो तिरंगा में लिपटी वर्दी भी, देखना चाहती थी उसके माथे पर सिंदूर,
सुनना चाहती थी, उन चूड़ियों की खनखनाहट,
पैरों में पायल की झंकार,
चूमना चाहती थी, उन हाथों की मेहंदी,
सूँघना चाहती थी, उन गजरों की खुशबू,
छूना चाहती थी, वो रेशम से बाल,
बताना चाहती थी, वो दर्द भरी अकेली रातों की दास्तान।

पर बदकिस्मती तो देखो!
जिसे महफ़िल की ख्वाहिश थी
मिलीं तनहाईयाँ उसको।

क्या बेबसी है कि अपने हालात बता भी नहीं सकती,
बस अँधेरों में बंद एक याद बन गई है,
उनकी तनहाईयों का साथ बन गई है।

शायद, उस खुदा को इतना भी गँवारा न था,
कि उन्हें पता भी न चला, कि कितने लाजिमी थे वो उनके लिए
कि उससे पहले ही, अपने पास बुला लिया।

Ms. Shatakshi Sarswat

Location: Vaishali, Ghaziabad, Uttar Pradesh, India,
Occupation: Student
Education: Pursuing Bachelor’s Degree
Age: 17-22
Poem ID: 429
Poem Genre: Other
Poem Length: 19-20 lines
Poem Creation Date: August 29, 2020
Poem Submission Date: August 29, 2020 at 8:42 pm

Poem Title: ” ब्रह्माण्ड का संदेश”

ब्रह्माण्ड ने अब कुछ रुख सा बदला है,
जिस के चलते हवाओं ने भी अपनी चाल को मोड़ा है।

किसी को तो आज मैनें अपने आस पास पाया है,
इस ब्रह्माण्ड ने कुछ तो संदेश मुझे बताया है।

प्रकृति में भी आज उथल-पुथल सी दिखाई पड़ती है,
क्योकिं लोगों ने अपने स्वार्थ के लिय प्रक्रति को भी ना छोड़ा है।

बड़ती हुई प्रतिस्पर्धा ने आज लोंगो के मन से शान्ति के प्रतिक को हटाया है,
और मनुष्य ने मनुष्य को ही इस युग में अपने आगे झुकाया है।

इस ब्रह्माण्ड का संदेश लोगों ने झुठलाया है,
और खुद को खुद से ही विनाशकारी शक्तियों की और बढ़ाया है।

बाहरी सुख ने आज मनुष्य में आंतरिक सुख को धुँधला बनाया है,
मनुष्य ने अपने मस्तिष्क से प्रोद्यौगिकी को भी आगे बढ़ाया है,
परंतु न जाने क्यू इस युग में मनुष्य ने उस आद्रश्य शक्ती को झूठलाया है।

समय समय पर ब्रह्माण्ड ने प्रकृति द्वारा मनुष्य को बहुत कुछ समझाया है,
फिर भी मनुष्य को वो समझ ना आया है।

क्योंकि कलयुग ने अपने झंडे को एक चरम सीमा पर लहराया है,
और लोगों के मस्तिष्क को अपने अनुसार चलाया है।

किसी को तो आज मैनें अपने आस-पास पाया है,
कोई तो संदेश इस ब्रह्माण्ड ने मुझे बताया है।

“Power of Universe”

Mr. Shiv Narayan Johri Vimal

Location: Bhopal Madhya Pradesh,
Occupation: Legal Service
Education: Other
Age: >70
Poem ID: 428
Poem Genre: Veer (heroic)
Poem Length: 25lines lines
Poem Creation Date: July 15, 2020
Poem Submission Date: August 29, 2020 at 12:50 am

Poem Title: 1857, mere mitra ,sarhad ke sipahi

कवी-श्री शिवनारायण जौहरी विमल)
मेरे मित्र

कोई तो देश के खातिर
कूद कर मैदान में
झंडे में लपिटवा कर अपना बदन
शहीद होकर मर गया

कोई हर घड़ी मरता रहा
डरता रहा छ्क्का लगाने से
विकेट पर बने रहना चाहता था
यह नहीं सोचा तुम्हारा भी
विकेट गिर जायगा इक दिन
संकल्प जिस दिन लिया
चढ़ गया एवरेस्ट पर उस दिन |

मित्र तुमने भी शपथ ली थी इक दिन
पर देश मरता और तुम
जीते रहे अपने लिए ?
किसी के घाव पर मरहम लगाया ?
किसी की पीर सहलाई ?
धरती रही पैरों तले
और दृष्टि तारे गिन रही थी |।।।
श्री शिवनारायण जौहरी विमल
[8/24, 7:18 PM] Madhu: श्री शिवनारायण जौहरी विमल

सरहद के सिपाही

निशा सुंदरी रजनी बाला

तिमिरांगन की अद्भुत हाला

हीरक हारों से भरा थाल ल्रे

कहाँ चलीं जातीं हर रात

और बेच कर हार रुपहले

सुबह लौटती खाली हाथ

पूरा थाल खरीदा मेंने

चलो आज तुम मेरे साथ

उस सरहद पर जहां पराक्रम

दिखा रहा है अपने हाथ

बना भीम सरहद का रक्षक

रिपु की गरदन तोड़ रहा है

पहना दो सब हार उसी को

भारत जय जय बोल रहा है ।।।।

श्री शिवनारायण जौहरी विमल
17 /7/2020
[8/24, 7:22 PM] Madhu: १८५७

सत्तावन का युद्ध खून से
लिखी गई कहानी थी
वृद्ध युवा महिलाओं तक
में आई नई जवानी थी
आज़ादी के परवानों ने
मर मिटने की ठानी
क्रांति संदेशे बाँट रहे थे
छदम वेश में वीर जवान
नीचे सब बारूद बिछी थी
ऊपर हरा भरा उद्धयान
मई अंत में क्रांतिवीर को
भूस में आग लगानी थी !

मंगल पांडे की बलि ने
संयम का प्याला तोड़ दिया
जगह जगह चिंगारी फूटी
तोपों का मुँह मोड़ दिया
कलकत्ता से अंबाला तक
फूटी नई जवानी थी !

मेरठ कानपुर में तांडव
धू धू जले फिरंगी घर
नर मुंडों से पटे रास्ते
गूँजे जय भारत के स्वर
दिल्ली को लेने की अब
इन रणवीरों ने ठानी थी !

तलवारों ने तोपें छीनी
प्यादों ने घोड़ो की रास
नंगे भूखे भगे फिरंगी
जंगल में छिपने की आस
झाँसी में रणचंडी ने भी
अपनी भृकुटी तानी थी !

काशी इलाहाबाद अयोध्या
में रनभेरी गूँजी थी
फर्रूखाबाद इटावा तक में
यह चिंगारी फूटी थी
गंगा यमुना लाल हो गई
इतनी क्रुद्ध भवानी थी !

आज़ादी की जली मशालें
नगर गाँव गलियारों में
कलकत्ता से कानपुर तक
गोली चली बाज़ारों में
तात्या बाजीराव कुंवर की
धाक शत्रु ने मानी थी !

दिल्ली पर चढ़ गये बांकुरे
शाह ज़फर सम्राट बने
सच से होने लगे देश
की आज़ादी के वे सपने
अँग्रेज़ों को घर जाने की
बस अब टिकिट कटानी थी !

लेकिन आख़िर वही हुआ
सर पत्थर से टकराने का
किंतु हार है मार्ग जीत
को वरमाला पहनाने का
बर्बरता को रौंध पैर से
मा की मुक्ति कराना थी !

आज़ादी का महासमर यह
चला निरंतर नब्बे साल
बदली युध नीतियाँ लेकिन
हा थो में थी बही मशाल
पंद्रह अगस्त को भारत ने
लिखी नई कहानी थी
आज़ादी की हुई घोषणा
दुनियाँ ने संमानी थी !!!!!!!!!

कवि—शिव नारायण जौहरी विमल

Ms. Himani Bisht

Location: Nainital,Uttarakhand, India.
Occupation: Student
Education: Bachelor’s Degree
Age: 17-22
Poem ID: 425
Poem Genre: Veer (heroic)
Poem Length: 14 lines
Poem Creation Date: July 12, 2020
Poem Submission Date: August 26, 2020 at 3:09 pm

Poem Title: ऐ मातृ भूमी तेरी जय हो …..

जे माँ शारदे

Ms. Akshitha Nomula Chary

Location: Hyderabad , Telangana, India
Occupation: Student
Education: High School
Age: 17-22
Poem ID: 424
Poem Genre: Other
Poem Length: 6 lines
Poem Creation Date: March 16, 2019
Poem Submission Date: August 25, 2020 at 2:01 pm

Poem Title: Cloud’s heavy

Cloud’s heavy

Wee hours , my cognisant zone
Freeze thoughts , nothing’s my own
Time’s lining me all unknown
Beneath my skull , endless groans
Flesh and bone , just moonlight alone
Wings keep tight , don’t want hopes to be flown.

Mr. vikas sharma

Location: Noida, Uttar Pradesh, india
Occupation: Professional Service
Education: Bachelor’s Degree
Age: 29-35
Poem ID: 423
Poem Genre: Veer (heroic)
Poem Length: 32 lines
Poem Creation Date: May 15, 2020
Poem Submission Date: August 23, 2020 at 3:34 pm

Poem Title: कदम बढ़ाओ , चलते जाओ

अभी तो चलना है हमने सीखा
सफर बाकी, चलते जाओ , चलते जाओ जाओ जाओ
सूरज है डूबा , रात है काली
तमनाओं को लिए चलते जाओ

कंधे मिलाकर अब चलना होगा
कदम बढ़ाओ , चलते जाओ , चलते जाओ जाओ जाओ
दुश्मन की ख्वाहिश , आंधी या बारिश
सत्य को थाम , यही गीता ज्ञान

सब कह चुके तुम , सब सुन लिया है
कदम बढ़ाओ , चलते जाओ , चलते जाओ जाओ जाओ
कहने सुनने को कुछ भी न बाकी
कर्म की बांह तू थामे चल

जिस मिटटी पर तुम चलना थे सीखे,
उसके लिए, जलते जाओ, जलते जाओ जाओ जाओ
जलना और चलना निभा न पाए
उसी अस्तित्व पे है धिक्कार

माटी ही माँ है, उसके लिए तुम
कदम उठाओ, बढ़ते जाओ, बढ़ते जाओ जाओ जाओ
सत्ता की कुर्सी, आड़ धर्म की
अहिंसा सत्य जले सुबह शाम

तुमको है चलना, यह सब बदलना
निश्चय को ढृढ़ करते जाओ , करते जाओ जाओ जाओ
तुम ही चलोगे, तुम ही लड़ोगे
इस काले युग का यह घोर संग्राम

रंग बदलके जो इम्तिहाँ ले
दस्तक जो देता है अब बार बार
साहस और जज़्बा जो संग है तेरे
जीतेगा तू होगी उसकी हार
जीतेगा सत्य असत्य की हार

तुम ही चलोगे, तुम ही बदलोगे
इस काले युग में न ढूंढ भगवान
इस काले युग में न ढूंढ भगवान

Ms. Shreya Damodhar Patil

Location: Pinjore, india
Occupation: Student
Education: High School
Age: 11-16
Poem ID: 422
Poem Genre: Veer (heroic)
Poem Length: 10 lines
Poem Creation Date: October 15, 2018
Poem Submission Date: August 21, 2020 at 4:39 pm

Poem Title: हिन्दी

हिंदी
मिला है भाग्य हमें हम बोलते हैं हिन्दी।
हो जाते है धन्य हम जब बोलते है हिन्दी।
धर्म पन्त जाती एक करती हैं हिन्दी।
सारे भारतीयों की माँ है हिन्दी।।

हर भारतीय की माँ है हिन्दी।
हर भारतीय का मान है हिन्दी।
हम भारतीयों की पहचान है हिन्दी।
हर भारतीय को एक करती है हिन्दी।।

हर राष्ट्र की भाषा नही है हिन्दी।
लेकिन पुरे राष्ट्र को जोडती है हिन्दी।।
– श्रेया दामोधर पाटिल

Mr. Himanshu Bansal

Location: Delhi, Delhi, India
Occupation: Professional Service
Education: Graduate of Professional Degree
Age: 23-28
Poem ID: 421
Poem Genre: Veer (heroic)
Poem Length: 42 lines
Poem Creation Date: January 4, 2015
Poem Submission Date: August 20, 2020 at 4:10 pm

Poem Title: एक पुकार

बेटी हूँ मैं माँ तेरी सदियों से चली आई पहेली हूँ,
पूछूँ तुझसे एक ही सवाल क्यों सबके बीच अकेली हूँ।
एक ही कोंख से जन्म लिया फिर बेटियां ही क्यों रोती है,
हमको जुल्म सहता देख क्यों खुली आँख तू सोती है।
एक का स्वागत खुशियों से किया जन्म लेना खानदानी शान,
मुझ बेटी को कोंख में गिरा छोड़ दिया अंधेरों में गुमनाम,
कराह रही हूँ तेरे अंदर मत छीनो मेरी जान,
मुझ कली को पनहपने दो एक दिन होगा मुझपे अभिमान।
अरमानो का गला घोट सदा अपनों के लिए दिया बलिदान,
त्याग को मैंने नियति समझा यही बना मेरी पहचान।
बेटी हूँ मैं माँ तेरी सदियों से चली आई पहेली हूँ,
पूछूँ तुझसे एक ही सवाल क्यों सबके बीच अकेली हूँ।।

मैं एक नारी शक्ति हूँ जो खतरों में घिरी पड़ी हूँ,
माँ तुझको सब पता होगा किस हालत में पली बढ़ी हूँ।
चौखट से लांगों कदम तो हवशी पीछा कर देखते है,
टेढ़ी मेढ़ी नज़रों से नोच नोच अखियाँ सकते हैं।
मैं साठ साल की माँ तो कभी तो पाँच साल की बेटी हूँ,
ठरकी मर्दो की नज़रों में कैद मैं निहथ्था पड़ी लेटी हूँ।
क्या यही उनकी असली मर्दानगी क्या यही हैं उनका सच्चा बल,
अधिकारों को छीन सम्मान को रोंद किया मेरा अस्तित्व ओझल।
समाज के ठेकेदारों के बीच मैं खुलके सांस नहीं लेती हूँ,
बंद पिंजरें में कैद हमेशा सब जुल्मों को सहती हूँ।
बेटी हूँ मैं माँ तेरी सदियों से चली आई पहेली हूँ,
पूछूँ तुझसे एक ही सवाल क्यों सबके बीच अकेली हूँ।।

देवी सती की पति भक्ति प्रसिद्ध हुई तो अहिल्या के साथ अन्याय किया,
सीता माँ ने कदम कदम पर पवित्रता का सबूत समाज को दिया।
उर्मिला का त्याग हो या द्रौपदी दिया बलिदान,
हर युग किसी रूप में नारी देती आ रही बलिदान।
इतिहास के पन्ने पलट के देखों तो हर शण परीक्षा दी हैं,
मर्दों के अत्याचारों को सहकर भी औरत खरी उतरी हैं।
बेटी हूँ मैं माँ तेरी सदियों से चली आई पहेली हूँ,
पूछूँ तुझसे एक ही सवाल क्यों सबके बीच अकेली हूँ।।

बेटी हूँ माँ तेरी बनूँ मैं तेरा ही साया,
क्यों अब तक कोई ये समझ नहीं पाया,
औरत घर की शोभा हैं और जग जननी माता हैं,
तन मन कोई तिजोरी नहीं जो कोई भी लूट ले जाता हैं।
घर आँगन को रोशन करती लक्ष्मी का स्वरुप हूँ मैं,
बढ़ जाए जब अत्याचारी महा काली का रूप हूँ मैं।
पूजे होंगे हज़ारों देवता तब जाके मैं मिलती हूँ,
रिश्तों को प्यार के मोतियों से पिरोये हर आँगन में खिलती हूँ।
बेटी हूँ मैं माँ तेरी सदियों से चली आई पहेली हूँ,
पूछूँ तुझसे एक ही सवाल क्यों सबके बीच अकेली हूँ।।

Mr. Himanshu Bansal

Location: Delhi, Delhi, India
Occupation: Professional Service
Education: Other
Age: 23-28
Poem ID: 420
Poem Genre: Bhayanak (terrifying)
Poem Length: 22 lines
Poem Creation Date: March 28, 2020
Poem Submission Date: August 20, 2020 at 4:04 pm

Poem Title: A Vague Outbreak

Shadow of vague awe is all over
death amuse all humans but game,
forced survivors to live in terror
as panic sitch began again,

This is the time of Apocalypse,
A pernicious disorder excited to nation,
which unfurl with great ease
cause humans to be in a state of confusion.

It’s Corona outbreak,
A deadly disease strucks
enforced to lockdown to avoid perils,
ruined connections who cared for one another
people gazed in awe at the dark tendrils.
Nature confiscate all revenge with cruel
men are helpless counting Zombies,
edify individual a lesson of existence
Or ready with near ones to buries,

The deadly Corona has in its full pace,
don’t be restless, shatter the fetters of Covoid;
Now coins cannot secure our entity
no machete can oppose the fate
the only way is to self-isolate.

Mr. Himanshu Bansal

Location: New Delhi, Hindustan
Occupation: Professional Service
Education: Graduate of Professional Degree
Age: 23-28
Poem ID: 418
Poem Genre: Veer (heroic)
Poem Length: 27 lines
Poem Creation Date: August 15, 2005
Poem Submission Date: August 21, 2020 at 3:04 am

Poem Title: गुलाम भारत

जब भी होता किसी दर्दनाक घटना का जिक्र,
समस्त हिन्दुस्तानी हो जाते सिहर,
बात थी युगों-युगों पुरानी,
करते थे सब अंग्रेजों की गुलामी,
व्यापारी बन आई इस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में अपने कदम जमाएँ
डाली थी उन्होने हम सब में फूट,
फिर सब लोगों का सुख -चैन लिया लूट,
दाने-दाने को कर दिया था मौहताज,
नही बची थी हम भारतीयों की लाज,
बहुत बुरी थी गुलाम भारत की हालत,
होनी चाहिए भारतीयों को खुद पर लानत,
क्योकिं करोड़ों लोग उन कुछ ब्रिटिशों का नही पाए बिगाड,
नही तो वे सब हो जाते ताड़-ताड़।।

अनेक स्वतंत्रता सैनानियों ने देखा आज़ाद भारत का स्वप्न,
इसे सच करने के लिए किया उन्होनें बहुत प्रयत्न।
गुलामी की जनजीरों को तोडने के लिए कर दी अपनी जान कुरबान,
और बचा ली अपने देश की आन-मान-शान,
हिन्दुस्तान को अपना समझने वाले अंग्रेज,
एक दिन सैनानियों द्वारा दिए गए भेज,
समझते थे अंग्रेज खुद को शक्तिशाली,
निकाल दिए गए इस सर जमीन से दोनो हाथ खाली,
निकालकर उन दुष्टों का मन से खौफ,
चले गए वे हम वासियों को देष सौप।
हम बेकार ना जाने देंगे उन महापुरुषों का बलिदान,
देष को सर्वश्रेष्ठ बनाने के लिए लगा देंगे हम अपनी जान।
लेते है हम शपथ आज,
झुकने न देंगें इस देश का ताज।।

Mr. Anand Singh Shekhawat

Location: Amravati, maharashtra, INDIA
Occupation: Business
Education: Bachelor’s Degree
Age: 29-35
Poem ID: 417
Poem Genre: Adbhut (wondrous)
Poem Length: About 30 lines lines
Poem Creation Date: August 15, 2020
Poem Submission Date: August 19, 2020 at 6:30 am

Poem Title: जम्मू-कश्मीर और 370

लोकतंत्र का स्वाभिमानी,
भारत देश महान है,
छोड़ दी जीत में मिली जमीन भी,
वाकिफ इससे सारा जहान है।

फिर भी न माने दुश्मन,
नोच लिया जिस टुकड़े को,
अभिन्न अंग है ये जिसका,
वो प्यारा-सा हिंदुस्तान है।

लेकिन कुछ सियासी पिल्लों ने ,
मचाया अपने घर में घमासान है,
और फिर से अलग कर दिया उसे
मस्तक है जिसका, वो हिंदुस्तान है।

मेरे देश में यह धरती की जन्नत कहलाता था,
स्वर्ग भी इसके सामने फीका पड़ जाता था,
केसर की क्यारी और देवों की नगरी था,
भारत के हर मानव -दिल का यह जिगरी था।

लेकिन उन पिल्लों को क्या पता था
एक दिन ऐसा तूफान जो आएगा,
बना के रखा था जिन्होंने स्वर्ग को जहन्नुम,
उनका अलग देश और संविधान का,
अटूट सपना भी चोपट कर जाएगा ।

कहता था जो सीना है छपन इंच का,
उसकी अग्नि परीक्षा का दिन आएगा,
और 370 में लिपटा हुआ कश्मीर भी,
अब भारत का अभिन्न अंग हो जाएगा।

लहराओ तिरंगा खुले दिल से अब,
भारत सारा एक है,
देख रहा है सयुंक्त राष्ट्र संघ भी,
भारत के लोकतंत्र की शक्ति को,
भले ही इसमे राज्य अनेक है।

आजाद हुआ भारत ,
आज सही मायने में,
खिला है केसर का फूल
और महक दिलों के आईने में,

कहता है ये आनन्द का विवेक है,
कश्मीर से कन्याकुमारी तक,
अब भारत सारा एक है।।

जय भारत , जय माँ भारती, जय लोकतंत्र,

Mr. Ritesh Kumar

Location: Faridabad, Haryana, Country is India
Occupation: Professional Service
Education: Bachelor’s Degree
Age: 29-35
Poem ID: 416
Poem Genre: Karuna (pathos)
Poem Length: 20 lines
Poem Creation Date: August 16, 2020
Poem Submission Date: August 18, 2020 at 7:33 pm

Poem Title: यूँ तो आज़ादी है…पर थोड़ा काम रहता है

यूँ तो आज़ादी है, पर थोड़ा और काम रहता है
स्कूल हो सबके नसीब में, बस करीब में
छूट न जाए कोई बच्चा बस यही डर रहता है

हवा थोड़ी और सॉफ हो, कुदरतन थोड़ा और इंसाफ़ हो
कारखानों और गाड़ियों से निकलता ये काला धुआँ
दम न घुट जाए मेरी मा का, बस यही डर रहता है

मेरे वतन की हर गली थोड़ी और महफूज़ हो
मेरी बहन को आज़ादी थोड़ी और महसूस हो
शाम ढलते ही, जल्दी घर आ जाए, बस यही डर रहता है

बारिश नही हो रही, कुछ इंतज़ाम और करो न
तुम तो सरकार हो, खुदा हो हमारे, किस्सा ये तमाम करो न
गाव में मेरा चाचा किसान है, फासी न लगा ले, यही डर रहता है

ग़रीबी कभी मेरे आँगन में रहती थी
आज भी इधर, उधर हर तरफ है, थोड़ा और ज़ोर लगाओ न
भूका न सो जाअए कोई, बस यही डर रहता है

काम बहुत हो रहा है, थोड़ा और धक्का लगाओ न
तुम भी अपना धंधा जमाओ न, बहुत ज़रूरत है
मेरा दोस्त ढूँढ रहा है काम एक महीने से
हार न मान जाए, बस यही डर रहता है

यूँ तो आज़ादी है, पर थोड़ा और काम रहता है

Ms. Shivani Yadav

Location: Lucknow/ Uttar Pradesh, India
Occupation: Student
Education: Pursuing Bachelor’s Degree
Age: 17-22
Poem ID: 415
Poem Genre: Veer (heroic)
Poem Length: 22 lines
Poem Creation Date: August 13, 2020
Poem Submission Date: August 18, 2020 at 8:01 am

Poem Title: आओ शुक्रिया कहें

कोरोना के इस काल में
पूरी दुनिया के इस हाल में
आओ शुक्रिया कहें उन्हें
जो सेवा कर रहे अस्पताल में

जिन्दगी उनकी भी जरूरी है
और आप कहेते मजबूरी है
अब तो समझो वो कितने महान है
आऔ शुक्रिया कहें उन्हें
जो इंसान के रूप में भगवान हैं

जरा सी खबर सुनकर आप डर जाते हैं
वो सैनेंटाइज़र लेके गलियों में मंडराते हैं
कब समझोगे वो हमारे लिए अपनी जान लगाते हैं
आओ शुक्रिया कहें उन्हें
जो अपने काम से महान कहलाते हैं

सड़कों पर खड़े पुलिस वालों को
जो साफ करते हैं नालों को
अस्पताल में जान बचाने वालों को
आऔ शुक्रिया कहें
अपने देश के रखवालों को

Mr. Rajesh Ranjan Arya

Location: Columbus, Ohio, USA
Occupation: Other
Education: Other
Age: 36-40
Poem ID: 414
Poem Genre: Shant (peaceful)
Poem Length: 26 lines
Poem Creation Date: August 15, 2020
Poem Submission Date: August 17, 2020 at 7:58 pm

Poem Title: मातृभूमि की माटी का सुख

मातृभूमि की माटी का सुख, कहीं स्वर्ग में भी मिलता नहीं,
हम देश से निकले हैं मगर, देश हमसे निकलता नहीं ।

वो दशहरे की रौनक, वो दिवाली के पटाखे,
वो दुर्गा जी की प्रतिमा, वो चीनी वाले बताशे |
वो ठेले के गोलगप्पे, वो इडली और डोसा,
वो गन्ने का रस अदरख डालकर, वो छोला और समोसा |
वो गांव की अलबेली शादी और लाउडस्पीकर का बेसुरा गाना,
वो दूल्हे के बगल बैठना, वो फूफा का मुंह फुलाना |
वो सब्ज़ीवाले से कहना, भैया थोड़ा कम लगाना,
वो बैठकर खेतों में, ट्यूबवेल के पानी से नहाना |
वो मनमर्ज़ी घर आ पाने का सुख, वो माँ के हाथों का खाना,
वो दादा-दादी, चाचा-चाची, वो भैया-भाभी, नानी और नाना |
कितने रिश्ते छूटे हैं वहाँ पर, कितने किस्से छूटे हैं वहाँ पर,
है इतनी चकाचौंध यहाँ, कुछ साफ़ से दिखता नहीं,
हम देश से निकले हैं मगर, देश हमसे निकलता नहीं ।

परदेश के सूरज में भी, देश का चाँद ही यादों में है,
काम आ सकूँ मैं कुछ देश के, ऐसा कुछ ख्वाबों में है |
है बहुत यह चाह कि, अपना श्रेष्ठ सबसे विज्ञान हो ,
नहीं वो कोई छोटा या बड़ा, सबका बराबर मान हो |
समाज में रहें सब मिल, नर-नारी का बराबर स्थान हो,
बनें हम आत्मनिर्भर, अर्थव्यवस्था पर हमें शान हो |
हम यूँही ना भागें पश्चिम की ओर, अपनी संस्कृति पे हमें गुमान हो,
सारी दुनिया से अलग, एक भारतीय होने की पहचान हो |
मैं कुछ देश के लिए कर पाऊं अगर, मिले भले ही कठिन डगर,
तो इससे बड़ा कोई सुख नहीं, इससे बड़ी कोई सफलता नहीं,
हम देश से निकले हैं मगर, देश हमसे निकलता नहीं ।

Ms. Neelam Saxena Chandra

Location: Pune, Maharashtra, India
Occupation: Government
Education: Graduate of Professional Degree
Age: 51-60
Poem ID: 413
Poem Genre: Shant (peaceful)
Poem Length: ३० lines
Poem Creation Date: August 17, 2020
Poem Submission Date: August 17, 2020 at 3:33 pm

Poem Title: इबादत

इबादत करती हूँ उस मुल्क की-
जहाँ हर दिन मानो कोई जश्न हो,
जहाँ हर शाम महकती हो शान से;
जहाँ रातों को चांदनी की नज़ाकत भी,
बरसती है गुमाँ के साथ आसमान से!

इबादत करती हूँ उस मुल्क की-
जहाँ हर शहर में कोई बात ख़ास है,
जहाँ हर गाँव ओढ़ता मुहब्बत का लिबास है;
जहाँ मेहमान को ईश्वर सा पूजा जाता है,
जिसके हर दिल में बंधती आस ही आस है!

इबादत करती हूँ उस मुल्क की-
जिसकी पौराणिक कथाओं में भी सीखा सम्मान,
जिसके इतिहास पढ़कर होता है हर पल अभिमान;
जो अपने आप में अनमोल, अद्वितीय और ख़ास है,
जिसका हर देशवासी करते नहीं थकता गुणगान!

इबादत करती हूँ उस मुल्क की-
जिसके सेनानी हिफाज़त करने में नहीं कतराते हैं,
बड़ी शान से हम मिल-जुलकर झंडा फहराते हैं,
जहां रंज और द्वेष का दूर-दूर तक नहीं निशाँ है,
जिसमें ईद और दीवाली हम मिलकर मनाते हैं!

इबादत करती हूँ उस मुल्क की
जिसके कदम बढ़ते ही जाते हैं आगे ही आगे,
जो पिरोता ही जाता देशप्रेम के रिश्ते और तागे;
जो बढाता जाता हर किसी की उम्मीद और जोश,
जो बाँधता ही जाता इश्क और प्रेम के धागे!

इबादत करती हूँ उस मुल्क की-
ऐ दोस्त! साथ तुम भी मेरा देते ही जाना!
कितनी भी मुश्किलें आयें, पर न घबराना;
हम, तुम और हमारे सभी साथी प्रेम से,
लिखते ही रहेंगे रोज़ एक नया अफ़साना!

Ms. Kriti Goswami

Location: Satna, Madhya Pradesh, India।
Occupation: Student
Education: Pursuing Bachelor’s Degree
Age: 17-22
Poem ID: 411
Poem Genre: Shringaar (romantic)
Poem Length: 7 lines
Poem Creation Date: August 16, 2020
Poem Submission Date: August 16, 2020 at 1:54 pm

Poem Title: हम

शायद ईश्वर के पास हमारी आत्माएँ एक रहीं होंगी,
ईश्वर ने उसके दो हिस्से कर के दो मनुष्य बना दिए,
तभी तो हम एक जैसे न होकर , एक दूसरे के पूरक हैं,
जैसे एक ही कागज़ के दो टुकड़े!

तभी तो मुझे बोलना पसंद है, तो तुम्हें सुनना,
मुझे लिखना पसंद है , तो तुम्हें पढ़ना,
तुम्हें गाना पसंद है, और मुझे गाने सुनना।।

Mr. Ravindra Kumar Srivastava

Location: Ghazipur , Uttar Pradesh, INDIA
Occupation: Government
Education: Bachelor’s Degree
Age: 41-50
Poem ID: 410
Poem Genre: Other
Poem Length: 32 lines
Poem Creation Date: August 16, 2020
Poem Submission Date: August 16, 2020 at 11:39 am

Poem Title: बस वही गद्दार है

जाति, मजहब,धर्म जिसका, देश से पहले खड़ा है
बस वही ग़ददार है ,ग़ददार है, ग़ददार है

जब अनैतिक मूल्य हो जाएं,लहू में प्रतिस्थापित
पीढ़ियाँ हो जातीं हैं उन खानदानों तक की शापित
बदनीयत की ही कमाई पर टिकी है साँस जिनकी
चंद सिक्कों में ही है ईमान हो जाता प्रवाहित
आखिरी में , आँख नीची , उसको करनी ही पड़ेगी
जो स्वयं की आत्मा से ,कर जिया व्यभिचार है

जब बहारें , कर रहीं हैं, पतझरों की ही गुलामी
और सूरज की किरण, जुगनू को देती हो सलामी
भाइचारा ,दुश्मनी की नींव को जब दे समर्थन
हरि कथा जब बांचते हो ,दुष्ट,क्रोधी और कामी
आसुओं की धार है जब खेत की फसलों को सींचे
और उबले ना लहू फिर भी तो फिर धिक्कार है

बेटियों की अस्मतें , नीलाम होती जा रहीं है
गीता,रजिया,मरियमें बदनाम होती जा रही हैं
कान ,पत्थर के हुए जाते,अदालत के हैं देखों
और सन्नाटे की सुबहें,शाम होती जा रही है
बदचलन जब हो हवायें, स्तनों का वस्त्र खींचें
जिंदगी ऐसी यहां फिर भी जिन्हें स्वीकार है

है परेशानी की जिनको ,गान गाने में वतन के
उठ रही है हूक दिल में, जिनको इस खिलते चमन से
जो तिरंगे के लिए, नीती दुरंगी जी रहे हैं
अब उन्हें ढकना पड़ेगा ,बांधना होगा कफन में
जो शहीदों के लिए , अनुचित वचन का बोल बोले
उनको बतलाना पड़ेगा, ये नहीं स्वीकार है

देश की करते खिलाफत , जो उन्हें मत माफ करिये
पौध ऐसी हैं जहाँ भी , अब उसे तो साफ करिये
मुंदने से आँख तो होती समस्या हल नहीं है
आज को कल टालने से आ सका तो कल नहीं है
राष्ट्र वंदन, राष्ट्र अभिनंदन जरूरी शर्त हो अब
छोड़ दें वो देश ,जिनको शर्त ये अस्वीकार है

Mr. Ved Prakash Singh

Location: Prayagraj (Allahabad),Uttar Pradesh, india, Bharat
Occupation: Other
Education: Bachelor’s Degree
Age: 23-28
Poem ID: 409
Poem Genre: Veer (heroic)
Poem Length: 12 lines
Poem Creation Date: August 13, 2020
Poem Submission Date: August 16, 2020 at 8:49 am

Poem Title: देश के नाम पैगाम

आया है स्वतंत्रता दिवस हमारा,
लाया है देश के नाम पैगाम यह प्यारा,
मिली है आजादी जिनके त्याग व बलिदान से,
शीश झुकाकर करें हम उनका अभिवादन गर्व और अभिमान से,
आया है स्वतंत्रता दिवस हमारा,
लाया है देश के नाम पैगाम यह प्यारा,
भगत जवाहर सुभाष गांधी ने देखा था मुक्त भारत का सपना,
उन सब की बलिदानी ने बनाया मुक्त भारत अपना,
खेतों में दिखलाई देती है स्वतंत्र भारत की लहलहाती फसलें,
घरों में बड़े-बुजुर्ग सुनाते रहते थे उनकी बलिदानी के किस्से पहले,
आया है स्वतंत्रता दिवस हमारा,
लाया है देश के नाम पैगाम यह प्यारा ।

Mr. Pranil Prabhakar Gamre

Location: Mumbai, Maharashtra, Pranil Gamre
Occupation: Student
Education: Bachelor’s Degree
Age: 23-28
Poem ID: 408
Poem Genre: Karuna (pathos)
Poem Length: 26 lines
Poem Creation Date: June 3, 2020
Poem Submission Date: August 16, 2020 at 7:38 am

Poem Title: तेज़ाब

तेज़ाब….

चहेरा की हसीनता देखकर उनको मुझपर दिल आया
अस्वीकार किया उनको तो उन्होंने तेजाब से जलाया

कहे दिया उन्होंने के मैंने उनके अहंकार को चोट पहुँचाई
यही वजह हैं उन्होंने मेरे चहेरे की मुस्कान चुराई

सचमुच प्यार होता मन मैं अगर तो ये अहंकार नहीं रेहता
इस तरह मेरी सूरत ख़राब करदेने का विचार ही मन मैं नहीं आता

देखने से डरती हूँ रोज मैं उस आईनेमे खुदको
घुट घुट मरती हूँ जब याद आती हैं वो काली रात मुझको

दुप्पटे से ढकती हूँ चहेरा मेरा लोगों से छुपाकर
जायज हैं अजीब सा लगता होगा उनको मुझे देखकर

पहले जैसे सजना सवरना छोड़ दिया अब मैंने
क्या करें कहिका नहीं छोड़ा मुझको उन लोगोंने

घरके चार दीवारों में अब कैद रखती हूँ मैं खुदको
खून के आंसू रोकर फिर मैं ही सवार लेती हूँ मुझको

क्या गलती हुई मुझसे , मुझे खुदसे निर्णय लेने का अधिकार नहीं था क्या
जो गलत ना होते हुए भी खुदा मुझे आजीवन ये सजा दे गया

अकेली पाती हूँ तबसे लेकर आजतक इस लोगों से भरी दुनियां मैं ख़ुदको
यही उम्मीद लगाई बैठी हूँ कोई आकर सच्चे मन से अपनाले मुझको

— Pranil Gamre

Mr. Pranil Prabhakar Gamre

Location: Mumbai, Maharashtra, India
Occupation: Student
Education: Bachelor’s Degree
Age: 23-28
Poem ID: 407
Poem Genre: Other
Poem Length: 31 lines
Poem Creation Date: June 11, 2020
Poem Submission Date: August 16, 2020 at 7:12 am

Poem Title: तब हमारा भारत महान कहलाएगा !

तब हमारा भारत महान कहलाएगा !

जब जात धर्मभेद लोगों के मन से निकल जाएगा
हर एक इंसान जब मिलजुलकर रहेगा
तब जाकर हमारा भारत महान कहलाऐगा

जब हर एक इंसान शिक्षा प्राप्त कर पायेगा
तब देश हमारा अंधविश्वास से मुक्त हो जाएगा
तब जाकर मेरा भारत महान कहलाएगा

बेटियों को बोझ नहीं समझा जाएगा, हर कोई बेटे के साथ बेटी को भी अपनाएगा
बेटियों के साथ एक समान सुलूक और हक़ दिया जाएगा
तब जाकर मेरा भारत महान कहलाएगा

जब स्त्रियों के ही चरित्र पर सवाल उठाना बंद होजाएगा
बलात्कार और छेड़छाड़ को लेकर स्त्रियों की सुरक्षा को अहम् मानाजाएगा
तब जाकर मेरा देश महान कहलाएगा

जब कोई भी गरीब घर मैं भूके पेट नही सोऐगा
कानून जब आमिर गरीब सबके लिए समान रहेगा
तब जाकर मेरा भारत महान कहलाएगा

जब कहींपर भी कोई भी नागरिक भ्रष्टाचार नहीं करेगा
और हर कोई अपनी भूमि को साफ सूत्रा रखने को चाहेगा
तब जाकर हमारा भारत महान कहलाएगा

जब दहेज़ के नाम पर लोगों को लुटा नहीं जाएगा
और जब किसानों के आँखों से आंसू नहीं बहेगा
तब जाकर मेरा भारत महान कहलाएगा

जब धर्म के नाम पर कोई राजनेता लोगों को नहीं भड़काएगा
धर्म जाती के नाम पर आपस मैं मार पिट खून खराबा नहीं किया जाएगा
तब जाकर मेरा भारत महान कहलाएगा
— Pranil Gamre

Mr. Shiv Narayan Johri ‘Vimal’

Location: Bhopal MP, EIndia
Occupation: Legal Service
Education: Other
Age: >70
Poem ID: 406
Poem Genre: Veer (heroic)
Poem Length: Two pages lines
Poem Creation Date: December 20, 2019
Poem Submission Date: August 22, 2020 at 2:44 am

Poem Title: Shahid marte nahi vismil

विध्वंस से
हमने देखी महाभारत की गोद में
प्यार की एक बूँद
पनपता एक नवयुग शिशु
परीक्षित |
हिरोशिमा की राख से अंकुरित होता
नया जापान |
होलिका की गोद से जन्म लेता
रंग और गुलाल में लिपटा हुआ
प्रहलाद |
रात ने जला डाला सब कुछ किन्तु
एक चिंगारी बची रह गई
फिर रंगीन करने को
सुबह |
फूलों पत्तियों से
कसम खा कर गया है
लौट कर ज़रूर आऐगा
बसंत |
एक तिनका रह गया था
बया की चोंच में
सुबह हर दाल पर लटके
हुए थे घोंसले अनगिन
ज़िन्दगी की चहचहाट से
गूंजता मौसम
दिशाएं कह रहीं हैं कल
रश्मि रथ पर आएगा
मंगल कलश।।।
[8/12, 11:26 AM] Madhu: नया वर्ष
बुझ चुकी है आग जंगल में पलाश के
उतरता जा रहा है रंग टेसू के
छीन कर होलिका की गोद से
पहलाद को अपने आँचल में
छिपा लिया है धरती ने
नया वर्ष मुस्काने
लगा है पालने में |

आगए स्वाद के सरताज
मीठे आम के दिन
जामुन जाम के दिन
संतरे तरबूज खरबूजे के दिन

पानी की सतह पर
काँटों का ताज पहने
तिकोने सिंघाडों की बेल
फेलती जा रही है |
कच्ची मूंगफली खोदकर
सिंघाडों के साथ खाने के दिन |

अलता लगाए गुड़हल के पैर
थिरकने लगे हैं
नए वर्ष का स्वागत |

बैगनी क्यारियों में
सर उठाने लगी है केशर

पझड के पत्तों की चीख सुन
गेंदे ने मलहम लगा कर कहा
रोने से कुछ नहीं होगा
उम्र का चौथा चरण
पीला हो कर सूख जाता है
कोई बच नहीं सकता
इस अनिवार्यता से
समय के साथ
उतर जाते है सारे रंग।।।
श्री शिवनारायण जौहरी विमल |
[8/12, 12:07 PM] Madhu: शहीद मरते नहीं बिस्मिल

एक बग्गी
पीछे केबिन में बैठा हुआ अंग्रेज़
आगे ऊँची सीट पर बैठा सईस
पुलिस की ड्रेस
एक हाथ में घोड़े की रास
दूसरे हाथ में चाबुक
हुकुम का गुलाम |
आगे कसा हुआ घोड़ा
चाबुक की मार खाता दौड़ता घोड़ा
गुलाम हिन्दुस्तान का नक्षा |

कोई शिकायत नहीं
घोड़े ने कर लिया था समझौता
अस्तबल रहने के लिए
खाने के लिए रातब
यह नागरिक डरा सहमा
गुलामों का गुलाम |

क्या इस घोड़े को
आज़ाद करवाने के लिए
सर फरोशी की तमन्ना की थी
क्या इसके किए
सर पर कफ़न बाँधा गया ?
वह तो अपने नरक में खुश था

क्या उनके लिए जो लड़ रहे थे
आजादी के लिए अपने तरीके से
और तुम्हारे रास्ते से डरते
तुमसे घ्रणा करते थे
जिन्होंने तुम्हारे त्याग को
बलिदान को कभी समझा नही ?
नहीं नहीं तुम लडे थे पूरे देश की
आजादी के लिए
देश की माटी के लिए |

१८५७ के बाद जो दमन चक्र चला था
गाँव के गाँव फूंके गए
खेत खलिहान जला कर
भुकमरी और दहशत फैलाई गई
जवानी लटका दी गई पेड़ों से
इस भयानक तांडव के बाद
जो तुम्हारे जैसे सरफरोशों
की टोलियाँ निकलीं
देश में नवोदय होने लगा |

दुनिया के हर देश ने
आजादी के लिए उत्सर्ग
को पूजा है सराहा है
मज़ार पर श्रद्धांजली दी है
पर हाय आज़ाद भारत देश के शासन
न तुम को शहीद का दर्जा मिला
न तुम्हारी चिताओं पर
लगाए गए मेले
न दी गई परिवार को पेंशन |

स्वतंत्रता संग्राम बहुतों ने लड़ा
अपने अपने तरीकों से
पर श्रेय सत्तारूढ़ दल ने
केवल अपनों को दिया |

तुम्हारा रास्ता सही था या गलत
तुम्हारी शहादत ने आजादी के
नव जागरण को हवा तो दी थी |
हवा में आज भी गूंजते है
सर फरोशी के तराने
शहीद मरते नहीं बिस्मिल
दिलों पर राज करते हैं |।।।
श्री शिवनारायण जौहरी विमल

Mr. Deependra Deepak

Location: Meerut, Uttar Pradesh, INDIA
Occupation: Government
Education: Bachelor’s Degree
Age: 17-22
Poem ID: 405
Poem Genre: Veer (heroic)
Poem Length: 29 lines
Poem Creation Date: August 14, 2020
Poem Submission Date: August 15, 2020 at 2:22 pm

Poem Title: सरहद की मिट्टी

माना के मैं नाकारा था…
पर माँ की आँख दा तारा था…..
एक सोणी कुड़ी के जोबन पे….
मैं भी साड्डा दिल हारा था…..
पर भूल के रिश्ते-नाते सब….
जन्नत से बड़ी सौगातें सब……
मैंने तैन्नु सोणी ख़ुद नु , महिवाल कर दिया…..
सरहद की मिट्टी देख, तेरा रंग लाल कर दिया……

बाबा बोले के बेटे ने , क्या उम्दा फर्ज़ निभाया है…..
अम्मा बोली लल्ला ने, भारत माँ का कर्ज़ चुकाया है…
बहना बोली के भाई ने, सम्मान रख लिया राखी का…..
जिंदड़ी बोली उसनु मैंने, अज सच्चा इश्क़ सिखाया है…..
छुप सकता था हर दिल का ग़म, इन ऊंची-ऊंची बातों मे…..
पर अश्कों ने ज़ाहिर सबके दिल का हाल कर दिया…..
सरहद की मिट्टी देख, तेरा रंग लाल कर दिया……

इस बार मुझे छुट्टी लेकर, फिर गाँव नू अपने आना था….
इस बार मुझे बैसाखी पे, फिर झूम के भंगड़ा पाना था…..
इस बार मुझे एक लड़की से, कह देनी थी दिल की बातें….
इस बार मुझे कुछ यारों को, जी भर के गले लगाना था…..
हर एक हसरत की कुर्बानी, देकर एक अदने इंसां ने…..
सबसे ऊँचा भारत माँ का इक़बाल कर दिया……
सरहद की मिट्टी देख, तेरा रंग लाल कर दिया……

गर फिर से मुझको जन्म मिले, तो इसी धरा पर आऊँ मैं….
फिर देख तिरंगे की जानिब, जन-गण-मन को दोहराऊँ मैं…..
फिर से ख़ाकी वर्दी पहनूँ, फिर दुश्मन से टकराऊँ मैं….
फिर मिट्टी बन इस धरती की, ही मिट्टी मे मिल जाऊँ मैं…..
सात जनम जीकर भी जितना प्यार नहीं मिलता मुझको…..
एक मौत ने उससे ज्यादा मालामाल कर दिया……
सरहद की मिट्टी देख, तेरा रंग लाल कर दिया…..

Ms. Dr.Rashmi Varshney

Location: Mumbai, India
Occupation: Government
Education: Other
Age: 51-60
Poem ID: 404
Poem Genre: Veer (heroic)
Poem Length: 50 lines
Poem Creation Date: August 15, 2020
Poem Submission Date: August 15, 2020 at 12:45 pm

Poem Title: ड्रैगन का कालिया मर्दन

ड्रैगन फुँफकारे, आग उगले कितना भी।
भारतवर्ष की सीमा न डरेगी, न काँपेगी।
ड्रैगन फुँफकारे …

माना था हमने उसे अपना ही भाई।
कहते थे हम हिंदी चीनी भाई भाई।
पर पीठ में घोंप दी उसने ऐसी छुरी।
सियाचिन की घास देने लगी दुहाई।
ड्रैगन फुँफकारे …

भूल गया नाशुक्रा चीन वह दिन भी।
दी थी हमने अपनी सदस्यता स्थाई।
भाता भारत का विरोध करना ही।
तन कर सदा अपनी आँखें तरेंरी।
ड्रैगन फुँफकारे …

चीन ने दी मारक सौगात कोरोना की।
पेंगोंग नहीं, तो गलवान पर की चढ़ाई।
गहराती रात में, इसने ताकत दिखाई।
कर्नल संग शहीद हुए बीसियों फौजी।
ड्रैगन फुँफकारे …

भाईचारा और दोस्ती तो बहुत निभ गई।
सदाशयता हमारी लगती अब कमजोरी।
देश की सीमा की रक्षा करना है जरूरी।
लेकर रहेंगे हम अपनी सारी मातृ भूमि।
ड्रैगन फुँफकारे …

अब न मनेगी चीनी लड़ियों की दिवाली।
न टिकटॉक से होगी यहाँ कमाई तुम्हारी।
न फलेगी फिरंगी व्यापार से राज की नीति।
इतिहास दोहराने की चाल रह जाएगी धरी।
ड्रैगन फुँफकारे …

समय बदला, युग बदला, सदी बदली।
विश्व में भारत की मान-प्रतिष्ठा भी बढी़।
(पर)
चीनी कर्मों से उसकी सदस्यता छिनेगी।
फिर से यह भारत की झोली में गिरेगी।
ड्रैगन फुँफकारे …

घिरेगा अब ड्रैगन हर वैश्विक मोर्चे पर।
देश की सीमा हो या कूटनीतिक मंच।
चाहे हो आर्थिक जगत का कारोबार।
कृष्ण वंशी बजेगी कालिया मर्दन कर।
ड्रैगन फुँफकारे …

ड्रैगन फुँफकारे, आग उगले कितना भी।
भारतवर्ष की सीमा न डरेगी, न काँपेगी।
ड्रैगन फुँफकारे …

Ms. Krithiga Sree

Location: Ramanathapuram,Tamilnadu, INDIA
Occupation: Student
Education: Pursuing Bachelor’s Degree
Age: 17-22
Poem ID: 403
Poem Genre: Other
Poem Length: 22 lines
Poem Creation Date: August 15, 2020
Poem Submission Date: August 15, 2020 at 10:02 am

Poem Title: Our freedom

The british treated the Indians as slaves,
And we were arrested in our own cave.
Lack of unity made them strong;
Won’t we get independence our hearts longed.

Lots of struggles and fights,
But there emerged a non-violence might.
Hundreds of people became prey to the bullet fire..
And it was done by general Dyer

The Brahmin sepoy fired the police station,
That glowed the great revolt of our nation;
The brave lady Rani Laxmi Bai,
Fought against the british with lot of joy.

Atlast,our independence was glown
With lots of life blown,
Let’s salute all the freedom fighters
With unity to make India more brighter.

Ms. Asha bharathi

Location: Karaikudi, INDIA
Occupation: Student
Education: Bachelor’s Degree
Age: 17-22
Poem ID: 401
Poem Genre: Karuna (pathos)
Poem Length: 18 lines
Poem Creation Date: August 15, 2020
Poem Submission Date: August 15, 2020 at 6:21 am

Poem Title: An Orphan child

Oh God !
Tell, what’s the sin committed by me!
To Search my mom and dad,
I’m wandering here and there.
Till I can’t find them,
Who are my precious gems!
I eat well “once in a blue moon”
And I beg in the streets all the noon.
Platform is the place I sleep,
But the rainy days make me weep!
The road traffic is my alarm clock,
That helps me to wake up fast,
The sun is giving the brightest light,
Till it’s not shinning in my life.
Days and months are running away
Still my life is in the dark!
My hopes are in vain
It’s all my unbearable pain!
-By (An OrphanChild )

Mr. Vikas Singh Bungla

Location: New Delhi, Delhi, India
Occupation: Other
Education: Other
Age: 23-28
Poem ID: 400
Poem Genre: Veer (heroic)
Poem Length: 20 lines
Poem Creation Date: July 27, 2020
Poem Submission Date: August 14, 2020 at 4:54 pm

Poem Title: जंबुद्वीपे

नमस्कार, मैं एक भारतवासी हूँ,
सदियों से चली आ रही, इस महान सभयता में,
मैं भी काशी का एक निवासी हूँ
नमस्कार, मैं एक भारतवासी हूँ।

रमज़ान की मीठी खीर हो, या हो दीवाली की बालू शाही,
वो सर पे सजा कश्मीर हो, या हो अकबर का दिन-ए-इलाही,
यहाँ अवधुत के 24 गुरु बस्ते हैं, दिया बुद्ध ने भी आष्टांगिक मार्ग,
नवरोज़ की उस जीवदायिनी सुबह के साथ, मिलते है यहाँ कईं महान गार्ग,
बीहू का मनमोहक नृत्य भी देखा हमने, है देखी पोंगल की महिमा,
वेद और क़ुरान की बातों को संजोए, बाइबिल की भी है अपनी ही गरिमा,
ये सत्य तुम्हें बतलाता हूँ, आओ तुम्हें मैं शून्य से बीज-गणित की ओर ले जाता हूँ,
मैं बस वसुधैव कुटुम्बकम् का अभिलाषी हूँ,
हाँ, मैं एक भारतवासी हूँ।

22 भाषाओं से सजी दुनिया है हमारी, 28 राज्यों का भूखंड भी कहलाए,
उत्तर में बद्री तो दक्षिण में तिरुपति की भक्ति में जन- जन का मन रम जाए,
इस सदियों पुरानी संस्कृति का इक छोटा सा अधिन्यासी हूँ,
नमस्कार, मैं एक भारतवासी हूँ।

Mr. Rahul Kapoor

Location: Jodhpur, India
Occupation: Professional Service
Education: Graduate of Professional Degree
Age: 41-50
Poem ID: 399
Poem Genre: Veer (heroic)
Poem Length: 22 lines
Poem Creation Date: June 5, 2019
Poem Submission Date: August 14, 2020 at 4:18 pm

Poem Title: Azaadi

लिखना चाह रहा हूँ पर मन मैं थोड़ा संशय है,

मुझ नाचीज़ को मिला आज क्रांति का विषय है,

उन वीरों के आगे शब्द बड़े ही हैं बौने,

जिनकी हुंकारों से फिरंगी खोजते थे कोने |

ये गाथा है उन वीरों के इंकलाब की,

रणभूमि मैं फैले हुए एक सैलाब की |

आज़ाद, भगतसिंह और सुभाष के आगे ये सर नतमस्तक है,

जहाँ राजगुरु, बिस्मिल ने भी किया खून से तिलक है |

उन बिरले दीवानों ने नाकों चने चबवाये थे,

गोरे फिरंगिओं को खून के आंसू रुलाये थे |

उनके कण कण मैं तो आज़ादी का जज्बा था,

अपने तिरंगे के आगे बाकी सब एक धब्बा था |

मरमिटे वो बचाने तिरंगे की शान को,

छुड़ा लाये उन गिद्धों से हिंदुस्तान को |

उफ़ तक नहीं होने दी हँसते हँसते मर मिटे,

झूल गए वो फाँसी पर जरा नहीं वो सिमटे |

निर्भयता, निडरता और बड़े हर्ष से कटवा लिए अपने गले,

पर छुड़ा लाये वो प्यारा भारत जो था कभी अंग्रेज़ों तले |

इंकलाब जिंदाबाद उनका प्यारा नारा था,

गैर मुल्कों की ग़ुलामी उनको नहीं गवारा था |

उन शहीदों के कारण ही हिन्द बना खुशहाल है,

ऐसे शूरवीरों को कोटि कोटि प्रणाम है |

Ms. Sharda – Monga

Location: Auckland, New Zealand
Occupation: Other
Education: Graduate of Professional Degree
Age: >70
Poem ID: 398
Poem Genre: Veer (heroic)
Poem Length: 24 lines
Poem Creation Date: January 14, 2011
Poem Submission Date: August 16, 2020 at 5:11 pm

Poem Title: पुनरावृति-

भयंकर प्रलय
.इडा, श्रद्धा, मनु की कहानी,
पुनरावृति-

पुनरावृति-
बारम्बार !!

फिर इस बार !
भीषण संहार.

भयंकर गड़ गड़,
बिजली तड़तड,

नभ-नालों के भुजंग सारे,
पूतना ने पांव पसारे,

धाराओं संग मिल-वीभस्त,
ताण्डवी नाच रही बदहस्त,

जल ही जल, जलमय थल,
सब एकसार, उथल पुथल,

हहराए गिरते पहाड़,
झंजोड़ते झंजावात,

फिसलते गोले,
सोनामी, बबोले,

दैव कुपित विकट,
प्रलय-कगार निकट,

चीख पुकार,
मानुषी प्रलाप,

भयंकर-त्रास,
सत्यानाश !

Mr. Ravi Durgaram Bohra

Location: Mumbai, Maharashtra, India
Occupation: Student
Education: Pursuing Graduate degree
Age: 17-22
Poem ID: 397
Poem Genre: Veer (heroic)
Poem Length: 34 lines
Poem Creation Date: August 13, 2020
Poem Submission Date: August 13, 2020 at 7:41 pm

Poem Title: स्वतंत्रता

स्वतंत्रता

कभी लहू तो कभी उनका कफ़न बन जाऊ
स्वतंत्र दीप से जगमगाता हुआ चमन बन जाऊ
ए आजादी तू घटा बनके बरसना
और में तेरा भीगता हुआ गगन बन जाऊ

क्यों याद दिला रहा हूँ, जो है बात पुरानी
इक अल्फाज नहीं, ये है पूरी एक कहानी
इस मिट्टी में खूं से लिपटी न जाने कई जवानी
वो पटेल आजाद लाल और सुभास तो याद नहीं तुम्हे
लेकिन ये लहराता तिरंगा है इनकी निशानी
जाओ तुम भी क्या याद करोगे
वो अमर वीर क़ुरबानी

आजादी के नाम पर
धर्म अधर्म का खेल खेलते
जिस्मो का रोज नया बाजार खोलते
वो सत्य नेता की तिजोरी में
और अहिंशा चोरो की चोरी में
फिर क्यू खुदको भारतीय बोलते

वो वीर, तीर थे
कभी आग तो कभी प्यार का नीर थे
परछाई भी जिनकी लड़ा करती थी
वही तो भारत बनाने वाले पीर थे
इन्ही से हुआ ये एक देश महान
जिनको कहते हम हिंदुस्तान

लेकिन
भ्रष्ट कपट और अपराध पर करते लोग आज गुमान
आप ही बताओ कैसे कहुँ मैं
मेरा भारत महान…..
मेरा भारत महान……

Mr. Sai Sathwik

Location: Hyderabad, India, Bharat
Occupation: Student
Education: Other
Age: 17-22
Poem ID: 396
Poem Genre: Vibhatsa (odious)
Poem Length: 45 lines
Poem Creation Date: August 13, 2020
Poem Submission Date: August 13, 2020 at 2:29 pm

Poem Title: The Magnificent India

Oh the land in my heart
The continent of the south
By the dearth of my mouth
I present you an ode
What is in my store
To hope the good more
Of your people,land and farm
But for my ode warm
The warmth of a patriot’s heart
Shall you be insulted start..!

Oh the land in my heart
The continent of the south
By the dearth of my mouth
I present you an ode
The horses on you queer
To have a steer
Over your economy
The bequest of your historious monopoly
That you once owned too much a gold
But was that forcibly sold
At the Persian hand
Who landed over your sacred sand
This patriot presents you a horse
A way to you to endorse
Yourself that you are great
The greatest in the worlds’s State..!

Oh the land in my heart
The continent of the south
By the dearth of my mouth
I present you an ode
The countries that once have you stolen
Have been badly broken
Being greive sticken at you prowess..!
Blessed shall be the people born on land
Nothing more to demand
So I came to a stand
To praise you to a strand..!

Oh the land in my heart
The continent of the south
By the dearth of my mouth
I present you an ode..!

Mr. भरत शर्मा

Location: जयपुर, राजस्थान, भारत
Occupation: Government
Education: Graduate of Professional Degree
Age: 51-60
Poem ID: 395
Poem Genre: Other
Poem Length: 22 lines
Poem Creation Date: September 7, 2015
Poem Submission Date: August 13, 2020 at 10:09 am

Poem Title: वन्दे भारत मातरम्

राष्ट्र वंदना

पुण्य प्रसूता पावन धरणी, वन्दे भारत मातरम् ।
अभिनन्दन वंदन भव भरणी, वन्दे भारत मातरम्।।

अभिनन्दन वंदन ………..

शीश मुकुट पर हिमगिरि सोहे, चरण चूमता है सागर।
दसों दिशाएँ धान्य लुटातीं,
भरती हैं इसकी गागर।
शस्य श्यामला वसुंधरा का,
छ: ऋतुएँ श्रृंगार करें।
स्रोत सनातन सूरज चन्दा, उजियारे के शुभ आगर।
परम पुनीता लौकिक तरणी,
वन्दे भारत मातरम्।।

अभिनन्दन वंदन….

शून्य दिया दुनिया को इसने, संस्कार सद्ज्ञान दिया। सत्य-अहिंसा-त्याग-प्रेम से,
मानव का उत्थान किया।
भाईचारा रहे जगत में,
विश्व बंधुता अपनाई।
नैतिकता की रक्षक बनकर,
सब धर्मों को मान दिया।
स्वर्णमयी गाथाओं वरणी,
वन्दे भारत मातरम्।।

अभिनन्दन वंदन…..

निर्माणों की नई डगर की,
भारत भू संवाहक है।
अनुसंधानों की श्रेणी की,
मौन मूक गुण गाहक है।
जीत लिया मंगल का दंगल, दुनिया लोहा मान चुकी।
अद्भुत अनुपम मिली सफलता, चेतनता की वाहक है।
सतत साधना मंगल करणी,
वन्दे भारत मातरम्।।

अभिनन्दन वंदन …….

केसर क्यारी से केरल तक,
प्रेम भावना अमर रहे।
समरसता का उज्ज्वल आँचल, ध्येय साधना अमर रहे।
स्वतंत्रता का सही अर्थ तो, मानवता का पोषण है।
स्वर्ग सरीखी इस धरती की,
पुण्य कामना अमर रहे।
जन-गण-मन की चिंता हरणी, वन्दे भारत मातरम्।।

अभिनन्दन वंदन ….

भरत शर्मा ‘भारत’

18, शिवपुरी, बैंक ऑफ इंडिया के पीछे, कालवाड़ रोड़ झोटवाड़ा, जयपुर – 12 (राजस्थान)

Mr. Rajat Sharma

Location: Melbourne, Australia
Occupation: Teacher
Education: Graduate of Professional Degree
Age: 23-28
Poem ID: 394
Poem Genre: Shringaar (romantic)
Poem Length: 15-29 lines
Poem Creation Date: November 23, 2018
Poem Submission Date: August 13, 2020 at 7:38 am

Poem Title: Haan Mein Darta Hun

Haa ma darta hu,
Par pyaar bahut tujhe mein karta hu..

Mat bat kr bhrose ki,
Jo khud se zyada tujhpe mein karta hu…
Koi cheen le na tujhe mujhse,
Bas is baat pe akar mein darta hu,
Par pyaar bht tujhe ma karta hu..

Aazadi teri ha khushi meri,
Tujhe udne se kabhi inkaaar na krta hu..

Magar,
Magar,
Ik bat yad rakh kar udna ke,

Kai bethe hain in rahon mein,
Pehle se tujhpe apna nishana sadhee,
Keeee, kai bethe ha in raho me,
Pehle se tujhpe apna nishana sadhee.
Isliye
Koi gira na de tujhe un unchaiyo se,
Yuu dekh ke havas ki nigaho se..

Na gherle koi shikanje me,
Jhuthe dhakoslo ke panje me..

Bas isi bat se ma darta hu,
Par tujhe pyar bht mein krta hu…

Chup chup ke tujhpe nigah rakhna ho,
Yan baton baton pr tujhe takna ho..
Chup chup ke tujhpe nigah rakhna ho,
yan baton baton pr tujhe takna ho..

Kisi or se kar batein tujhe,
Kisi or se kar batein tujhe,
dekh kar mera jalna ho,
Isse kabhi yeh na samajhna tum,
Isse Mat samajhna ke tujhpe shak mein krta hu…
Haa ma darta hu,
kyunki tujhe pyaar bahut mein karta hu.

Maa- Baap ho ya Bhai- behan
Nana-nani ho ya koi Sachaa DoSt,

Chand palo ke in rishton se,
Puchle chahe in farishton se,

Ke haal kya ha tere bina mera,
Ke haal kya hai tere bina mera,
Bin pani ke ho machli jaise,

Kahi ulajh na jaye in rishto ke jhuthe janjaal me tu.
Bas isi bat se ma darta hu,
Par tujhe pyaar bahut mein karta hu.

Ant me
(Shayari me bhi ek choti shayari arz hai)

ik roz aazzan krte hue khuda ne mujhse pucha..

Ki kyu krun dua ma kabul teri, jiske liye tu fariyad krta ha

Ki kyu kru dua ma kabul teri, jiske liye tu fariyad krta ha

To mane bhi zid me keh diya

ki mat itrao apni dariyadili pr tum,
Ki mat itrao apni dariyadili pr tum.

Yehi vo fariyad ha jis vja se ye bnda tujhe yad krta ha..

Ms. Rajni Bala

Location: Kartarpur, India
Occupation: House wife
Education: Bachelor’s Degree
Age: 29-35
Poem ID: 393
Poem Genre: Other
Poem Length: 27 lines
Poem Creation Date: May 11, 2020
Poem Submission Date: August 13, 2020 at 5:24 am

Poem Title: औरत

औरत

Ms. Juhi bajpai

Location: Lucknow, INDIA
Occupation: Student
Education: Other
Age: 23-28
Poem ID: 391
Poem Genre: Karuna (pathos)
Poem Length: 16 lines
Poem Creation Date: July 15, 2020
Poem Submission Date: August 13, 2020 at 3:33 am

Poem Title: है यह कोरोना महामारी

शीर्षक:- है यह कोरोना महामारी

है यह कोरोना महामारी, इससे जंग है जारी,
ना जाने कितने इससे ग्रसित हैं, कितनों ने गवायी अपनों की जान प्यारी,
है यह कोरोना महामारी,
रोका है इसने समय का चक्र, अपनों की यारी ठप है सारा काम काज दुनिया कैद है घरों में सारी,
यह है कोरोना महामारी जिस से जंग है जारी,
इस जंग में कौन जीतेगा सवाल है भारी, फिलहाल तो कोरोना ने मारी है बाजी,
है दुविधा कैसे जीतेगी मानवता (दुनिया) सारी, अभी तक तो सारी महा शक्तियां भी इससे हारी,
है यह कोरोना महामारी, जिस से जंग है जारी,
है यह संसार भर की वेदना, कोई तो उपाय होगा खोजना,
वरना मानव को और कीमत चुकानी होगी भारी,
कहीं और देर ना हो जाए यह महामारी विकट रूप ना दिखाएं,
हल करनी होगी समस्या सारी, है यह कोरोना महामारी इससे जंग है जारी,
पर क्या यह सब नया है, नहीं ……मानव ने पहले भी ऐसा बुरा वक्त सहा है,
आखिर मानव मस्तिष्क सब पर भारी है, इसके आगे ठहरी न कोई बीमारी है,
जीतेंगे हम फिर से, हारेगी यह महामारी है ,
है यह कोरोना महामारी इससे लगातार जंग है जारी,

Mr. Ankit bajpai

Location: Lucknow, INDIA
Occupation: Student
Education: Graduate of Professional Degree
Age: 23-28
Poem ID: 390
Poem Genre: Veer (heroic)
Poem Length: 30 lines
Poem Creation Date: June 9, 2017
Poem Submission Date: August 13, 2020 at 3:26 am

Poem Title: वह थे अलबेले वह थे मस्तानी

शीर्षक-: वह थे अलबेले, वह थे मस्ताने

वह थे अलबेले, वह थे मस्ताने,
ना जाने क्या बात थी उनमें,
किस कदर थे देशभक्त वो,
जाने क्या जज्बात थे उनमें,
हंसते हंसते मर जाते थे,
हंसते-हंसते मिट जाते थे,
वह भी अपनी मातृभूमि पर,
ना रुकते थे, ना झुकते थे,
लिए संकल्प डटे रहते थे,
चाहे कठिन हो कितने रसते,
चाहे कठिन हो कितने रसते,
वह थे अलबेले, वो थे मस्ताने

चाहे कितनी गर्म हो धरती,
चाहे हर पल देह हो तपती,
चाहे प्यास के मारे मन,
हार जाए जीवन तन,
पर वह अडिग खड़े रहते थे,
लिए कर्तव्य पथ को हंसते-हंसते,
वो थे अलबेले, वो थे मस्ताने,

चाहे जितना सर्द हो मौसम,
चाहे गिरे ओले या बम,
चाहे जम जाए बर्फ में दबकर यह तन,
चाहे थम जाए ठंड से हृदय की धड़कन,
पर वह हर पल लगे रहते थे,
अपना सब कुछ अर्पण कर,
अपना सब कुछ तर्पण कर,
वहां थे अलबेले, वह थे मस्ताने
ना जाने क्या बात थी उनमें………

Mr. Ankit bajpai

Location: Lucknow up, INDIA
Occupation: Student
Education: Graduate of Professional Degree
Age: 23-28
Poem ID: 389
Poem Genre: Veer (heroic)
Poem Length: 30 lines
Poem Creation Date: June 7, 2011
Poem Submission Date: August 13, 2020 at 3:19 am

Poem Title: मेरी कलम का बस इतना ही अरमान है

शीर्षक-: मेरी कलम का बस इतना ही अरमान है

मेरी कलम का बस इतना ही अरमान है,
यह चले उन शहीदों के लिए,
जिनका भारत की रक्षा में,
अमर गौरव गान है,
जिन्होंने प्राण देकर इस देश का बढ़ाया मान है,
जिन्होंने अपनी जान देकर रखा इसका अभिमान है,
ऐसे हर शहीदों को मेरी कलम का बार-बार सलाम है,
ऐसे शहीदों को मेरी कलम का बार-बार प्रणाम है,
ज्ञात या अज्ञात जिनके नाम है,
सभी को मेरा प्रणाम है,

इस देश के सम्मान पर,
जिन्होंने खुद को कुर्बान कर,
अपने घर को वीरान कर,
अपनों के सपनों को सुनसान कर,
इस देश को दिया नवजीवन का वरदान है,
सरहद पर मरने वाले हर शहीद को,
मेरा बार-बार प्रणाम है,
मेरा बार-बार सलाम है,

जिनके मासूम बच्चों के सपने,
वो थे इकलौते बूढ़े मां बाप के अपने,
किसी के माथे का सुहाग,
बहनों की राखियों का हिसाब,
सब कुछ अर्पण कर बैठे,
इस मिट्टी के नाम,
ऐसे महान दीवानों को,
ऐसे वीर जवानों को,
मेरा सलाम मेरा प्रणाम,
भले ज्ञात ना हो सबके नाम,
ऐसी हर शहीदों को मेरी कलम का बार-बार प्रणाम,
ऐसे हर वीरों को मेरी कलम का बार-बार सलाम|

Ms. Vidushi Rai

Location: Lucknow , Uttar Pradesh, India
Occupation: Student
Education: High School
Age: 17-22
Poem ID: 388
Poem Genre: Veer (heroic)
Poem Length: 17 lines
Poem Creation Date: January 12, 2012
Poem Submission Date: August 12, 2020 at 1:36 pm

Poem Title: ये स्वतंत्रता महान है

ये स्वतंत्रता महान है….
कितने सपूतों की बली ,
मातृभूमि पर चढ़ी ,
तब मिला सम्मान है ,
ये स्वतंत्रता महान है।
प्रगति पथ प्रशस्त हो ,
हर नागरिक आश्वस्त हो ,
प्रखर किरण के ओज सी,
हर आशा प्रचण्ड हो ।
आस तब साकार है,
ये स्वतंत्रता महान है।
उम्मीद पर खरे रहें,
ईमान पर डटे रहें,
देश के सम्मान हेतु ,
चट्टान से जमे रहें।
आस तब साकार है,
ये स्वतंत्रता महान है।

Mr. Gopal Krishna Bhatt ‘Aakul’

Location: KOTA, Rajasthan, India
Occupation: Writer
Education: Other
Age: 61-70
Poem ID: 387
Poem Genre: Veer (heroic)
Poem Length: 25 lines
Poem Creation Date: May 8, 2018
Poem Submission Date: August 12, 2020 at 12:33 pm

Poem Title: मेरा भारत

गीत
मेरा भारत
======

हमारे देश की रक्षा की जब जब बात आई है।
जवानों ने वतन के वासते जाँ तक लुटाई है।
कई तूफान आए और आँधी ने सताया है,
हुआ है एक जुट भारत, अमन की लौ जलाई है।।
हमारे देश की……….’’

रखा है मान वीरों ने, तिरंगे का हिमाचल का।
रखा सम्मान वीरों ने धरा का माँ के आँचल का।
कभी दुश्मन डराता है, करे यदि वार धोखे से,
न की जाँ की कभी परवा, धूल उसको चटाई है।।
हमारे देश की……….’’

कभी बापू, जवाहर, लाल, की आजाद की बातें।
सदा करते हैं, माँ के लाल, सरहद पर यही बातें।
कई किस्से कहानी हैं, कई हैं शौर्य गाथाएँ,
भगत सिंह की शहादत भी, अभी तक ना भुलाई है।।
हमारे देश की……….’’

यहाँ मनती दिवाली है, बड़े चैनो अमन से ही।
यहाँ मिलते गले हैं ईद, होली पर अमन से ही।
यहाँ गंगो जमन की सभ्यता, शिखर को छूती है,
बिरज भूमि है कान्हा ने, यहाँ बंसी बजाई है।।
हमारे देश की……….’’

मेरा भारत कुराने पाक, गीता में नहीं रहता।
मेरा हिन्दोस्ताँ मंदिर या मस्जिद में नहीं रहता।
दिलों में आपके रहता, मेरी साँसों में रहता है,
चमन के ज़र्रे ज़र्रे में इसकी खुशबू समाई है।।
हमारे देश की……….’’

Mr. सतीश कुमार सिन्हा

Location: NORTH 24 PARGANAS, INDIA
Occupation: Government
Education: Bachelor’s Degree
Age: 41-50
Poem ID: 386
Poem Genre: Veer (heroic)
Poem Length: 16 lines
Poem Creation Date: January 25, 2016
Poem Submission Date: August 12, 2020 at 9:47 am

Poem Title: हम हैं भारतवासी

स्वततंत्रता दिवस के मौके पर एलान करते हैं ।
अपने देश के वीर जवानों को सलाम करते हैं ।।

स्वतंत्र हमें कराया, उन्हें सम्मान करते हैं ।
न्योछावर कर दी जान, उनका गुणगान करते हैं ।।

अपना देश महान, उसपर अभिमान करते हैं ।
देश के महान सपूतों को, कोटिश प्रणाम करते हैं ।।

हम देश की प्रगति के लिए, हरदम काम करते हैं ।
हम करते जाते काम, नहीं आराम करते हैं ।।

हम हैं हिन्दुस्तानी इसपर अभिमान करते हैं
शरहद पर मर-मिटने को हम तैयार रहते हैं

नापाक इरादे दुश्मन के हम कभी न सहते हैं
हम अपने सम्मान के खातिर मर मिट जाते हैं

अपने देश के दूश्मन से हम कभी न डरते हैं ।
हम हैं भारतवासी सबको प्रेम सिखाते हैं ।।

शांति भंग जो करना चाहे उसे सबक सिखाते हैं ।
शांति, अहिंसा, भाईचारे का, उसे पाठ पढ़ाते हैं ।।

Ms. Arpita Saxena

Location: Jaipur, Rajasthan, INDIA
Occupation: Professional Service
Education: Graduate of Professional Degree
Age: 23-28
Poem ID: 385
Poem Genre: Shant (peaceful)
Poem Length: 15 lines
Poem Creation Date: August 11, 2020
Poem Submission Date: August 12, 2020 at 7:28 am

Poem Title: Individuality

Over the time, your exterior outlook changes,
But your intentions remain the same,
Your heartbeats stay with you,
But their physical presence ranges!

It is always said that I am with you,
But words loose their effects when the time gets to you!

Don’t worry, your soul says, I will direct you,
But, you start to build shield all around you!

Easy for others that they understand,
As if they’re in my shoe when it all ends!

Might I start my new chapter, it is all my wish,
I, me, myself is my present
Should I include someone in my existence!

Let’s see how this game ends,
Smile and make your way then!

Mr. Nikhilesh Bagade

Location: Maharashtra, India
Occupation: Student
Education: Bachelor’s Degree
Age: 36-40
Poem ID: 384
Poem Genre: Veer (heroic)
Poem Length: 15 lines
Poem Creation Date: September 30, 2019
Poem Submission Date: August 12, 2020 at 6:25 am

Poem Title: अभिमान . . .

परिस्थिति और देश काल को
अनदेखा कर देना।
ठीक नहीं है अकर्मता को
विधि लिखित है कहना।
वीर उठो अब धर्म दंड से
विधान लिखना होगा।
हर कण-कण को करो प्रफुल्लित
अंतर मन को छेडो। १।
तान धनुष को, बाण पे तुम
अभिमान लगा के छोडो। धृ।

कबतक भागोगे स्वधर्म से
कबतक युद्ध टलेगा।
जबतक मन में दुविधा होगी
तबतक युद्ध चलेगा।
देखो वीरा धर्मयुद्ध में
धनुष उठाना होगा।
अबतक तुमको रोकरहे
वो पाश आभासी तोडो। २।
तान धनुष को, बाण पे तुम
अभिमान लगा के छोडो। धृ।

अपने मन को निर्धारित कर
प्रत्यंचा को ओढो।
सारी ऊर्जा लक्ष साधने
एक दिशा में मोडो।
विजय पराजय स्वाभाविक है
जो होना है होगा।
वीरों के इस कर्मयज्ञ में
अपना हिस्सा जोडो। ३।
तान धनुष को, बाण पे तुम
अभिमान लगा के छोडो। धृ।

Ms. Anju Damodaran

Location: Bangalore, Karnataka, India
Occupation: Government
Education: Bachelor’s Degree
Age: 41-50
Poem ID: 382
Poem Genre: Shant (peaceful)
Poem Length: 34 lines
Poem Creation Date: August 12, 2019
Poem Submission Date: August 12, 2020 at 5:16 am

Poem Title: गगनयान…भारत की शान

विहग सा बन व्योम में उड़ जाऊँ,
छोड़ गुरुत्व अंतरिक्ष तक हो आऊँ,
निकट नव नक्षत्र अपलक निहारूँ,
अंतरिक्ष में एक आशियाँ बना लूँ।

माँ पृथ्वी के चरण स्पर्श किए,
हृदय में भव्य भारत छवि लिए,
मैं सुरक्षित स्पेस्सूट आवरण में,
मानो अभेद्य कवच कुंडल कर्ण के।

क्रू कक्ष बना मानव अनुकूल,
ऊर्जा प्रवाह, संचार, हर एक आवश्यकता,
कर रहा पूर्ण सर्विस मॉड्यूल।
समाकलित क्रू एवं सर्विस मॉडयूल,
समाहित जीएसएलवी विशाल के हृदय में,
मानो राम सिया विराजित आंजनेय के हृदय में।

उड़ चले आंजनेय बृहत् विराट,
सिया राम स्थापित अंतरिक्ष कक्षा में,
सौर अपरूपणों का हुआ प्रस्तरण,
किए व्यतीत सात दिवस, किए
नाना प्रकार प्रयोग औ’ परीक्षण।

लहराया तिरंगा आज अंतरिक्ष में,
मानो नक्षत्रों को साथी मिला
तिरंगे की स्वर्णिम आभा से।

अवतरण चरण आरम्भ हुआ,
कुछ ही समय में सर्विस
मॉडयूल भी अलग हुआ।
मन में उल्लास उत्साह है,
नीचे वारिधि वेग प्रवाह है।

किया क्रू मॉडयूल का वेग अवरोधन,
हुआ अवतरण छत्र का प्रसारण,
क्रू मॉडयूल का कोमल जल सम्पर्क,
देखो तैर मुस्कुराया ऐसे, जैसे,
माँ की गोदी में है लालन।
सार्थक हो यह दिव्य स्वपन,
गगनयात्री और सफल गगनयान!!l

Ms. Himanee Bisht

Location: Dehradun, Uttarakhand, INDIA
Occupation: Student
Education: Bachelor’s Degree
Age: 17-22
Poem ID: 381
Poem Genre: Veer (heroic)
Poem Length: 32 lines lines
Poem Creation Date: August 12, 2020
Poem Submission Date: August 12, 2020 at 3:46 am

Poem Title: WAR MEMORIAL

WAR MEMORIAL

Tiranga guards the land of courage, sacrifice and Heroism.
India’s first THE “National War Memorial”.
Adjoining iconic INDIA GATE in the heart of capital
Erected to honor soldiers.

Concentric circles with patriotic beats
Pay homage to our brave immortal men.
Boost up the sense of devotion
Arouse the feeling of nationalism.

Circle of immortality – Amar Chakra
With the central obelisk and an eternal flame.
Engraved with “shaheed ki mazaro par” – symbolises perpetual gratitude to national war deeds.
The love and light lays inside building connections in every dimensions.

Six bronze murals potray
” circle of bravery “- Veerta Chakra
Strengthening the mindset to grow from pain.
Unite to quash the insane.

Tyag Chakra with the names of 25,942 soldiers, inscribed beautifully in Golden letters.
Admirable ” Circle of sacrifices” gives goosebumps.
Then it is understood that – “This is the Glory in Life”

Outermost Rakshak Chakra comprises rows of 600 trees.
Guarding national solidarity of India.
To raise a toast to the life and sacrifices of soldiers.
Still reassuring safety of citizens via “circle of protection”

The ParamVeer Yoddha samarak
For valor and bravery
Is a self Assurance just in different way.
Saluting the sacrifices for our peace.

Beating the Retreat ceremony
A must experience event.
Evening brings down the national flag,
To be hosted again with pride at Sunrise.
Showing steady dedication for lifetime.

Ms. Chanchal Sahu

Location: KARBIANGLONG ASSAM, INDIA
Occupation: Student
Education: High School
Age: 11-16
Poem ID: 379
Poem Genre: Veer (heroic)
Poem Length: 13 lines
Poem Creation Date: August 11, 2020
Poem Submission Date: August 10, 2020 at 7:44 pm

Poem Title: मेरा वतन

स्वतंत्रता दिवस आया है
खुशियों के दिन लाया है
आजादी का नया रंग लाया है
मेरे वतन में एक उमंग सा छाया है
सबसे महान देश मेरा है
जहां ना कोई हिंदू ना मुसलमान का मेला है
जहां लाखों सेनानियों का डेरा है
वही भारत देश मेरा है
देश को अपने सजाएंगे
चारों तरफ तिरंगा लहराएंगे
राष्ट्रगीत गाएंगे
आजादी का पर्व
पूरे गर्व से मनाएंगे