रण

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रण

बरसो से सोया था
वो सिंह दहाड़ उठा है,
छेड़ा है तुमने जिसे
वो नाग फुंकार उठा है ।

बरसो से दबी जनता
आज हुँकार उठी है,
भारत की सोई जवानी
अब पुन: जाग उठी है ।

ब्राह्मणों में लुप्त था वो
दिव्य ज्ञान जाग उठा है,
क्षत्रियों के शास्त्रों से
वही पुराना आग उठा है ।

धरती के गर्भ में पलता
लावा धधक रहा है,
कालिया नाग के दमन हेतु
अब कृष्ण मचल रहा है ।

जगा सकते हो पौरुष तो
कायरता पर तुम चोट करो
अनीति पर तुम टूट पड़ो
अधर्म पर विस्फोट करो ।

वरना, मूक दर्शक सा तुम
कोने में खड़े हो जाओ,
निरीह कीट सा जीवन जी
काल के ग्रास हो जाओ ।

महाभारत का रण है ये
अर्जुन तुम गाण्डीव चलाओ,
बहुत हो चुकी संधि वार्ता
अब अमोघ अस्त्र चलाओ ।

दुश्शासन और दुर्योधन का
भीम तुम संहार करो,
उनके रक्तों से अब तुम
द्रौपदी का श्रृंगार भरो ।

महाराणा , शिवाजी जैसे
देशभक्ति की ललकार बनो ,
अंग्रेजो के छक्के छुड़ाए
वो टीपू की तलवार बनो ।

परिणाम की परवाह ना कर
वीर अब तुम युद्ध करो ,
अपनी वसुधा के कलंको को
रक्तों से अब शुद्ध करो ।

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