एक नयी भारत गाथा

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एक नयी भारत गाथा
रात्रि स्वप्न में शंख बज उठे, आरती सजाये गगन खड़ा
एक मूर्ति दिखी अति परिचित सी , जिसके आगे जग नत हो पड़ा

मैं पूछ उठा फिर सृष्टि से , ये किसका वंदन होता है
सृष्टि बोली हे मानव सुन, भारत का अर्चन होता है

वार्ता चली फिर भारत की, सृष्टि गर्वित बोलने लगी
वेदों कि धरती देव भूमि के , गुणगान में रस घोलने लगी

ये धरती वही जहाँ पुरुषोत्तम ने, मर्यादा का पाठ पढ़ाया था
यहीं वो वृंदावन की बगिया, जहाँ कृष्ण ने रास रचाया था

अगणित संस्कृतियां यहीं, एक दूसरे में आश्रय पातीं थीं
पुण्य सलिला सरिताएं, इस धरती को नहलाती थीं

ऐसे वीरों कि जननी ये, जिनकी गाथाएं जग गाता है
जिनके अमरत्व की धारा से, एक वीर वीरता पाता है

इसकी बालाएं शक्ति स्वरूपा, सिंहनी सी गर्जन करती थीं
वो दुर्गा काली बन रण में, शत्रु का मर्दन करती थीं

सहसा खगकुल के कोमल स्वर से, रात्रि का सपना टूटा
उठ सोच रहा खुद से पूछा, अब किसने भारत को लूटा

यहाँ हवा में करुणा घुल गयी , हैं विषाद की काली रातें
नदियों की चंचलता मलिन, हर ओर हैं हिंसा की बातें

एक पथ पर महल विलासित हैं, दूजे पथ पर क्षुधा चीख रही
भारत पुत्रियों की अस्मत लुटती, मानवता दुर्गुण सीख रही

यहाँ ग्राम देवता सिसक रहा, जो अन्न देव का सानी है
कटते जंगल का रुदन यहाँ, दूषित हुई प्रकृति रानी है

शत्रु अड़े हर पल सीमा पर, एक दुश्मन अंदर भी पलता
हे भारत के पुत्रों तुमने, अभी पायी न सच्ची स्वतंत्रता

जब हर हाथों में काम रहेगा, हर प्राणी सुख की किलकारी करता
जब बेटियां निडर विचरण करतीं, तभी होगी सच्ची स्वतंत्रता

इस हेतु हे भारतवासी सुन ले, मैं युध्धनाद अब करता हूँ
तेरी मृतवत आत्मा में फिर से, नवजीवन अब भरता हूँ

दुविधा की शैया अब छोडो, भारत संतानों जाग पड़ो
एक नयी क्रांति की लहर चली, अब अपने अंदर आग भरो

वसुधैव कुटुम्बकम का नारा, अस्तित्व क्यूँ अपना खोता है
धिक्कार तुझे है हर उस पल, जब कोई भूखा सोता है

कहीं दूर क्षितिज तक चलता आया, अब गंतव्य ज्ञान तो कर
दूर चला अति दूर चला, भारतवासी खुद की पहचान तो कर

स्वतंत्रता के अमर शहीदों की, गाथाओं में नव स्वर भर दे
सब धर्मं एकता की वाणी, अब फिर से मुखरित कर दे

अरिदल अट्टहास करता, तुम तलवारें चमका लो प्यारों
भ्रष्ट खेल अब बहुत हो चुका, विजित करो दिशा चारों

भारत की संस्कृति अमर रहे, इस लौ को भड़काते जाओ
ब्रम्हाण्ड भी चकित रह जाये, वो दामिनी कड़काते जाओ

छिन्न भिन्न कर बाधाओं को, जो खड़ी प्रगति की राहों में
धनी-निर्धन का हाथ पकड़ चल, सबल ले निर्बल को बाँहों में

ये युग क्रांति का अवसर है, क़दमों में मारुत की गति ला
जो चले काल तक रहे अटल, उस विजय भावना की मति ला

गहन अंध के वियावान में, रौशनी करो अब शुभता की
जगद्गुरु सदा जगद्गुरु हो, जय होती रहे सदा उस प्रभुता की

ये देश रहे आदर्श विश्व का, सत संस्कृति का उद्घोष करे
असत कभी विजयी न हो, सब में सत शुभ का जोश भरे

राष्ट्र का कर्ज बहुत तुझपे, अब समय ये कर्ज चुकाने का,
कुछ फर्ज हैं मानवता के नाते, अब समय वो फर्ज निभाने का

भारत जग सिरमौर रहा, वो कांति मलिन न हो पाये
हर प्राणी में समभाव रहे , विषमता का मिलन न हो पाये

अब जग फिर से उद्घोष करे, जय जय भारत, भारती कथा
भारत की संतानों लिख दो, अब एक नयी भारत गाथा

भारत की संतानों लिख दो, अब एक नयी भारत गाथा

-बसन्त सिंह

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