“उनकी कुर्बानी”

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(2 ) ” उनकी कुर्बानी”

ये मेरे आजाद देश के लोगों–
ज़रा आखों में लाओं नमी,
आज आजाद हुए हम
हजारों जवान दिए थे उसदिन कुर्बानी !

यह मत भूलों–ये मेरे वतन के लोगों–
कुर्बान हुए थे उसदिन जवान हजारों ;
उनकी माँ-बहन और पिता-पुत्र के लिए
थोड़ी सी आज लाओं आखों में नमी–
मत भूलों मेरे आजाद देशवासी –उनकी कुर्बानी !

घोर अंधेरी तूफानी रातों में
माथे पर बंधें भारत माँ का आँचल की डोरी–
लिए कंधें पर बन्दुक और गोला-वारूद सारी
जुज रहे थे दुश्मनों के गोली के बोछारों के आगे,
उन्हें मत भूलों ये मेरे वतन के लोगों–
ज़रा आज एकबार आखों में लाओं थोरी सी नमी !

लड़ते लड़ते वे गिर पड़े–
गिर पड़े गोली खाकर छाती पे,
जान अभी बाकी था–
पुकार सुनकर वतन के
दुसरे ही पल वे उठ खड़े हुए
बन्दुक उठा लिए भारत माँ के आवाज पर–
भुन कर रख दिए दुश्मनों को–फिर
सलाम देकर वतन को–मिट गए
इस भारत माँ के ही मिट्टी पर !

यह वतन था हम्हारा–रह गया हम्हारा —
पर वतन के जवानें –सरहद के जवानें
माँ के लिए मर-मिट गए–लौटकर नहीं आ पाए,
हो गया आजाद हिन्दुस्ता हम्हारा !
ज़रा आखों में लाओं नमी–
मत भूलों वतन के लोगों
हजारों हिन्दुस्तानी की कुर्बानी !
ये मेरे आजाद देश के लोगों…..लाओं नमी !!

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