हम

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शायद ईश्वर के पास हमारी आत्माएँ एक रहीं होंगी,
ईश्वर ने उसके दो हिस्से कर के दो मनुष्य बना दिए,
तभी तो हम एक जैसे न होकर , एक दूसरे के पूरक हैं,
जैसे एक ही कागज़ के दो टुकड़े!

तभी तो मुझे बोलना पसंद है, तो तुम्हें सुनना,
मुझे लिखना पसंद है , तो तुम्हें पढ़ना,
तुम्हें गाना पसंद है, और मुझे गाने सुनना।।

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