ना जाने क्यु

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ना जाने क्यु आज जिंदगीसे इतना डरने लगी हू में..
यु ही बस छोटी छोटीसी बातो पे आंहे भरणे लगी हू में..

ना जाने क्यु इस भीड में सुकून की खामोशी धुंड रही हू में..
ना जाने दिल की राहो में कीस गली मे मूड रही हू में..

आसमान मे उडणे के ख्वाब देखनेको क्यों डगमगा रही हू में..
पंखोंमें हे ताकद पर हौसले गवा रही हू में..

जानती हू में खुदको ऐसी तो नही हू में..
शायद आज दुनिया के सामने खुद जैसी भी नही हू में..

ये सब कश्मकश है क्योंकी इन हाथोमे तेरा हाथ नही है..
जो हिम्मत देता हे मुझे हर दम वो तेरा साथ नही है..
– Deepali

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