सैनिक

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सैनिक

वो सैनिक है आसमान सी छाती लेकर फिरता है,
धरती के हक़ में सुभाष की थाती लेकर फिरता है।

हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर, जिद्दी स्वांसों की हलचल है,
जमा हुआ है रक्त, धौंकनी चलती है, कैसा ये बल है,
अग्निपरीक्षा पल पल देता, सीने में भरकर हुँकार,
खौल उठता है शोणित सुनकर, धरती की एक करुण पुकार,
आसमान भी जिसके आगे, नतमस्तक सा रहता है,
उस एक हिमालय की चोटी से, ऊँचा मस्तक रहता है,
पुत्र नहीं वो भ्रात नहीं वो, पति तो छोडो तात नहीं वो,
अपनी दुनिया छोड़ स्वयं को, पहले सैनिक कहता है,
वो सैनिक है आसमान सी छाती लेकर फिरता है,
धरती के हक़ में सुभाष की थाती लेकर फिरता है।

वो धागा कितना दृढ़ होगा, जिसको कभी न मिली कलाई,
कैसी होगी बहन वो जिसने, सौंप दिया इकलौता भाई,
वो माँ भी कैसी माँ होगी, जो माँ का दर्द समझती है,
घर में बूढी माँ भूखी रहकर भी, बड़ी धनी रहती है,
अपने भूखे जिन्दा अरमानों को, बड़े प्यार से छोड़ किनारे,
बैरागी सन्यासी बनकर, उसी गाँव की साँझ सकारे,
मन में मात्र देश की चिंता, कफ़न बांधकर चलता है,
बंदूकों के साये में जीता है, किञ्चित स्वाँसे बुनता है,
वो सैनिक है आसमान सी छाती लेकर फिरता है,
धरती के हक़ में सुभाष की थाती लेकर फिरता है।

रातों के अधियारों में भी, उसकी नींद जगी रहती है,
अंधड़ रेत सहारों में भी, उसकी आँख खुली रहती है,
स्वप्नों के गलियारों में, उसकी बन्दूक तनी रहती है,
दर्रों मैदान पहाड़ों में, कर्तव्यज्योति जगी रहती है,
नमकीन न हो जाये मिट्टी, वो आँखें सूखी रखता है,
पढ़ने का वक्त नहीं मिलता, एक पाती लेकर फिरता है,
तपते रेगिस्तानों में जब, भू पर आग लगी रहती है,
फिर भी चलता है रक्षा का, दायित्व सँभाले फिरता है,
वो सैनिक है आसमान सी छाती लेकर फिरता है,
धरती के हक़ में सुभाष की थाती लेकर फिरता है।

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