देश मेरा दौड़ रहा है

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देश मेरा दौड़ रहा है
देश मेरा दौड़ रहा है , अँधेरी गलियों से होता हुआ .. सूरज की सुनहरी किरणों की और…
लेकिन न जाने क्यों उजाला देखते ही, वो फिर लौट पड़ता है अँधेरे की कोठरी में…
भूल भुलाके इंसान अपनी इंसानियत… कर रहा है अत्याचार…
कही नारी का तो कही समाज की सोच का हो रहा है बलात्कार…
सबके आगे आम इंसान है बस लाचार बस लाचार…
कुएं में डूबा वो मेंढक है आम इंसान… जिसकी सोच बढ़ नहीं पाती..
सरकारी नीतियाँ और देशो की जंग… सपनो के पंख लगने से पहले हे है दबा देती..
उड़ना चाहकर भी वो उड़ नहीं पाता… जबसे परिंदो ने चलना शुरू कर दिया…
अपनी ताकत को जब आम इंसान ने भुला कर खुद ही अपने आप को दीवार के पीछे खड़ा कर दिया…
डरा हुआ है… सहमा हुआ है… बस घर में बैठ के देख रहा है..
दम नहीं है उसमे बाहर आने का… मुँह छुपा के बैठा है दुपट्टा ओड अपनी माँ का…
बैठे बैठे ना तो कभी हुआ है कुछ… जो जीना है अपने लिए.. तो बहार निकल और लड़ना सीख…
आवाज उठानी भी पड़ेंगी.. लाठी खानी भी पड़ेगी…
जहां जरुरत पड़ेगी .. वहां अपनी औकात दिखानी भी पड़ेगी…
ना झुकना है ना रुकना है .. जो है गलत वो ना सहना है…
चल शुरू कर तू चलना मेरे साथ … हम सब मिलकर बने एक हाथ… बस एक हाथ..
ना किसी नेता का ना किसी ज्ञानी का… ये वक़्त है अपनी खुदकी कहानी बनाने का..
चल शुरू कर तू चलना मेरे साथ … हम सब मिलकर बने एक हाथ… बस एक हाथ..

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