धरती ये रोशन हो

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कितना सहा है इसने, बरसों से रात का डर |
कोई तो सुबह हो अब कि धरती ये रोशन हो ||

ये तंत्र हो चुका है, जर्जर, गुलाम तम का |
कुछ दीप तो जलें यूँ, अंधेरा ये दफ़न हो ||
कोई तो सुबह हो…

नेत्रत्व करे जग का, विज्ञान ज्ञान अपना |
मेधावियों का जग के, हम पहला आकर्षण हों ||
कोई तो सुबह हो…

आज़ाद हो अभिव्यक्ति और हो कला शिखर पर |
अपनी कला से प्रेरित, दुनिया के आंदोलन हों ||
कोई तो सुबह हो…

उद्योग और उद्यम, मानक बनें जगत के |
निर्यात से अपने विश्व-व्यापार में जीवन हो ||
कोई तो सुबह हो…

हर धर्म, आस्था का, सम्मान हो बराबर |
सदभावना की मिसाल बनें, कायम ऐसा अमन हो ||
कोई तो सुबह हो…

कृषि और दुग्ध में हों, ना सिर्फ़ आत्मनिर्भर |
निर्यात करें जग को, क्रांतिकारी उत्पादन हो ||
कोई तो सुबह हो…

जब अलविदा कहें हम, कोई कसक रहे ना |
संतुष्टि सी हो मन में, ऐसा वो अंतिम क्षण हो ||
कोई तो सुबह हो…

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