काश मैं तिरंगा होता

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ना हिन्दू का होता, ना मुस्लमान का,
काश मैं तिरंगा होता इस प्यारा हिन्दुस्तान का,
ना मुझे धर्म के तराजू में तौला जाता,
ना ही मुझे लाल और हरे में तोड़ा जाता,
ना राम का होता, ना रेहमान का,
काश मैं तिरंगा होता इस प्यारा हिन्दुस्तान का.
ना मेरा कोई मजहब होता, ना कोई जात,
बिना कोई भेद-भाव के सबको जोड़ रखता एक साथ.
ना मैं गीता में होता, ना मैं कुरान का,
काश मैं तिरंगा होता इस प्यारा हिंदुस्तान का,
ना मैं भगवन का होता, ना मैं इंसान का,
मैं हमेशा प्रतिक होता हर भारतीयों के सम्मान का,
काश मैं तिरंगा होता इस प्यारा हिन्दुस्तान का,
काश मैं तिरंगा होता इस प्यारा हिन्दुस्तान का…

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