वक्र दृष्टि पर पूर्णविराम

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शाश्वत है जाग में वाद-विवाद
अब आज़ादी के इतनी बाद
किंकर्तव्यविमूढ अक़ड़े ना हों
क्षमता पर प्रश्न खड़े ना हों

क्षमता से प्रभावित कण-कण हो
ऐसा अपना प्रक्षेपण हो
गाण्डीव सुसज्जित पार्थ रहें
शर तरकश मे पर्याप्त रहे

जो निर्णय हो, प्रभावी हो
पौरुष प्रारब्ध पे हावी हो
अब ठान लिया तो ठान लिया
पीछे देखेंगे जो होगा

जीवन में जो भी अर्जित हो
राष्ट्र को सहज समर्पित हो
सर्वस्व समर्पण को तत्पर
तन से, मन से, सब नारी- नर

लयबद्ध रहें सबके विचार
मानवता के ना हों प्रकार
निज स्वार्थ में ऐसा ना हो
द्वितिया, प्रथमा के पहले हो

गीता- क़ुरान सहवास करें
सब मिलजुल कर ये प्रयास करें
स्वार्थ रहित संवाद रहे
राष्ट्रगान भी याद रहे

प्रतिबुद्ध समाज, स्वतः इंगित
काया छाया सब परिष्कृत
अव्यक्त, मधुर संवाद सुनें
निज का ही अनाहत नाद सुनें

परितुष्ट, प्रवर प्रजा, परिवेश
सुरभित, सांभ्रांत, समृद्ध देश
सखा, श्रेष्ठ सबको प्रणाम
वक्र दृष्टि पर पूर्णविराम

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