मुखौटा……

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मेरे व्यक्तित्व का एक हिस्सा
कल खामोश था
न रोष, न जोश
छत – विछत गिरा
खुद के आगोश में था
मेरे व्यक्तित्व का एक हिस्सा…
मुखौटा मेरा
बातें मुझसे ही कर रहा था
रह – रह मुझको देख रहा था
और पूछ रहा था
क्यों मुझको लगाते हो ?
आकर अक्सर पीछे मेरे छिप जाते हो
हँसते कम, खुद को ज्यादा रुलाते हो
क्या हासिल कर लेते हो ?
अक्सर खाली हाथ ही तो घर को आते हो
फिर क्यों .. फिर क्यों, नहीं खुद को आज़माते हो
बेवज़ह ही न मुझको लगाते हो
सुन बातें उसकी,
मैं खामोश था
बेज़ान, पर होश में था
छत बिछात, पर खुद के आग़ोश में था
फ़िज़ाओं में एक अज़ाब का शोर था
दूर क्षितिज पर होने को अब भोर था
डूबा अतीत की स्मृतिओं के मैं
खुद को तलाश रहा था
अंदर ही अंदर खुद को तरास रहा था
और कर रहा था खुद को तैयार
कल के आरम्भ को …..2
सृजित, संचित
दूर मुखौटे से…..
दूर मुखौटे से….

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