दरीया

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क्या करू मैं तारीफ ‘तेरी,
तू खुद्द एक समा है!
तुझ मैं समा जाऊ ,
तू तो खुद्द एक समंदर है!
इश्क कि हर बाजी तू,
इश्क कि हर नाराजी तू है!
तेरे खयाल सारे मेरे ख्वाब,
उन आँखो का हर लम्हा मेरी जान है!
तुझसे शुरु मेरी दिवानगी,
तुझपे खतम मेरी हर मदहोशी है!
तू तो हर मौसम बरसात,
तुझ मैं समाने का यही तो एक जरिया है!
नदी , समंदार सारे तेरे अंदर,
तुफान तो बस तेरे इश्क मैं है!
तू हि राहत , तू हि चाहत , तू हि मेरी मंजिल,
तुझ तक पहुचने का बस इश्क हि तो दरिया है!

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